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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

About this granth

The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.

This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.

The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.

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१८० | शुक्रनीतिः

अज्ञातशास्त्रो न ब्रूयाज्ज्योतिषं धर्मनिर्णयम् ॥ ३२२ ॥
नीतिदण्डं चिकित्सां च प्रायश्चित्तं क्रियाफलम् ।

बिना शास्त्रज्ञान के न करने योग्य विषयों का निर्देश— बिना शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किये हुये (मूर्ख) पुरुष को ज्योतिष, धर्म का निर्णय, दण्डनीति या नीति एवं दण्डविषयक विवरण, चिकित्सा, प्रायश्चित्त और किसी कार्य का परिणाम (नतीजा) के विषय में कुछ न करे या न कहे ।

पारतन्त्र्यात्परन्दुःखं न स्वातन्त्र्यात्परं सुखम् ॥ ३२३ ॥
अप्रवासी गृही नित्यं स्वतन्त्रः सुखमेधते ।

पारतन्त्र्य से बढ़कर दुःख और स्वतन्त्रता से बढ़कर सुख न होने का निर्देश— परतन्त्रता (पराधीनता) से बढ़कर दूसरा कोई दुःख और स्वाधीनता से बढ़कर दूसरा कोई सुख नहीं है। एवं प्रवास नहीं करनेवाला तथा स्वाधीन होकर अपने ही घर में रहनेवाला पुरुष सुख प्राप्त करता है।

नूतनप्राक्तनानां च व्यवहारविदां धिया ॥ ३२४ ॥
प्रतिक्षणं चाभिनवो व्यवहारो भवेद्यतः ।
वक्तुं न शक्यते प्रायः प्रत्यक्षादनुमानतः ॥ ३२५ ॥
उपमानेन तज्ज्ञानं भवेदाप्तोपदेशतः ।

प्रत्यक्षादि ४ प्रमाणों से व्यवहार-ज्ञान होने का निर्देश— नवीन तथा प्राचीन व्यवहार में चतुर लोगों की बुद्धि से प्रतिक्षण नये-नये व्यवहार होते रहते हैं अतः प्रायः करके उन सबों का कहना कठिन है इसीसे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा आप्त पुरुषों के उपदेश (शब्द प्रमाण) से उन सबों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।

कथितं तु समासेन सामान्यं नृपराष्ट्रयोः ॥ ३२६ ॥
नीतिशास्त्रं हितायालं यद्विशिष्टं नृपे स्मृतम् ।

इति शुक्रनीतौ नृपराष्ट्रसामान्यलक्षणं नाम तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ।

इस प्रकार से संक्षेपरूप में सामान्यतः (साधारणतया) राजा तथा राष्ट्र (प्रजाजन) दोनों के सम्बन्ध में और विशेषतः केवल राजा के लिये जो नीतिशास्त्र पर्याप्त हितकारक है उसे कहा गया ।

इति शुक्रनीति में नृप-राष्ट्र-सामान्य-लक्षणनामक तृतीय अध्याय समाप्त हुआ ।


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चतुर्थोऽध्यायः

चतुर्थाध्याये प्रथमं प्रकरणम् ।

अथ मिश्रप्रकरणं प्रवक्ष्यामि समासतः ।
लक्षणं सुहृदादीनां समासाच्छृणुताधुना ॥ १ ॥

अब मिश्रप्रकरण ( विविध विषयों का प्रकरण ) संक्षेप से कहता हूँ, उसमें प्रथम सुहृदादियों के लक्षण संक्षेप से इस समय तुम लोग सुनो ।

मित्रं शत्रुश्चतुर्धा स्यादुपकारापकारयोः ।
कर्ता कारयिता चानुमन्ता यश्च सहायकः ॥ २ ॥

**मित्र और शत्रु के प्रकारों का निर्देश—**मनुष्य किसी का उपकार या अपकार करने से क्रम से मित्र या शत्रु होता है जो प्रत्येक करनेवाला, करानेवाला, अनुमति देनेवाला और सहायता करनेवाला इन भेदों से ४ प्रकार का होता है ।

यस्य सुद्रवते चित्तं परदुःखेन सर्वदा ।
इष्टार्थे यततेऽन्यस्य प्रेरितः सत्करोति यः ॥ ३ ॥
आत्मस्त्रीधनगुह्यानां शरणं समये सुहृत् ।
प्रोक्तोत्तमोऽयमन्यश्च द्वित्र्येकपदमित्रकः ॥ ४ ॥

**४ पादों से युक्त उत्तम मित्र के लक्षण—**१. जिसका चित्त दूसरे (मित्र) के दुःख से सदा द्रवीभूत हो जाता है । २. और जो दूसरे (मित्र) के अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिये सदा यत्न करता है । ३. तथा बिना प्रेरणा किये ही स्वयं मित्र का सत्कार करता है । ४. एवं अपने ( मित्र की ) स्त्री, धन और गुह्य विषयों की समय पड़ने पर रक्षा करनेवाला होता है, इस प्रकार ४ पादों से युक्त वह मित्र 'उत्तम' कहलाता है । इससे अन्य अर्थात् योग्यतानुसार न्यून-पादवाला होने से तीन, दो तथा एक पादवाला मित्र कहलाता है । इसका भाव यह है कि—जिसका चित्त मित्र के दुःख से द्रवीभूत होता है, और जो मित्र की अभीष्ट-सिद्धि के लिये यत्न करता है एवं बिना प्रेरणा किये सत्कार करता है वह 'त्रिपदमित्रक' और जिसका चित्त मित्र के दुःख से द्रवीभूत होता है और जो अभीष्ट सिद्धि के लिये यत्न करता है वह 'द्विपदमित्रक' एवं जो केवल मित्र के दुःख से द्रवित चित्तवाला होता है वह 'एकपदमित्रक' कहलाता है ।

अनन्यस्वत्वकामत्वमेकस्मिन् विषये द्वयोः ।
वैरिलक्षणमेतद्वाऽन्येष्टनाशनकारिता ॥ ५ ॥

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१८२ | शुक्रनीतिः

**बैरभाव रखनेवालों के दो लक्षणों का निर्देश—**एक वस्तु के विषय में दो व्यक्तियों का 'अपना १ स्वत्व जमाने की इच्छा रखना' अथवा 'एक दूसरे के अभीष्ट कार्य को नष्ट करना' ये दोनों लक्षण बैरभाव रखनेवालों के हैं।

भ्रातृभावेऽपि तु द्रव्यमखिलं मम वै भवेत् ।
न स्यादेतस्य वश्योऽयं ममैव स्यात् परस्परम् ॥ ६ ॥
भोक्ष्येऽखिलमहं चैतद्विनाऽन्यं स्तः सुवैरिणौ ।
द्वेष्टि द्विष्ट उभौ शत्रू स्तश्चैकतरसंज्ञकौ ॥ ७ ॥

**परम शत्रु और एकतरफा शत्रु भाइयों के लक्षण—**भाई के रहने पर भी 'पिता का सम्पूर्ण द्रव्य मेरा ही हो, इस दूसरे भाई का न हो, यह भाई मेरे ही अधीन रहे मैं इसके अधीन न रहूँ, और मैं इसको अलग रखकर अकेले समग्र वस्तु का उपभोग करूँगा' ऐसा जो परस्पर भाई लोग एक दूसरे के प्रति विचार रखते हैं, वे दोनों 'परमशत्रु' कहलाते हैं। जो केवल द्वेष करता है और जो किसी का द्वेषपात्र होता है वे दोनों 'एकतरफा शत्रु' कहलाते हैं।

शूरस्योत्थानशीलस्य बलनीतिमतः सदा ।
सर्वे मित्रा गूढवैरा नृपाः कालप्रतीक्षकाः ॥ ८ ॥
भवन्तीति किमाश्चर्यं राज्यलुब्धा न ते हि किम् ।
न राज्ञो विद्यते मित्रं राजा मित्रं न कस्य वै ॥ ९ ॥
प्रायः कृत्रिममित्रे ते भवतश्च परस्परम् ।
केचित् स्वभावतो मित्राः शत्रवः सन्ति सर्वदा ॥ १० ॥

राजाओं की परस्पर कृत्रिम-मित्रता का निर्देश—'जो राजा शूर, सदा उन्नति के लिये उद्योगशील एवं बल तथा नीति से युक्त होता है उसके सभी राजा लोग समय की प्रतीक्षा करनेवाले (मौका का इन्तजार करनेवाले) होकर गुप्त रूप से बैरभाव और ऊपर से मित्रभाव रखनेवाले होते हैं' इस पर आश्चर्य करना क्या उचित है ? अर्थात् कभी नहीं। क्योंकि क्या वे (राजा लोग) राज्य के लोभी नहीं हैं अर्थात् अवश्य हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि राजा का कोई मित्र नहीं होता है और राजा भी किसी के मित्र नहीं होते हैं किन्तु प्रायः वे (दोनों राजा) मतलब के लिये परस्पर कृत्रिम मित्र बने रहते हैं। और कोई स्वभावतः सदा मित्र या शत्रु ही होते हैं।

माता मातृकुलं चैव पिता तत्पितरौ तथा ।
पितृपितृव्यात्मकन्या पत्नी तत्कुलमेव च ॥ ११ ॥
पितृमात्रात्मभगिनीकन्यकासन्ततिश्च या ।
प्रजापालो गुरुश्चैव मित्राणि सहजानि हि ॥ १२ ॥

चतुर्थोऽध्याये मित्रप्रकरणम् १८३

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चतुर्थोऽध्याये मित्रप्रकरणम् १८३

सहज मित्र कहलानेवालों का निर्देश—जैसे—माता, माता के कुल के लोग नाना आदि, पिता, पिता के माता-पिता (दादा-दादी), पिता के चाचा, अपनी लड़की, पत्नी, पत्नी के कुल के लोग (ससुरालवाले), पिता की बहिन (फूआ), माता की बहिन (मौसी), अपनी बहिन, कन्या की सन्तान अथवा फुआ और मौसी की लड़की-लड़के, राजा, गुरु ये सब सहज (स्वाभाविक) मित्र होते हैं।

विद्या शौर्यं च दाक्ष्यं च बलं धैर्यं च पञ्चमम्।
मित्राणि सहजान्याहुर्वर्तयन्ति हि तैर्बुधाः॥१३॥

विद्यादि ५ की सहज मित्रता का निर्देश—विद्या, शूरता, चतुरता, बल तथा धीरता ये पांचों भी सहज मित्र कहलाते हैं क्योंकि पण्डित लोग इन्हीं से अपनी जीविका चलाते हैं।

पुत्रो निर्देशवर्त्ती यः स पुत्रोऽन्वर्थनामवान्।
श्रेष्ठ एकस्तु गुणवान् किं शतैरपि निर्गुणैः॥१४॥

सार्थक पुत्र के लक्षण—माता-पिता के आज्ञावशवर्त्ती जो पुत्र होता है वही यथार्थ नामवाला (सार्थक) पुत्र कहलाता है। और एक गुणवान् पुत्र श्रेष्ठ होता है, सैकड़ों निर्गुण (मूर्ख) पुत्रों से क्या? अर्थात् पिता का इनसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है।

स्वभावतो भवन्त्येते हिंस्रो दुर्वृत्त एव च।
ऋणकारी पिता शत्रुर्माता स्त्री व्यभिचारिणी॥१५॥
आत्मपितृभ्रातरश्च तत्स्त्रीपुत्राश्च शत्रवः।

स्वाभाविक शत्रु के लक्षण—स्वभावतः निम्नलिखित ये सब शत्रु होते हैं, जैसे, हिंसाशील, दुराचारी (दुष्ट), ऋण करनेवाला पिता, व्यभिचारिणी माता तथा स्त्री, अपने तथा पिता के भाई लोग (भाई-चाचा) और भाई तथा चाचा के स्त्री-और पुत्र,।

स्नुषा श्वश्रूः सपत्नी च ननान्दा यातरस्तथा॥१६॥

परस्पर शत्रु कहलानेवालों का निर्देश—पतोहू और सास, सौत-सौत, ननद-भौजाई, देवरानी-जेठानी ये सब प्रायः परस्पर शत्रु होती हैं।

मूर्खः पुत्रः कुवैद्यश्चारक्षकस्तु पतिः प्रभुः।
चण्डश्चण्डा प्रजा शत्रुरदाता धनिकश्च यः॥१७॥

मूर्ख पुत्रादिकों की शत्रु संज्ञा का निर्देश—मूर्ख पुत्र, दुष्ट चिकित्सक (प' अर्थ वैद्य), नहीं रक्षा करनेवाला पति (स्वामी), अत्यन्त क्रोधी प्रभु (राजा), अत्यन्त क्रोध करनेवाली प्रजा या सन्तान, नहीं देनेवाला (कंजूस) धनी जो होता है वह शत्रु है।

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१८४ | शुक्रनीतिः

दुष्टानां नृपतिः शत्रुः कुलटानां पतिव्रता ।
साधुः खलानां शत्रुः स्यान्मूर्खाणां बोधको रिपुः ॥ १८ ॥
दुष्टों के लिये राजा, कुलटाओं के लिये पतिव्रता स्त्री, दुर्जनों के लिये सज्जन और मूर्खों के लिये उपदेश देनेवाला शत्रु होता है ।

उपदेशो हि मूर्खाणां क्रोधायैव शमाय न ।
पयः पानं भुजङ्गानां विषायैवामृताय न ॥ १९ ॥
मूर्खों के लिए उपदेश देने का निषेध—क्योंकि—मूर्खों के लिये उपदेश देना केवल क्रोधजनक होता है उससे उसे शान्ति नहीं मिलती है । और सर्पों के लिये दूध पिलाना केवल विषवर्द्धक होता है उससे अमृत नहीं होता है अर्थात् विष के बदले अमृत नहीं निकलता ।

आसमन्ताच्चतुर्दिक्षु सन्निकृष्टाश्च ये नृपाः ।
तत्परास्तत्परा येऽन्ये क्रमाद्धीनबलारयः ॥ २० ॥
शत्रूदासीनमित्राणि क्रमात्ते स्युस्तु प्राकृताः ।
अरिर्मित्रमुदासीनोऽनन्तरस्तत्परः परः ॥ २१ ॥
क्रमशो वा नृपा ज्ञेयाश्चतुर्दिक्षु तथाऽरयः ।
स्वसमीपतरा भृत्या ह्यमात्याद्याश्च कीर्तिताः ॥ २२ ॥
राजाओं के स्वाभाविक शत्रु-उदासीन-मित्र राजाओं के लक्षण—राजा के राज्य के सब तरफ चारों दिशाओं में समीपवर्त्ती एवं उनके बाद पुनः उनके बाद के जो अन्य राजा लोग हैं वे क्रम से स्वाभाविक पास के शत्रु, उसके बाद के उदासीन और पुनः उसके बाद के मित्र होते हैं । और हीन बलवाले शत्रु भी पास के, उसके बाद के पुनः उसके बाद के इस क्रम से शत्रु, उदासीन तथा मित्र होते हैं । और अरि, मित्र और उदासीन राजाओं के भी चारों दिशाओं में पास के, उसके बाद के पुनः उसके बाद के इस क्रम से उनके भी शत्रु, मित्र और उदासीन होते हैं । और अपने अत्यन्त समीपवर्त्ती भृत्य तथा अमात्य (मन्त्री) आदि भी राजा के द्वारा कष्ट दिये जाने पर शत्रु हो जाते हैं ।

बृंहयेत् कर्षयेन्मित्रं हीनाधिकबलं क्रमात् ।
भेदनीयाः कर्षणीयाः पीडनीयाश्च शत्रवः ॥ २३ ॥
विनाशनीयास्ते सर्वे सामादिभिरुपक्रमैः ।
मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश—हीनबल और अधिक बलवाले मित्र राजाओं की भी क्रम से वृद्धि तथा क्षीणता करे। और जो शत्रु राजा लोग हैं उनमें सामादि उपायों से भेद डालना तथा उन्हें क्षीण, पीडित एवं नष्ट करना चाहिये ।

मित्रं शत्रुं यथायोग्यैः कुर्यात् स्ववशवर्तिनम् ॥ २४ ॥
उपायेन यथा व्यालो गजः सिंहोऽपि साध्यते ।

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चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम्
१८४

जिस प्रकार से उपाय द्वारा सर्प, हाथी तथा सिंह को अपने वश में किया जाता है उसी प्रकार से यथायोग्य उपायों से मित्र तथा शत्रु को अपना वशवर्ती बनाना चाहिये ।

भूमिष्ठाः स्वर्गमायान्ति वज्रं भिन्दन्त्युपायतः ॥ २५ ॥

क्योंकि उपाय से मनुष्य भूमि में रहकर स्वर्ग पहुँच जाता है और वज्र को भी विदीर्ण कर देता है ।

सुहृत्संबन्धिस्त्रीपुत्रप्रजाशत्रुषु ते पृथक् ।
सामदानभेददण्डाश्चिन्तनीयाः स्वयुक्तितः ॥ २६ ॥

मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश—
मित्र, संबन्धी, पुत्र, प्रजा और शत्रु इन सबों के विषय में उक्त साम, दान, तथा दण्ड का अपनी युक्ति से पृथक् २ विचार करना चाहिये ।

एकशीलवयोविद्याजातिव्यसनवृत्तयः ।
साहचर्ये भवेन्मित्रमेभिर्यदि तु सार्जवैः ॥ २७ ॥

मित्रता होने के कारणों का निर्देश— जिनके परस्पर स्वभाव, अवस्था, विद्या ( ज्ञान ), जाति, व्यसन ( आदत ), आजीविका ये सब समान हैं वे यदि निष्कपट भाववाले सरल होकर एक जगह मिलते हैं तो मित्र हो जाते हैं ।

त्वत्समस्तु सखा नास्ति मित्रे साम इदं स्मृतम् ।
मम सर्वं तवैवास्ति दानं मित्रे सजीवितम् ॥ २८ ॥

मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण— तुम्हारे समान मेरा दूसरा कोई मित्र नहीं है' ऐसा मित्र के लिये कहना 'साम वाक्य' कहलाता है । और 'जीवन के सहित मेरी सभी वस्तुयें तुम्हारी ही हैं' यह मित्र के लिये कहना 'दान वाक्य' कहलाता है ।

मित्रेऽन्यमित्रसुगुणान् कीर्तयेद् भेदनं हि तत् ।
मित्रे दण्डो न करिष्ये मैत्रीमेवंविधोऽसि चेत् ॥ २६ ॥

भेद तथा दण्ड-वाक्यों के लक्षण— 'मित्र के सामने अन्य मित्र के सुन्दर गुणों की प्रशंसा करना' यह मित्र के लिये 'भेद-वाक्य' और 'तुम यदि ऐसे हो तो मैं तुम्हारे साथ मित्रता नहीं रक्खूंगा' यह कहना मित्र के लिये 'दण्ड-वाक्य' कहलाता है ।

यो न संयोजयेदिष्टमन्यानिष्टमुपेक्षते ।
उदासीनः स न कथं भवेच्छत्रुः सुसान्ध्विकः ॥ ३० ॥

उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश— जो स्वयं अभीष्ट कार्य की सिद्धि

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१८६ | शुक्रनीतिः

न करे और दूसरे के किये हुये अनिष्ट की उपेक्षा करे, वह उदासीन भलीभांति सन्धि करने पर भी क्यों न शत्रु हो अर्थात् सन्धि करने पर भी वह शत्रु ही हो जाता है ।

परस्परमनिष्टं न चिन्तनीयं त्वया मया ।
सुसाहाय्यं हि कर्तव्यं शत्रौ साम प्रकीर्तितम् ॥ ३१ ॥

शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण—'तुम्हें और हमें परस्पर एक दूसरे के अनिष्ट का विचार नहीं रखना चाहिये, बल्कि सहायता ही करनी चाहिये' ऐसा शत्रु के लिये कहना 'सामवाक्य' कहलाता है ।

करैर्वा प्रमितैर्ग्रामैर्वत्सरे प्रबलं रिपुम् ।
तोषयेत्तद्धि दानं स्याद्यथायोग्येषु शत्रुशु ॥ ३२ ॥

शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश—'प्रबल शत्रु को वर्ष में थोड़ा सा कर ( मालगुजारी ) या छोटा सा कोई ग्राम देकर या योग्यतानुसार कुछ देकर संतुष्ट करना' शत्रु के लिये 'दान' कहलाता है ।

शत्रुसाधकहीनत्वकरणात् प्रबलाश्रयात् ।
तद्धीनतोज्जीवनाच्च शत्रुभेदनमुच्यते ॥ ३३ ॥

शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश—'शत्रु के सम्पूर्ण साधनों को हीन बना देना, शत्रु से अधिक बलशाली का आश्रय लेना एवं शत्रु से हीन बलवालों को प्रबल बना देना' इन सबों से 'शत्रु का भेद' होना कहा है ।

दस्युभिः पीडनं शत्रोः कर्षणं धनधान्यतः ।
तच्छिद्रदर्शनादुग्रबलैर्नीत्या प्रभीषणम् ॥ ३४ ॥
प्राप्तयुद्धानिवृत्तित्वैस्त्रासनं दण्ड उच्यते ।

शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश—'डाकुओं से शत्रु को पीड़ा पहुँचाना ( लुटवाना ), धन-धान्य को क्षीण कर देना, दोष देखना, उग्र सेना तथा नीति से अत्यन्त डराना, यदि युद्ध हो रहा हो तो उस पर डटे रहने से त्रास पहुँचाना' ये सब शत्रु के लिये 'दण्ड' कहलाता है ।

क्रियाभेदादुपाया हि भिद्यन्ते च यथार्हतः ॥ ३५ ॥

योग्यतानुसार क्रिया में भिन्नता होने से सामादिक उपायों में भी भिन्नता होती है ।

सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः ।
यथा स्वाभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ३६ ॥

**मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने का निषेध—**नीति के जाननेवाले राजा को हर एक उपायों से यही करना चाहिये कि उसके मित्र, उदासीन तथा शत्रु राजा लोग अपने से अधिक बलवान न होने पावें ।

चतुर्थाध्याये भिन्नप्रकरणम् १८७

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चतुर्थाध्याये भिन्नप्रकरणम् १८७

सामैव प्रथमं श्रेष्ठं दानं तु तदनन्तरम् ।
सर्वदा भेदनं शत्रोर्दण्डनं प्राणसंशये ॥ ३७ ॥

सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश— शत्रु के लिये सर्वप्रथम साम-नीति का व्यवहार करना ही श्रेष्ठ होता है, इससे भी कार्य न होने पर उसके बाद दाननीति का प्रयोग उचित होता है, यदि इससे भी कार्यसिद्धि न हो तो सभी प्रकारों से भेदनीति करनी चाहिये और इसके भी विफल होने पर यदि प्राण-संकट उपस्थित हो जाय तो अन्त में शत्रु के लिये दण्डनीति का प्रयोग उचित होता है।

प्रबलेऽरौ सामदाने साम भेदोऽधिके स्मृतौ ।
भेददण्डौ समे कार्यों दण्डः पूज्यः प्रहीनके ॥ ३८ ॥

शत्रुभेद से सामादिकों की व्यवस्था का निर्देश— अत्यन्त प्रबल शत्रु के लिये साम और दान का, अपने से अधिक बलवान् के लिये साम और भेद का, अपने बराबर के लिये भेद तथा दण्ड का एवं अपने से हीन शत्रु के लिये केवल दण्ड का प्रयोग करना श्रेष्ठ होता है।

मित्रे च सामदाने स्तो न कदा भेददण्डने ।
मित्र के लिये केवल साम-दान के प्रयोग का निर्देश— मित्र के लिये साम तथा दान का ही प्रयोग उचित होता है और कभी भी उसके लिये भेद तथा दण्ड का प्रयोग उचित नहीं होता।

रिपोः प्रजानां संभेदः पीडनं स्वजयाय वै ॥ ३९ ॥
रिपुप्रपीडितानां च साम्ना दानेन संग्रहः ।
गुणवतां च दुष्टानां हितं निर्वासनं सदा ॥ ४० ॥

रिपु-पीडित प्रजाओं का साम-दान से संग्रह करने का निर्देश— शत्रु की प्रजाओं के साथ मेल करके शत्रु को पीड़ा पहुंचाना अपनी विजय का कारण होता है। और शत्रु से पीड़ित लोगों को साम तथा दान से अपने पास संग्रह करना चाहिये। और दुष्ट गुणवानों को भी देश से निकाल देना सदा उचित होता है।

स्वप्रजानां न भेदेन नैव दण्डेन पालनम् ।
कुर्वीत सामदानाभ्यां सर्वदा यत्नमास्थितः ॥ ४१

स्वप्रजाओं का साम-दान से पालन का निर्देश— अपनी प्रजाओं का भेद तथा दंड से नहीं किन्तु यत्नपूर्वक सर्वदा साम तथा दान से ही पालन करना उचित है।

स्वप्रजादण्डभेदैश्च भवेद्राष्ट्रविनाशनम् ।
हीनाधिका यथा न स्युः सदा रक्ष्यास्तथा प्रजाः ॥ ४२ ॥

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१८८ | शुक्रनीतिः

**प्रजाओं के साथ दण्ड तथा भेद के प्रयोग से राज्य-नाशका निर्देश—**अपनो प्रजाओं का दण्ड तथा भेद से पालन करने से राज्य का विनाश हो जाता है। अतः जिस प्रकार से प्रजायें क्षीण-बल और प्रबल न हों किन्तु समबल में रहें उसी प्रकार से उनका पालन करना चाहिये।

निवृत्तिरसदाचाराद्दमनं दण्डतश्च तत् ।
येन संदम्यते जन्तुरुपायो दण्ड एव सः ॥ ४३ ॥

**दण्ड के लक्षण—**दण्ड के द्वारा असत् ( बुरे ) आचरण से निवृत्ति और दमन होता है अतः जिस उपाय से मनुष्य का अच्छी तरह से दमन होता है उसे ‘दण्ड’ कहते हैं।

स उपायो नृपाधीनः स सर्वस्य प्रभूर्यतः ।

वह दण्ड नामक उपाय राजा के अधीन रहता है क्योंकि वही सर्वो का स्वामी है ( अतः दण्ड वही दे सकता है ) ।

निर्भर्त्सनं चापमानोऽनशनं बन्धनं तथा ॥ ४४ ॥
ताडनं द्रव्यहरणं पुरान्निर्वासनाङ्कने ।
व्यस्तक्षौरमसस्थानमङ्गच्छेदो वधस्तथा ॥ ४५ ॥
युद्धमेते ह्युपायाश्च दण्डस्यैव प्रभेदकाः ।

**दण्ड के भेद का निर्देश—**झिड़कना, अपमान ( सम्मान पद से अलग कर देना ), उपवास कराना, बांधना, मारना, धन हर लेना, शहर या राज्य से निकाल देना, दाग देना, बुरे ढङ्ग से सिर मुड़वा देना, गदहे आदि पर चढ़ा देना, किसी अङ्ग ( नाक-कान आदि ) को कटवा देना, प्राणदण्ड देना, युद्ध करना, ये सभी उपाय दण्ड के ही भेद माने जाते हैं।

जायते धर्मनिरताः प्रजा दण्डभयेन च ॥ ४६ ॥
करोत्याधर्षणं नैव तथा चासत्यभाषणम् ।
क्रूराश्च मार्दवं यान्ति दुष्टा दौष्ट्यं त्यजन्ति च ॥ ४७ ॥
पशवोऽपि वशं यान्ति विद्रवन्ति च दस्यवः ।
पिशुना मूकतां यान्ति भयं यान्त्याततायिनः ॥ ४८ ॥
करदाश्च भवन्त्यन्ये वित्रासं यान्ति चापरे ।
अतो दण्डधरो नित्यं स्यान्नृपो धर्मरक्षणे ॥ ४९ ॥

**दण्ड के प्रभाव एवं राजा को धर्मरक्षार्थ दण्डधर होने का निर्देश—**दण्ड के भय से प्रजा अपने २ धर्मों में रत रहती है । और वह किसी दुर्बल पर आक्रमण तथा असत्य-भाषण नहीं करती है। क्रूर लोग कोमलता को धारण कर लेते हैं, दुष्ट लोग दुष्टता को छोड़ देते हैं, पशु भी वश में हो जाते हैं, डाकू लोग भाग जाते हैं, चुगलखोर जबान बन्द कर लेते हैं, आततायी लोग डर

चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८६

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चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८६

जाते हैं, जो कोई कर नहीं देते हैं वे कर देने लग जाते हैं, और जो कोई नहीं डरने वाले होते हैं वे विशेषतः डरने लगते हैं। अतः राजा को नित्य धर्मरक्षार्थ दण्डधर ( दण्ड देनेवाला ) होना चाहिये।

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥ ५० ॥

घमण्डी आदि गुरुजनों को भी दण्ड देने का निर्देश— घमण्डी, कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य कर्म को नहीं जाननेवाला, और कुमार्ग पर चलनेवाले गुरुजन को भी दण्ड देना राजा का कर्त्तव्य होता है।

राज्ञां सदण्डनीत्या हि सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः ।
दण्ड एव हि धर्माणां शरणं परमं स्मृतम् ॥ ५१ ॥

दण्ड-सहित नीति का व्यवहार करने से राजा के सभी कार्य सिद्ध होते हैं, क्योंकि धर्मों का परम रक्षक दण्ड ही माना गया है।

अहिंसैवासाधुहिंसा पशुवच्छ्रुतिचोदनात् ।

दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने का निर्देश— और जैसे वेद की आज्ञा होने से यज्ञ में पशु की हिंसा अहिंसा मानी जाती है वैसे ही दुष्ट पुरुषों की हिंसा भी अहिंसा होती है।

दण्ड्यस्यादण्डनान्नित्यमदण्ड्यस्य च दण्डनात् ॥ ५२ ॥
अतिदण्डाच्च गुणिभिस्त्यज्यते पातकी भवेत् ।

उचितानुचित दण्ड देने से राजा के इष्टानिष्ट-फलकथन का निर्देश— नित्य दण्ड देने योग्य व्यक्ति को दण्ड न देने से, नहीं दण्ड देने योग्य को दण्ड देने से एवं अपराध से अधिक दण्ड देने से विद्वान् लोग ऐसे अनुचित दण्ड देनेवाले राजा का परित्याग कर देते हैं और वह राजा उक्त कर्म से पातकी होता है।

अल्पदानान्महत् पुण्यं दण्डप्रणयनात् फलम् ॥ ५३ ॥
शास्त्रेषूक्तं मुनिवरैः प्रवृत्त्यर्थं भयाय च ।

'अल्प ( थोड़ा जो कुछ ) दान करने से भी बहुत बड़ा पुण्य होता है एवं शास्त्रानुसार दण्ड देने से बहुत बड़ा फल होता है' यह जो शास्त्रों में मुनिवरों ने कहा है, वह क्रम से लोगों को दान में प्रवृत्ति कराने एवं पाप से भयभीत होने के लिये ही कहा है।

अश्वमेधादिभिः पुण्यं तत् किं स्यात् स्तोत्रपाठतः ॥ ५४ ॥
क्षमया यत्तु पुण्यं स्यात्तत्किं दण्डनिपातनात् ।
स्वप्रजादण्डनाच्छ्रेयः कथं राज्ञो भविष्यति ॥ ५५ ॥
तद्दण्डाज्जायते कीर्तिर्धनपुण्यविनाशनम् ।

अश्वमेधादि यज्ञों से जो पुण्य होता है वह क्या केवल स्तोत्रों के पाठमात्र

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१६०शुक्रनीतिः

से होगा ? अर्थात् कभी नहीं। क्षमा करने से जो पुण्य होता है वह क्या दण्ड देने से होगा ? अर्थात् कभी नहीं। अतः अपनी प्रजाओं को दण्ड देने से राजाओं का कैसे कल्याण होगा अर्थात् कभी नहीं, बल्कि उन सर्वो को दण्ड देने से उल्टे राजा की कीर्त्ति, धन तथा पुण्य का नाश ही होगा।

नृपस्य धर्मपूर्णत्वादण्डः कृतयुगे न हि ॥ ५६ ॥
त्रेतायुगे पूर्णदण्डः पादाधर्माः प्रजा यतः ।
द्वापरे चार्धधर्मत्वात् त्रिपादण्डो विधीयते ॥ ५७ ॥
प्रजा निःस्वा राजदौष्ट्याद् दण्डार्धं तु कलौ यथा।

सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम से पूर्ण, पौन एवं अर्ध दण्ड देने का सकारण निर्देश— सत्ययुग में धर्म चारों पादों से परिपूर्ण था, अतः उस समय किसी के लिये भी दण्ड नहीं दिया जाता था, त्रेतायुग में प्रजाओं में तीन पाव ( १२ आने ) धर्म के साथ २ एक पाद ( ४ आने ) अधर्म भी रहता था, अतः उस समय पूर्ण दण्ड दिया जाता था, द्वापरयुग में आधा अंश धर्म और आधा अंश अधर्म अर्थात् दोनों समान भाव से थे, अतः तीन पादों के साथ ( १२ आने ) दण्ड का विधान था तथा कलियुग में राजाओं की दुष्टता से प्रजायें कर अधिक बढ़ जाने से एवं राजा द्वारा धन हरण करने से अत्यन्त निर्धन होती हैं अतः आधा अंश दंड देने का विधान है।

युगप्रर्वतको राजा धर्माधर्मप्रशिक्षणात् ॥ ५८ ॥
युगानां न प्रजानां न दोषः किन्तु नृपस्य हि ।

राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश— प्रजाओं को धर्म तथा अधर्म की शिक्षा देनेवाला राजा के होने से वही सत्ययुग आदि ४ युगों का प्रवर्तक होता है, अतः अधर्म की प्रवृत्ति में युगों का या प्रजाओं का दोष नहीं है अर्थात् युग या प्रजाओं के ऊपर अधर्म भावना नहीं अवलम्बित है प्रत्युत राजा के ऊपर अवलम्बित है अर्थात् राजा के अधार्मिक होने से प्रजाओं में या युग में अधर्म फैलता है।

प्रसन्नो येनं नृपतिस्तदाचरति वै जनः ॥ ५६ ॥
लोभाद्भयाच्च किं तेन शिक्षितं नाचरेत् कथम् ।

धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश— जब कि लोभ से प्रजायें जिससे राजा प्रसन्न हो वैसा आचरण करने लगती हैं तब भला राजा के भय से उसके द्वारा सिखाये जाने पर तदनुसार कैसे नहीं वे चलेंगी -अर्थात् अवश्य चलेंगी।

सुपुण्यो यत्र नृपतिर्धर्मिष्ठास्तत्र हि प्रजाः ॥ ६० ॥
महापापी यत्र राजा तत्राधर्मपरो जनः ।

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चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १६१

जिस राज्य में राजा अत्यन्त धर्मात्मा होता है वहां पर प्रजायें भी धर्मिष्ठ होती हैं और जहां पर राजा अत्यन्त पापी होता है वहां पर प्रजायें भी अधर्म में लीन रहती हैं ।

न कालवर्षी पर्जन्यस्तत्र भूर्न महाफला ॥ ६१ ॥
जायते राष्ट्रह्रासश्च शत्रुवृद्धर्धनक्षयः ।

**पापी राजा के राज्य में समय पर वृष्टि न होने का निर्देश—**और वहां पर अधर्म अधिक होने से मेघ समय पर पानी बरसानेवाला नहीं होता है और पृथ्वी अधिक धान्य तथा फल से युक्त नहीं रहती है, एवं राज्य (देश या राष्ट्र) का दिन-प्रतिदिन ह्रास होने लगता है तथा शत्रुओं की वृद्धि और धन का क्षय होता है ।

सुराप्यपि वरो राजा न स्त्रैणो नातिकोपवान् ॥ ६२ ॥
लोकांश्चण्डस्तापयति स्त्रैणो वर्णान् विलुम्पति ।

**स्त्रैण और क्रोधी होना राजा को निषिद्ध होने का निर्देश—**मद्य (शराब) पीनेवाला राजा अच्छा है किन्तु स्त्री में आसक्त (ऐयाश) तथा अत्यन्त क्रोधी राजा का होना अच्छा नहीं है क्योंकि अत्यन्त क्रोधी राजा लोगों को संताप देता है और स्त्री में आसक्त (लम्पट) राजा ब्राह्मणादि जातियों का लोप कर देता है अर्थात् व्यभिचार द्वारा वर्ण-सङ्कर उत्पन्न करके वर्णों को दूषित कर देता है ।

मद्यप्येकश्च भ्रष्टः स्याद् बुद्ध्या च व्यवहारतः ॥ ६३ ॥
कामक्रोधौ मद्यतमौ सर्वमद्याधिकौ यतः ।

**राजा को काम-क्रोध त्याग करने का निर्देश—**मद्य पीनेवाला अकेले स्वयं बुद्धि तथा व्यवहार में भ्रष्ट होता है किन्तु प्रजाओं की बुद्धि तथा व्यवहार को भ्रष्ट नहीं करता है। और काम तथा क्रोध ये दोनों मद्य से भी अधिक हैं क्योंकि सभी मादक वस्तुओं से बढ़कर मादक होते हैं ।

धनप्राणहरो राजा प्रजायाश्चातिलोभतः ॥ ६४ ॥
तस्मादेतत् त्रयं त्यक्त्वा दण्डधारी भवेन्नृपः ।

**काम, क्रोध तथा लोभ त्याग कर दण्ड देने का निर्देश—**राजा अत्यन्त लोभ से प्रजा का धन तथा प्राण का हरण करनेवाला होता है, इसलिये काम, क्रोध तथा लोभ इन तीनों को छोड़ कर राजा को दण्ड देनेवाला होना चाहिये ।

अन्तर्मृदुर्बहिः क्रूरो भूत्वा स्वां दण्डयेत् प्रजाम् ॥ ६५ ॥
अत्युग्रदण्डकल्पः स्यात् स्वभावाद्धि तकारिणः ।

**'राजा ऊपर से क्रूर होकर दण्ड देवे' इसका निर्देश—**राजा को हृदय में

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१९२ शुक्रनीतिः

कोमलता रखते हुये ऊपर से क्रूर (तीक्ष्ण) होकर अपनी प्रजा को दण्ड देना चाहिये। अर्थात् ऊपर से अत्यन्त कठोर दण्ड देनेवाले के समान और स्वभाव से हितकारी होना चाहिये।

राष्ट्रं कर्णेजपैर्नित्यं हन्यते च स्वभावतः ॥ ६६ ॥
अतो नृपः सूचितोऽपि विमृशेत् कार्यमादरात् ।

चुगुलखोरों से देश नष्ट होने का निर्देश— स्वभावतः चुगुलखोर लोग चुगुलखोरी से परस्पर बिगाड़ कराकर राज्य को नष्ट करने की चेष्टा करते हैं, अतः राजा किसी की चुगुली सुनने पर यत्नपूर्वक विचार कर तदनुसार कार्य करे।

आत्मनश्च प्रजायाश्च दोषदर्शद्युत्तमो नृपः ॥ ६७ ॥
विनियच्छति चात्मानमादौ भृत्यांस्ततः प्रजाः ।

उत्तम राजा के लक्षण तथा स्वयं दोषमुक्त होने का निर्देश— अपने तथा प्रजाओं के दोषों को देखनेवाला राजा उत्तम कहलाता है और वह प्रथम अपने को दोषमुक्त बनाता है पश्चात् भृत्यों को, उसके बाद प्रजाओं को दोषमुक्त बनाता है।

कायिको वाचिको मानसिकः सांसर्गिकस्तथा ॥ ६८ ॥
चतुर्विधोऽपराधः स बुद्धयबुद्धिकृतो द्विधा ।

अपराध के ४ भेद पुनः प्रत्येक के दो-दो भेदों का निर्देश— कायिक (शरीर से होनेवाला), वाचिक (वाणी से होनेवाला), मानसिक (मनसे होनेवाला), सांसर्गिक (संसर्ग से होनेवाला), इस प्रकार से अपराध ४ प्रकार का होता है। और उसमें प्रत्येक बुद्धिकृत (जानबूझ कर होनेवाला) एवं अबुद्धिकृत (बिना जाने होनेवाला) भेद से दो-दो प्रकार का होता है।

पुनर्द्विधा कारितश्च तथा ज्ञेयोऽनुमोदितः ॥ ६९ ॥
सकृदसकृदभ्यस्तस्वभावैः स चतुर्विधः ।

पुनः उक्त अपराधों के २ भेद एवं सभी अपराधों के पुनः ४ भेदों का निर्देश— वह अपराध पुनः दो प्रकार का होता है एक कारित (कराया हुआ) दूसरा अनुमोदित (अनुमोदन किया हुआ) और वह अपराध सकृत्कृत (एक बार किया हुआ), असकृत्कृत (बार-बार किया हुआ), अभ्यस्तकृत (निरन्तर किया हुआ), स्वभावकृत (स्वभाव से किया हुआ) इस प्रकार से ४ प्रकार का होता है।

नेत्रवक्त्रविकाराद्यैर्भावैर्मानसिकं तथा ॥ ७० ॥
क्रियया कायिकं वीक्ष्य वाचिकं क्रूरशब्दतः ।
सांसर्गिकं साहचर्यैर्ज्ञात्वा गौरवलाघवम् ॥ ७१ ॥

प्रथमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डमर्हति ॥ ७२ ॥

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चतुर्थाध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् । १६३

उत्पन्नोत्पत्स्यमानानां कार्याणां दण्डमावहेत् ।

मानसिकादि ४ अपराधों की परीक्षा का निर्देश— नेत्र तथा मुख की भङ्गी आदि भावों से मानसिक अपराध को एवं क्रिया के द्वारा कायिक, कर्कश वचनों से वाचिक और सहवास से सांसर्गिक अपराध के गौरव और लाघव को समझकर उत्पन्न हुये तथा आगे होनेवाले कार्यों (अपराधों) के संबन्ध में दण्डविचार करना चाहिये ।

प्रथमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डमर्हति ॥ ७२ ॥
न्याय्यं किमिति संपृच्छेत् तवैवेयममत्कृतिः ।

दण्ड के योग्य पुरुषों के लक्षण— उत्तम पुरुष यदि प्रथम बार साधारण साहस (चोरी आदि पाप) करे तो क्या यह तुम्हारा कार्य न्याय युक्त हुआ है ? और क्या तुम्हारा ही किया हुआ यह अपराध है । इसको उससे पूछ कर छोड़ देना चाहिये । उसके बाद पुनः करने पर प्रथम साहसदण्ड नामक (२५० पैसों का) दण्ड (जुर्माना) करना चाहिये ।

अपराधं यथोक्तं च द्विगुणं त्रिगुणं ततः ॥ ७३ ॥

यदि उत्तमजन दुबारा वही (अपराध करे तो उससे दूना अर्थात् ५०० पैसों का, तिबारा करे तो ७५० पैसों का दण्ड (जुर्माना) करना चाहिये ।

मध्यमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डमर्हति ।
धिग्दण्डं प्रथमं चाद्यसाहसं तदनन्तरम् ॥ ७४ ॥
यथोक्तं तु तथा सम्यग्यथावृद्धि ह्यनन्तरम् ।

उत्तम पुरुष पूर्वकी अपेक्षा अधिक मध्यम साहस (अपराध) करे तो उसे दण्ड इस प्रकार देना चाहिये अर्थात् उत्तम पुरुष यदि प्रथम उक्त अपराध साधारण रीति से करे तो उसे धिक्कार वचन सुनाकर दण्ड देना चाहिये उसके बाद यदि करे तो प्रथम साहस दण्ड (२५० पैसों का जुर्माना) करना चाहिये उसके बाद अपराधों की वृद्धि के अनुसार उक्त रूप से द्विगुण, त्रिगुण दण्ड (जुर्माना) अच्छी तरह से करे ।

उत्तमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डमर्हति ॥ ७५ ॥
प्रथमं साहसं चादौ मध्यमं तदनन्तरम् ।
यथोक्तं द्विगुणं पश्चादवरोधं ततः परम् ॥ ७६ ॥

उत्तम पुरुष के विषय में प्रथमादि अपराधों के दण्डों का एवं अन्त में रोक देने का निर्देश— और उत्तम पुरुष यदि उत्तम साहस (अत्यधिक अपराध) करे तो इस भांति दण्ड देना चाहिये कि—प्रथम अपराध होने पर प्रथम साहस दण्ड (२५० पैसों का जुर्माना), उसके बाद पुनः अपराध करने पर मध्यम साहस दण्ड (५०० पैसों का जुर्माना), उसके बाद भी अपराधः

१३ शु०

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१६४ | शुक्रनीतिः

करने पर उससे दूना ( १००० पैसों का जुर्माना ) करना चाहिये उसके बाद जेल भेज देना चाहिये ।
बुद्धिपूर्वनृघातेन विनैतद्दण्डकल्पनम् ।
उपरि लिखित दण्ड की व्यवस्था बुद्धिपूर्वक नरहत्या नहीं करनेवालो के लिये ही है, अन्य के लिये नहीं समझनी चाहिये ।
उत्तमत्वं मध्यमत्वं नीचत्वं चात्र कीर्त्यते ॥ ७७ ॥
गुणेनैव तु मुख्यं हि कुलेनापि धनेन च ।
यहाँ पर उत्तम, मध्यम तथा अधम की व्याख्या मुख्य रूपसे, अपराधी के गुण, कुल तथा धन के अनुसार ही समझनी चाहिये ।
प्रथमं साहसं कुर्वन् मध्यमो दण्डमर्हति ॥ ७८ ॥
धिग्दण्डमर्थदण्डं च पूर्णदण्डमनुक्रमात् ।
मध्यम पुरुष यदि प्रथम साहस ( अपराध ) करे तो उसे धिग्दण्ड ( तुम्हें धिक्कार है ऐसा वचन दण्ड ) देना चाहिये, उसके बाद प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का जुर्माना ) का आधा दण्ड ( १२५ पैसों का ) करना चाहिये । उसके बाद पूर्ण दण्ड ( २५० पैसों का ) अनुक्रम से अर्थात् अपराध के बारं बार करने या गौरव-लाघव के क्रम से करना चाहिये ।
द्विगुणं त्रिगुणं पश्चात् संरोधं नीचकर्म च ॥ ७६ ॥
संरोध और नीच कर्म के योग्य पुरुष के लक्षण—उसके बाद प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का ), दुगुना ( ५०० ) तिगुना ( ७५० ) उसके बाद कैद और नीच कर्म ( मल-मूत्रादि साफ करना आदि ) का अपराध के न्यूनाधिक्य के अनुसार दण्ड देना चाहिये ।
मध्यमं साहसं कुर्वन्मध्यमो दण्डमर्हति ।
पूर्वं साहसमादौ तु यथोक्तं द्विगुणं ततः ॥ ८० ॥
ताडनं बन्धनं पश्चात्पुरान्निर्वासनाङ्कने ।
शास्त्रोक्त दण्डनीय पुरुषों के लक्षण—मध्यम पुरुष यदि मध्यम साहस ( अपराध ) करे तो उसे प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का ) पुनः करने पर दूना ( ५०० पैसों का ) उसके बाद मारना-पीटना उसके बाद बांध रखना, पीछे से शहर से या राज्य से निकाल देना, दाग देना इस प्रकार से योग्यतानुसार दण्ड देना चाहिये ।
उत्तमं साहसं कुर्वन् मध्यमो दण्डमर्हति ॥ ८१ ॥
मध्यमं साहसं चादौ यथोक्तं तदनन्तरम् ।
द्विगुणं त्रिगुणं पश्चाद्यावज्जीवं तु बन्धनम् ॥ ८२ ॥
आजीवन बन्धन योग्य पुरुष के लक्षण—मध्यम पुरुष यदि उत्तम साहस

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चतुर्थाध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६५

(अपराध) करे तो इस भांति से दण्ड देना चाहिये कि—प्रथम मध्यम साहस दण्ड (५०० पैसों का), तदनन्तर दुगुना (१००० पैसों का), तिगुना (१५००), पश्चात् आजीवन बांधकर रखना। ये सब योग्यतानुसार करने चाहिये।

प्रथमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ।
अर्धं यथोक्तं द्विगुणं त्रिगुणं बन्धनं ततः ॥ ८३ ॥

अधम पुरुष यदि प्रथम साहस (अपराध) करे तो आधा प्रथम साहस दण्ड (१२५ पैसों का जुर्माना) उसके बाद पूर्ण दण्ड (२५०) पुनः द्विगुण (५०० पैसों का), पुनः त्रिगुण (७५० पैसों का) दण्ड उसके बाद जेल का दण्ड देना चाहिये।

मध्यमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ।
पूर्वसाहसमादौ तु यथोक्तं द्विगुणं ततः ॥ ८४ ॥
ततः संरोधनं नित्यं मार्गसंस्करणार्थकम् ।

मार्गों पर झाडू लगाने योग्य पुरुष के लक्षण— अधम पुरुष यदि मध्यम साहस (अपराध) करे तो उसे पहले प्रथम साहस दण्ड (२५० पैसों का), उसके बाद द्विगुण (५०० पैसों का) दण्ड, उसके बाद कैद तथा नित्य सड़क पर झाडू दिलाने का दण्ड देना चाहिये।

उत्तमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ॥ ८५ ॥
मध्यमं साहसं चादौ यथोक्तं द्विगुणं ततः ।
यावज्जीवं बन्धनं च नीचकर्मैव केवलम् ॥ ८६ ॥

अधम पुरुषों के बारम्बार अपराध करने पर दण्ड का प्रकार— अधम पुरुष यदि उत्तम साहस (अपराध) करे तो उसे प्रथम मध्यम साहस दण्ड (५०० पैसों का) देना चाहिये। उसके बाद द्विगुण दण्ड (२०० पैसों का) उसके बाद आजीवन जेल एवं केवल नीच कार्य (मल-मूत्रादि साफ कराने) का दण्ड देना चाहिये।

हरेत् पादं धनात्तस्य यः कुर्याद्धनगर्वतः ।
पूर्वं ततोऽर्धमखिलं यावज्जीवं तु बन्धनम् ॥ ८७ ॥

धनगर्व से अपराध करने पर दण्ड का निर्देश— जो धन के गर्व से अपराध करे उसे प्रथम बार उसके पास के धन से चौथाई धन दण्ड रूप में ले ले, उसके बाद यदि अपराध करे तो आधा उसके बाद सम्पूर्ण धन छीन ले, उसके बाद आजीवन जेल का दण्ड दे।

सहायगौरवाद् विद्यामदाच्च बलदर्पतः ।
पापं करोति यस्तं तु बन्धयेत् ताडयेत्सदा ॥ ८८ ॥

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१६६ | शुक्रनीतिः

बन्धन तथा ताडन योग्य के लक्षण— जो सहायकों की श्रेष्ठता से पूर्व विद्या या बल के अहङ्कार से पाप (अपराध) करता है उसे सदा कैद में बन्द रखे तथा मारे-पीटे।

भार्या पुत्रश्च भगिनी शिष्यो दासः स्नुषाऽनुजः ।
कृतापराधास्ताड्यास्ते तनुरज्जुसुवेणुभिः ॥ ८९ ॥
पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गे कथञ्चन ।
अतोऽन्यथा तु प्रहरेच्चोरवद्दण्डमर्हति ॥ ९० ॥

पतली रस्सी या छड़ी आदि से मारने योग्य के लक्षण— अपनी स्त्री, पुत्र, बहन (छोटी), शिष्य (छात्र), दास, पुत्रवधू (पतोहू), छोटा भाई यदि अपराध करे तो इन्हें पतली रस्सी या छड़ी से अथवा पतली रस्सी वाले चाबुक से शरीर पर पीठ में मारना चाहिये किन्तु कभी भी शिर में नहीं मारना चाहिये, इससे अन्यथा यदि कोई मारता है तो उसे चोर की भांति दण्ड देना चाहिये ।

नीचकर्मकरं कुर्याद् बन्धयित्वा तु पापिनम् ।
मासमात्रं त्रिमासं वा षण्मासं वाऽपि वत्सरम् ॥ ९१ ॥
यावज्जीवं तु वा कश्चिन्न कश्चिद्वधमर्हति ।

नीच कर्म कराने योग्य अपराधी का निर्देश— किसी भी अपराधी (हत्या करनेवाले को छोड़कर) को एक मास, तीन मास, छ मास, १ वर्ष या आजीवन भर कैद रखकर नीच कर्म (मल-मूत्रादि फिकवाना आदि) का दण्ड देना चाहिये किन्तु किसी को वध का दण्ड नहीं देना चाहिये ।

न हिंस्याच्च भूतानि त्विति जागर्ति वै श्रुतिः ॥ ९२ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वधदण्डं त्यजेन्नृपः ।

वध की शिक्षा कदापि न देने का निर्देश— क्योंकि 'प्राणियों का वध नहीं करना चाहिये' ऐसी श्रुति का वचन (वेद का वचन) है। अतः राजा को अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक वध का दण्ड देना त्याग देना चाहिये ।

अवरोधाद् बन्धनेन ताडनेन च कर्षयेत् ॥ ९३ ॥
लोभान्न कर्षयेद्राजा धनं दण्डेन वै प्रजाम् ।

बल्कि वध दण्ड के बदले, हथकड़ी-बेड़ी के साथ कैद रखना, मारना-पीटना, पीड़ा पहुंचाना उचित है । और राजा को लोभवश धनदण्ड (जुर्माना करने) से प्रजा को पीड़ा न पहुँचानी चाहिये ।

नासहायास्तु पित्राद्या दण्ड्याः स्युरपराधिनः ॥ ९४ ॥
क्षमाशीलस्य वै राज्ञो दण्डग्रहणमीदृशम् ।

सहायहीन अपराधी के माता-पिता आदि को दण्ड न देने का निर्देश—

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चतुर्थोऽध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६७

अपराधी के सहायहीन पिता आदि को दण्ड नहीं देना चाहिये। क्षमाशील राजा को इसी प्रकार से अपराधी के लिये दण्ड देना उचित है।

नापराधं तु क्षमते प्रचण्डो धनहारकः ॥ ६५ ॥
नृपो यदा तदा लोकः क्षुभ्यते भिद्यते परैः।
अतः सुभागदण्डी स्यात् क्षमावान् रञ्जको नृपः ॥ ६६ ॥

राजा जब अपराधी को तीक्ष्ण दण्ड देनेवाला एवं धन हरण करनेवाला होकर अपराध को नहीं क्षमा करता है अर्थात् अनुचित दण्ड देता है तब प्रजा क्षुभित हो उठती है और उसे शत्रु लोग फोड़कर अपनी ओर कर लेते हैं, अतः राजा को जितना अपराध हो उतना ही विचार कर दंड देना चाहिये एवं क्षमाशील तथा प्रजा का अनुरञ्जन करनेवाला होना चाहिये ।

मद्यपः कितवः स्तेनो जारश्चण्डश्च हिंसकः ।
त्यक्तवर्णाश्रमाचारो नास्तिकः शठ एव हि ॥ ६७ ॥
मिथ्याभिशापकः कर्णेजपाथैदेशदूषकौ ।
असत्यवाङ् न्यासहारी तथा वृत्तिविघातकः ॥ ६८ ॥
अन्योदयासहिष्णुश्च ह्युत्कोचग्रहणे रतः ।
अकार्यकृतमित्राणां कार्याणां भेदकस्तथा ॥ ९९ ॥
अनिष्टवाक् परुषवाग् जलारामप्रबाधकः ।
नक्षत्रसूची राजद्विट् कुमन्त्री कूटकार्यवित् ॥ १०० ॥
कुवैद्यामङ्गलाशौचशीलो मार्गनिरोधकः ।
कुसाद्यूद्धतवेशश्च स्वामिद्रोही व्ययाधिकः ॥ १०१ ॥
अग्निदो गरदो वेश्यासक्तः प्रबलदण्डकृत् ।
तथा पाक्षिकसभ्यश्च बलाल्लिखितग्राहकः ॥ १०२ ॥
अन्यायकारी कलहशीले युद्धे पराङ्मुखः ।
साक्ष्यलोपी पितृमातृसतीस्त्रीमित्रद्रोहकः ॥ १०३ ॥
असूयकः शत्रुसेवी मर्मभेदी च वञ्चकः ।
स्वकीयद्विङ्गुप्तवृत्तिर्बुधलो ग्रामकण्टकः ॥ १०४ ॥
बिना कुटुम्बभरणात्तपोविद्यार्थिनः सदा ।
तृणकाष्ठादिहरणे शक्तः सन् भैक्ष्यभोजकः ॥ १०५ ॥
कन्याया अपि विक्रेता कुटुम्बवृत्तिहिंसकः ।
अधर्मा सूचकश्चापि राजानिष्टमुपेक्षकः ॥ १०६ ॥
कुलटा पतिपुत्रघ्नी स्वतन्त्रा वृद्धनिन्दिता ।
गृहकृत्योझिता नित्यं दुष्टाचारा प्रियस्नुषा ॥ १०७ ॥
स्वभावदुष्टानेतान् हि ज्ञात्वा राष्ट्राद् विवासयेत् ।

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१६८शुक्रनीतिः

देश-निष्कासन योग्य अपराधियों के लक्षण—मद्यप (शराबी), धूर्त, चोर, जार (परस्त्रीगामी), अत्यन्त क्रोधी, हिंसा करनेवाला (खूनी), वर्ण (ब्राह्मणादि ४ वर्ण) तथा आश्रम (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास) के अनुकूल आचारों का त्याग करनेवाला, नास्तिक (परलोकादि को नहीं माननेवाला), खल, झूठा दोषारोप करनेवाला, एक को-दूसरे से आपस में कह सुनकर विरोध करानेवाला, अच्छे साधु पुरुषों को दोष लगानेवाला एवं देवताओं को अपवित्र करनेवाला अथवा मूर्त्ति को तोड़नेवाला, झूठ बोलनेवाला, धरोहर को हजम करनेवाला, किसी की जीविका को नष्ट करनेवाला, दूसरी की उन्नति को नहीं सहन करनेवाला, घूस लेने में तत्पर, नहीं करने योग्य बुरे कार्यों को करनेवाला, किसी के गुप्त विचार को प्रकट करनेवाला, किसी के कार्यों को नष्ट करनेवाला, अप्रिय (अनुचित) वचन बोलनेवाला, कठोरभाषी, जलाशय या बगीचे को हानि पहुँचानेवाला, झूठ-मूठ का बना हुआ ज्योतिषी (भाग्य फल बतानेवाला), राजद्रोही, बुरी सलाह देनेवाला (दुष्टमन्त्री), कूट कार्य (जालसाजी) जाननेवाला, कुवैद्य (अनाड़ी वैद्य), अभद्र तथा अपवित्र आचार तथा वेश भूषा रखनेवाला, रास्ता रूधनेवाला, ठीक २ गवाही नहीं देनेवाला, उद्धत वेश रखनेवाला, अपने स्वामी के साथ द्रोह रखनेवाला, अनाप-शनाप व्यय करनेवाला, आग लगानेवाला, विष देनेवाला, वेश्या में आसक्त, अत्यन्त उग्र दंड देनेवाला, अफसर, न्यायालय में सदस्य (जूरी) होकर पक्षपात करनेवाला, बलपूर्वक लिखित पत्र को अन्याय से ग्रहण करनेवाला, अन्याय करनेवाला, झगड़ालू, युद्ध से भाग आनेवाला, गवाही को नहीं माननेवाला या उचित गवाही नहीं देनेवाला, पिता-माता-सती स्त्री-मित्र इनके साथ द्रोह करनेवाला, दूसरे के गुणों में भी दोषारोप करनेवाला, राजा के शत्रुओं की सेवा करनेवाला, मर्मान्तक पीड़ा पहुँचानेवाले वचनों को बोलनेवाला या कार्यों को करनेवाला, ठगनेवाला, आत्मीयों के साथ द्वेष करनेवाला, गुप्त व्यापार (ब्लैक मार्केटिंग-चोर बाजारी) करनेवाला, वृषल (किसी भी धर्म पर आघात पहुँचानेवाला), ग्रामवासियों को पीड़ा पहुंचानेवाला अर्थात् उनके कार्यों में बाधा पहुँचानेवाला, गृहस्थ होकर भी कुटुम्ब का भरण-पोषण न करके सदा तपस्या या विद्या पढ़नेवाला, तृण (घास), काष्ठ आदि लाकर आजीविका चलाने की सामर्थ्य रहने पर भी भिक्षा वृत्ति से पेट पालनेवाला, कन्या को भी बेचनेवाला, कुटुम्ब की आजीविका को घटानेवाला, अधार्मिक (अपने धर्म पर नहीं चलनेवाला), चुगुली करनेवाला अथवा अधर्म की सूचना देनेवाला (पापवार्त्ता करनेवाला), राजा के अनिष्ट की पर्वाह नहीं करनेवाला, ऐसे पुरुषों एवं कुलटा, पति पुत्र की हत्या करनेवाली,

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चतुर्थोऽध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६६

स्वतन्त्र होकर घूमनेवाली, वृद्धजनों से निन्दिता, गृह के कार्यों को छोड़ देनेवाली (न करनेवाली), नित्य दुष्ट आचरण करनेवाली, गुरुजनों के साथ अप्रिय व्यवहार करनेवाली, पतोहू या पतोहुओं के साथ अप्रिय व्यवहार करनेवाली ऐसी स्त्रियों को स्वभावतः दुष्ट जानकर राजा अपने राज्य से निकाल दे।

द्वीपे निर्वासितव्यास्ते बद्धा दुर्गोदरेऽथवा ॥ १०८ ॥
मार्गसंस्करणे योज्याः कदन्नन्यूनभोजनाः।
तत्तज्जात्युक्तकर्माणि कारयीत च तैनृपः ॥ १०९ ॥

मार्ग संरक्षण योग्य का निर्देश— अथवा उक्त मद्यप आदि लोगों को किसी टापू में ले जाकर रखना चाहिये किंवा किसी—किले के भीतर कैद करके रखना चाहिये और वहां पर उन सबों से रास्ता साफ कराना चाहिये एवं खराब अन्न तथा थोड़ी मात्रा में उन्हें भोजन देना चाहिये। और उन सबों से उनके जाति के अनुकूल कर्म राजा को कराना चाहिये।

एवंविधानसाधूंश्च संसर्गेण च दूषितान्।
दण्डयित्वा च सन्मार्गे शिक्षयेत्तान्नृपः सदा ॥ ११० ॥

संसर्ग से दूषित को दण्ड देकर सन्मार्ग की शिक्षा देने का निर्देश— और राजा सदा इस प्रकार से पूर्वोक्त दुष्ट पुरुषों को एवं उनके साथ संसर्ग करने से दुष्ट हुये पुरुषों को दण्ड देकर सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा दे।

राज्ञो राष्ट्रस्य विकृतिं तथा मन्त्रिगणस्य च।
इच्छन्ति शत्रुसम्बन्धाद्ये तान् हन्याद्धि द्राङ्नृपः ॥ १११ ॥

राजादिकों से बिगाड़ करवानेवाले को शीघ्र नष्ट कर देने का निर्देश— और जो राजा राज्य या मन्त्री लोगों को शत्रु से मिलकर हानि पहुंचाना चाहते हों उन्हें राजा शीघ्र वध करने का दण्ड दे।

नेच्छेच्च युगपद्ध्वंसं गणदौष्ट्ये गणस्य च।
एकैकं घातयेद्राजा वत्सोऽश्नाति यथा स्तनम् ॥ ११२ ॥

गणों की दुष्टता करने पर उपाय का निर्देश— यदि बहुत से गण (समूह) दुष्ट हो गये हों तो प्रत्येक गण का एक साथ ही नाश करने की इच्छा राजा को नहीं करनी चाहिये बल्कि उनमें से एक-एक को क्रम से नष्ट करना चाहिये। जैसे बछड़ा एक-एक करके क्रम से स्तनों को पीता है न कि एक साथ ही।

अधर्मशीलो नृपतिर्यदा तं भीषयेज्जनः।
धर्मशीलातिबलवद्रिपोराश्रयतः सदा ॥ ११३ ॥

अधर्मशील राजा को सदैव भय दिलाने को प्रजा के लिये निर्देश— जब राजा अधर्म पर चलनेवाला हो जाय तो प्रजा 'धर्मशील, बलवान् उस राजा