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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 272 of 526

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Page 272

१८६ | शुक्रनीतिः

न करे और दूसरे के किये हुये अनिष्ट की उपेक्षा करे, वह उदासीन भलीभांति सन्धि करने पर भी क्यों न शत्रु हो अर्थात् सन्धि करने पर भी वह शत्रु ही हो जाता है ।

परस्परमनिष्टं न चिन्तनीयं त्वया मया ।
सुसाहाय्यं हि कर्तव्यं शत्रौ साम प्रकीर्तितम् ॥ ३१ ॥

शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण—'तुम्हें और हमें परस्पर एक दूसरे के अनिष्ट का विचार नहीं रखना चाहिये, बल्कि सहायता ही करनी चाहिये' ऐसा शत्रु के लिये कहना 'सामवाक्य' कहलाता है ।

करैर्वा प्रमितैर्ग्रामैर्वत्सरे प्रबलं रिपुम् ।
तोषयेत्तद्धि दानं स्याद्यथायोग्येषु शत्रुशु ॥ ३२ ॥

शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश—'प्रबल शत्रु को वर्ष में थोड़ा सा कर ( मालगुजारी ) या छोटा सा कोई ग्राम देकर या योग्यतानुसार कुछ देकर संतुष्ट करना' शत्रु के लिये 'दान' कहलाता है ।

शत्रुसाधकहीनत्वकरणात् प्रबलाश्रयात् ।
तद्धीनतोज्जीवनाच्च शत्रुभेदनमुच्यते ॥ ३३ ॥

शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश—'शत्रु के सम्पूर्ण साधनों को हीन बना देना, शत्रु से अधिक बलशाली का आश्रय लेना एवं शत्रु से हीन बलवालों को प्रबल बना देना' इन सबों से 'शत्रु का भेद' होना कहा है ।

दस्युभिः पीडनं शत्रोः कर्षणं धनधान्यतः ।
तच्छिद्रदर्शनादुग्रबलैर्नीत्या प्रभीषणम् ॥ ३४ ॥
प्राप्तयुद्धानिवृत्तित्वैस्त्रासनं दण्ड उच्यते ।

शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश—'डाकुओं से शत्रु को पीड़ा पहुँचाना ( लुटवाना ), धन-धान्य को क्षीण कर देना, दोष देखना, उग्र सेना तथा नीति से अत्यन्त डराना, यदि युद्ध हो रहा हो तो उस पर डटे रहने से त्रास पहुँचाना' ये सब शत्रु के लिये 'दण्ड' कहलाता है ।

क्रियाभेदादुपाया हि भिद्यन्ते च यथार्हतः ॥ ३५ ॥

योग्यतानुसार क्रिया में भिन्नता होने से सामादिक उपायों में भी भिन्नता होती है ।

सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः ।
यथा स्वाभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ३६ ॥

**मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने का निषेध—**नीति के जाननेवाले राजा को हर एक उपायों से यही करना चाहिये कि उसके मित्र, उदासीन तथा शत्रु राजा लोग अपने से अधिक बलवान न होने पावें ।