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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 275 of 526

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Page 275

चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८६

जाते हैं, जो कोई कर नहीं देते हैं वे कर देने लग जाते हैं, और जो कोई नहीं डरने वाले होते हैं वे विशेषतः डरने लगते हैं। अतः राजा को नित्य धर्मरक्षार्थ दण्डधर ( दण्ड देनेवाला ) होना चाहिये।

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥ ५० ॥

घमण्डी आदि गुरुजनों को भी दण्ड देने का निर्देश— घमण्डी, कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य कर्म को नहीं जाननेवाला, और कुमार्ग पर चलनेवाले गुरुजन को भी दण्ड देना राजा का कर्त्तव्य होता है।

राज्ञां सदण्डनीत्या हि सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः ।
दण्ड एव हि धर्माणां शरणं परमं स्मृतम् ॥ ५१ ॥

दण्ड-सहित नीति का व्यवहार करने से राजा के सभी कार्य सिद्ध होते हैं, क्योंकि धर्मों का परम रक्षक दण्ड ही माना गया है।

अहिंसैवासाधुहिंसा पशुवच्छ्रुतिचोदनात् ।

दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने का निर्देश— और जैसे वेद की आज्ञा होने से यज्ञ में पशु की हिंसा अहिंसा मानी जाती है वैसे ही दुष्ट पुरुषों की हिंसा भी अहिंसा होती है।

दण्ड्यस्यादण्डनान्नित्यमदण्ड्यस्य च दण्डनात् ॥ ५२ ॥
अतिदण्डाच्च गुणिभिस्त्यज्यते पातकी भवेत् ।

उचितानुचित दण्ड देने से राजा के इष्टानिष्ट-फलकथन का निर्देश— नित्य दण्ड देने योग्य व्यक्ति को दण्ड न देने से, नहीं दण्ड देने योग्य को दण्ड देने से एवं अपराध से अधिक दण्ड देने से विद्वान् लोग ऐसे अनुचित दण्ड देनेवाले राजा का परित्याग कर देते हैं और वह राजा उक्त कर्म से पातकी होता है।

अल्पदानान्महत् पुण्यं दण्डप्रणयनात् फलम् ॥ ५३ ॥
शास्त्रेषूक्तं मुनिवरैः प्रवृत्त्यर्थं भयाय च ।

'अल्प ( थोड़ा जो कुछ ) दान करने से भी बहुत बड़ा पुण्य होता है एवं शास्त्रानुसार दण्ड देने से बहुत बड़ा फल होता है' यह जो शास्त्रों में मुनिवरों ने कहा है, वह क्रम से लोगों को दान में प्रवृत्ति कराने एवं पाप से भयभीत होने के लिये ही कहा है।

अश्वमेधादिभिः पुण्यं तत् किं स्यात् स्तोत्रपाठतः ॥ ५४ ॥
क्षमया यत्तु पुण्यं स्यात्तत्किं दण्डनिपातनात् ।
स्वप्रजादण्डनाच्छ्रेयः कथं राज्ञो भविष्यति ॥ ५५ ॥
तद्दण्डाज्जायते कीर्तिर्धनपुण्यविनाशनम् ।

अश्वमेधादि यज्ञों से जो पुण्य होता है वह क्या केवल स्तोत्रों के पाठमात्र