शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १६१
जिस राज्य में राजा अत्यन्त धर्मात्मा होता है वहां पर प्रजायें भी धर्मिष्ठ होती हैं और जहां पर राजा अत्यन्त पापी होता है वहां पर प्रजायें भी अधर्म में लीन रहती हैं ।
न कालवर्षी पर्जन्यस्तत्र भूर्न महाफला ॥ ६१ ॥
जायते राष्ट्रह्रासश्च शत्रुवृद्धर्धनक्षयः ।
**पापी राजा के राज्य में समय पर वृष्टि न होने का निर्देश—**और वहां पर अधर्म अधिक होने से मेघ समय पर पानी बरसानेवाला नहीं होता है और पृथ्वी अधिक धान्य तथा फल से युक्त नहीं रहती है, एवं राज्य (देश या राष्ट्र) का दिन-प्रतिदिन ह्रास होने लगता है तथा शत्रुओं की वृद्धि और धन का क्षय होता है ।
सुराप्यपि वरो राजा न स्त्रैणो नातिकोपवान् ॥ ६२ ॥
लोकांश्चण्डस्तापयति स्त्रैणो वर्णान् विलुम्पति ।
**स्त्रैण और क्रोधी होना राजा को निषिद्ध होने का निर्देश—**मद्य (शराब) पीनेवाला राजा अच्छा है किन्तु स्त्री में आसक्त (ऐयाश) तथा अत्यन्त क्रोधी राजा का होना अच्छा नहीं है क्योंकि अत्यन्त क्रोधी राजा लोगों को संताप देता है और स्त्री में आसक्त (लम्पट) राजा ब्राह्मणादि जातियों का लोप कर देता है अर्थात् व्यभिचार द्वारा वर्ण-सङ्कर उत्पन्न करके वर्णों को दूषित कर देता है ।
मद्यप्येकश्च भ्रष्टः स्याद् बुद्ध्या च व्यवहारतः ॥ ६३ ॥
कामक्रोधौ मद्यतमौ सर्वमद्याधिकौ यतः ।
**राजा को काम-क्रोध त्याग करने का निर्देश—**मद्य पीनेवाला अकेले स्वयं बुद्धि तथा व्यवहार में भ्रष्ट होता है किन्तु प्रजाओं की बुद्धि तथा व्यवहार को भ्रष्ट नहीं करता है। और काम तथा क्रोध ये दोनों मद्य से भी अधिक हैं क्योंकि सभी मादक वस्तुओं से बढ़कर मादक होते हैं ।
धनप्राणहरो राजा प्रजायाश्चातिलोभतः ॥ ६४ ॥
तस्मादेतत् त्रयं त्यक्त्वा दण्डधारी भवेन्नृपः ।
**काम, क्रोध तथा लोभ त्याग कर दण्ड देने का निर्देश—**राजा अत्यन्त लोभ से प्रजा का धन तथा प्राण का हरण करनेवाला होता है, इसलिये काम, क्रोध तथा लोभ इन तीनों को छोड़ कर राजा को दण्ड देनेवाला होना चाहिये ।
अन्तर्मृदुर्बहिः क्रूरो भूत्वा स्वां दण्डयेत् प्रजाम् ॥ ६५ ॥
अत्युग्रदण्डकल्पः स्यात् स्वभावाद्धि तकारिणः ।
**'राजा ऊपर से क्रूर होकर दण्ड देवे' इसका निर्देश—**राजा को हृदय में