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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 267 of 526

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Page 267

चतुर्थोऽध्यायः

चतुर्थाध्याये प्रथमं प्रकरणम् ।

अथ मिश्रप्रकरणं प्रवक्ष्यामि समासतः ।
लक्षणं सुहृदादीनां समासाच्छृणुताधुना ॥ १ ॥

अब मिश्रप्रकरण ( विविध विषयों का प्रकरण ) संक्षेप से कहता हूँ, उसमें प्रथम सुहृदादियों के लक्षण संक्षेप से इस समय तुम लोग सुनो ।

मित्रं शत्रुश्चतुर्धा स्यादुपकारापकारयोः ।
कर्ता कारयिता चानुमन्ता यश्च सहायकः ॥ २ ॥

**मित्र और शत्रु के प्रकारों का निर्देश—**मनुष्य किसी का उपकार या अपकार करने से क्रम से मित्र या शत्रु होता है जो प्रत्येक करनेवाला, करानेवाला, अनुमति देनेवाला और सहायता करनेवाला इन भेदों से ४ प्रकार का होता है ।

यस्य सुद्रवते चित्तं परदुःखेन सर्वदा ।
इष्टार्थे यततेऽन्यस्य प्रेरितः सत्करोति यः ॥ ३ ॥
आत्मस्त्रीधनगुह्यानां शरणं समये सुहृत् ।
प्रोक्तोत्तमोऽयमन्यश्च द्वित्र्येकपदमित्रकः ॥ ४ ॥

**४ पादों से युक्त उत्तम मित्र के लक्षण—**१. जिसका चित्त दूसरे (मित्र) के दुःख से सदा द्रवीभूत हो जाता है । २. और जो दूसरे (मित्र) के अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिये सदा यत्न करता है । ३. तथा बिना प्रेरणा किये ही स्वयं मित्र का सत्कार करता है । ४. एवं अपने ( मित्र की ) स्त्री, धन और गुह्य विषयों की समय पड़ने पर रक्षा करनेवाला होता है, इस प्रकार ४ पादों से युक्त वह मित्र 'उत्तम' कहलाता है । इससे अन्य अर्थात् योग्यतानुसार न्यून-पादवाला होने से तीन, दो तथा एक पादवाला मित्र कहलाता है । इसका भाव यह है कि—जिसका चित्त मित्र के दुःख से द्रवीभूत होता है, और जो मित्र की अभीष्ट-सिद्धि के लिये यत्न करता है एवं बिना प्रेरणा किये सत्कार करता है वह 'त्रिपदमित्रक' और जिसका चित्त मित्र के दुःख से द्रवीभूत होता है और जो अभीष्ट सिद्धि के लिये यत्न करता है वह 'द्विपदमित्रक' एवं जो केवल मित्र के दुःख से द्रवित चित्तवाला होता है वह 'एकपदमित्रक' कहलाता है ।

अनन्यस्वत्वकामत्वमेकस्मिन् विषये द्वयोः ।
वैरिलक्षणमेतद्वाऽन्येष्टनाशनकारिता ॥ ५ ॥