Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 273 of 526

Read in context
Page 273

चतुर्थाध्याये भिन्नप्रकरणम् १८७

सामैव प्रथमं श्रेष्ठं दानं तु तदनन्तरम् ।
सर्वदा भेदनं शत्रोर्दण्डनं प्राणसंशये ॥ ३७ ॥

सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश— शत्रु के लिये सर्वप्रथम साम-नीति का व्यवहार करना ही श्रेष्ठ होता है, इससे भी कार्य न होने पर उसके बाद दाननीति का प्रयोग उचित होता है, यदि इससे भी कार्यसिद्धि न हो तो सभी प्रकारों से भेदनीति करनी चाहिये और इसके भी विफल होने पर यदि प्राण-संकट उपस्थित हो जाय तो अन्त में शत्रु के लिये दण्डनीति का प्रयोग उचित होता है।

प्रबलेऽरौ सामदाने साम भेदोऽधिके स्मृतौ ।
भेददण्डौ समे कार्यों दण्डः पूज्यः प्रहीनके ॥ ३८ ॥

शत्रुभेद से सामादिकों की व्यवस्था का निर्देश— अत्यन्त प्रबल शत्रु के लिये साम और दान का, अपने से अधिक बलवान् के लिये साम और भेद का, अपने बराबर के लिये भेद तथा दण्ड का एवं अपने से हीन शत्रु के लिये केवल दण्ड का प्रयोग करना श्रेष्ठ होता है।

मित्रे च सामदाने स्तो न कदा भेददण्डने ।
मित्र के लिये केवल साम-दान के प्रयोग का निर्देश— मित्र के लिये साम तथा दान का ही प्रयोग उचित होता है और कभी भी उसके लिये भेद तथा दण्ड का प्रयोग उचित नहीं होता।

रिपोः प्रजानां संभेदः पीडनं स्वजयाय वै ॥ ३९ ॥
रिपुप्रपीडितानां च साम्ना दानेन संग्रहः ।
गुणवतां च दुष्टानां हितं निर्वासनं सदा ॥ ४० ॥

रिपु-पीडित प्रजाओं का साम-दान से संग्रह करने का निर्देश— शत्रु की प्रजाओं के साथ मेल करके शत्रु को पीड़ा पहुंचाना अपनी विजय का कारण होता है। और शत्रु से पीड़ित लोगों को साम तथा दान से अपने पास संग्रह करना चाहिये। और दुष्ट गुणवानों को भी देश से निकाल देना सदा उचित होता है।

स्वप्रजानां न भेदेन नैव दण्डेन पालनम् ।
कुर्वीत सामदानाभ्यां सर्वदा यत्नमास्थितः ॥ ४१

स्वप्रजाओं का साम-दान से पालन का निर्देश— अपनी प्रजाओं का भेद तथा दंड से नहीं किन्तु यत्नपूर्वक सर्वदा साम तथा दान से ही पालन करना उचित है।

स्वप्रजादण्डभेदैश्च भवेद्राष्ट्रविनाशनम् ।
हीनाधिका यथा न स्युः सदा रक्ष्यास्तथा प्रजाः ॥ ४२ ॥