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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

About this granth

The Shatapatha Brahmana (शतपथ ब्राह्मण), the Brahmana of the White Yajurveda, is the largest and most important work of Vedic prose. Named for its hundred chapters and linked by tradition to the sage Yajnavalkya, it has fourteen books in the Madhyandina recension. It explains the procedure and meaning of the new- and full-moon offerings, the setting up of the fires, the agnihotra, the soma sacrifice, the building of the fire altar and the horse sacrifice, and its final part contains the Brihadaranyaka Upanishad. The first book includes the well-known story of Manu and the fish in the great flood.

This is the first of three volumes. The text follows Albrecht Weber's edition, with the Hindi translation (Ratnadipika) of Pandit Gangaprasad Upadhyaya, edited by Swami Satyaprakash Saraswati. Introductions on the Brahmanas and on the accent marks, a note on the translation, an English preface and contents precede the text, which runs by kanda, adhyaya and brahmana. This scan is of the 2014 Govindram Hasanand edition, 699 pages.

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५७२ शतपथ ब्राह्मण
पतिर्यज्ञस्याथ प्रतिहर्त्ता भृग्वा व्यानो वा ॥ ३ ॥ तान्वाऽएतान् । पञ्चर्त्विजो
यजमानोऽन्वारभतऽएतावान्वै सर्वो यज्ञो यावन्त एते पञ्चर्त्विजो भवन्ति पाङ्क्तो
वै यज्ञस्तद्यज्ञमेवैतद्यजमानोऽन्वारभते ॥ ४ ॥ अथान्यत्तरत्तृणम् । चात्वाल्लमभिप्रा-
स्यति देवानामूत्क्रमणमसीति यत्र वै देवा यज्ञेन स्वर्गं लोकँ समाश्रुवत त
ऽएतस्माच्चात्वाल्लादूर्ध्वाः स्वर्गं लोकमुपोदक्रामंस्तद्यजमानमेवैतत्स्वर्ग्यं पन्थानमनु-
संख्यापयति ॥ ५ ॥ अथान्यत्तरत्तृणम् । पुरस्तादुद्गातॄणामुपास्यति तूष्णीमेव स्तोमो
वाऽएष प्रजापतिर्यदुद्गातारः स इदँ सर्वं युतऽइदँ सर्वँ सम्भवति तस्माऽए-
वैतत्त्तृणमपिदधाति तथो ह्यार्ध्र्यु न युंते नैनँ सम्भवत्यथ यदा जपन्ति जपन्ति
ह्येवैतदुद्गातारः ॥ ६ ॥ अथ स्तोत्रमुपाकरोति । सोमः पवतेऽइति स वै परागेव
स्तोत्रमुपाकरोति पराञ्च स्तुवते देवान्वाऽएतानि स्तोत्राण्यभ्युपावृत्तानि प्रत्यव-
मानाः पराञ्चो ह्येतैर्देवाः स्वर्गं लोकँ समाश्रुवत तस्मात्परागेव स्तोत्रमुपाक-
रोति पराञ्च स्तुवते ॥ ७ ॥ उपावर्त्तध्वमिति वाऽअन्यानि स्तोत्राणि । ऽअभ्यावर्त्त
ध्युर्यै स्तुवतऽइमा वै प्रजा एतानि स्तोत्राण्यभ्युपावृत्तास्तस्मादिमाः प्रजाः पुनर-
भ्यावर्त्तं प्रजायन्ते ॥ ८ ॥ अथ यदत्र बहिष्पवमानेन स्तुवते । अत्र ह वाऽअसा-
वग्रऽआदित्य आस तमृतवः परिगृह्यैवात ऊर्ध्वाः स्वर्गं लोकमुपोदक्रामंस्त एष
ऋतुषु प्रतिष्ठितस्तपति तथो ऽएवैतदृषिजो यजमानं परिगृह्यैवात ऊर्ध्वाः स्वर्गं
लोकमुपोत्क्रामन्ति तस्मादत्र बहिष्पवमानेन स्तुवते ॥ ९ ॥ नौर्ह वाऽएषा
स्वर्ग्या । यद्बहिष्पवमानं तस्या ऋत्विज एव स्फ्याश्चारित्राश्च स्वर्गस्य लोकस्य
सम्पारणास्तस्या रुक एव मज्जयिता य एव निन्यः स यथा पूर्णामम्भारुह्य मज्ज-
येदेवँ हैनाँ स मज्जयति तद्धे सर्व एव यज्ञो नौः स्वर्ग्या तस्माडु सर्वस्मादेव
यज्ञान्निन्द्य परिबिबाधिषेत ॥ १० ॥ अथ स्तुतऽएतां वाचं वदति । अग्नीदग्नीन्व-
हर बर्हि स्तृणीहि पुरोडाशाँ२ऽअलंकुरु पशूनेकेति विह्वरत्यग्नीदग्नीत्समिन्ध

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कां० ४, अ० २, ब्रा० ५, कं० ३-११ शतपथब्राह्मण / ५७३
आत्मा या प्रजापति के रूप में, फिर प्रतिहर्ता चिकित्सक या व्यान के रूप में ॥३॥
इन पाँचों को यजमान पीछे से साधता है। इतना ही तो सब यज्ञ है जितने ये पाँच
ऋत्विज हैं। यज्ञ पाँच भाग वाला है। इसलिए यजमान इस प्रकार इस यज्ञ को साधता है ॥४॥
अब अध्वर्यु एक तिनके को चात्वाल पर फेंक देता है, यह कहकर— "देवानामूत्क्रमण-
मसि” (यजु० ७।२६) — “तू देवताओं की सीढ़ी है" (स्वर्ग जाने के लिए)। जब देव यज्ञ से
स्वर्गलोक को गये तो इस चात्वाल से ऊपर उठकर स्वर्गलोक को गये। इस प्रकार वह यजमान
को भी स्वर्ग का रास्ता बताता है ॥५॥
दूसरे तिनके को वह उद्गाताओं के आगे चुपके से फेंक देता है। यह जो उद्गाता है,
वे स्तोम प्रजापति हैं। यह (प्रजापति) इस सबको अपने में खींच लेता है, इस सबको अपना
कर लेता है। इसी को यह तिनका दिया जाता है। इस प्रकार वह अध्वर्यु को नहीं खींचता और
न उसको अपना बनाता है। और जब वे जाप करते हैं—क्योंकि उद्गाता लोग अब जाप करते
हैं—॥६॥
तो वह स्तोत्र पढ़ता है यह कहकर कि 'सोमः पवते' या सोम शुद्ध हो रहा है। वह स्तोत्र
को सीधा (पराग एव—बिना अन्य किसी कृत्य के) पढ़ता है। वे सब भी सीधा ही पढ़ते हैं।
यह स्तोत्र जिनको 'पवमान' कहते हैं सीधे देवों को पहुँचाये जाते हैं। देव इन्हीं के द्वारा तो
स्वर्गलोक को पहुँचे थे। इसीलिए वह सीधा इस स्तोत्र को पढ़ता है और वे भी सीधे इस स्तोत्र
को पढ़ते हैं ॥७॥
'पीछे लौटिये' यह कहकर वह और स्तोत्रों (धुर्यों को) पढ़ता है और पीछे लौटकर वे
धुर्यों को पढ़ते हैं, क्योंकि ये स्तोत्र इन प्रजाओं के लिए पढ़े जाते हैं। इनसे ही यह प्रजा बार-
बार उत्पन्न होती हैं ॥८॥
यहाँ (चात्वाल के पास) बहिष्पवमान स्तोत्रों को क्यों पढ़ते हैं ? आरम्भ में यह सूर्य
यहीं था। ऋतु उसको लेकर स्वर्ग को गये। वहाँ वह ऋतुओं में स्थापित होकर तपता है। इसी
प्रकार ऋत्विज लोग यजमान को लेकर स्वर्ग को ले जाते हैं। इसलिए यहाँ बहिष्पवमान स्तोत्र
पढ़े जाते हैं ॥६॥
बहिष्पवमान स्वर्ग की नौका है। ऋत्विज लोग इस नौका के स्पया और चारित्र अर्थात्
डाँड आदि हैं। ये स्वर्ग पहुँचाने के सम्पारग (साधक) हैं। (नौका में) यदि एक भी बुरा
आदमी होता है तो वह नौका को डुबो देता है। उसी प्रकार जैसे ऊपर तक भारी नौका में यदि
एक भी आ जाय तो वह डूब जाती है। हर एक यज्ञ स्वर्ग की नौका है, इसलिए सब यज्ञों से बुरे
आदमियों को अलग रखना चाहिए ॥१०॥
स्तोत्र पढ़े जाने के बाद यह बात बोलता है 'अग्नीध् अग्नियों को फैला, कुशों को फैला,
पुरोडाश बना, पशु को ला।' अग्नीध् अग्नियों को फैलाता अर्थात् प्रज्वलित करता है। कुशों को

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ऽथै॒वैनाने॒तत्स्तृणा॑ति ब॒र्हि स्ती॒र्णे ब॒र्हिषि॒ समि॑द्धे दे॒वेभ्यो॑ जुह॒वानीति॑ पुरोडा॒-
शाँ२ऽअ॒लंकु॒र्विति॑ पुरोडा॒शैर्हि प्र॒चरि॒ष्यन्भव॑ति पशुने॒हीति॑ प॒शु॒ꣳ ह्युपाकरि॒-
ष्यन्भव॑ति ॥ ११॥ अथ॒ पुनः॒ प्रप॒द्य । आ॒श्वि॒नं ग्र॒हं गृ॑ह्णात्याश्वि॒नं ग्र॒हं गृ॑ही॒त्वोप॑-
निष्क्रम्य॒ यूपं॑ परिव्यय॑ति परिवी॒य यूपं॑ प॒शुमुपा॑करोति र॒समे॒वास्मिन्ने॒तद्द॑धाति
॥ १२॥ स प्रा॒तःसवन॒ऽआल॑ब्धः । आ तृ॑तीयसव॒नाच्छूय॑माण उप॒शेते॒ सर्व॑स्मिन्ने॒-
वैतद्य॒ज्ञे रसं दधाति॒ सर्वं॑ य॒ज्ञꣳ रसे॑न॒ प्रस॑जति ॥ १३॥ तस्मा॑दाग्ने॒यम॒ग्निष्टोम॒ऽआ-
लभेत॑ । तद्धि सलोम यदा॑ग्ने॒यम॒ग्निष्टोम॒ऽआलभेत॒ यद्यु॑क्थ्यः स्या॑दैन्द्रा॒ग्नं द्वि॒तीय॑-
माल॒भेतेन्द्राग्नानि॒ ह्युक्था॑नि॒ यदि॑ षोडशी स्या॑दै॒न्द्रं तृ॒तीय॑माल॒भेतेन्द्रो॒ हि षो-
डशी॒ यद्य॑तिरा॒त्रः स्या॑त्सा॒रस्व॒तं च॑तु॒र्थमाल॒भेत॒ वाग्वै सर॑स्वती॒ घोषा॒ वै वाग्यो॒-
षा रात्रि॒स्तद्य॒थाय॑थं य॒ज्ञक्रतू॒न्व्याव॑र्तयति ॥ १४॥ अथ॒ सवनी॑यैः पुरोडाशैः प्र॒चर-
न्ति॑ । दे॒वो वै सोमो॑ दि॒वि हि सोमो॑ वृ॒त्रो वै सोम॑ आसीत्त॒स्यैतत्छरी॑रं॒ यद्गि॒रयो
यदश्मान॒स्तद्दे॑षोशाना नामौषधि॒र्जायत॒ऽइति॑ ह स्माह॒ श्वेत॑केतु॒रौद्दालकिस्तन्मै-
तदा॒हृत्याभिषु॑ण्वन्तीति॑ ॥ १५॥ स यत्प॑शु॒माल॑भते । र॒समे॒वास्मिन्ने॒तद्द॑धात्यथ॒ य-
त्सवनी॑यैः पुरोडाशैः प्र॒चर॑ति मे॒धमे॒वास्मिन्ने॒तद्द॑धाति॒ तथो॒ हास्यैष॒ सोम॑ ए॒व
भव॑ति ॥ १६॥ सर्व॑ऽऐ॒न्द्रा भव॑न्ति । इ॒न्द्रो वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ तस्मा॒त्सर्व॑ऽऐ॒न्द्रा
भव॑न्ति ॥ १७॥ अथ षट्पुरोडाशः॑ धा॒नाः क॒रम्भो॑ द॒ध्यामि॒क्षेति॑ भवति॒ या य॒ज्ञस्य॑
दे॒वता॒स्ताः सुप्रीता अस॒न्निति॑ ॥ १८॥ इदं वाऽअ॒नूपमशिवा कामयते । धा॒नाः
खादेयं॑ क॒रम्भ॑मश्रीयां द॒ध्य॑श्रीयामा॒मिक्षाम॑श्रीया॒मिति॒ ते सर्वे॒ कामा॒ या य॒ज्ञस्य॑ दे॒-
वता॒स्ताः सुप्रीता अस॒न्नित्यथ॒ यदै॒षा प्रा॒तःसव॒नऽए॒व मै॑त्रावरु॒णी प॑य॒स्याव॑क्लृप्ता
भव॑ति॒ नेतर॑योः सव॒नयोः॑ ॥ १९॥ गाय॒त्री वै प्रातःसवनं॒ वह॑ति । त्रि॒ष्टुम्माध्यं॑-
न्दिनꣳ॒ सवनं॒ जग॑ती तृतीयसवनं॒ तद्वाऽअनेकाकि॒न्येव॑ त्रि॒ष्टुम्माध्यन्दि॑नꣳ सव॑नं

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कां० ४, अ० २, ब्रा० ५, कं० ११-२० शतपथब्राह्मण / ५७५
फैलांता है यह सोचकर कि कुशों को फैलाकर प्रज्वलित अग्नि में देवों के लिए आहुति दूंगा।
'पुरोडाश बना' यह इसलिए कहता है कि पुरोडाशों का प्रयोग करनेवाला है; 'पशु को ला'
क्योंकि पशु को तैयार करनेवाला होता है ॥११॥
(हविर्धान में) फिर आकर आश्विन ग्रह को निकालता है। आश्विन ग्रह को निकाल-
कर बाहर आकर यूप के चारों ओर रस्सी बाँधता है और यूप में रस्सी बाँधकर पशु को तैयार
करता है। इस प्रकार वह उस (सोम) में रस धारण कराता है ॥१२॥
यह (पशु) प्रातःसवन में मारा जाकर तीसरे सवन तक पकता रहता है।१ इस सम्पूर्ण
यज्ञ में रस धारण करता है। सब यज्ञ को रस से युक्त करता है ॥१३॥
इसलिए अग्निष्टोम में आग्नेय पशु का आलभन करे। अग्निष्टोम में आग्नेय पशु का
आलभन सलोम अर्थात् उपयुक्त है। यदि उक्थ्य यज्ञ हो तो दूसरे स्थान पर इन्द्र-अग्नि-सम्बन्धी
पशु का आलभन करे, क्योंकि उक्थ इन्द्र-अग्नि के हैं। यदि षोडशी हो तो तीसरे स्थान में इन्द्र-
सम्बन्धी पशु का आलभन करे, क्योंकि षोडशी इन्द्र का है। यदि अतिरात्र हो तो सरस्वती-
सम्बन्धी पशु का चौथे स्थान में आलभन करे। वाणी सरस्वती है। वाणी स्त्री है, रात्रि। स्त्री
है, इस प्रकार वह क्रमशः यज्ञों को अलग-अलग कर देता है ॥१४॥
अब सवन-सम्बन्धी पुरोडाशों की आहुति देता है। सोम देव है। सोम द्यौलोक में था।
सोम वृत्र था। जो पहाड़ और पत्थर हैं वे इसके शरीर हैं। श्वेतकेतु औद्दालकि ने कहा कि वहीं
'उशाना' नाम की ओषधि उत्पन्न होती है जिसको लाकर निचोड़ते हैं ॥१५॥
जब पशु का आलभन करता है तो उसमें रस डालता है। सवनीय पुरोडाश की आहुति
देता है तो उसमें मेध डालता है। इस प्रकार यह सोम ही हो जाता है ॥१६॥
यह सब इन्द्र के होते हैं। इन्द्र यज्ञ का देवता है। इसलिए यह सब इन्द्र का होता
है ॥१७॥
पुरोडाश, धान, करम्भ, दही, आमिक्षा इसलिए होते हैं कि यज्ञ के देवता इनसे प्रसन्न
हो जायें ॥१८॥
रोटी खाकर मनुष्य की इच्छा होती है कि मैं धान खाऊँ, करम्भ खाऊँ, दही खाऊँ,
आमिक्षा खाऊँ। ये सब कामनाएँ हैं कि जो यज्ञ के देवता हों वे सब प्रसन्न हों। मैत्रावरुणी
पयस्या प्रातःसवन में ही क्यों की जाती है, अन्य सवनों में क्यों नहीं ? ॥१९॥
इसलिए कि गायत्री प्रातःसवन को (देवों तक) ले जाती है, त्रिष्टुप् दोपहर के सवन को
और जगती तीसरे सवन को। दोपहर के सवन को त्रिष्टुप् अकेली नहीं ले जाती किन्तु गायत्री
और बृहती की सहायता से। जगती भी तृतीय सवन को अकेली नहीं ले जाती, किन्तु गायत्री,
१. 'पशु-बलि' प्रचलित होने के बाद ऐसे स्थल 'प्रक्षिप्त' हैं।
— स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

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कु॒भ्यामनुष्टुभा ॥२०॥ गाय॒त्र्येवैकाकि॒नी प्रातःसवनं॒ वहति । सैताभ्यां॑ प॒ङ्क्तिभ्याँ
स्तोत्र॒पङ्क्त्या च ह॒विष्पङ्क्त्या च च॒त्वार्या॒न्यानि ब॒हिष्पवमानं पञ्च॒मं प॒ञ्चपदा
प॒ङ्क्तिः सैतया॑ स्तोत्र॒पङ्क्त्यानेकाकिनी गाय॒त्री प्रातःसवनं॒ वहति ॥२१॥ इन्द्र॑स्य
पुरोडाशः । क॒र्य्यी॑धानाः पूष्णः करम्भः स॒रस्वत्यै दधि॑ मित्रावरु॒णयोः पय॒स्या प॒ञ्च-
पदा प॒ङ्क्तिः सैतया॑ ह॒विष्पङ्क्त्यानेकाकिनी गाय॒त्री प्रातःसवनं॒ वहत्येतस्या एव॒
प॒ङ्क्तेः स॒म्पदः कामाय प्रातःसवन॒ऽऐवैषा मैत्रावरुणी पय॒स्यावकॢप्ता भ॑वति नैत-
रयोः सवनयोः ॥२२॥ ब्राह्मणम् ॥४ [२.५.] ॥ द्वितीयोऽध्यायः [२६] ॥ ॥
भक्षयित्वा ममुपहूताः स्म इत्युक्त्वोत्तिष्ठति । पुरोडाशशकलमादाय तमुप्रैत-
दुपसन्नोऽहावाकोऽन्वाह॒ तद॑स्मै पुरोडाशश॒कलं पाणावा॒दधदाहाहावाक वद॒स्व
य॑त्ते वा॒द्यमित्युक्त्येत वा॒ऽअहावाकः ॥१॥ तमिन्द्राग्नी॒ऽअनु॒समतनुताम् । प्र॒जा-
नां प्रजात्यै तस्मादिन्द्राग्नोऽहावाकः स॒ं ह्येतेन॑ च ह॒विषा॒ यदस्मा॑ऽए॒तत्पुरोडाश-
श॒कलं पाणावा॒दधात्येतेन चार्षेयेण यदि॒तदन्वाह॒ तेनानु॒समतनुते ॥२॥ सं वै
सत्रे॑ऽहावाके । ऋतुग्रहैश्चरति तद्यत्सत्रे॑ऽहावाक॒ऽऋतुग्रहैश्च॑रति मिथुनं वा॒ अहा-
वाक ऐन्द्राग्नो ह्याहावाको द्वौ हीन्द्राग्नी द्वन्द्व॑ꣳ हि मिथुनं प्र॒जननं॒ स ए॒तस्मा-
न्ममिथुनात्प्र॒जननादृतून्त्संवत्सरं प्र॒जनयति ॥३॥ यद्वे॑व सत्रे॒ऽहावाके । ऋतुग्रहै-
श्चरति सर्वं वा॒ऽऋतवः संवत्सरः सर्व॑मेवैतत्प्र॒जनयति तस्मात्सत्रे॒ऽहावाक॒ऽऋतु-
ग्रहैश्चरति ॥४॥ तान्वै द्वादश गृह्णीयात् । द्वादश वै मासाः संवत्सरस्य तस्माद्द्वा-
दश गृह्णीयाद्यद्योऽअपि त्रयोदश गृह्णीयादस्ति त्रयोदशो मास इति द्वादश वैव
गृह्णीयादेषैव सम्पत् ॥५॥ द्रोणकलशाद्गृह्णाति । प्रजापतिर्वै द्रोणकलशः स ए-
तस्मात्प्रजापतेर्ऋतून्त्संवत्सरं प्र॒जनयति ॥६॥ उभयतोमुखाभ्यां पात्राभ्यां गृह्णाति
। कु॒तस्तयोर्लोको॒ ये॒ऽउभयतोमुखे तस्मादयमनन्तः संवत्सरः परिप्लवते तं गृहीत्वा
न सादयति तस्मादयमसन्नः संवत्सरः ॥७॥ नानुवाक्यामन्वाह । ह्वयति वा

अध्याय-३, ब्राह्मण-१

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कां० ४, अ० २-३, ब्रा० ५-१, कं० २०-२२ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५७७
उष्णिक्, ककुभ् और अनुष्टुभ् के साथ ॥२०॥
गायत्री ही अकेली प्रातःसवन को ले जाती है—दो पंक्तियों के साथ अर्थात् स्तोत्र-पंक्ति
और हविष्पंक्ति के साथ । आज्यस्तोत्र चार होते हैं और हविष्पवमान पाँचवाँ है । पंक्ति छन्द
में पाँच पाद होते हैं। इस पंक्ति के साथ, न कि अकेली गायत्री प्रातःसवन को ले जाती
है ॥२१॥
पुरोडाश इन्द्र का होता है। धान दो घोड़ों का, करम्भ पूषा का, दही सरस्वती का,
पयस्या मित्र-वरुण की। पंक्ति में पाँच पद होते हैं। हवियों की इस पंक्ति के साथ, न कि
अकेली, गायत्री प्रातःसवन को ले जाती है। इस पंक्ति को पूरा करने के लिए ही मैत्रावरुणी
पयस्या प्रातःसवन में ही की जाती है, अन्य सवनों में नहीं ॥२२॥
ऋतुग्रहैन्द्राग्नवैश्वदेव ग्रहाः
अध्याय ३—ब्राह्मण १
(सोम) पान करके और यह कहकर कि 'हम सबको साथ निमन्त्रण दिया गया था',
अध्वर्यु उठ खड़ा होता है। जहाँ अच्छावाक अनुवाक पढ़ने को है वहाँ पुरोडाश के टुकड़े को ले
जाकर और उसके हाथ में देकर कहता है, 'अच्छावाक, कह जो तुझको कहना है।' अच्छावाक
का सोम से बहिष्कार हो चुका था ॥१॥
इन्द्र और अग्नि ने उसको प्रजा की उत्पत्ति के लिए बनाये रक्खा । इसलिए अच्छावाक
इन्द्र-अग्नि का होता है। इस हवि के द्वारा, इस पुरोडाश के टुकड़े के द्वारा जिसको उसने हाथ
में रक्खा है और उस ऋषि-वाणी के द्वारा (वेदमन्त्रों द्वारा) जिसको वह जपता है यह इन्द्र
और अग्नि उसको बचाते हैं ॥२॥
अच्छावाक के बैठ जाने पर ऋतु-ग्रहों की आहुति देता है। अच्छावाक के बैठ जाने पर
ऋतु-ग्रहों की आहुति इसलिए देता है कि अच्छावाक जोड़ा है, अच्छावाक इन्द्र और अग्नि का
है। इन्द्र और अग्नि दो हैं। जोड़े का अर्थ है उत्पत्ति । वह इस उत्पत्ति करनेवाले जोड़े से
ऋतुओं और संवत्सर को उत्पन्न करता है ॥३॥
अच्छावाक के बैठ चुकने पर ऋतु-ग्रहों की आहुति इसलिए भी देता है कि ऋतुयें 'सब'
हैं, संवत्सर 'सब' है। इस प्रकार वह सबकी उत्पत्ति करता है। इसलिए वह अच्छावाक के बैठ
चुकने पर ऋतु-ग्रहों की आहुति देता है ॥४॥
उसको बारह (ग्रह) लेने चाहिएँ । संवत्सर के १२ महीने होते हैं। इसलिए बारह ग्रह
लेने चाहिएँ । तेरह भी ले सकता है, क्योंकि तेरहवाँ महीना भी होता है। परन्तु बारह ही लेने
चाहिएँ । यही पूर्ण है ॥५॥
ये ग्रह द्रोण कलश से लिये जाते हैं। द्रोण कलश प्रजापति है। वह इसी प्रजापति से
ऋतुओं और संवत्सर को उत्पन्न करता है ॥६॥
दो मुखवाले पात्रों से लेता है। दो मुखवाले पात्रों का अन्त कहाँ ? इसलिए यह
अनन्त संवत्सर घूमा करता है। इसको लेकर रखता नहीं। इसलिए यह संवत्सर निरन्तर
है ॥७॥
न अनुवाक कहता है। अनुवाक से तो निमन्त्रण दिया जाता है। यह ऋतु तो पहले से

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ऽअनुवा॒क्या॑यागतो ह्ये॒वायमृतुर्यदि॒ दिवा॒ यदि॒ नक्तं॒ नानु॑वषट्करोति नेदृ॒तूनप॑व्-
णाजा॒ऽइति॒ सहै॒व प्र॑थ॒मौ ग्रहा॑ गृ॒ह्येतः॑ सहोत्त॒मावि॒दमे॒वैतत्सर्वं॑ संवत्स॒रेण॑
प॒रिगृ॑ही॒तस्तदि॒दग्ँ सर्वं॑ संवत्स॒रेण॒ परि॑गृही॒तम् ॥ ८ ॥ नि॒रे॒वान्यतरः॒ क्रामा॑ति ।
प्रान्यतरः॑ पच्यते त॒स्मादि॒मेऽन्व॑ञ्चो मासा यद्य॒थ यदु॒भौ वा स॒ह निष्क्रा॑मेतामु॒-
भौ वा स॒ह प्रप॑द्येयातां पृथ॑गु ह्ये॒वेमे मासा॑ ईयु॒स्तस्मान्निरे॒वान्यतरः॒ क्राम॑ति प्रा-
न्यतरः॑ पच्यते ॥ ९ ॥ तौ वाऽऋतुनेति षट् प्र॒चर॑तः । तद्देवा अह॒रसृ॑जन्त॒र्तुभि॒-
रिति॒ चत॑स्रद्रा॒त्रिमसृ॑जन्त स य॒द्धैताव॑दे॒वाभ॑विष्यद्रा॒त्रिश्चै॒वाभ॑विष्य॒न्न व्य॑वतत्स्यत्
॥ १० ॥ तौ वाऽऋतुनेत्युप॑रिष्टाद्व्य॒चर॑तः । तद्देवाः प॒रस्ता॑दह॒रद॑धुस्त॒स्मादि॒दम॑द्या-
ह्न॒स्य॒ रात्रि॑र॒थ श्वोऽह॑र्भावि॒ता ॥ ११ ॥ ऋतुनेति॒ वै देवाः॑ । म॒नु॒ष्यान॑सृजन्त॒र्तुभि॒-
रिति॑ पशू॒ग्ंस्तद्य॒त्तन्म॒ध्ये येन॑ पशू॒नसृ॑जन्त॒ तस्मा॑दि॒मे पश॑व उ॒भय॑तः प॒रिगृ॑हीता
वश॒मुपे॑ता मनु॒ष्याणा॑म् ॥ १२ ॥ तौ वाऽऋतुनेति षट् प्रच॑र्य । इत॒रया॒ पात्रे॒ वि-
पर्यस्येतेऽऋतु॒भिरिति॒ चत॑स्ररि॒त॒रया॒ पात्रे॑ विप॒र्यस्येतेऽअन्यत॒रत॑ एव तद्देवा
अह॒रसृ॑जन्तान्यत॒रतो॒ रात्रि॑मन्यत॒रत॑ एव तद्देवा म॒नुष्या॑नसृजन्तान्यत॒रतः॑ पशून्
॥ १३ ॥ अथातो गृह्णात्येव । उप॒यामगृ॑हीतोऽसि॒ मध॑वे॒ त्वेत्ये॒वाध्व॒र्युर्गृ॑ह्णात्युपया-
मगृ॑हीतोऽसि॒ माध॑वाय॒ त्वेति॑ प्रतिप्रस्था॒तैतावे॑व वास॒न्तिकौ स यद्वसन्त॒ऽओष॑धयो
जाय॑न्ते॒ वन॒स्पत॑यः पच्य॑न्ते॒ तेनो॑ ह्येतौ॒ मधु॑श्च॒ माध॑वश्च ॥ १४ ॥ उप॒यामगृ॑हीतो
ऽसि॒ । शुक्रा॒य त्वेत्ये॒वाध्व॒र्युर्गृ॑ह्णात्युपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ शुच॑ये॒ त्वेति॑ प्रतिप्रस्था॒तैतावे॑व
ग्रैष्मौ स यदे॑त॒योर्बलि॑ष्ठं॒ तप॑ति॒ तेनो॑ ह्येतौ शु॒क्रश्च॒ शुचि॑श्च ॥ १५ ॥ उप॒यामगृ॑ही-
तोऽसि॒ नभ॑से॒ त्वेत्ये॒वाध्व॒र्युर्गृ॑ह्णात्युपयानगृ॒हीतो॑ऽसि नभ॒स्या॑य॒ त्वेति॑ प्रतिप्रस्था॒तै-
तावे॑व वार्षि॒काव॒मृतो॒ वै दि॒वो व॑र्षति॒ तेनो॑ ह्येतौ नभ॑श्च नभ॒स्य॑श्च ॥ १६ ॥ उप-
यामगृ॑हीतोऽसि॒ । इ॒षे त्वेत्ये॒वाध्व॒र्युर्गृ॑ह्णात्युपयामगृ॑हीतोऽस्यू॒र्जे त्वेति॑ प्रतिप्रस्था॒-
तैतावे॑व शार॒दौ स य॒दूर्ग्यद्रस॒ ओष॑धयः पच्य॑न्ते॒ तेनो॑ ह्ये॒ताविष॑श्चो॒र्ज॑श्च ॥ १७ ॥

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कां० ४, अ० ३, ब्रा० १, कं० ८-१७. शतपथब्राह्मण / ५७६
ही आई हुई है, दिन हो या रात हो। दुबारा वषट्कार भी नहीं कहता कि कहीं ऋतुओं को
वापस न कर दे। (अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता) पहले ग्रहों को साथ-साथ लेते हैं, और पिछलों
को भी साथ-साथ। यह 'सब' संवत्सर द्वारा ग्रहण हो जाता है। यह 'सब' संवत्सर में शामिल
है ॥८॥
एक (हविर्धान के) बाहर जाता है; दूसरा भीतर आता है। इसलिए एक मास के बाद
दूसरा आता है (एक जाता, दूसरा आता है)। यदि दोनों साथ निकलें और साथ घुसें तो ये
महीने अलग-अलग गुजरा करें। इसलिए एक बाहर जाता है और दूसरा भीतर आता है ॥९॥
वे दोनों 'ऋतु के लिए' छः बार आहुति देते हैं। इसी से देवों ने दिन बनाया। 'ऋतुओं
के लिए' इससे चार बार। इससे उन्होंने रात बनाई। यदि इतना ही होता तो रात ही होती,
यह कभी समाप्त न होती ॥१०॥
'ऋतुना' इससे दो बार आहुति देता है। इससे देवों ने फिर दिन दिया। इसलिए अब
दिन है, फिर रात होगी। फिर कल ॥११॥
'ऋतुना' (ऋतु से) देवों ने मनुष्यों को उत्पन्न किया, 'ऋतुभिः' (ऋतु से) पशुओं
को। पशुओं को मनुष्यों के बीच में बनाया, इसलिए पशु दोनों ओर से घिरकर मनुष्यों के वश में
हो गये ॥१२॥
'ऋतुना' इससे छः बार आहुति देकर पात्रों को दूसरी ओर लौट देते हैं। 'ऋतुभिः'
इससे चार बार आहुति देकर पात्रों को दूसरी ओर लौट देते हैं। एक ओर से देवों ने दिन
बनाया, दूसरी से रात। एक ओर से देवों ने मनुष्य बनाया, दूसरी ओर से पशु ॥१३॥
वह इन (ऋतु-ग्रहों को द्रोण कलश से) लेता है। "उपयामगृहीतोऽसि मधवे त्वा"
(यजु० ७।३०)-इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयामगृहीतोऽसि माधवाय त्वा" (यजु० ७।३०)-
-इससे प्रतिप्रस्थाता। 'मधु और माधव' ये दो वसन्त के महीने हैं। क्योंकि वसन्त में ही
ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और वनस्पति पकती हैं, इसलिए यह मधु और माधव हैं ॥१४॥
"उपयामगृहीतोऽसि शुक्राय त्वा" (यजु० ७।३०)- इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयाम-
गृहीतोऽसि शुचये त्वा" (यजु० ७।३०)- इससे प्रतिप्रस्थाता। ये दोनों ग्रीष्म के महीने हैं,
इनमें धूप कड़ी होती है, इसलिए यह शुक्र और शुचि दो महीने हुए ॥१५॥
"उपयामगृहीतोऽसि नभसे त्वा" (यजु० ७।३०)- इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयाम-
गृहीतोऽसि नभस्याय त्वा" (यजु० ७।३०)- इससे प्रतिप्रस्थाता। ये दोनों वर्षा के महीने हैं।
इनमें वर्षा बहुत होती है। 'नभ' और 'नभस्य' ये दो वर्षा ऋतु के महीने हुए ॥१६॥
"उपयामगृहीतोऽसि इषे त्वा" (यजु० ७।३०)- इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयाम-
गृहीतोऽस्यूर्जे त्वा" (यजु० ७।३०) - इससे प्रतिप्रस्थाता। ये दोनों शरद् ऋतु के महीने हैं
क्योंकि शरद् ऋतुओं में अन्न और रस पकता है, इसलिए शरद् के इन महीनों का नाम इष और
ऊर्ज है ॥१७॥

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५८० शतपथ ब्राह्मण
उप॒यामगृ॑हीतोऽसि॒ सह॑से त्वेत्ये॒वाध्व॒र्युर्गृह्णा॑त्युप॒यामगृ॑हीतोऽसि॒ सह॑स्याय॒ त्वेति॑
प्रतिप्रस्था॒तैतावे॒व है॑मन्ति॒कौ स यद्धे॑म॒न्त इ॒माः प्र॒जाः सह॑सेव॒ स्वं वश॑मुपन॒यते
तेनो॒ हैतौ सह॑श्च सह॒स्य॑श्च ॥ १८॥ उप॒यामगृ॑हीतोऽसि॒ तप॑से त्वेत्ये॒वाध्व॒र्युर्गृह्णा॑-
त्युप॒यामगृ॑हीतोऽसि तप॒स्या॑य॒ त्वेति॑ प्रतिप्रस्था॒तैतावे॒व शैशि॒रौ स यदे॑तयो॒र्बलि॑-
ष्ठꣳ श्याय॑ति॒ तेनो॒ हैतौ तप॑श्च तप॒स्य॑श्च ॥ १९॥ उप॒यामगृ॑हीतोऽसि॒ । अꣳ॒हस॑स्प-
तये॒ त्वेति॑ त्रयोद॒शं ग्र॒हं गृ॑ह्णाति॒ यदि॑ त्रयोद॒शं गृ॑ह्णीया॒दथ॑ प्रतिप्रस्था॒ताध्व॒र्योः पा॒त्रे
सꣳस्राव॒मव॑नय॒त्यध्व॑र्यु॒र्वा प्र॑तिप्रस्था॒तुः पा॒त्रे सꣳस्राव॒मव॑नय॒त्याह्व॑यति भ॒क्षम् ॥ २०॥
अथ॑ प्रतिप्रस्था॒ताभ॑ङ्कितेन॒ पात्रे॑ण । ऐ॒न्द्रा॒ग्नं ग्र॒हं गृ॑ह्णाति॒ तद्यद॑भङ्कितेन॒ पात्रे॑-
णैन्द्रा॒ग्नं ग्र॒हं गृ॑ह्णाति॒ न वाऽऋ॑तुग्र॒हाणा॑मनुवषट्कु॒र्वन्त्ये॒तेभ्यो॑ वाऽऐन्द्रा॒ग्नं ग्र॒हं
ग्रही॒ष्यन्भ॑वति॒ तद॑स्यैन्द्रा॒ग्नेनै॒वानु॑वषट्कृता भवन्ति ॥ २१॥ यद्वे॒वैन्द्रा॒ग्नं ग्र॒हं गृ॒-
ह्णाति॑ । सर्वं॑ वा॒ऽइदं॑ प्राजी॑जन॒द्य ॠ॑तुग्र॒हानग्र॑ही॒त्स इ॒दꣳ सर्वं॑ प्र॒जनये॒द्यदे॒मैवै॑त-
त्सर्वं॑ प्रा॒णो॒दा॒नयोः॑ प्रति॒ष्ठाप॑यति॒ तदि॒दꣳ सर्वं॑ प्रा॒णो॒दा॒नयोः॒ प्रति॑ष्ठित॒मिन्द्रा॒ग्नी
हि प्रा॒णो॒दा॒नावि॒मे हि द्यावा॑पृथि॒वी प्रा॒णो॒दा॒नाव॑नयो॒र्हीदꣳ॑ सर्वं॒ प्रति॑ष्ठितम्
॥ २२॥ यद्वे॒वैन्द्रा॒ग्नं ग्र॒हं गृ॒ह्णाति॑ । सर्वं॑ वा॒ऽइदं॑ प्राजी॑जन॒द्य ॠ॑तुग्र॒हानग्र॑ही॒त्स
इदꣳ॑ सर्वं॑ प्र॒जनय्या॒स्मिन्ने॒वैतत्सर्व॑स्मिन्प्रा॒णो॒दा॒नौ द॑धाति॒ तावि॒माव॒स्मिन्त्सर्व॑स्मि-
न्प्रा॒णो॒दा॒नौ हि॒तौ ॥ २३॥ अथातो॑ गृह्णा॒त्येव॑ । इन्द्रा॒ग्नीऽआग॑तꣳ सु॒तं गी॒र्भिर्न॑-
भो वरे॑ण्यम् । अस्य पा॒तं धि॒येषि॒ता । उप॒यामगृ॑हीतोऽसीन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ वां॒ चैष ते यो॑-
नि॒रिन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ त्वेति॑ सादयतीन्द्राग्निभ्याꣳ॑ ह्ये॑नं॒ गृह्णा॑ति ॥ २४॥ अथ॑ वैश्वदे॒वं ग्र॒हं
गृह्णा॑ति । सर्वं॑ वा॒ऽइदं॑ प्राजी॑जन॒द्य ॠ॑तुग्र॒हानग्र॑ही॒त्स यदै॒ताव॑दे॒वाभ॑वि॒ष्यद्याव॑-
त्या॒ हैवार्ग्रे॑ प्र॒जाः सृ॒ष्टास्ता॑वत्यो॒ हैवा॑भवि॒ष्यन्न प्राज॑निष्यन्त ॥ २५॥ अथ॒ यद्वै॑श्व-
दे॒वं ग्र॒हं गृ॑ह्णाति॑ । इ॒दमे॒वैतत्सर्व॑मि॒माः प्र॒जा य॑थाय॒थं व्यव॑सृजति॒ तस्मा॑दि॒माः
प्र॒जाः पु॑नर॒भ्याव॑र्तं प्र॒जाय॑न्ते शु॒क्रपात्रे॑ण गृह्णात्ये॒ष वै शु॒क्रो य ए॒ष तप॑ति॒ तस्य॑

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का० ४, अ० ३, ब्रा० १, कं० १८-२६ शतपथब्राह्मण / ५८१
"उपयामगृहीतोऽसि सहसे त्वा" (यजु० ७।३०) —इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयाम-
गृहीतोऽसि सहस्याय त्वा" (यजु० ७।३०) —इससे प्रतिप्रस्थाता। ये दोनों हेमन्त के महीने हैं।
क्योंकि हेमन्त इन प्रजाओं को साहस के साथ वश में लाता है, इसलिए सहस और साहस ये दो
हेमन्त के महीने हुए ॥१८॥
"उपयामगृहीतोऽसि तपसे त्वा" (यजु० ७।३०) —इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयाम-
गृहीतोऽसि तपस्याय त्वा" (यजु० ७।३०) —इससे प्रतिप्रस्थाता। ये दोनों शिशिर ऋतु के
महीने हैं। क्योंकि इनमें पाला बहुत पड़ता है, इसलिए तप और तपस्या ये शिशिर के महीने
हैं ॥१९॥
"उपयामगृहीतोऽसि अँहसस्पतये त्वा" (यजु० ७।३०) —"इससे तेरहवां ग्रह
(अध्वर्यु) लेता है। यदि तेरहवाँ लेना हो तो प्रतिप्रस्थाता अध्वर्यु के पात्र में बचा-खुचा छोड़
देता है, या अध्वर्यु प्रतिप्रस्थाता के पात्र में बचा-खुचा छोड़ देता है। (अध्वर्यु) अब पान करने
के लिए (सदस् में) ले जाता है ॥२०॥
अब प्रतिप्रस्थाता उस पात्र से जिसमें से पिया नहीं गया इन्द्र-अग्नि के ग्रह को लेता है।
ऐसे पात्र से इन्द्र-अग्नि के ग्रह को क्यों लेता है, जिसमें पिया न गया हो ? इसलिए कि ऋतु-ग्रहों
पर तो दोबारा वषट्कार हुआ नहीं। और उन्हीं के लिए इन्द्र-अग्नि ग्रह लेता है। इस प्रकार
इन्द्र-अग्नि के द्वारा इनका वषट्कार हो जाता है ॥२१॥
इन्द्र-अग्नि ग्रह को इसलिए भी लेता है कि ऋतु-ग्रहों को लेकर ही इसने इन 'सब' को
उत्पन्न किया। वह इन 'सब' को उत्पन्न करके प्राण और उदान में इनकी प्रतिष्ठा करता है।
इसीलिए ये 'सब' प्राण और उदान में प्रतिष्ठित हैं। इन्द्र-अग्नि प्राण और उदान हैं। इन्हीं में
ये सब प्रतिष्ठित हैं ॥२२॥
इन्द्र-अग्नि ग्रह को लेने का यह भी प्रयोजन है कि ऋतु-ग्रहों से उसने इस 'सब' को
उत्पन्न किया और इस 'सब' को उत्पन्न करके 'प्राण और उदान' की इस 'सब' में प्रतिष्ठा करता
है, इसलिए प्राण और उदान इस सबमें प्रतिष्ठित हैं ॥२३॥
वह इसको (द्रोण कलश से) इस मन्त्र से लेता है—"इन्द्राग्नी ऽ आगत॑ ˏ सु॒तं गीर्भिर्न॑भो
वरेण्यम् । अस्य पातं धियेषि॒ता । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राग्निभ्यां त्वा" (यजु० ७।३१, ऋ०
३।१२।१) —'हे इन्द्र-अग्नि, हमारी वाणियों द्वारा तुम दोनों आओ इस निचोड़े हुए और आदित्य
के समान वरने योग्य सोम के पास । बुद्धि के द्वारा प्रेरित हुए तुम दोनों इसको पियो। आश्रय के
लिए लिया गया है तू इन्द्र और अग्नि के लिए तुझको।" "एष ते योनिरिन्द्राग्निभ्यां त्वा"
(यजु० ७।३१) —"यह तेरी योनि है। इन्द्र और अग्नि के लिए तुझको।" यह कहकर वह रख
देता है, क्योंकि इन्द्र और अग्नि के लिए उसने लिया था ॥२४॥
अब 'वैश्वदेव' ग्रह को लेता है। ऋतु-ग्रहों को लेकर ही उसने इस 'सब' को उत्पन्न
किया। यदि इतना ही होता तो जितनी प्रजा पहले उत्पन्न हो गई उतनी ही रह जाती, आगे
उत्पन्न न होती ॥२५॥
वैश्वदेव ग्रह को इसलिए भी लेता है कि वह इन सब प्रजाओं को क्रमशः कर देता है।
इससे यह प्रजा बार-बार उत्पन्न होती रहती है। इसको शुक्र-पात्र से लेता है। यह जो सूर्य

अध्याय-३, ब्राह्मण-२

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ये र॒श्मय॒स्ते विश्वे॑ दे॒वास्तस्मा॒च्छुक्रपात्रे॑ण गृह्णाति ॥ २६ ॥ अ॒थातो गृह्णात्ये॒व ।
ओमा॑सश्चर्षणीधृतो॒ विश्वे॑ देवास॒ आगत॑ । दा॒श्वांसो दा॒शुषः॑ सु॒तम् । उप॒यामगृ॑-
हीतोऽसि॒ विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्य॑ ए॒ष ते॒ योनि॒र्विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्य॒ इति॑ सादयति
विश्वे॑भ्यो ह्ये॑नं दे॒वेभ्यो॑ गृह्णाति॑ ॥ २७॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [३. १.] ॥ ॥
गृ॒णाति॑ ह॒ वाऽए॒तद्धोता यच्छ॑सति । तस्मा॑दे॒तद्गृणा॑ते॒ प्रत्ये॑वाध्व॒र्युर्गृणा॑ति
तस्मा॑त्प्रतिग॒रो नाम॑ ॥ १ ॥ तं वै प्राञ्च॑मासी॒नमाह्व॑यते । सर्वे॒ वाऽअन्यऽउद्गातुः
प्राञ्च आ॒र्त्विज्यं॑ कुर्व॒न्ति तथो॒ हास्यैतत्प्रागे॒वार्त्विज्यं॑ कृतं भव॑ति ॥ २॥ प्र॒जाप॑ति-
र्वाऽउद्गाता । योष॒ऽग्यै॑ता स ए॒तत्प्र॒जाप॑तिरुद्गाता॒ योषायमृचि॒ होत॑रि॒ रेतः॑
सिञ्चति॒ यत्स्तु॑ते॒ तद्धोता श॒स्त्रेण॑ प्र॒जन॑यति॒ तद्यति॒ यथायं पुरुषः॑ शितस्त॒द्यदे॑-
नद्यति॒ तस्मा॒च्छ॒स्त्रं नाम॑ ॥ ३॥ तदुपप॒ल्यग्य॑ प्रति॒गृणा॑ति । इ॒दमे॒वैतद्रेतः॑ सि॒क्त-
मुप॒निम॑द्गत्यथ॒ यत्परा॑ङ् ति॒ष्ठन्प्रति॑गृणीयात्पराङ् है॒वैतद्रेतः॑ सि॒क्तं प्र॒णश्ये॒त्तन्न प्र॒-
जायेत सम्प्र॒चाऽउ चैवैतदू॒र्ध्वेवैतद्रेतः॑ सि॒क्तं प्र॒जन॑यतः ॥४॥ या॒त॒यामा॑नि॒ वै दे॒वै-
श्छन्दा॑सि । छन्दो॑भि॒र्हि दे॒वाः स्व॒र्गं लो॒कं स॒माश्नु॑वत॒ मदो॒ वै प्र॑तिग॒रो यो
वाऽऋचि॒ मदो॒ यः सामन्॒रसो॒ वै स तच्छन्दः॑स्वै॒वैतद्रसं॑ दधात्ययातयामानि करो-
ति तैरयातया॑मि॒र्ह्यनं तन्वते॑ ॥ ५॥ तस्मा॒द्यद॒र्धर्चशः॑ शं॒सेत् । अ॒र्धर्चे॑ऽर्धर्चे॒ प्रति॑-
गृणीया॒द्यदि॑ प॒दः शं॒सेत्प॒दे-प॑दे प्रतिगृणीया॒द्यत्र॒ वै श॒स्त्रम॒न्ववा॑निति॒ तद्सुररक्ष॒-
सानि॑ य॒ज्ञम॒न्वव॑चरन्ति॒ तत्प्रति॑गरेण॒ संद॑धाति॒ नाष्ट्राणा॑ꣳ रक्ष॑सामनन्ववचाराय॑
यज॑मानस्यो चैवैतद्भा॒तृव्य॑लो॒कं छि॒नत्ति॑ ॥ ६॥ चतुर॒क्षरा॑णि ह॒ वाऽअये॒ च्छन्दा॑-
स्यासुः । ततो॒ जग॑ती॒ सोम॒मछाप॑तत्सा॒ त्रीण्य॒क्षरा॑णि हि॒त्वाऽग॑म॒त्ततस्त्रिष्टुक्सो॑-
मम॒छाप॑तत्सैकम॒क्षरं॑ हि॒त्वाऽग॑म॒ ततो॑ गायत्री॒ सोम॒मछाप॒त्तत्सैतानि चा॒क्षरा॑णि
हर॒त्याग॑छ॒त्सोमं॑ च॒ ततो॑ऽष्टाक्ष॑रा गाय॒त्र्यभ॑व॒त्तस्मा॑दाहुर॒ष्टाक्ष॑रा गाय॒त्रीति॑ ॥ ७॥
तया॑ प्रातःस॒वन॒मत॑न्वत । तस्मा॑द्गाय॒त्रं प्रा॑तःस॒वनं तथै॑व माध्यन्दि॒नꣳ सव॑नम-

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कां०४, अ० ३, ब्रा० १-२, कं० २६-२७ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५८३
तपता है, शुक्र (तेजों से) तपता है जिसकी ये सब किरणें हैं। यही विश्वेदेव हैं। इसलिए शुक्र-
ग्रह से लेता है ॥२६॥
वह (द्रोण कलश से सोम) इस मन्त्र से निकलता है—"ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे
देवास ऽ आगत। दाश्वाँसो दाशुषः सुतम् । उपयामगृहीतोऽसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः” (यजु०
७।३३, ऋ० १।३।७) —“हे रक्षक और मनुष्यों के पोषक विश्वेदेव, आओ। आप कामनाओं के
देनेवाले हैं। देनेवाले के निचोड़े हुए सोम को (पीने के लिए)। तुझको आश्रय के लिए लिया
गया है। विश्वेदेवों के लिए तुझको।" "एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः" (यजु० ७।३३) —
"यह तेरी योनि है। विश्वेदेवों के लिए तुझको।" ऐसा कहकर वह उसको रख देता है, क्योंकि
विश्वेदेवों के लिए इसको लेता है ॥२७॥
शस्त्रप्रतिगरः
अध्याय ३—ब्राह्मण २
जब होता शस्त्र पढ़ता है तो गाता है। और जब वह गाता है तो अध्वर्यु उसके प्रत्युत्तर
में गाता है। इसलिए उसको 'प्रतिगर' (प्रति + आ + गृणाति) कहते हैं ॥१॥
होता पूर्वाभिमुख बैठे हुए अध्वर्यु का आह्वान करता है। उद्गाता को छोड़कर और
सब पूर्वाभिमुख होकर ऋत्विज का कार्य करते हैं। इसलिए इसका ऋत्विक का कार्य भी पूर्वा-
भिमुख हो जाता है ॥२॥
उद्गाता प्रजापति है। ऋचा होतारूपी स्त्री है। यह प्रजापतिरूप उद्गाता पुरुष
ऋचारूपी होता स्त्री में वीर्य का सिंचन करता है जबकि वह स्तुति करता है। होता शस्त्र के
रूप में जनता है (जैसे मां बच्चे को जनती है)। वह पैना करता है जैसे यह पुरुष पैना किया
जाता है (चाकू पैना करने के लिए सान पर रखते हैं। इस प्रकार 'शो' का अर्थ है पैना करना,
बनाना) चूंकि पैना करते हैं इसलिए 'शो' से 'शस्त्र' शब्द बना। ('शो तनूकरणे' धातु के रूप
'श्यति' आदि होते हैं) ॥३॥
(अध्वर्यु) घूमकर (होता की ओर मुँह करके) प्रत्युत्तर में गाता है। इस प्रकार यह
सींचे हुए वीर्य को तेज कर देता है। यदि मुँह फेरकर गावे तो सींचा हुआ वीर्य नष्ट हो जाय,
और उत्पत्ति न हो। (स्त्री और पुरुष) एक-दूसरे की ओर मुख करके सींचे हुए वीर्य से उत्पत्ति
करते हैं ॥४॥
देवों द्वारा छन्द थका दिये गये। क्योंकि छन्दों द्वारा ही देव स्वर्गलोक को गये। प्रतिगर
(प्रत्युत्तर का गाना) यह है। यह जो ऋक् में मद है और यह जो साम में, वही रस है। यह रस
वह छन्दों में रख देता है, अर्थात् छन्दों की थकावट दूर कर देता है। इन फिर से पुष्ट छन्दों से
यज्ञ करता है ॥५॥
इसलिए यदि (होता) आधी ऋचाओं से शस्त्र पढ़े तो अध्वर्यु आधी ऋचाओं के द्वारा
प्रत्युत्तर भी दे। यदि पाद-पाद करके तो प्रतिगर भी पद-पद से हो, क्योंकि शस्त्र पढ़ने में ज्योंही
साँस टूटता है त्यों ही असुर राक्षस दौड़ पड़ते हैं। इसको अध्वर्यु प्रतिगर द्वारा बन्द कर देता है।
इससे दुष्ट राक्षस आने नहीं पावे। इस प्रकार वह यजमान के शत्रु-लोक का नाश कर देता है ॥६॥
पहले छन्दों में चार अक्षर होते थे। उनमें से जगती सोम को लेने उड़ गई, और तीन
अक्षर पीछे छोड़कर लौट आई। अब त्रिष्टुप् सोम को लेने उड़ गया और एक अक्षर छोड़कर
घर लौट आया। फिर गायत्री सोम को लेने उड़ी और इन सब अक्षरों को और सोम को भी
लेकर वापस आ गई। इसलिए आठ अक्षर की गायत्री हो गई। इसलिए कहते हैं कि आठ अक्षर
की गायत्री होती है ॥७॥
उस (गायत्री) से प्रातःसवन किया गया। इसलिए प्रातःसवन का नाम गायत्र है।

अध्याय-३, ब्राह्मण-३

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५८४ शतपथ ब्राह्मण
तन्वत ताꣳ ह त्रिष्टुबुवाचोप वाह्मायानि त्रिभि॒रक्ष॑रै॒रुप॑ मा ह्वयस्व॒ मा मा य-
ज्ञाद॒न्तर्गा॒ इति॒ तथेति॑ तामुपा॑ह्वयत॒ तत॑ एकादशाक्षरा त्रिष्टुब्भवत्तस्मादाहुस्त्रै-
ष्टुभं माध्यन्दिनꣳ सवनमिति ॥ ८॥ तयै॑व तृतीयसवन॒मत॑न्वत । ताꣳ ह॒ जगत्यु-
वाचोप॑ वाह्मायाम्येके॒नाक्ष॑रे॒णोप॑ मा ह्वयस्व॒ मा मा यज्ञाद॒न्तर्गा॒ इति॒ तथेति॑
तामुपा॑ह्वयत॒ ततो॑ द्वादशाक्षरा जग॑त्यभवत्तस्मादाहुर्जागतं तृतीयसवनमिति ॥ ९॥
तदाहुः । गायत्राणि॒ वै सर्वा॑णि॒ सव॑नानि गायत्री ह्ये॑वैतदुपसङ्गमानीदिति॒ तस्मा-
त्सꣳ॑त्सिदं॒ प्रातःसवने॒ प्रति॑गृणीयात्सꣳ॑त्सिद्धा हि गायत्र्याग॒ह्वत्तस्कु॑न्मद्धन्माध्यन्दिने
सवनऽएकꣳ॑ हि॒ साक्षरꣳ॑ ह्त्वाग॒ह्वत्तैनै॒वैना॑मेतत्सम॑र्धयति॒ कृत्स्नां करो॑ति ॥ १०॥
यत्र त्रि॒ष्टुभः॑ शस्यन्ते॑ । त्रिमद्वत्तृतीयसवने॒ त्रीणि॒ हि साक्ष॑राणि ह्त्वाग॒ह्वत्तैरै॒वै-
नामि॑तत्सम॑र्धयति॒ कृत्स्नां करो॑ति ॥ ११ ॥ ॥ शतम् २५०० ॥ ॥ यत्र द्यावा॑पृथि॒व्यꣳ॑
शस्यते॑ । इ॒मे ह॒ वै द्यावा॑पृथिवी॒ऽइमाः॑ प्रजा उप॑जीवन्ति॒ तदन॑यो॒रेवैतद्रू॒द्यावा॑पृ-
थिव्यो॒ रसं॑ दधाति॒ ते र॒सवत्या॒ऽउप॑जीवनीये॒ऽइमाः॑ प्रजा उप॑जीवन्ति॒ स वा
ऽओ३मित्ये॑व प्रति॑गृणीयात्तद्धि स॒त्यं तद्दे॒वा विदुः॑ ॥ १२॥ तद्धैके॑ । ओथामो॑दैव॒
वागि॑ति॒ प्रति॑गृणन्ति वाक्प्रति॒गर् ए॒तद्वाच॑मुपा॒प्नुम॒ इति॒ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॑ न कु-
र्याद्यथा॑ वै कथा॒ च प्रति॑गृणात्युपा॒प्तिर्वा॑स्य वाग्भ॑वति वा॒चा हि प्रति॑गृ॒णाति॑
तस्मा॒दो३मित्ये॑व प्रति॑गृणीयात्तद्धि स॒त्यं तद्दे॒वा विदुः॑ ॥ १३॥ ब्राह्मणम् ॥ ६
[३. २.] ॥ ॥
इ॒ङ्कारऽइ॒ङ्कारऽइ॒त्य॑भिषु॒णोति॑ । इ॒न्द्रमे॒वैतदा॒च्याव॑यति बृ॒हद्वृ॒हदि॒तीन्द्र॑मे॒वै-
तदा॒च्याव॑यति ॥ १॥ स शुक्रा॑मन्थिनौ॑ प्रथ॒मौ गृ॑ह्णाति । शुक्र॑वद्धैतत्सव॑नमथाग्र-
य॒णꣳ सर्वे॑षु॒ ह्येष सव॑नेषु गृह्यतेऽथ मरुत्वतीयमथोक्थ्यमुक्थ्यानि॒ ह्यत्रा॑पि भव॑-
न्ति ॥ २॥ तद्धैके॑ । उ॒क्थ्यं गृ॑ही॒त्वाथ॑ मरुत्वती॒ये गृ॑ह्णन्ति॒ तदु॒ तथा॑ न कुर्यान्मरुत्व-
तीय॑मे॒व गृ॑ही॒त्वाथो॑क्थ्यं गृ॑ह्णीयात् ॥ ३॥ तान्वाऽए॒तान् । पञ्च॒ ग्रहान्गृ॑ह्णात्येष

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का० ४, अ० ३, ब्रा० २-३, क० ८-१३ व १-४ शतपथब्राह्मण / ५८५
उसी से दोपहर का सवन किया गया। उससे त्रिष्टुप् ने कहा, 'मैं अपने तीन अक्षरों के साथ
आता हूँ। मुझे बुला। मुझे यज्ञ से बाहर न निकाल।' 'अच्छा' ऐसा कहकर (गायत्री ने त्रिष्टुप्
को) बुला लिया। इस प्रकार त्रिष्टुप् में ग्यारह अक्षर हो गये। इसलिए कहते हैं कि दोपहर का
सवन त्रैष्टुभ् होता है ॥८॥
उसी गायत्री से तीसरा सवन किया। उससे जगती ने कहा, 'मैं अपने एक अक्षर के साथ
तेरे पास आती हूँ, तू मुझे बुला, यज्ञ से बाहर मत निकाल।' उसने कहा 'अच्छा' और बुला
लिया। तब से जगती बारह अक्षर की हो गई। इसलिए कहते हैं कि तीसरा सवन 'जागत'
है ॥९॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि सभी सवन 'गायत्र' हैं क्योंकि गायत्री ही तो बढ़ती गई।
इसलिए प्रातःसवन में पूरा 'प्रतिगर' कहे, क्योंकि गायत्री पूरी होकर लौटी थी। दोपहर के
सवन में एक बार 'मद्' शब्द कहकर प्रतिगर पढ़े, क्योंकि त्रिष्टुप् एक अक्षर छोड़कर लौटा था।
उसी से वह उसको समृद्ध करता है अर्थात् उसको पूरा कर देता है जबकि—॥१०॥
त्रिष्टुप् से शस्त्र पढ़ता है। तीसरे सवन में तीन बार 'मद्' शब्द से प्रतिगर कहे, क्योंकि
जब जगती लौटी तो तीन अक्षर पीछे छोड़ आई। इससे वह इसकी समृद्धि करता है, उसको
पूरा करता है जबकि—॥११॥
द्यौ और पृथिवी के लिए शस्त्र पढ़ता है। यह प्रजा इन्हीं दोनों अर्थात् द्यौ और पृथिवी
के सहारे रहते हैं; इसके द्वारा इन्हीं द्यौ और पृथिवी में वह रस रखता है। इन्हीं रसवाले द्यौ
और पृथिवी के सहारे प्रजा उत्पन्न होती है। 'ओ३म्' ऐसा कहकर 'प्रतिगर' करे, क्योंकि यही
सत्य है जिसको देव जानते हैं ॥१२॥
कुछ इस प्रकार प्रतिगर करते हैं 'ओथामो दैववाक्' अर्थात् वाणी प्रतिगर है, उसी को
लेते हैं। परन्तु ऐसा न करे। क्योंकि चाहे जैसे प्रतिगर करे, वाणी ही हो जाती है, क्योंकि प्रतिगर
वाणी द्वारा ही हो सकता है। इसलिए 'ओ३म्' कहकर ही प्रतिगर करे। यही सत्य है जिसको
देव जानते थे ॥१३॥
माध्यन्दिनसवनम्—मरुत्वतीयग्रहादि
अध्याय ३—ब्राह्मण ३
'इहा' 'इहा' कहकर (सोमरस) निकालता है। ('इह' का अर्थ है 'यहाँ। इसी का अन्त
का अक्षर प्लुत करके 'इहा' हो गया। बुलाने में प्लुत हो ही जाता है)। इस प्रकार इन्द्र को
निकट बुलाता है। 'बृहद्-बृहद्' भी कहता है; इससे भी इन्द्र को निकट बुलाता है ॥१॥
पहले शुक्र और मन्थी ग्रहों को लेता है। इससे (सोम यज्ञ) 'शुक्र-युक्त' हो जाता है।
अब आग्रयण ग्रह को लेता है। यह ग्रह तो सभी सवनों में लिया जाता है। फिर मरुत्वतीय ग्रह
लेता है। फिर उक्थ्य ग्रह को। क्योंकि यहाँ भी उक्थ्य मन्त्र होते हैं ॥२॥
कुछ लोग उक्थ्य ग्रह को लेकर मरुत्वतीय को लेते हैं। परन्तु ऐसा न करना चाहिए।
मरुत्वतीय को लेकर उक्थ्य को ले ॥३॥
इस प्रकार यह इन पाँच ग्रहों को लेता है (शुक्र, मन्थी, आग्रयण, मरुत्वतीय और

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५८६ शतपथ ब्राह्मण
वै॒ वज्रो॑ यन्माध्य॒न्दिनः॑ पव॑मानस्तस्मात्प॒ञ्चद॒शः पृ॑ष्ठनामा भवति पञ्चद॒शो हि॑
वज्रः॒ स ए॒तैः प॒ञ्चभि॑र्ग्र॒हैः प॒ञ्च वाऽइ॒मा अ॒ङ्गुलयो॒ऽङ्गुलि॑भि॒र्वै प्रह॑रति ॥ ४ ॥
इन्द्रो॑ वृ॒त्राय॒ वज्रं॒ प्रज॑हार । स वृ॒त्रं पा॒प्मानं॑ ह॒त्वा विजि॑ते॒ऽभये॑ऽना॒ष्ट्रे द॑क्षि॒णा
निना॑य॒ तस्मा॑द्ये॒तर्हि॒ यदि॒वैते॑न माध्यन्दि॒नेन॑ पव॒माने॑न स्तु॒वते॒ऽथ विजि॑ते॒ऽभये॑
ऽना॒ष्ट्रे द॑क्षि॒णा नी॒यन्ते॒ तथो॒ऽएवै॒ष ए॒तैः प॒ञ्चभि॑र्ग्र॒हैः पा॒प्मने॒ द्विष॑ते॒ भ्रातृ॑व्याय॒
वज्रं॒ प्रह॑रति॒ स वृ॒त्रं पा॒प्मानं॑ ह॒त्वा विजि॑ते॒ऽभये॑ऽना॒ष्ट्रे द॑क्षि॒णा न॑यति॒ तस्मा॑-
द्वा॒ऽएता॒न्यञ्च॒ ग्रहा॒न्गृह्णा॑ति ॥ ५ ॥ तद्यन्म॑रुत्वती॒यान्गृह्णा॑ति । ए॒तद्वा॒ऽइन्द्र॑स्य नि॒-
ष्केवल्यं॒ सव॑नं॒ यन्मा॑ध्यन्दि॒नं सव॑नं॒ तेन॑ वृ॒त्रम॑जिघां॒सत्तेन॒ व्य॑जिगीषत म॒रु-
तो वा॒ऽहुत्यश्चत्ये॒ऽपक्र॑म्य तस्थुः॒ क्षत्रं॒ वा॒ऽइन्द्रो॒ विशो॑ म॒रुतो॒ विशा॒ वै क्ष॒त्रियो॒
ब॒लवा॑न्भवति॒ तस्मा॑दाश्व॒त्थेश्च॑तुःपा॒त्रे स्या॑तां का॒र्ष्मर्य॑मये॒ त्वे॑व भ॑वतः ॥ ६ ॥ ता॒-
निन्द्र॒ उप॑मन्त्रयां चक्रे । उप॒ माव॑र्तध्वं यु॒ष्माभि॑र्ब॒लेन॑ वृ॒त्रं ह॒नानीति॑ ते होचुः॒
किं न॑स्ततः॒ स्यादि॑ति॒ तेभ्य॑ ए॒तौ म॑रुत्वती॒यौ ग्र॒हाव॑गृह्णात् ॥ ७ ॥ ते हो॑चुः । अ॒-
पनि॑धायिनमो॒न्न उपा॑वर्तामहा॒ऽइति॒ तऽएन॑मपनि॒धायि॑नो॒ऽन्न उपा॑ववृतु॒स्तद्वा॒ऽइन्द्रो॒
ऽप्यु॑ण॒ताप॑निधाय॒ वै मो॒न्न उपा॑वृत॒न्निति॑ ॥ ८ ॥ स हो॑वाच । स॒हैव मौज॑सो॒पा-
व॑र्तध्व॒मिति॒ तेभ्यो॒ वै न॑स्तृ॒ती॒यं ग्रहं॑ गृह्ला॒णेति॒ तेभ्य॑ ए॒तं तृती॑यं॒ ग्रहम॑गृह्णादु॒प-
यामगृ॑हीतोऽसि म॒रुतां॒ त्वौज॑स॒ऽइति॒ तऽएनं॑ स॒हैवौज॑सो॒पाव॑र्तन्त॒ तैर्व्य॑जयत॒
तैर्वृ॒त्रमहं॒त्क्षत्रं॒ वा॒ऽइन्द्रो॒ विशो॑ म॒रुतो॒ विशा॒ वै क्ष॒त्रियो॒ ब॒लवा॑न्भवति॒ तत्क्ष॒-
त्रऽए॒वैतद्ब॑लं दधाति॒ तस्मा॑न्मरुत्वती॒यान्गृह्णा॑ति ॥ ९ ॥ स वा॒ऽइन्द्रा॑यै॒व म॒रुत्व॑ते
गृह्णी॑यात् । नापि॑ म॒रुद्भ्यः॑ स॒ यद्यपि॑ म॒रुद्भ्यो॑ गृह्णी॒यात्प्रत्यु॒द्या॑मिनीं॒ ह क्ष॒त्राय॑
विशं॑ कुर्या॒द्यथै॒तदिन्द्र॑मे॒वानु॑ म॒रुत॒ आभ॑जति॒ तत्क्ष॒त्रायै॒वैतद्विशं॑ कृतानुका॒रम॑नु-
वर्त्मा॑नं करोति॒ तस्मा॑दि॒न्द्रायै॒व म॒रुत्व॑ते गृह्णी॒यान्नापि॑ म॒रुद्भ्यः॑ ॥ १० ॥ अप॑क्रमादु॒
है॒वेषा॑मेतद्वि॒भयां॑ चकार । यदि॒मे म॒न्नाप॑क्रामे॒युर्यन्ना॒न्यद्व्रि॑ये॒रन्नि॑ति॒ ताने॒वैतदु॑पप्रक्र-

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कां० ४, अ० ३, ब्रा० ३, क० ४-११ शतपथब्राह्मण / ५८७
उक्थ्य) । यह जो दोपहर का पवमान है, वह वज्र है। इसमें पांच साम होतें हैं, १५ मन्त्रवाले ।
वज्र पन्द्रहवाला होता है। पांच ग्रहों के द्वारा। ये अँगुलियाँ भी पाँच हैं। इन अँगुलियों से ही
तो वज्र फेंका जाता है ॥४॥
इन्द्र ने वृत्र पर वज्र फेंका । पापी वृत्र को मारकर और विजय तथा अभय प्राप्त करके
दक्षिणा लाया । इसलिए ये उद्गाता लोग भी जब दोपहर के सवन में पवमान पढ़ते हैं और
अभय तथा विजय प्राप्त करते हैं तो दक्षिणा को लाते हैं। इसी प्रकार यह भी इन पाँच ग्रहों
द्वारा दुष्ट पापी शत्रु पर वज्र फेंकता है और पापी वृत्र को मारकर अभय तथा विजय प्राप्त
होने पर दक्षिणा को ले जाता है। इसलिए इन पाँच ग्रहों को लेते हैं ॥५॥
मरुत्वतीय ग्रहों को इसलिए लेता है कि यह जो दोपहर का सवनं है वह इन्द्र का निज
का सवन (निष्केवल्य) है। उसी से उसने वृत्र को मारने और जीतने की इच्छा की। इस समय
मरुत् अश्वत्थ कक्षा पर घूमकर जा खड़े हुए । इन्द्र क्षत्रिय है। मरुत् वैश्य हैं। क्षत्रिय बलवान्
होता है। इसलिए दो पात्र अश्वत्थ लकड़ी के हो सकते हैं। (ऐसी लोगों की राय है) परन्तु
कार्ष्मर्य लकड़ी के तो होते ही हैं ॥६॥
उनको इन्द्र ने बुलाया, 'मेरे पास आइये कि आपकी सहायता से मैं वृत्र को मार डालूं ?'
उन्होंने कहा, 'हमको क्या मिलेगा ?' उसने इन दो मरुत्वतीय ग्रहों को उनके लिए
निकाला ॥७॥
वे बोले, 'इस एक अह अर्थात् ओज को अलग रखकर हम आ रहे हैं।' वे इस ओज को
अलग रखकर आये । परन्तु इन्द्र ने इस (ग्रह अर्थात् ओज) को भी लेना चाहा, यह सोचकर
कि ये ओज को अलग रखकर आ रहे हैं। (ओज के बिना तो कुछ सफलता होती नहीं) ॥८॥
उसने कहा, 'ओज के साथ आइये ।' उन्होंने उत्तर दिया, 'तो हमारे लिए एक तीसरा
ग्रह और लो।' तब उनके लिए उसने एक तीसरा ग्रह निकाला, इस मन्त्र से “उपयामगृहीतोऽसि
मरुतां त्वौजसे—” (यजु० ७।३६) । तब वे ओज के साथ (इन्द्र की सहायता को) गये।
उनकी सहायता से विजय पाई, उनकी सहायता से वृत्र को मारा । इन्द्र क्षत्रिय है। मरुत् वैश्य
है। क्षत्रिय वैश्य की सहायता से ही बलवान् होता है। इसलिए वह क्षत्रिय में बल को रखता
है। इसलिए मरुत्वतीय ग्रहों को लेता है ॥९॥
उन ग्रहों को वह 'मरुत्-युक्त इन्द्र' के लिए निकाले, अकेले इन्द्र के लिए नहीं। यदि वह
केवल मरुतों के लिए निकालेगा तो वैश्यों को क्षत्रियों के विरुद्ध कर देगा। इसलिए वह इन्द्र के
पीछे मरुत् का भी भाग रख देता है। इस प्रकार वह वैश्य को क्षत्रिय के अधीन और उसका
आज्ञाकारी बना देता है। इसलिए मरुत्-युक्त इन्द्र के लिए निकाले, न कि 'मरुतों' के
लिए ॥१०॥
उस (इन्द्र) को उनके छोड़ने का भय था, 'कहीं वे मुझे छोड़ जायें और दूसरे दल में
मिल जायें।' इस प्रकार वह इस भाग के द्वारा उनको ऐसा बना देता है कि वे उसे छोड़ने न

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मिणोऽकुरुत तस्मादिन्द्रायैव म॒रुत्व॑ते गृह्णीयान्नापि मरुद्म्यः ॥ ११॥ ऋतुपात्राभ्यां
गृह्णाति । ऋतवो वै संवत्सरो यज्ञस्तेऽद॒ः प्रातःसवने प्रत्यक्षमकल्प्यन्ते यदृतु-
ग्रहान्गृह्णात्यथैतत्परोऽक्षं माध्यन्दिने सवनेऽवकल्प्यन्ते यदृतुपात्राभ्यां मरुवती-
यान्गृह्णाति विशो वै मरुतोऽन्नं वै विश ऋतवो वाऽइदꣳ सर्वमन्नाद्यं पचन्ति
तस्मादृतुपात्राभ्यां मरुवतीयान्गृह्णाति ॥ १२॥ अथातो गृह्णात्येव । इन्द्र मरुत्व
इ॒ह पा॑हि॒ सोमं॒ यथा शार्या॒तेऽअपिबः सु॒तस्य॑ । तव प्रणीती तव शूर॒ शर्म॒न्ना-
विवासन्ति कवयः सुयज्ञाः । उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽसीन्द्राय त्वा म॒रुत्व॑त ऽए॒ष ते॒ योनि॒-
रिन्द्राय त्वा मरुत्वते ॥ १३॥ म॒रुत्व॑न्तं वृष॒भम् । वावृधानम॒कवा॑रिं दि॒व्यꣳ शास॑-
मिन्द्र॑म् । वि॒श्वा॒सा॒हमव॑से नूतनायो॒ग्रꣳ स॑हो॒दामि॒ह तꣳ हु॑वेम । उ॒पया॒मगृ॑ही-
तोऽसीन्द्रा॑य त्वा मरुत्वत ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते । उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽसि
मरुतां त्वौजस ऽइति तृतीयं ग्रहं गृह्णाति ॥ १४॥ अथ माहेन्द्रं ग्रहं गृह्णाति । पा-
प्मना वाऽएतदिन्द्रः संसृष्टोऽभूद्यद्विशा मरुद्भिः स यथा विजयस्य कामाय विशा
समाने पात्रेऽश्नीयादेवं तद्यदस्माऽएतं मरुद्भिः समानं ग्रहमगृह्णन् ॥ १५॥ ते दे-
वाः । सर्वस्मिन्विजितेऽभयेऽनाष्ट्रे यथेषीकां मुञ्जाद्विवृहेदेवꣳ सर्वस्मात्पाप्मनो
व्यवृहन्यन्माहेन्द्रं ग्रहमगृह्णꣳस्तथोऽएवैष एतद्यथेषीकां विमुञ्जा स्यादेवꣳ सर्व-
स्मात्पाप्मनो निर्मुच्यते यन्माहेन्द्रं ग्रहं गृह्णाति ॥ १६॥ यद्वेव माहेन्द्रं ग्रहं गृ-
ह्णाति । इन्द्रो वाऽएष पुरा वृत्रस्य बधादथ वृत्रꣳ हत्वा यथा महाराजो विजि-
ग्यान एवं महेन्द्रोऽभवत्तस्मान्माहेन्द्रं ग्रहं गृह्णाति महान्तमु चैवैनमेतत्खलु
करोति वृत्रस्य बधाय तस्माद्वेव माहेन्द्रं ग्रहं गृह्णाति शु० पात्रेण गृह्णात्येष वै
शुक्रो य एष तपत्येष उऽएव महांस्तस्माच्छुक्रपात्रेण गृह्णाति ॥ १७॥ अथातो गृ-
ह्णात्येव । म॒हाँ२॥ऽइन्द्रो॒ नृवदा च॑र्षणि॒प्रा उत् वि॒ब॒र्हा म॒हिनः सहो॑भिः । अ॒-
स्म॒द्र्यग्वावृधे वी॒र्या॑योरुः पृथुः सु॒कृतः कर्तृभिर्भूत् । उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽसि म॒हेन्द्रा॑य

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कां० ४, अ० ३, ब्रा० ३, कं० ११-१८ शतपथब्राह्मण / २८६
पावें। इसलिए भी 'मरुत्-युक्त इन्द्र' के लिए निकाले, मरुतों के लिए नहीं ॥११॥
दो ऋतु-पात्रों से निकालता है। ऋतु संवत्सर यज्ञ है। प्रातःसवन में तो प्रत्यक्ष ही
लिये जाते हैं, जब ऋतु-ग्रह निकाले जाते हैं। परन्तु दोपहर के सवन में परोक्ष रूप से निकलता
है जब दो मरुत्वतीय ऋतुपात्रों को निकालता है, इसलिए दो मरुत्वतीय ऋतु-पात्रों में निकालता
है ॥१२॥
वह इस मन्त्र से निकालता है—"इन्द्र मरुत्व ऽ इह पाहि सोमं यथा शार्याते ऽ अपिबः
सुतस्य । तव प्रणीती तव शूर शर्मन्नाविवासन्ति कवयः सुयज्ञाः । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा
मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते” (यजु० ७।३५, ऋ० ३।५१।७)—"हे मरुतों से
युक्त इन्द्र ! यहाँ सोम को पी, जैसे शार्यात के सोम को पिया था। सुयज्ञ कवि लोग तेरी
प्रसन्नता और तेरी शरण की सहायता से ही यज्ञ में तेरी सेवा करते हैं। तुझे आश्रय के लिए
लिया है। इन्द्र मरुत्-युक्त के लिए तुझको ! यह तेरी योनि है। मरुत्-युक्त इन्द्र के लिए
तुझको” ॥१३॥
दूसरे ग्रह को इस मन्त्र से निकालता है—"मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्यँ
शासमिन्द्रम् । विश्वासाहमवसे नूतनायोग्रँ सहोदामिह तँ हुवेम । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा
मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते" (यजु० ७।३६, ऋ० ३।४७।५)—"मरुतवाले,
बलवान्, वृद्धि-शील, दोष-रहित, दिव्य, शासक, सबके पालक इन्द्र को हम इस यज्ञ में नई रक्षा
के लिए बुलाते हैं। आश्रय के लिए तुझे लिया जाता है। इन्द्र-मरुतवाले के लिए तुझको। यह
तेरी योनि है। इन्द्र मरुतवाले के लिए तुझको।' इस मन्त्र से तीसरा ग्रह निकालता है- "उपयाम-
गृहीतोसि मरुतां त्वौजसे” (यजु० ७।३६)—"तुझे आश्रय के लिए लिया गया है। मरुतों के
ओज के लिए तुझको” ॥१४॥
अब वह माहेन्द्र ग्रह को लेता है। जैसे विजय की कामना के लिए वैश्यों के साथ एक ही
पात्र में खा लेवे, इसी प्रकार इन्द्र भी वैश्य मरुतों के साथ मिलकर पाप-युक्त हो गया, क्योंकि
मरुतों के साथ-साथ इन्द्र के लिए भी एक ही ग्रह निकाला गया ॥१५॥
तब देवों ने जीत हो जाने और अभय और शान्ति प्राप्त हो जाने पर इन्द्र को उस पाप
से मुक्त किया जैसे सिरकी से मूंज निकाल लेते हैं, इस माहेन्द्र ग्रह को लेकर। जैसे सिरकी बिना
मूंज के (साफ) हो जाती है इसी प्रकार माहेन्द्र ग्रह को निकालकर वह सब दोषों से दूर हो
जाता है ॥१६॥
माहेन्द्र ग्रह को इसलिए भी निकालता है, वृत्र के वध से पहले वह इन्द्र था। अब किसी
बड़े विजयी राजा के समान, वृत्र को मारकर माहेन्द्र बन गया। इसलिए माहेन्द्र ग्रह को लेता
है। वृत्र के वध के लिए उसको बड़ा बनाता है, इसलिए भी माहेन्द्र ग्रह को लेता है। शुक्र-पात्र
से लेता है। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, वह शुक्र है। शुक्र महान् है, इसलिए शुक्र-पात्र से
निकालता है ॥१७॥
इस मन्त्र से निकालता है—"महाँ२ ऽ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा ऽ उत द्विबर्हा ऽ अमिनः
सहोभिः । अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत् । उपयामगृहीतोऽसि महेन्द्राय

अध्याय-३, ब्राह्मण-४

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५६० शतपथ ब्राह्मण
षैष ते॒ योनि॑र्म॒हेन्द्रा॑य॒ त्वेति॑ सादयति महेन्द्रा॑य ह्ये॒नं गृ॒ह्णाति॑ ॥ १८ ॥ अथोपा-
कृत्यै॒तां वाचं॑ वदति । अ॒भिषोतारो॒ऽभिषु॑णु॒तोलू॑खलान्नु॒द्वाद॑यता॒शीरा॑शिरं॒ विन॑य
सौ॒म्यस्य॑ वि॒त्तादि॑ति ते वै तृतीयसवनायैवाभिषोतारोऽभिषुण्वन्ति तृतीयसवना-
यो॑लूखलान्नु॒द्वाद॑यन्ति तृतीयसवना॒याशीरा॑शिरं॒ विन॑यन्ति तृतीयसवनाय सौम्यं
च॒रुग्ं॑ श्रपयन्त्ये॒ते वै शु॑क्रमती र॒सव॑ती॒ सव॑ने॒ यत्प्रा॑तः॒सवनं॑ च माध्यन्दिनं॑ च स-
वन॒मथैत॒न्निऋ॑तिशुक्रं॒ यत्तृतीयसवनं॒ तद्देवैतस्मान्माध्यन्दिनात्स॒वनान्निर्मि॒मीते॒ तथो
हा॒स्यैतच्छुक्रव॒द्रसव॑त्तृतीयसवनं॑ भवति॒ तस्मादे॒तामत्र॒ वाचं॑ वदति ॥ १९ ॥ ब्राह्म-
णम् ॥ ७ [३. ३.] ॥ द्वितीयः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १३१ ॥ ॥
घ्नन्ति॒ वाऽए॒तद्य॒ज्ञम् । यदे॑नं त॒न्वते॒ यन्त्वे॑व॒ राजानम॒भिषु॑ण्व॒न्ति तत्त्ं॑ घ्नन्ति॒
यत्पशुं॑ सं॒ज्ञपय॑न्ति वि॒शास॑ति तत्त्ं॒ प्रत्युलू॑खलमुसला॒भ्यां दृषदुप॒लाभ्याग्ं॑ ह॒-
विर्य॒ज्ञं घ्नन्ति॑ ॥ १ ॥ स ए॒ष य॒ज्ञो ह॒तो न द॑द॒भे । तं दे॒वा द॑क्षिणाभि॒रद॑क्षयंस्त-
द्यदेनं॒ दक्षि॑णाभि॒रद॑क्षयं॒स्तस्माद्दक्षि॑णा नाम॒ तय्द्येवात्र॑ य॒ज्ञस्य॒ ह॒तस्य॒ व्यथ॑ते॒ त-
द्दे॒वास्तैतद्दक्षि॑णाभि॒र्दक्ष॑यन्त्यथ॒ समृ॑द्ध ए॒व य॒ज्ञो भ॑वति॒ तस्माद्दक्षि॑णा ददाति ॥ २॥
तद्वै षड्द्वादशेत्येव हविर्यज्ञे ददति । न ह त्वे॑वाशतदक्षिणाः सौम्योऽध्वरः स्यादेष
वै प्र॒त्यक्षं॑ य॒ज्ञो यत्प्र॒जाप॑तिः पुरु॑षो वै प्र॒जाप॑तेर्नेदि॑ष्ठग्ं॒ सोऽयग्ं शतायुः श॒त-
तेजाः श॒तवी॑र्य्यस्तग्ं श॒तेनै॒व दक्ष॑यति॒ नाशतेन॒ तस्मान्नाशतदक्षिणः सौम्योऽध्वरः
स्यान्नो हैवाशतदक्षिणेन यजमानस्यऽर्त्विक्स्यान्निदस्यान्निर्भूरिसानि धिमिहे हनि-
ष्यन्नेव न दत्तयिष्यन्तीति ॥ ३॥ द्वया वै देवा देवाः । अहैव देवा अथ ये ब्रा-
ह्मणाः शुश्रुवाग्ंसोऽनूचानास्ते मनुष्यदेवास्तेषां द्वेधाविभक्त एव यज्ञ आहुतय
एव देवानां दक्षिणा मनुष्यदेवानां ब्राह्मणानाग्ं शुश्रुषुषामनूचानानामाहुतिभि-
रेव देवान्प्रीणाति दक्षिणाभिर्मनुष्यदेवान्ब्राह्मणाञ्छुश्रुवुषोऽनूचानांस्तऽएनमु-
भये देवाः प्रीताः स्वर्गं लोकमभिवहन्ति ॥ ४॥ ता वाऽएताः । ऋत्विजामेव द-

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कां० ४, अ० ३, ब्रा० ३-४, कं० १८-१९ व १-५ शतपथब्राह्मण / ५६१
त्वा'' (यजु० ७।३६, ऋ० ६।१६।१)—"बड़ा इन्द्र ! नेता के समान, मनुष्य की कामनाओ
की पूर्ति करनेवाला, दुहरे यज्ञोंवाला, अपार बलों के साथ, हमारे सामने बढ़ा वीर्य अर्थात्
पराक्रम से, उस (यशवाला), पृथुः (विस्तृत) यजमानों द्वारा पूज्य हुआ।" यह पढ़कर नीचे
रख देता है— "एष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा" (यजु० ७।३६)— "यह तेरा घर है। महेन्द्र के लिए
तुझको" ॥१८॥
उपाकरण करके यह वचन बोलता है, 'निचोड़नेवाला, निचोड़ो। मूसलों को जोर से
चलाओ (सोम पीसने के लिए) आग्नीध्र, दही को देख, सोम की ख़बर रख।' ये निचोड़नेवाले
तीसरे सवन के लिए निचोड़ते हैं। तीसरे सवन के लिए ही मूसली चलाते हैं। तीसरे सवन के
लिए ही आग्नीध्र दही को बिलोता है। तीसरे सवन के लिए ही सोम के चरु को पकाता है। ये
जो दो सवन थे अर्थात् प्रातः और दोपहर के, ये तो शुक्र और रसवाले थे। परन्तु तीसरा सवन
शुक्र-रहित हो जाता है। इसलिए दोपहर के संवन से इसको बनाता है। इस प्रकार यह तीसरा
सवन शुक्र और रसवाला हो जाता है। इसीलिए इस वाणी को इस समय बोलता है ॥१९॥
दाक्षिणहोमो दक्षिणादानञ्च
अध्याय ३—ब्राह्मण ४
अब इस यज्ञ का वध करते हैं। जब यज्ञ में सोम राजा को कुचलते हैं तो मानो उसका
वध करते हैं। जैसे पशु को काटते हैं तो उसका वध करते हैं, इसी प्रकार ओखली और मूसल से
या दो पाटों से यज्ञ की हवि का वध किया जाता है ॥१॥
जब इस यज्ञ का वध हो गया तो उसकी शक्ति जाती रही, तब देवों ने दक्षिणाओं द्वारा
पूरा किया। यह यज्ञ दक्षिणाओं द्वारा दक्ष हो गया। इसलिए इसका नाम दक्षिणा पड़ा (दक्ष
बनानेवाली)। यहाँ यज्ञ के वध होने से जो कुछ कमी आ जाती है उसकी वह दक्षिणाओं से
पूर्ति कर देता है। यज्ञ पूर्ण हो जाता है। इसलिए वह दक्षिणा देता है ॥२॥
हविर्यज्ञ में छः या बारह गायें दक्षिणा में दी जाती हैं। परन्तु सोम यज्ञ में सौ से कम
नहीं। यह जो प्रजापति है वह प्रत्यक्ष यज्ञ है। पुरुष प्रजापति का निकटतम है। इसकी सौ वर्ष
की आयु, सौ गुना तेज और सौ गुना पराक्रम होता है। सौ से ही वह इसको शक्ति-सम्पन्न
करता है, सौ से कम से नहीं। इसलिए सोम यज्ञ में सौ गायों की दक्षिणा देनी चाहिए, और न
किसी को ऐसे यज्ञ में ऋत्विक् बनना चाहिए जहाँ सौ से कम गायें दक्षिणा में दी जायें, कि
कहीं मैं ऐसी क्रिया का साक्षी न हो जाऊँ जहाँ यज्ञ का वध तो किया जाता है परन्तु उसकी पूर्ति
नहीं की जाती ॥३॥
देव दो प्रकार के हैं—एक तो देव और दूसरे मनुष्य-देव, जो ब्राह्मण, वेदशास्त्र पढ़े
हुए। इसलिए यज्ञ भी दो भागों में विभक्त है। देवों की आहुतियां हैं और मनुष्यदेवों की
अर्थात् उन ब्राह्मणों की जो वेद-शास्त्र पढ़े हुए हैं दक्षिणा है। आहुतियों से देवों को प्रसन्न किया
जाता है और मनुष्य-देव अर्थात् वेदशास्त्र पढ़े हुए ब्राह्मणों को दक्षिणाओं से। इस प्रकार दोनों
देव प्रसन्न होकर यजमान को स्वर्गलोक में ले जाते हैं ॥४॥
यह दक्षिणा केवल ऋत्विजों की ही होती है। यह जो ऋक्, यजुः और साम और