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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 603 of 699

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Page 603

का० ४, अ० ३, ब्रा० २-३, क० ८-१३ व १-४ शतपथब्राह्मण / ५८५
उसी से दोपहर का सवन किया गया। उससे त्रिष्टुप् ने कहा, 'मैं अपने तीन अक्षरों के साथ
आता हूँ। मुझे बुला। मुझे यज्ञ से बाहर न निकाल।' 'अच्छा' ऐसा कहकर (गायत्री ने त्रिष्टुप्
को) बुला लिया। इस प्रकार त्रिष्टुप् में ग्यारह अक्षर हो गये। इसलिए कहते हैं कि दोपहर का
सवन त्रैष्टुभ् होता है ॥८॥
उसी गायत्री से तीसरा सवन किया। उससे जगती ने कहा, 'मैं अपने एक अक्षर के साथ
तेरे पास आती हूँ, तू मुझे बुला, यज्ञ से बाहर मत निकाल।' उसने कहा 'अच्छा' और बुला
लिया। तब से जगती बारह अक्षर की हो गई। इसलिए कहते हैं कि तीसरा सवन 'जागत'
है ॥९॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि सभी सवन 'गायत्र' हैं क्योंकि गायत्री ही तो बढ़ती गई।
इसलिए प्रातःसवन में पूरा 'प्रतिगर' कहे, क्योंकि गायत्री पूरी होकर लौटी थी। दोपहर के
सवन में एक बार 'मद्' शब्द कहकर प्रतिगर पढ़े, क्योंकि त्रिष्टुप् एक अक्षर छोड़कर लौटा था।
उसी से वह उसको समृद्ध करता है अर्थात् उसको पूरा कर देता है जबकि—॥१०॥
त्रिष्टुप् से शस्त्र पढ़ता है। तीसरे सवन में तीन बार 'मद्' शब्द से प्रतिगर कहे, क्योंकि
जब जगती लौटी तो तीन अक्षर पीछे छोड़ आई। इससे वह इसकी समृद्धि करता है, उसको
पूरा करता है जबकि—॥११॥
द्यौ और पृथिवी के लिए शस्त्र पढ़ता है। यह प्रजा इन्हीं दोनों अर्थात् द्यौ और पृथिवी
के सहारे रहते हैं; इसके द्वारा इन्हीं द्यौ और पृथिवी में वह रस रखता है। इन्हीं रसवाले द्यौ
और पृथिवी के सहारे प्रजा उत्पन्न होती है। 'ओ३म्' ऐसा कहकर 'प्रतिगर' करे, क्योंकि यही
सत्य है जिसको देव जानते हैं ॥१२॥
कुछ इस प्रकार प्रतिगर करते हैं 'ओथामो दैववाक्' अर्थात् वाणी प्रतिगर है, उसी को
लेते हैं। परन्तु ऐसा न करे। क्योंकि चाहे जैसे प्रतिगर करे, वाणी ही हो जाती है, क्योंकि प्रतिगर
वाणी द्वारा ही हो सकता है। इसलिए 'ओ३म्' कहकर ही प्रतिगर करे। यही सत्य है जिसको
देव जानते थे ॥१३॥
माध्यन्दिनसवनम्—मरुत्वतीयग्रहादि
अध्याय ३—ब्राह्मण ३
'इहा' 'इहा' कहकर (सोमरस) निकालता है। ('इह' का अर्थ है 'यहाँ। इसी का अन्त
का अक्षर प्लुत करके 'इहा' हो गया। बुलाने में प्लुत हो ही जाता है)। इस प्रकार इन्द्र को
निकट बुलाता है। 'बृहद्-बृहद्' भी कहता है; इससे भी इन्द्र को निकट बुलाता है ॥१॥
पहले शुक्र और मन्थी ग्रहों को लेता है। इससे (सोम यज्ञ) 'शुक्र-युक्त' हो जाता है।
अब आग्रयण ग्रह को लेता है। यह ग्रह तो सभी सवनों में लिया जाता है। फिर मरुत्वतीय ग्रह
लेता है। फिर उक्थ्य ग्रह को। क्योंकि यहाँ भी उक्थ्य मन्त्र होते हैं ॥२॥
कुछ लोग उक्थ्य ग्रह को लेकर मरुत्वतीय को लेते हैं। परन्तु ऐसा न करना चाहिए।
मरुत्वतीय को लेकर उक्थ्य को ले ॥३॥
इस प्रकार यह इन पाँच ग्रहों को लेता है (शुक्र, मन्थी, आग्रयण, मरुत्वतीय और