शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ४, अ० ३, ब्रा० ३-४, कं० १८-१९ व १-५ शतपथब्राह्मण / ५६१
त्वा'' (यजु० ७।३६, ऋ० ६।१६।१)—"बड़ा इन्द्र ! नेता के समान, मनुष्य की कामनाओ
की पूर्ति करनेवाला, दुहरे यज्ञोंवाला, अपार बलों के साथ, हमारे सामने बढ़ा वीर्य अर्थात्
पराक्रम से, उस (यशवाला), पृथुः (विस्तृत) यजमानों द्वारा पूज्य हुआ।" यह पढ़कर नीचे
रख देता है— "एष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा" (यजु० ७।३६)— "यह तेरा घर है। महेन्द्र के लिए
तुझको" ॥१८॥
उपाकरण करके यह वचन बोलता है, 'निचोड़नेवाला, निचोड़ो। मूसलों को जोर से
चलाओ (सोम पीसने के लिए) आग्नीध्र, दही को देख, सोम की ख़बर रख।' ये निचोड़नेवाले
तीसरे सवन के लिए निचोड़ते हैं। तीसरे सवन के लिए ही मूसली चलाते हैं। तीसरे सवन के
लिए ही आग्नीध्र दही को बिलोता है। तीसरे सवन के लिए ही सोम के चरु को पकाता है। ये
जो दो सवन थे अर्थात् प्रातः और दोपहर के, ये तो शुक्र और रसवाले थे। परन्तु तीसरा सवन
शुक्र-रहित हो जाता है। इसलिए दोपहर के संवन से इसको बनाता है। इस प्रकार यह तीसरा
सवन शुक्र और रसवाला हो जाता है। इसीलिए इस वाणी को इस समय बोलता है ॥१९॥
दाक्षिणहोमो दक्षिणादानञ्च
अध्याय ३—ब्राह्मण ४
अब इस यज्ञ का वध करते हैं। जब यज्ञ में सोम राजा को कुचलते हैं तो मानो उसका
वध करते हैं। जैसे पशु को काटते हैं तो उसका वध करते हैं, इसी प्रकार ओखली और मूसल से
या दो पाटों से यज्ञ की हवि का वध किया जाता है ॥१॥
जब इस यज्ञ का वध हो गया तो उसकी शक्ति जाती रही, तब देवों ने दक्षिणाओं द्वारा
पूरा किया। यह यज्ञ दक्षिणाओं द्वारा दक्ष हो गया। इसलिए इसका नाम दक्षिणा पड़ा (दक्ष
बनानेवाली)। यहाँ यज्ञ के वध होने से जो कुछ कमी आ जाती है उसकी वह दक्षिणाओं से
पूर्ति कर देता है। यज्ञ पूर्ण हो जाता है। इसलिए वह दक्षिणा देता है ॥२॥
हविर्यज्ञ में छः या बारह गायें दक्षिणा में दी जाती हैं। परन्तु सोम यज्ञ में सौ से कम
नहीं। यह जो प्रजापति है वह प्रत्यक्ष यज्ञ है। पुरुष प्रजापति का निकटतम है। इसकी सौ वर्ष
की आयु, सौ गुना तेज और सौ गुना पराक्रम होता है। सौ से ही वह इसको शक्ति-सम्पन्न
करता है, सौ से कम से नहीं। इसलिए सोम यज्ञ में सौ गायों की दक्षिणा देनी चाहिए, और न
किसी को ऐसे यज्ञ में ऋत्विक् बनना चाहिए जहाँ सौ से कम गायें दक्षिणा में दी जायें, कि
कहीं मैं ऐसी क्रिया का साक्षी न हो जाऊँ जहाँ यज्ञ का वध तो किया जाता है परन्तु उसकी पूर्ति
नहीं की जाती ॥३॥
देव दो प्रकार के हैं—एक तो देव और दूसरे मनुष्य-देव, जो ब्राह्मण, वेदशास्त्र पढ़े
हुए। इसलिए यज्ञ भी दो भागों में विभक्त है। देवों की आहुतियां हैं और मनुष्यदेवों की
अर्थात् उन ब्राह्मणों की जो वेद-शास्त्र पढ़े हुए हैं दक्षिणा है। आहुतियों से देवों को प्रसन्न किया
जाता है और मनुष्य-देव अर्थात् वेदशास्त्र पढ़े हुए ब्राह्मणों को दक्षिणाओं से। इस प्रकार दोनों
देव प्रसन्न होकर यजमान को स्वर्गलोक में ले जाते हैं ॥४॥
यह दक्षिणा केवल ऋत्विजों की ही होती है। यह जो ऋक्, यजुः और साम और