शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ४, अ० २, ब्रा० ५, कं० ३-११ शतपथब्राह्मण / ५७३
आत्मा या प्रजापति के रूप में, फिर प्रतिहर्ता चिकित्सक या व्यान के रूप में ॥३॥
इन पाँचों को यजमान पीछे से साधता है। इतना ही तो सब यज्ञ है जितने ये पाँच
ऋत्विज हैं। यज्ञ पाँच भाग वाला है। इसलिए यजमान इस प्रकार इस यज्ञ को साधता है ॥४॥
अब अध्वर्यु एक तिनके को चात्वाल पर फेंक देता है, यह कहकर— "देवानामूत्क्रमण-
मसि” (यजु० ७।२६) — “तू देवताओं की सीढ़ी है" (स्वर्ग जाने के लिए)। जब देव यज्ञ से
स्वर्गलोक को गये तो इस चात्वाल से ऊपर उठकर स्वर्गलोक को गये। इस प्रकार वह यजमान
को भी स्वर्ग का रास्ता बताता है ॥५॥
दूसरे तिनके को वह उद्गाताओं के आगे चुपके से फेंक देता है। यह जो उद्गाता है,
वे स्तोम प्रजापति हैं। यह (प्रजापति) इस सबको अपने में खींच लेता है, इस सबको अपना
कर लेता है। इसी को यह तिनका दिया जाता है। इस प्रकार वह अध्वर्यु को नहीं खींचता और
न उसको अपना बनाता है। और जब वे जाप करते हैं—क्योंकि उद्गाता लोग अब जाप करते
हैं—॥६॥
तो वह स्तोत्र पढ़ता है यह कहकर कि 'सोमः पवते' या सोम शुद्ध हो रहा है। वह स्तोत्र
को सीधा (पराग एव—बिना अन्य किसी कृत्य के) पढ़ता है। वे सब भी सीधा ही पढ़ते हैं।
यह स्तोत्र जिनको 'पवमान' कहते हैं सीधे देवों को पहुँचाये जाते हैं। देव इन्हीं के द्वारा तो
स्वर्गलोक को पहुँचे थे। इसीलिए वह सीधा इस स्तोत्र को पढ़ता है और वे भी सीधे इस स्तोत्र
को पढ़ते हैं ॥७॥
'पीछे लौटिये' यह कहकर वह और स्तोत्रों (धुर्यों को) पढ़ता है और पीछे लौटकर वे
धुर्यों को पढ़ते हैं, क्योंकि ये स्तोत्र इन प्रजाओं के लिए पढ़े जाते हैं। इनसे ही यह प्रजा बार-
बार उत्पन्न होती हैं ॥८॥
यहाँ (चात्वाल के पास) बहिष्पवमान स्तोत्रों को क्यों पढ़ते हैं ? आरम्भ में यह सूर्य
यहीं था। ऋतु उसको लेकर स्वर्ग को गये। वहाँ वह ऋतुओं में स्थापित होकर तपता है। इसी
प्रकार ऋत्विज लोग यजमान को लेकर स्वर्ग को ले जाते हैं। इसलिए यहाँ बहिष्पवमान स्तोत्र
पढ़े जाते हैं ॥६॥
बहिष्पवमान स्वर्ग की नौका है। ऋत्विज लोग इस नौका के स्पया और चारित्र अर्थात्
डाँड आदि हैं। ये स्वर्ग पहुँचाने के सम्पारग (साधक) हैं। (नौका में) यदि एक भी बुरा
आदमी होता है तो वह नौका को डुबो देता है। उसी प्रकार जैसे ऊपर तक भारी नौका में यदि
एक भी आ जाय तो वह डूब जाती है। हर एक यज्ञ स्वर्ग की नौका है, इसलिए सब यज्ञों से बुरे
आदमियों को अलग रखना चाहिए ॥१०॥
स्तोत्र पढ़े जाने के बाद यह बात बोलता है 'अग्नीध् अग्नियों को फैला, कुशों को फैला,
पुरोडाश बना, पशु को ला।' अग्नीध् अग्नियों को फैलाता अर्थात् प्रज्वलित करता है। कुशों को