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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 605 of 699

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Page 605

कां० ४, अ० ३, ब्रा० ३, क० ४-११ शतपथब्राह्मण / ५८७
उक्थ्य) । यह जो दोपहर का पवमान है, वह वज्र है। इसमें पांच साम होतें हैं, १५ मन्त्रवाले ।
वज्र पन्द्रहवाला होता है। पांच ग्रहों के द्वारा। ये अँगुलियाँ भी पाँच हैं। इन अँगुलियों से ही
तो वज्र फेंका जाता है ॥४॥
इन्द्र ने वृत्र पर वज्र फेंका । पापी वृत्र को मारकर और विजय तथा अभय प्राप्त करके
दक्षिणा लाया । इसलिए ये उद्गाता लोग भी जब दोपहर के सवन में पवमान पढ़ते हैं और
अभय तथा विजय प्राप्त करते हैं तो दक्षिणा को लाते हैं। इसी प्रकार यह भी इन पाँच ग्रहों
द्वारा दुष्ट पापी शत्रु पर वज्र फेंकता है और पापी वृत्र को मारकर अभय तथा विजय प्राप्त
होने पर दक्षिणा को ले जाता है। इसलिए इन पाँच ग्रहों को लेते हैं ॥५॥
मरुत्वतीय ग्रहों को इसलिए लेता है कि यह जो दोपहर का सवनं है वह इन्द्र का निज
का सवन (निष्केवल्य) है। उसी से उसने वृत्र को मारने और जीतने की इच्छा की। इस समय
मरुत् अश्वत्थ कक्षा पर घूमकर जा खड़े हुए । इन्द्र क्षत्रिय है। मरुत् वैश्य हैं। क्षत्रिय बलवान्
होता है। इसलिए दो पात्र अश्वत्थ लकड़ी के हो सकते हैं। (ऐसी लोगों की राय है) परन्तु
कार्ष्मर्य लकड़ी के तो होते ही हैं ॥६॥
उनको इन्द्र ने बुलाया, 'मेरे पास आइये कि आपकी सहायता से मैं वृत्र को मार डालूं ?'
उन्होंने कहा, 'हमको क्या मिलेगा ?' उसने इन दो मरुत्वतीय ग्रहों को उनके लिए
निकाला ॥७॥
वे बोले, 'इस एक अह अर्थात् ओज को अलग रखकर हम आ रहे हैं।' वे इस ओज को
अलग रखकर आये । परन्तु इन्द्र ने इस (ग्रह अर्थात् ओज) को भी लेना चाहा, यह सोचकर
कि ये ओज को अलग रखकर आ रहे हैं। (ओज के बिना तो कुछ सफलता होती नहीं) ॥८॥
उसने कहा, 'ओज के साथ आइये ।' उन्होंने उत्तर दिया, 'तो हमारे लिए एक तीसरा
ग्रह और लो।' तब उनके लिए उसने एक तीसरा ग्रह निकाला, इस मन्त्र से “उपयामगृहीतोऽसि
मरुतां त्वौजसे—” (यजु० ७।३६) । तब वे ओज के साथ (इन्द्र की सहायता को) गये।
उनकी सहायता से विजय पाई, उनकी सहायता से वृत्र को मारा । इन्द्र क्षत्रिय है। मरुत् वैश्य
है। क्षत्रिय वैश्य की सहायता से ही बलवान् होता है। इसलिए वह क्षत्रिय में बल को रखता
है। इसलिए मरुत्वतीय ग्रहों को लेता है ॥९॥
उन ग्रहों को वह 'मरुत्-युक्त इन्द्र' के लिए निकाले, अकेले इन्द्र के लिए नहीं। यदि वह
केवल मरुतों के लिए निकालेगा तो वैश्यों को क्षत्रियों के विरुद्ध कर देगा। इसलिए वह इन्द्र के
पीछे मरुत् का भी भाग रख देता है। इस प्रकार वह वैश्य को क्षत्रिय के अधीन और उसका
आज्ञाकारी बना देता है। इसलिए मरुत्-युक्त इन्द्र के लिए निकाले, न कि 'मरुतों' के
लिए ॥१०॥
उस (इन्द्र) को उनके छोड़ने का भय था, 'कहीं वे मुझे छोड़ जायें और दूसरे दल में
मिल जायें।' इस प्रकार वह इस भाग के द्वारा उनको ऐसा बना देता है कि वे उसे छोड़ने न