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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

About this granth

The Shatapatha Brahmana (शतपथ ब्राह्मण), the Brahmana of the White Yajurveda, is the largest and most important work of Vedic prose. Named for its hundred chapters and linked by tradition to the sage Yajnavalkya, it has fourteen books in the Madhyandina recension. It explains the procedure and meaning of the new- and full-moon offerings, the setting up of the fires, the agnihotra, the soma sacrifice, the building of the fire altar and the horse sacrifice, and its final part contains the Brihadaranyaka Upanishad. The first book includes the well-known story of Manu and the fish in the great flood.

This is the first of three volumes. The text follows Albrecht Weber's edition, with the Hindi translation (Ratnadipika) of Pandit Gangaprasad Upadhyaya, edited by Swami Satyaprakash Saraswati. Introductions on the Brahmanas and on the accent marks, a note on the translation, an English preface and contents precede the text, which runs by kanda, adhyaya and brahmana. This scan is of the 2014 Govindram Hasanand edition, 699 pages.

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कां० ३, अ० १, ब्रा० २-३, कं० २१ व १-६ शतपथब्राह्मण / ३३५
अब (अध्वर्यु) उसको शाला में ले जाता है। वह गाय या बैल का (मांस) न खावे,
क्योंकि गाय और बैल ही इस सब विश्व को धारण करते हैं। देवों ने कहा—"ये गाय और
बैल संसार को धारण करते हैं इसलिए अन्य प्राणियों का जो वीर्य या पराक्रम है वह गाय और
बैल में रख दें। इसलिए जो पराक्रम अन्य प्राणियों में था उसे उन्होंने गाय और बैलों में रख
दिया। इसलिए गाय और बैल बहुत खाते हैं। इसलिए यदि गाय या बैल का (मांस) खा जायगा
तो सब ही खा लिया जायगा और अन्त में सबका नाश हो जायगा। वह दूसरे जन्म में अद्भुत
योनि को प्राप्त होगा। कहा जायगा कि इसने पत्नी के गर्भ का नाश कर दिया; पाप कर दिया।
उसकी कीर्ति पापयुक्त होगी। इसलिए गाय और बैल का मांस न ख.वे। परन्तु याज्ञवल्क्य ने
कहा—"मैं तो खाता हूँ अगर नर्म (अंसल) हो ॥२१॥
अध्याय १—ब्राह्मण ३
जलों को लाकर अग्नि और विष्णु के लिए ११ कपालों का पुरोडाश निकालता है।
अग्नि ही सब देवता हैं क्योंकि अग्नि में ही सब देवताओं के लिए आहुति दी जाती है। अग्नि
यज्ञ का नीचे का आधा है और विष्णु ऊपर का आधा। वह सोचता है कि 'मैं सब देवताओं का
परिग्रहण करके और सब यज्ञ को घेरके दीक्षित हो जाऊँगा, इसलिए वह अग्नि और विष्णु के
लिए ग्यारह कपालों का पुरोडाश बनाता है ॥१॥
इस पर कुछ लोग आदित्य के लिए चरु देते हैं। इस पर एक श्रुति है—"अष्टौ पुत्रासो
अदितेर्ये जातास्तन्वस्परि । देवाँ उप प्रैत् सप्तभिः परा मार्ताण्डमास्यत् ।” (ऋ० १०।७२।८)—
“अदिति के आठ पुत्र हैं, जो उसके शरीर से उत्पन्न हुए हैं। सातों के साथ वह देवों तक पहुँची,
और मार्तण्ड को उसने फेंक दिया" ॥२॥
अदिति के आठ पुत्र थे। परन्तु जो आदित्य (अर्थात् अदिति के अपत्य) कहलाते हैं
वे सात ही हैं। आठवें मार्तण्ड को उसने अविकृत (बिगड़े) रूप में उत्पन्न किया। वह सन्देह-
मात्र था अर्थात् वह किसी निश्चित रूप का न था। जितना ऊँचा था उतना ही चौड़ा था। कुछ
लोग कहते हैं कि वह मनुष्य के आकार का था ॥३॥
आदित्य देव अर्थात् अदिति के पुत्रों ने कहा—"जो हमारे पीछे उत्पन्न हुआ है वह
विकृत न हो जाय। लाओ इसे बनावें।" उन्होंने उसे वैसा ही बनाया जैसा मनुष्य बनाया जाता
है। जो मांस काटकर डाल दिया गया उससे हाथी बन गया। इसलिए कहते हैं कि भेंटस्वरूप
हाथी न लेना चाहिए क्योंकि हाथी मनुष्य से उत्पन्न हुआ है, और जिसे बनाया वह हुआ
'विवस्वान्' (सूर्य) या सूर्य, और इसी की यह सब प्रजा हैं ॥४॥
उसने कहा—"मेरी प्रजा में से वह फलीभूत होगा जो आदित्यों को चरु देता है।" इस-
लिए वह सफल होता है जो आदित्यों को चरु देता है। यह चरु अग्नि और विष्णु के लिए विख्यात
है ॥५॥
इसकी सत्रह सामिधेनियां हैं। इन दोनों देवताओं के लिए धीमी आवाज में आहुति दी
जाती है। पाँच प्रयाज होते हैं और तीन अनुयाज। पूर्णता के लिए पत्नी-संयाज करते हैं। समिष्ट-

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मे दे॒हीति॒ नात्र॑ तिरो॒हित॑मिवास्ति ॥ ९॥ अथाक्ष्यावानक्ति । अरुर्वै

  • पु॒रुष॒स्याक्षि॑ प्रशान्त्वे॒वेति॒ ह स्माह॒ याज्ञ॑वल्क्यो॒ऽरन्-इव॒ ह्यास पूयो है॒वास्य॑
  • दूषी॑का ते॒ऽन्वै॒तदन॑रुष्करोति॒ यद॒क्ष्यावा॑न॒क्ति ॥ १०॥ यत्र॒ वै दे॒वाः । असुररक्ष-
  • सानि॑ ज॒घ्नुस्तत्कु॒क्षो दान॑वः प्रत्य॒ङ् पति॑त्वा मनु॒ष्या॑णा॒मक्ष्णोः प्रवि॑वेश॒ स ए॒ष क-
  • नी॑नकः कुमा॒रक॒-इव॑ परिभास॑ते॒ तस्मा॑ऽए॒वैतच्चक्षु॑ष॒प्रय॒त्त्सर्व॑तो॒ऽश्मपु॑रां परिद-
  • धात्यश्मा ह्याञ्जनम् ॥ ११॥ त्रैककुदं भवति । यत्र वाऽइन्द्रो वृत्रमहंस्तस्य यद-
  • क्ष्यासीतं॒ गिरि॑ त्रिककुद॒मकरोत्तद्य॒त्रैक॑कु॒द
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कां० ३, अ० १, ब्रा० ३, क० ६-१६ शतपथब्राह्मण / ३३७
यजुः की आहुति नहीं देते कि कहीं ऐसा न हो कि दीक्षित के वस्त्र पहनकर यज्ञ की पूर्ति से यज्ञ
के अन्त को पहुँच जाय। क्योंकि समिष्ट-यजुः यज्ञ का अन्त है ॥६॥
अब शाला के आगे खड़े होकर अभ्यंजन (नवनी शरीर पर मलना) कराता है। त्वचा
से वंचित होकर पुरुष घाववाला हो जाता है। जब उसका अभ्यंजन होता है तो घाव भर जाते
हैं। क्योंकि मनुष्य की त्वचा तो गाय के ऊपर है और घी (नवनी) भी गाय की होती है। इस
प्रकार (अध्वर्यु) उसको उसी की चीज दिला देता है। इसीलिए अभ्यंजन किया जाता है ॥७॥
यह नवनी है। घी देवों का है और फाण्ट (अर्थात् वे मक्खन के कण जो मट्ठा चलाने
में ऊपर उतरा आते हैं) मनुष्यों का। नवनी न तो घी है, न फाण्ट है। वृद्धि के लिए घी और
फाण्ट दोनों होने चाहिएँ। जो वृद्धियुक्त चीज है उससे वह यजमान को वृद्धियुक्त करता है ॥८॥
वह शिर से पैर तक अनुलोम की रीति से अभ्यंजन (उबटन) करता है, इस मन्त्र को
पढ़कर- “महीनां पयोऽसि” (यजु० ४।३)। 'मही' उन गायों में से एक का नाम है और यह
(नवनी) उनका 'पय' है। इसीलिए कहा- 'महीनां पयोऽसि।' अब कहता है- “वर्चोदाऽअसि
वर्चो मे देहि” (यजु० ४।३) -“तू वर्चस् देनेवाला है, मुझे वर्चस् दे।” यह स्पष्ट है ॥६॥
अब आंख में काजल लगाता है। याज्ञवल्क्य ने कहा कि 'मनुष्य की आंख जरुमवाली है।
मेरी आंख ठीक है।' पहले उसकी आंख खराब थी। अब वह काजल लगाकर उसकी आंख को
नीरोग करता है ॥१०॥
जब देवों ने असुर राक्षसों को मारा तो शुष्ण दानव पीछे को लौटकर मनुष्यों की आंखों
में समा गया। वही आँख की पुतली होकर छोटा बालक-सा प्रतीत होता है (कुमारक पुतली
को भी कहते हैं और बालक को भी)। इस प्रकार यजमान यज्ञ में प्रवेश होते समय इस अंजन
को लगाकर मानो उस दानव के चारों ओर पत्थर की दीवार खड़ी कर देता है, क्योंकि अंजन
पत्थर का है। (सुरमा पत्थर का होता है) ॥११॥
यह त्रिककुद पहाड़ का सुरमा है। जब इन्द्र ने वृत्र को मारा तो उसकी आँख की जो
पुतली थी उसका त्रिककुद पहाड़ बना दिया। अब त्रिककुद पहाड़ से सुरमा लाने का तात्पर्य यह
है कि आँख में रख देवे। यदि त्रिककुद पर्वत का सुरमा न मिले तो त्रिककुद को छोड़कर किसी
अन्य स्थान से सुरमा लावे, क्योंकि सुरमों का फल एक ही है ॥१२॥
सुरमा सींक से लगता है, क्योंकि सींक वज्र है। इसी (सींक) की नोक पर रुई लगी
होती है जिससे राक्षस निकल जाय, क्योंकि राक्षस बिना मूल के और दोनों ओर से स्वतन्त्र होकर
हवा में घूमता है, इसी तरह जैसे आदमी हवा में बिना मूल के और बिना रोकटोक के घूमता
है। सींक के किनारे पर रुई इसीलिए लगी होती है कि राक्षस दूर हो जाय ॥१३॥
पहले दाहिनी आँख में सुरमा या अंजन लगाया जाता है। आदमी की बाईं आँख में
पहले अंजन लगाया जाता है, देवताओं की (इसके विपरीत), ऐसी ही चाल है ॥१४॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर अंजन लगाता है- “वृत्रस्यासि कनीनकः” (यजु० ४।३) -“तू
वृत्र की आँख है।” वस्तुतः यह वृत्र की ही आँख है। अब कहता है- “चक्षुर्दाऽअसि चक्षुर्मे देहि”
(यजु० ४।३) -“तू आँख देनेवाला है, मुझे आँख दे।” यह स्पष्ट है ॥१५॥
दाहिनी आँख में एक यजुः-मन्त्र पढ़कर लगाता है और एक बार चुपचाप। बाईं आँख में

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३३८ शतपथ ब्राह्मण
कृ॒ष्ण॒विषा॒ण॒क्ति द्विस्तू॒ष्णीं तदु॑त्तर॒मेवैत॒दुत्त॑रावत्करोति ॥ १६॥ तद्यत्पञ्च॑ कृत्व॒ आ-
न॒क्ति । सं॒वत्स॑रसंमितो वै य॒ज्ञः पञ्च वाऽऋ॒तवः॑ संवत्स॒रस्य॒ तं प॒ञ्चभि॑राप्नोति
तस्मात्पञ्च॑ कृत्व॒ आन॒क्ति ॥ १७॥ अथैनं॑ दर्भपवित्रे॒ण पावयति । अमे॒ध्यो वै पुरु॑-
षो यद॒नृतं॑ वद॒ति ते॑न पूतिरन्त॒रतो मेध्या॒ वै दर्भा मेध्यो भूत्वा॒ दीक्षा॒ऽइति॑ प-
वित्रं॒ वै दर्भाः प॒वित्र॑पूतो दीक्षा॒ इति॒ तस्मा॑देनं दर्भपवित्रे॒ण पावयति ॥ १८॥ त-
द्वाऽएक॑ स्यात् । एको॒ ह्ये॒वायं पव॑ते॒ तदे॒तस्यैव रूपेण तस्मादेक॑ स्यात् ॥१९॥
अथोऽअपि त्रीणि स्युः । एको॒ ह्ये॒वायं पव॑ते॒ सोऽयं पुरु॑षे॒ऽन्तः प्रवि॑ष्टस्त्रेधावि॑-
क्तः प्रा॒ण उदा॒नो व्यान॒ इति॒ तदे॒तस्यैवानु मात्रां तस्मात्त्रीणि स्युः ॥ २०॥ अ-
थोऽअपि सप्त॑ स्युः । सप्त॒ वाऽइ॒मे शी॒र्षन्प्रा॒णास्तस्मात्सप्त॑ स्युस्त्रिःस॒प्तान्ये॒व स्यु॒रे-
कवि॒ꣳशति॑रे॒षैव संपत् ॥२१॥ तꣳ स॒प्तभिः॑-स॒प्तभिः॑ पावयति । चि॒त्पति॑र्मा पुना-
त्विति प्रजा॒पति॒र्वे चि॒त्पतिः॑ प्रजा॒पति॑र्मा पुना॒त्वित्ये॒वैतदा॑ह वा॒क्पति॑र्मा पुनात्वि-
ति प्रजा॒पति॒र्वे वा॒क्पतिः॑ प्रजा॒पति॑र्मा पुना॒त्वित्ये॒वैतदा॑ह दे॒वो मा॑ सवि॒ता पु॑ना-
त्विति तद्द्वै सुपूतं॒ यं देवः॑ सवितापुना॒त्तस्मा॑दाह दे॒वो मा॑ सवि॒ता पु॑ना॒त्वित्यच्छिद्रे-
ण प॒वित्रे॑णे॒ति यो वाऽअ॒यं पव॑त॒ऽएषोऽच्छि॑द्रं प॒वित्र॑मे॒तेनैतदा॑ह॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒-
रित्ये॒ते वै प॒वितारो॒ यत्सूर्य॑स्य र॒श्मय॒स्तस्मा॑दाह॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒रिति॑ ॥ २२॥ त-
स्य ते पवित्रपत॒ऽइति॑ । प॒वित्र॑पति॒र्हि भव॑ति प॒वित्र॑पूतस्येति प॒वित्र॑पूतो हि भ॑-
वति यत्कामः पुने॒ तच्छ॑केय॒मिति॑ य॒ज्ञस्योद्गुचं॑ गच्छानी॒त्येवैतदा॑ह ॥ २३॥ अथाशि॒-
षा॒मार॑म्भं वाचयति । आ वो॑ देवास ईमहे वामं प्रयत्यध्वरे । आ वो॑ देवास
आशिषो य॒ज्ञियासो हवामहेऽइति॒ तदस्मै स्वाः सत॒र्ऋत्विज॒ आशिष॒ आशा॑सते
॥ २४॥ अथाङ्गुलीर्न्यञ्चति । स्वाहा॑ य॒ज्ञं मन॑स॒ऽइति॒ द्वे स्वाहा॒रोरन्तरिक्षा॒दिति॒ द्वे
स्वाहा॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्या॒मिति॒ द्वे स्वाहा॒ वाता॒दारभ॒ऽइति॑ मु॒ष्टीक॑रोति न वै य-
ज्ञः प्रत्य॒क्षमिवाऽऽर॑भे य॒थायं द॒ण्डो वा वासो॑ वा परोऽक्षं॒ वै दे॒वाः परोऽक्षं य-

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का० ३, अ० १, ब्रा० ३, कं० १६-२५ शतपथब्राह्मण / ३३६
एक बार एक यजुः-मन्त्र पढ़कर लगाता है और दो बार चुपचाप । इस प्रकार बाईं आँख को
बड़प्पन दे देता है ॥१६॥
यह पाँच बार क्यों लगाता है ? इसका कारण यह है कि यज्ञ और संवत्सर एक-से हैं ।
संवत्सर में पाँच ऋतुएँ होती हैं । इस प्रकार वह पाँच बार लगाने से संवत्सर को पा लेता है ।
इसलिए पाँच बार लगाता है ॥१७॥
अब यह इसको दर्भ के पवित्रा से पाक करता है। मनुष्य झूठ बोलने से अपवित्र हो
जाता है । पवित्रा पाक है। वह सोचता है कि 'पाक होकर दीक्षा लूँ।' दर्भ शुद्धि का साधन है।
वह सोचता है कि 'पवित्र होकर दीक्षा लूँ।' इसलिए दर्भ के पवित्रा से अपने को शुद्ध करता
है ॥१८॥
यह (दर्भ का पवित्रा) एक ही हो। यह पवन भी तो एक ही है, और पवन के ही लक्षण
का यह पवित्रा है (पवन का अर्थ भी पवित्र करनेवाला है), इसलिए दर्भ एक ही होना
चाहिए ॥१९॥
या तीन पवित्रा हों । यह पवन तो एक ही है, लेकिन पुरुष के शरीर में पहुँचकर प्राण,
व्यान और उदान बन जाता है । पवित्रा का भी यही लक्षण है। इसलिए तीन पवित्रा हो सकते
हैं ॥२०॥
ये सात भी हो सकते हैं। सिर के प्राण सात हैं, इसलिए सात हो सकते हैं। ये सात के
तिगुने अर्थात् २१ भी हो सकते हैं। पूर्णता इसी में है ॥२१॥
सात पवित्रों से वह यह मन्त्र पढ़कर पवित्र करता है—"चित्पतिर्मा पुनातु" (यजु०
४।४) । 'चित्पति' का अर्थ है प्रजापति, अर्थात् प्रजापति मुझे शुद्ध करे । "वाक्पतिर्मा पुनातु"
(यजु० ४।४) । 'वाक्पति' भी प्रजापति है, अर्थात् प्रजापति मुझे पवित्र करे । "देवो मा सविता
पुनात्वच्छिद्रेण पवित्रेण" (यजु० ४।४) । 'सुपूत' (अर्थात् यथार्थ शुद्ध) वह है जिसको सविता
देव ने शुद्ध किया हो । "अच्छिद्रेण पवित्रेण" (यजु० ४।४), क्योंकि वायु ही छिद्ररहित पवित्र
करनेवाला है । "सूर्यस्य रश्मिभिः" (यजु० ४।४), क्योंकि सूर्य की किरणें सबसे अधिक पवित्र
करनेवाली हैं ॥२२॥
"तस्य ते पवित्रपते" (यजु० ४।४)—"वह (जो दीक्षित पुरुष है) पवित्रता का पति है।"
"पवित्रपूतस्य" (यजु० ४।४), क्योंकि वह पवित्रा से शुद्ध किया हुआ है। "यत् कामः पुने
तच्छकेयम्" (यजु० ४।४), अर्थात् "जिस कामना से मैं पवित्र हुआ हूँ वह कर सकूँ" अर्थात् यज्ञ
को पा सकूँ ॥२३॥
अब वह आशीर्वाद का मन्त्र बोलता है—"आ वो देवासऽईमहे वामं प्रयत्यध्वरे । आ वो
देवासऽआशिषो यज्ञियासो हवामहे" (यजु० ४।५)—"हे देवो, हम आपका यज्ञ के आरम्भ में
आवाहन करते हैं। हे देवो, हम आपका यज्ञ में आशीर्वाद के लिए आवाहन करते हैं।" इस प्रकार
ऋत्विज लोग अपने आशीर्वाद को उसके लिए देते हैं ॥२४॥
अब वह अँगुलियों को यह मन्त्र पढ़कर भीतर की ओर मोड़ता है—"स्वाहा यज्ञं मनसः"
(यजु० ४।६) । इस मन्त्र से दो छोटी अँगुलियों को । "स्वाहोरोरन्तरिक्षात्" (यजु० ४।६) ।
इससे दो अनामिकाओं को । "स्वाहा द्यावापृथिवीभ्याम्" (यजु० ४।६) । इससे दो बीच की
अँगुलियों को । "स्वाहा वातादारभे" (यजु० ४।५) । इससे दोनों मुट्ठियाँ बाँधता है। जैसे डंडा
या कपड़ा पकड़ा जाता है उसी प्रकार प्रत्यक्ष रीति से यज्ञ नहीं पकड़ा जा सकता है। जैसे देव
परोक्ष हैं, वैसे ही यज्ञ परोक्ष है ॥२५॥

अध्याय-१, ब्राह्मण-४

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३४० शतपथ ब्राह्मण
ज्ञः ॥ २५॥ स यदा॑ह । स्वाहा॑ य॒ज्ञं मन॑स॒ऽइति तन्मन॑स॒ आर॑भते॒ स्वाहो॒रोर॒न्तरि॑क्षा॒दिति॒ तद॒न्तरि॑क्षा॒दार॑भते॒ स्वाहा॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्या॒मिति॒ तदाभ्यां॒ द्यावा॑पृथि॒-
वीभ्या॒मार॑भते॒ ययो॒रिदँ॒ सर्व॒मधि॒ स्वाहा॒ वाता॒दार॑भ॒ऽइति॒ वातो॒ वै य॒ज्ञस्तद्य॒ज्ञं
प्रत्य॒क्षमार॑भते ॥ २६॥ अथ॒ यत्स्वाहा॑-स्वा॒हेति॑ करोति । य॒ज्ञो वै स्वाहा॑कारो
य॒ज्ञमे॒वैतदा॒त्मन्ध॑त्ते॒ऽथो॒ऽए॒व वाचं॑ यच्छति वाग्वै य॒ज्ञो य॒ज्ञमे॒वैतदा॒त्मन्ध॑त्ते ॥ २७॥
अथैनँ॑ शालां॒ प्रपा॑दयति । स ज॒घने॒नाह॑वनी॒यमेत्य॒परे॑ण गार्हप॒त्यँ॒ सो॒ऽस्य सं॒-
चरो॑ भवत्या सुत्या॑यै तस्मा॒द्यस्यै॒ष सं॑चरो भवत्या सुत्या॒याऽअ॒ग्निर्वे योनि॑र्य॒ज्ञस्य॒ ग-
र्भो दीक्षि॒तो॒ऽन्तरे॑ण वै योनिं॒ गर्भः॒ संच॑रति॒ स यत्स॒ तत्रै॒वेति॒ व्यृ॒द्धिं ब॒दाव॑र्तते
तस्मा॑दि॒मे गर्भा॒ एज॑न्ति व्यृ॒द्धिं ब॒दाव॑र्तन्ते॒ तस्मा॑दस्यै॒ष सं॒चरो॑ भवत्या सुत्या॑यै
॥ २८ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ ॥
सर्वा॑णि ह॒ वै दी॒क्षाया॑ य॒ज्ञौद्ग्र॑ह॒णानि॑ । उ॒द्गृभी॑ते वा॒ऽए॒षो॒ऽस्माल्लो॒का-
दे॒वलो॒कम॒भि यो दीक्ष॑तऽए॒तैरे॒व तद्यजु॑र्भि॒रुद्गृ॑भीते॒ तस्मा॑दाहुः॒ सर्वा॑णि दी॒क्षा-
या य॒ज्ञौद्ग्र॑ह॒णानी॑ति॒ तन॒ एतान्यवा॒त्तरा॒माच॑क्षत॒ ऽऔद्ग्र॑ह॒णानी॑त्या॒हुत॑यो ह्ये॒-
ता आहु॑तिर्हि य॒ज्ञः परा॑ऽङ्वै॑ यजु॑र॒थैष॒ प्रत्य॒क्षं य॒ज्ञो यदाहु॑तिस्त॒देते॑न य॒-
ज्ञेनो॒द्गृभी॑तो॒ऽस्माल्लो॒काद्दे॑वलो॒कम॒भि ॥ १॥ ततो॒ यानि॒ त्रीणि॑ सु॒वेण जु॒होति॑ ।
तान्या॑धीतय॒ज्ञौध्वी॒त्याच॑क्षते॒ सम्य॒ङ्गेव॒ कामा॑य चतु॒र्थँ हूयते॒ऽथ यत्प॑ञ्च॒मँ सु॒-
चा जु॒होति॒ तदे॑व प्रत्य॒क्षमौद्ग्र॑हण॒मनु॑ष्टुभा॒ हि तज्जु॒होति॒ वाग्घ्यनु॑ष्टुग्वाग्घि य॒ज्ञः
॥ २॥ य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॑तिं॒ जिग्यु॒र्यैषा॑मियं॒ जिति॒स्ते हो॑चुः क॒थं न इ॒दं
मनु॒ष्यैर॒नभ्या॑रो॒ह्यँ स्या॒दिति॑ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतो॒ निर्ध॑येयु॒-
र्विदु॒ह्य य॒ज्ञं यू॒पेन॒ योप॑यित्वा॒ तिरो॒ऽभव॒न्नथ॒ यदेने॒नायो॑प॒यंस्तस्मा॒द्यूपो॒ नाम॑ ॥ ३॥
तद्वा॒ऽऋषी॑णामनु॒श्रुत॑मास । ते य॒ज्ञँ सम॑भर॒न्यथा॑ऽयं॒ य॒ज्ञः सम्भृ॑त ए॒वं वा॒ऽए॒ष य॒-
ज्ञँ स॒म्भर॑ति॒ यदे॒तानि॑ जु॒होति॑ ॥ ४॥ तानि॒ वै पञ्च॑ जु

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कां० ३, अ० १, ब्रा० ३-४, कं० २६-२८ व १-५ शतपथब्राह्मण / ३४१
जब वह कहता है—"स्वाहा॑ य॒ज्ञं मन॑सः" तो मन से यज्ञ का आरम्भ करता है। जब
कहता है—"स्वाहोरोर॒न्तरि॑क्षात्", तब अन्तरिक्ष से आरम्भ करता है। जब कहता है "स्वाहा
द्यावा॑पृथि॒वीभ्याम्" तब द्यौ और पृथिवी से आरम्भ करता है जिनमें ये सब चीजें शामिल हैं।
जब वह कहता है "स्वाहा वातादारभे" तो यज्ञ को स्वयं ही ले लेता है, क्योंकि 'वात' यज्ञ
है ॥२६॥
जब वह कहता है "स्वाहा, स्वाहा" तो यज्ञ ही स्वाहा है, इसलिए यज्ञ को धारण
करता है। अब वह वाणी को रोकता है। वाक् ही यज्ञ है, इसलिए यज्ञ को यज्ञ की आत्मा में ही
धारण करता है ॥२७॥
अब वह उसको यज्ञ में प्रवेश करता है। वह आहवनीय के पीछे और गार्हपत्य के आगे
चलता है। इस प्रकार सोम निचोड़ने तक चलता है। सोम निचोड़ने तक वह इस प्रकार क्यों
चलता है ? इसका कारण यह है—अग्नि यज्ञ की योनि है और दीक्षित पुरुष गर्भ है। गर्भ
योनि के भीतर चलता है। और जैसे दीक्षित पुरुष यहाँ चलता और फिर मुड़कर लौट देता है
उसी प्रकार योनि के गर्भ चलता है और फिर मुड़कर लौट देता है। इसलिए सोम निचोड़ने
तक यही चाल रहती है ॥२८॥
अध्याय १—ब्राह्मण ४
दीक्षा-सम्बन्धी सब यजु औद्ग्रभण कहलाते हैं, क्योंकि जो पुरुष दीक्षित होता है वह इस
लोक से देवलोक को उठता है (उद् गृभ्णीते) और इन यजुओं के द्वारा उठता है इसीलिए ये
औद्ग्रभण कहलाते हैं। इन अवान्तर (बीच में होनेवाले) कृत्यों को भी औद्ग्रभण कहते हैं।
क्योंकि ये आहुतियाँ हैं और आहुतियाँ यज्ञ हैं। यजुः का जाप तो परोक्ष यज्ञ है और यह आहुति
प्रत्यक्ष यज्ञ है। इसी यज्ञ से इस लोक से देवलोक को उठते हैं ॥१॥
स्रुवों से जो तीन आहुतियाँ दी जाती हैं उनको 'अधीत यजुः' कहते हैं। चौथी आहुति
कामना के लिए होती है। पाँचवीं आहुति जो स्रुक् या जुहू से दी जाती है वह प्रत्यक्ष में औद्-
ग्रभण कहलाती है। क्योंकि यह अनुष्टुभ् छन्द से दी जाती है। अनुष्टुभ् वाणी है। वाणी यज्ञ
है ॥२॥
यज्ञ से देवों ने वह विजय पाई जो उनकी मिली हुई है। वे कहने लगे—"यह मनुष्यों
के लिए अप्राप्य कैसे हो ?" उन्होंने यज्ञ के रस को चूसा जैसे शहद की मक्खी शहद को चूसती
हैं, और यज्ञ को नीरस करके और यूप के द्वारा यज्ञ को तितर-बितर करके छिप गये। चूंकि
उन्होंने इससे यज्ञ को तितर-बितर किया (योपयन्) इसलिए इसका यूप नाम पड़ा ॥३॥
ऋषियों ने इस बात को सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया, जैसे यज्ञ इकट्ठा किया जाता
है। यह औद्ग्रभण आहुतियों द्वारा यज्ञ को इकट्ठा करता है ॥४॥
वह पाँच आहुतियां देता है क्योंकि यज्ञ और संवत्सर की संगति हैं। साल में पाँच ऋतुए

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३४२ शतपथ ब्राह्मण

वै य॒ज्ञः प॒ञ्च वा॒ऽऋतवः संवत्सरस्य॒ तं प॒ञ्चभिराप्नोति॒ तस्मात्प॒ञ्च जुहोति ॥ ५॥
अथातो होमस्यैव । आकूत्यै प्रयु॒जेऽग्नये स्वाहेत्या वा॒ऽअग्नये कुर्वते य॒ज्ञेयेति त-
द्य॒देवात्र य॒ज्ञस्य॒ तद्देवैतत्संभृत्यात्मन्कुरुते ॥ ६॥ मेधायै॒ मन॑से॒ऽग्नये॒ स्वाहेति॑ । मे-
धया वै मन॑साभिगच्छति य॒ज्ञेयेति तद्य॒देवात्र य॒ज्ञस्य॒ तद्देवैतत्संभृत्यात्मन्कुरुते ॥ ७॥
दी॒क्षायै॒ तप॑से॒ऽग्नये॒ स्वाहेति॑ । अन्वे॒वैतदुच्यते नेत्तु हूयते ॥ ८॥ सर॑स्वत्यै पू॒ष्णे
ऽग्नये॒ स्वाहेति॑ । वाग्वै सर॑स्वती वाग्य॒ज्ञः पशवो॒ वै पूषा पुष्टिर्वै पूषा पुष्टिः प-
शवः॑ पशवो॒ हि य॒ज्ञस्तद्य॒देवात्र य॒ज्ञस्य॒ तद्देवैतत्संभृत्यात्मन्कुरुते ॥ ९॥ तदाहुः ।
अनद्धवैता आहु॑तयो हूयन्ते॒ऽप्रति॑ष्ठिता अ॒देवकास्तन्न नेन्द्रो न सोमो नाग्निरिति
॥ १०॥ आकूत्यै प्रयु॒जेऽग्नये स्वाहेति । नात ऽउकं च॒नाग्निर्वा॒ऽअद्धेवाग्निः प्रति॑ष्ठि-
तः स यद॒ग्नौ जुहोति॒ तेनैवैता अ॒द्देवा तेन प्रति॑ष्ठितास्तस्मादु सर्वास्वेवा॒ग्नये स्वा-
हेति जुहोति॒ तत एतान्याधीतयजूँषीत्याचक्षते ॥ ११॥ आकूत्यै प्रयु॒जेऽग्नये स्वा-
हेति॑ । आत्मना वा॒ऽअग्न्य॒ऽआकुर्वते य॒ज्ञेयेति तमात्मन॒ऽएव प्रयुङ्क्ते॒ यत्तनुते ते
ऽअस्यैते॒ऽआत्मन्व॑न्तो॒ऽआधी॑ते भवत॒ आकूतिश्च॒ प्रयुक्च॑ ॥ १२॥ मेधायै॒ मनसे॒ऽग्नये
स्वाहेति॑ । मेधया वै मन॑साभिगच्छति य॒ज्ञेयेति ते॒ऽअस्यैते॒ऽआत्मन्व॑न्ते॒ऽआधी॑ते
भवतो॒ मेधा च॒ मन॑श्च ॥ १३॥ सर॑स्वत्यै पू॒ष्णेऽग्नये॒ स्वाहेति॑ । वाग्वै सर॑स्वती
वाग्य॒ज्ञः सास्यैषात्मन्दे॒वताधी॑ता भवति वाक्प॒शवो॒ वै पूषा पुष्टिर्वै पूषा पुष्टिः
पशवः॑ पशवो॒ हि य॒ज्ञस्ते॒ऽस्यैत॒ऽआत्मन्यव॑शव आधीता भवन्ति तद्यद॒स्यैता आ-
त्मन्दे॒वता आधी॑ता भवन्ति तस्मादाधीतयजूं॑षि नाम ॥ १४॥ अथ चतुर्थी जुहो-
ति । आपो॑ देवी॒र्बृह॑तीर्विश्वशंभुवो॒ द्यावा॑पृथि॒वी॒ऽउरो॒ऽअन्तरि॑क्ष । बृह॒स्पत॑ये
ह॒विषा वि॒धेम॒ स्वाहेत्येषा ह॒ नेदीयो य॒ज्ञस्यापा॑ꣳ हि कीर्तय॒त्यापो॒ हि य॒ज्ञो
द्यावा॑पृथि॒वी॒ऽउरो॒ऽन्तरि॑क्षेति लो॒काना॑ꣳ हि कीर्तयति बृह॒स्पत॑ये ह॒विषा वि-
धेम॒ स्वाहेति॒ ब्रह्म॒ वै बृह॒स्पति॒र्ब्रह्म य॒ज्ञ ए॒तेनो हैषा नेदीयो य॒ज्ञस्य ॥ १५॥
PARS II.

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का० ३, अ० १, ब्रा० ४, क० ५-१५ शतपथब्राह्मण / ३४३
होती हैं। इससे पांच की प्राप्ति होती है, इसलिए पांच आहुतियाँ दी जाती हैं ॥५॥
होम की ये आहुतियाँ हैं- पहली- "आकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहा" (यजु० ४।७) -"विचार,
प्रयोग और अग्नि के लिए स्वाहा।" पहले यज्ञ का विचार ही करता है (कुरुते)। अब इस आहुति
में जो यज्ञ का भाग शामिल है उसे अपना बना लेता है ॥६॥
दूसरी- "मेधायै मनसेऽग्नये स्वाहा" (यजु० ४।७) - "बुद्धि, मन और अग्नि के लिए
स्वाहा।" बुद्धि और मन से वह यज्ञ करना चाहता है। अब इस आहुति में जो यज्ञ का भाग है
उसको अपना बना लेता है ॥७॥
"दीक्षायै तपसेऽग्नये स्वाहा" (यजु० ४।७) - "दीक्षा, तप और अग्नि के लिए स्वाहा।"
यह केवल बोला जाता है। इससे आहुति नहीं दी जाती ॥८॥
तीसरी- "सरस्वत्यै पूष्णेऽग्नये स्वाहा" (यजु० ४।७) -"सरस्वती, पूषा और अग्नि
के लिए स्वाहा।" वाणी सरस्वती है। वाणी यज्ञ है। पशु पूषा हैं क्योंकि पूषा का अर्थ है पुष्टि।
पशु पुष्टि हैं और पशु यज्ञ हैं। इस (तीसरी) आहुति में जो यज्ञ का भाग है उसको वह अपना
बना लेता है ॥९॥
इस पर कहा जाता है कि ये आहुतियाँ अनिश्चित हैं। ये प्रतिष्ठित नहीं हैं। इनमें
किसी देवता, इन्द्र, सोम या अग्नि का नाम नहीं है ॥१०॥
"आकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहा" में किसी देवता का निश्चय नहीं है। (इस आक्षेप का
उत्तर यह है कि) अग्नि तो निश्चित है। अग्नि प्रतिष्ठित है। जब अग्नि में आहुतियाँ दी जाती
हैं तो वे निश्चित हो जाती हैं। इसीलिए ये सब आहुतियाँ 'अग्नये स्वाहा' कहकर दी जाती हैं।
इन आहुतियों को 'अधीत यजूंषि' कहते हैं ॥११॥
"आकूत्यै प्रयुजेऽग्नये स्वाहा।" यहाँ वह आत्मा से ही यज्ञ का विचार करता है और
आत्मा से ही प्रयोग करता है। ये दोनों देवता अर्थात् आकूति (विचार) और प्रयुक् (प्रयोग)
आत्मा में ही उठते हैं (अधीत) ॥१२॥
"मेधायै मनसेऽग्नये स्वाहा।" यहाँ मेधा और मन से यज्ञ की प्राप्ति करता है, इसलिए
मेधा और ये दोनों देवता स्थित होते हैं ॥१३॥
"सरस्वत्यै पूष्णेऽग्नये स्वाहा।" वाणी ही सरस्वती है। वाणी यज्ञ है। यह सरस्वती
देवता आत्मा में स्थित होता है। पशु पूषा हैं। पूषा पुष्टि है। पशु यज्ञ हैं। आत्मा में पशु स्थित
होते हैं। इसलिए 'अधीत यजूंषि' इनका नाम हुआ ॥१४॥
अब चौथी आहुति देता है- "आपो देवीर्बृहतीर्विश्वशम्भुवो द्यावापृथिवीऽउरोऽ
अन्तरिक्ष । बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा" (यजु० ४।७) - "हे दिव्य, बड़े, संसार के हितकारक
आपो देवता, हे द्यावापृथिवी, हे विस्तृत अन्तरिक्ष ! हम हवि से बृहस्पति की पूजा करें।" ये
आहुति यज्ञ के घनिष्ठ हैं। आपो देवता की कीर्तियां हैं। 'आप' ही यज्ञ है। "द्यावापृथिवी,
उरोऽन्तरिक्ष" से लोकों की कीर्ति कहता है। "बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा।" यहाँ ब्रह्म की
बृहस्पति है। ब्रह्म ही यज्ञ है। इस प्रकार यह आहुति यज्ञ से घनिष्ठ सम्बन्ध रखतीहै ॥१५॥

अध्याय-२, ब्राह्मण-१

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३४४ शतपथ ब्राह्मण
अथ॑ यां पञ्चमीꣳ॒ स्रुचा॑ जु॒होति॑ । सा है॒व प्रत्य॑क्षं य॒ज्ञोऽनु॑ष्टुभा हि तां जु॒होति॑
वाग्व्यनु॑ष्टुब्वाग्यि॑ य॒ज्ञः ॥१६॥ अथ॒ यद्ध्रुवा॑यामाज्यं॒ परिशि॑ष्टं भव॑ति । तज्जु॒ह्वा-
मान॑यति त्रिः स्रुवे॑णाज्यविलाप॒न्याऽअधि॑ जु॒ह्वां गृ॑ह्णाति॒ यत्तृ॒तीयं॑ गृ॒ह्णाति॒ तत्स्रु-
वम॒भिपूर्य॑ति ॥१७॥ स जु॑होति । वि॒श्वो दे॒वस्य॑ ने॒तुर्मर्त्तो॑ वृरीत स॒ख्यम् । वि॒-
श्वो रा॒य इ॑षुध्यति द्यु॒म्नं वृ॑णीत पु॒ष्यस॒ इति॑ ॥१८॥ सैषा दे॒वता॑भिः प॒ङ्क्तिर्भ॑-
वति । वि॒श्वो दे॒वस्येति॑ वैश्वदे॒वं ने॒तुरिति॑ सावित्रं मर्त्तो॑ वृरी॒तेति॑ मै॒त्रं द्यु॒म्नं वृ॑-
णी॒तेति॑ बा॒र्हस्प॒त्यं द्यु॒म्नं हि बृह॒स्पतिः॑ पु॒ष्यस॒ इति॑ पौ॒ष्णं ॥१९॥ सैषा दे॒व-
ता॑भिः प॒ङ्क्तिर्भव॑ति । पा॒ङ्क्तो य॒ज्ञः पा॒ङ्क्तः प॒शुः पञ्च॒र्त्तवः॑ संवत्स॒रस्यैतमे॒वैतद्या॑प्नोति
यद्वैता॑भिः प॒ङ्क्तिर्भव॑ति ॥२०॥ तां वाऽअनु॑ष्टुभा जु॑होति । वाग्वाऽअनु॑ष्टुब्वाग्य-
ज्ञस्तद्य॒ज्ञं प्रत्य॑क्षमा॒प्नोति॑ ॥२१॥ तदा॑हुः । ए॒तामे॒वैकां॑ जुहुयाद्यस्मै॒ कामा॑येतरा
हूयन्त॒ऽइत॑येव तं काममा॒प्नोतीति॑ तां वै यद्येकां॑ जुहुयात्पूर्णां॑ जुहुयात्सर्वं॒ वै पू-
र्णंꣳ सर्व॑मे॒वैतदा॒प्नोत्य॑थ॒ यत्स्रुवम॒भिपूर्य॑ति स्रुचं तद॒भिपूर्य॑ति तां पूर्णां॑ जु-
होत्य॒न्वेवैतदु॑च्यते॒ सर्वा॑स्त्वेव हूयन्ते॒ ॥२२॥ तां वाऽअनु॑ष्टुभा जु॑होति । सैषानु॑-
ष्टुप्प्रत्ये॑कत्रिꣳशदक्षरा भवति दश पाण्‍या अ॒ङ्गुलयो॒ दश॑ पाद्या॒ दश॑ प्राणा॒ आत्मै-
कत्रिꣳशो॒ यस्मि॑न्नेते प्राणाः॑ प्रति॑ष्ठिता ए॒तावा॒न्वै पुरु॑षः पु॒रुषो॑ य॒ज्ञः पु॒रुषसं॑मि-
तो य॒ज्ञः स यावा॑ने॒व य॒ज्ञो याव॑त्यस्य मा॒त्रा ताव॑न्तमे॒वैतदा॑प्नोति॒ यदनु॑ष्टुभै-
कत्रिꣳशदक्षरया जु॒होति॑ ॥२३॥ ब्राह्मणं॑ ॥४॥ अध्या॒यः ॥१[१६.]॥ ॥
द॒क्षिणे॒नाह॑वनीयं॑ प्राचीनग्री॒वे कृ॑ष्णाजिने॒ऽउप॑स्तृणाति । तयो॑रे॒नमधि॑ दीक्ष-
यति॒ यदि॒ द्वे भ॑वत॒स्तद॑नयो॒र्लोकयो॑ रू॒पं तदे॑नम॒नयो॒र्लोकयो॒रधि॑ दीक्षयति ॥१॥
संबद्धा॑ते भवतः । संब॒द्धावि॒व हीमौ लो॒कौ तद्य॑त्समु॒द्रे प॒श्चाद्भवतस्तदि॒मावे॒व
लो॒कौ मिथुनी॒कृत्य तयो॑रे॒नमधि॑ दीक्षयति ॥२॥ यु॒ग्म॒ऽएकं॑ भवति । तदे॑षां लो-
काना॑ꣳ रू॒पं तदे॑नमे॒षु लो॒केष्वधि॑ दीक्षयति यानि शु॒क्लानि॒ तानि॑ दि॒वो रू॒पं या-

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कां० ३, अ० १-२, ब्रा० ४-१, कं० १६-२३ व १-३ शतपथब्राह्मण/ ३४५
अब जो स्रुक् से पाँचवीं आहुति दी जाती है वह तो साक्षात् यज्ञ है, क्योंकि यह अनुष्टुभ्
छन्द में दी जाती है। वाणी अनुष्टुभ् है। वाणी यज्ञ है ॥१६॥
ध्रुवा में जो आज्य बच रहता है वह जुहू में छोड़ा जाता है। अब तीन बार स्रुवा से
आज्य घी पिघलनेवाले पात्र से जुहू में डालते हैं। तीसरी बार जो लेता है उससे स्रुवा को भर
लेता है ॥१७॥
अब वह इस मन्त्र से आहुति देता है—"विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीतः सख्यम् । विश्वे
रायऽइषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा" (यजु० ४।८; ऋ० ५।५०।१) —"सब आदमी दिव्य
नेता की मित्रता को ग्रहण करें। सब धन को चाहते हैं। अपनी पुष्टि के लिए यश को चाहें" ॥१८॥
यह आहुति और ऋचा देवताओं की अपेक्षा से सम्बन्धित है—'विश्वो देवस्य' से
तात्पर्य है वैश्वदेव का, 'नेतुः' से सविता का, 'मर्तो वुरीतः' से मित्र का, 'द्युम्नं वृणीत' से
बृहस्पति का, 'पुष्य' से पूषा का ॥१९॥
यह आहुति और ऋचा देवताओं की अपेक्षा से पाँच से सम्बन्धित है। यज्ञ के पाँच भाग
हैं। पशु के पाँच भाग हैं। ऋतुएँ पाँच हैं। इस प्रकार पाँच देवताओं वाली आहुति के द्वारा वह
सम्वत्सर की प्राप्ति कर लेता है ॥२०॥
इसको वह अनुष्टुभ् छन्द में देता है। वाणी अनुष्टुभ् है। वाणी यज्ञ है। इस प्रकार प्रत्यक्ष
यज्ञ की प्राप्ति करता है ॥२१॥
इस पर कहते हैं कि बस इसी एक आहुति को देवे। अन्य आहुतियाँ जिस-जिस कामना
के लिए दी जाती हैं वे सब इसी से पूरी हो जाती हैं। जो इस आहुति को देता है, पूर्ण आहुति को
देता है। 'सर्व' का अर्थ है पूर्ण। स्रुवा को भरकर वह जुहू को भर लेता है और जुहू को पूरा-
पूरा छोड़ देता है। परन्तु यह केवल कथन मात्र है। आहुतियाँ तो पाँचों ही दी जाती हैं ॥२२॥
इसको अनुष्टुभ् छन्द में देते हैं। अनुष्टुभ् में ३१ अक्षर होते हैं। दस हाथ की उँगलियाँ
हैं, दस पैर की, दस प्राण हैं। ३१वाँ आत्मा जिसमें ये प्राण हैं। इतना ही पुरुष है। पुरुष यज्ञ
है। उतने ही यज्ञ के भाग हैं जितने पुरुष के। इसलिए जितना यज्ञ है, जितनी उसकी मात्रा है,
उतनी ही वह इस ३१ अक्षरवाले अनुष्टुभ् की आहुति देकर उसको प्राप्त कर लेता है ॥२३॥
अध्याय २--ब्राह्मण १
आहवनीय के दक्षिण की ओर दो मृगचर्मों को इस प्रकार बिछाता है कि उनकी गर्दन
पूर्व की ओर रहे। उन पर वह उसको दीक्षा देता है। ये जो दो होते हैं ये दोनों लोकों के रूप हैं।
इस प्रकार वह उसको इन दोनों लोकों में दीक्षित करता है ॥१॥
ये दोनों सिरों पर जुड़े होते हैं। ये दोनों लोक भी सिरे पर जुड़े होते हैं। पीछे की ओर
ये छिद्रों द्वारा जुड़े होते हैं। इन दोनों लोकों को जोड़कर वह उसको दीक्षा देता है ॥२॥
यदि एक ही चर्म हो तो वह इन तीनों लोकों का रूप है। इस प्रकार वह उसको इन
तीनों लोकों में दीक्षित करता है। जो श्वेत बाल हैं वे द्यौ का रूप हैं, जो काले हैं वे इस पृथिवी

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नि॒ कृ॒ष्णा॑नि ता॒न्यस्यै॒ यदि॒ वेत॑र्या॒ यान्ये॒व कृ॒ष्णा॑नि॒ तानि॑ दि॒वो रू॒पं यानि॑ शु-
क्ला॑नि ता॒न्यस्यै॒ यान्ये॒व ब॑भ्रू॒णोव॑ रू॒राणि॒ तान्य॒न्तरि॑क्षस्य रू॒पं तदे॑नमे॒षु लो॒के-
ष्व॑धि दी॒क्षय॑ति ॥३॥ अ॒क्तकं॒ नु॒ तर्हि॑ प॒श्चात्प्रत्यस्ये॑त् । तदि॒माने॒व लो॒कानि॒म्युनी-
कृत्य॒ तेष्वे॑नमधि॑ दीक्षयति ॥४॥ अथ जघने॑न कृ॒ष्णाजि॑ने प॒श्चात् प्राङ् जा॒न्वाच्य॑
उप॑विशति स यत्र॑ शु॒क्लानां॑ च कृ॒ष्णानां॑ च सं॒धिर्भ॑वति॒ तद॑व॒मनि॑मृश्य॒ ज॒पत्यृक्सा-
म॒योः शिल्पे॑ स्थ॒ऽइति॒ यद्वै प्रति॑रूपं॒ तच्छिल्प॑मृ॒चां च॒ साम्नां॑ च प्रति॒रूपे स्थ॒ इत्ये॒-
वैतदा॑ह ॥५॥ ते वा॒मार॑भ॒ऽइति॑ । गर्भो वा॒ऽए॒ष भ॑वति॒ यो दी॒क्षते॒ स छन्दा॒ꣳ-
सि प्रवि॑शति तस्मा॒न्न्यञ्चा॑ङ्गुलिरिव भवति॒ न्यञ्चा॑ङ्गुलय-इव॒ हि गर्भाः॑ ॥६॥ स
यदा॑ह । ते वा॒मार॑भ॒ऽइति॒ ते वां प्रवि॑शामी॒त्येवैतदा॑ह॒ ते मा पातम॒स्य य॒ज्ञ-
स्यो॒दृच॒ इति॒ ते मा गोपायत॒मस्य॑ य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्था॑या॒ इत्ये॒वैतदा॑ह ॥७॥ अथ॑ दू-
षि॒पेन॒ जानु॒नारो॑हति । शर्म॑ऽसि॒ शर्म॑ मे य॒च्छेति॒ चर्म॒ वा॒ऽए॒तत्कृ॑ष्ण॒स्य तद॑स्य॒ त-
न्मानुष॒ꣳ शर्म॑ दे॒वत्रा तस्मा॑दाह॒ शर्म॑ऽसि॒ शर्म॑ मे य॒च्छेति॒ नम॒स्तेऽस्तु॒ मा मा॑ हि॒ꣳ-
सी॒रिति॒ श्रेयाꣳसं॒ वा॒ऽए॒ष उपाधि॑रोहति॒ यो य॒ज्ञं य॒ज्ञो हि॑ कृ॒ष्णाजि॑नं॒ तस्मा॑ऽए॒-
वैतद्य॒ज्ञाय॑ निह्लुते॒ तथो॒ हैने॑मे॒ष य॒ज्ञो न हि॑नस्ति॒ तस्मा॑दाह॒ नम॒स्तेऽस्तु॒ मा
मा हिꣳसी॒रिति॑ ॥८॥ स वै ज॒घना॒र्धऽइ॒वैवाग्र॒ऽआसी॑त । अथ॒ यदग्र॒ऽएव मध्य॑
ऽउप॑वि॒शेद्य॒ एनं॒ तत्रा॑नु॒ष्या हु॑रे॒द्रुध्ये॑ति वा॒ प्र वा॑ पतिष्यती॑ति॒ तथा॒ हैव स्या॒-
त्तस्मा॒ज्जघना॒र्धऽइ॒वैवाग्र॒ऽआसी॑त ॥९॥ अथ॑ मे॒खलां॒ परि॑हरते । अ॒ङ्गिरसो ह॒ वै
दी॒क्षिता॑नब॒ल्यम॑विन्द॒न्ने नान्यद्रुताद॒शनम॑वाकल्पयंस्त॒ऽएतामूर्जम॑पश्य॒न्समाप्तिं तां
मध्य॑त॒ आत्म॑न्न॒ ऊर्ज॑मदधत समा॑प्तिं॒ तया॒ समा॑प्नुवंस्तथो॒ऽए॒वैष ए॒तां मध्य॑त॒ आ-
त्मन्न॒ ऊर्जं॑ धत्ते समा॑प्तिं॒ तया॒ समा॑प्नोति ॥१०॥ सा वै शाणी भव॑ति । मुञ्चसदि॒ति॒
न्वेव॒ शाणी॒ यत्र॒ वै प्र॒जाप॑तिर॒जायत॒ गर्भो भू॒त्वैतस्माद्य॒ज्ञात्तस्य॒ यन्निदि॑ष्ठमुल्बमा॒-
सीत्तच्छणास्तस्मा॑त्ते पूतयो वान्ति॒ यद्स्य॒ जरा॒य्वासीत्तद्दीक्षि॑तव॒सनमु॒त्तरं॒ वाऽउ

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कां ३, अ० २, ब्रा० १, कं० ३-११ शतपथब्राह्मण / ३४७
का। या इसके विपरीत यों भी कह सकते हैं कि जो काले बाल हैं वे द्यौ का रूप हैं और जो श्वेत
बाल हैं वे इस पृथिवी का । जो भूरे पीले-पीले हैं वे अन्तरिक्ष का रूप हैं । इस प्रकार वह उसको
इन तीनों लोकों में दीक्षित करता है ॥३॥
अन्त में उसे उस (मृगचर्म) के पीछे को मुड़ना चाहिए। इन लोकों को जोड़कर वह
उसको उनमें दीक्षित करता है ॥४॥
अब वह मृगचर्मों के पीछे पूर्वाभिमुख और जानु को झुकाकर बैठ जाता है और जहाँ
सफेद और काले बाल मिलते हैं वहाँ इस प्रकार (श्वेत बाल अँगूठे से और काले अगली अँगुली
से एक-साथ) छूकर यह मन्त्र पढ़ता है-“ऋक् सामयोः शिल्पे स्थः” (यजु० ४।६) - "तुम ऋक्
और साम के प्रतिरूप हो ।” शिल्प कहते हैं प्रतिरूप को। इसका तात्पर्य यह है कि 'ऋचाओं और
सामों के प्रतिरूप* हो' ॥५॥
अब कहता है, "ते वामारभे" (यजु० ४।६)-"मैं तुमको छूता हूँ।" जो दीक्षित होता है
वह गर्भ बनकर छन्दों में घुस जाता है । इसलिए उसकी अंगुलियाँ सिकुड़ जाती हैं। गर्भ बँधी
हुई मुट्ठी के समान होते हैं ॥६॥
और जब वे कहते हैं 'मैं तुमको छूता हूँ' तो इसका तात्पर्य है कि 'मैं तुममें प्रवेश करता
हूँ।' अब कहता है- ते मा पातमास्य यज्ञस्योदृचः” (यजु० ४।६) – “तुम मेरी इस यज्ञ के
अन्त तक रक्षा करो ।” इसका तात्पर्य है कि तुम यज्ञ के अन्त तक मेरी रक्षा करो ॥७॥
अब दाहिनी जानु से उठता है। और पढ़ता है-“शर्मासि शर्म मे यच्छ" (यजु० ४।६)-
"तू शरण (कल्याण) है, मुझे शरण दे'-"नमस्तेऽअस्तु मा मा हिंसी” (यजु० ४।६)-"तुझे
नमस्कार हो । तू मुझे पीड़ा न दे ।” मनुष्य के लिए तो वह काला मृग का चर्म है । देवताओं के
लिए यह 'शर्म' या 'शरण' है । जो अपने को यज्ञ के तल तक उठाता है वह मानो अपने को
उच्चतर तल तक उठाता है । यह काला मृगचर्म यज्ञ है । इस प्रकार वह उस यज्ञ को प्रसन्न
करता है जिससे वह यज्ञ उसे हानि न पहुँचावे । इसलिए कहता है- 'नमस्ते अस्तु मा मा
हिंसीः' ॥८॥
पहले वह मृगचर्म के पीछे की ओर बैठे । यदि पहले ही बीच में बैठ जावे और कोई
उसको शाप दे कि 'यह नष्ट हो जायगा' या 'इसका पतन हो जायगा' तो ऐसा हो ही जायगा ।
इसलिए उसको मृगचर्म के पिछले भाग में ही बैठना चाहिए ॥६॥
अब वह मेखला को पहनता है। पहले अंगिरा लोगों को दीक्षा दी जाने लगी तो उनमें
निर्बलता आ गई, क्योंकि उन्होंने व्रत के दूध के सिवाय और कुछ खाना नहीं तैयार किया था।
तब उन्होंने इस (मेखला-सम्बन्धी) बल को देखा और उसको प्राप्त करके शरीर के बीच
(कमर) में बाँधा। इससे इनको पूर्णता प्राप्त हो गई ॥१०॥
यह (मेखला) सन की बनाई जाती है। सन की इसलिए बनाई जाती है कि नर्म रहे ।
जब प्रजापति गर्भ होकर उस यज्ञ से निकला, तब जो उसका उल्ब था वह सन बन गया।
इसीलिए उनमें बू आती है। और जो जरायु था वह दीक्षित का वस्त्र हो गया। उल्ब जरायु के

  • सामानि यस्य लोमानि ।
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३४८ शतपथ ब्राह्मण
ल्बं जरा॒युणो॑ भवति॒ तस्मा॑दे॒षान्त॑रा वास॑सो भवति॒ स यथै॒वातः॑ प्र॒जाप॑ति॒रजायत
ग॒र्भी भू॒त्वैत॒स्माद्य॒ज्ञादे॒वमे॒वैषो॒ऽतो॑ जायते ग॒र्भी भू॒त्वैत॒स्माद्य॒ज्ञात् ॥११॥ सा वै
त्रि॒वृद्भवति । त्रि॒वृद्ध्यान्नं॑ पश॒वो ह्यन्नं॑ पि॒ता मा॒ता यज्जाय॑ते॒ तत्त्कृती॑यं॒ तस्मा॑त्त्रि॒वृ-
द्भवति ॥ १२॥ मुञ्जवल्शेनान्त्वस्ता भवति । वज्रो वै शरो विरक्ष॒स्तायै॑ स्तुकासर्ग॒ꣳ
सृष्टा॑ भवति सा यत्प्रसक्ल॑वि सृ॒ष्टा स्याद्य॒द्द्ये॒दमन्या॑ र॒ञ्जवो मानुषी स्याद्यद्यपसल-
वि॒ सृष्टा स्यात्पितृ॑दे॒वत्या॑ स्या॒त्तस्मा॑त्स्तुकासर्ग॒ꣳ सृष्टा॑ भवति ॥ १३॥ तां परि॒कृ-
र्णते । ऊर्ग॑स्याङ्गिर॒सीत्यङ्गिर॑सो॒ ह्येतामूर्ज॒मप॑श्यन्नूर्णामदा ऊर्जं॒ मयि॑ धे॒हीति॒ नात्र॑
ति॒रोहि॑तमिव॒ास्ति ॥ १४॥ अथ नीविमुदूहते । सोम॑स्य नी॒विर॑सीत्य॒दीक्षि॑तस्य
वा॒ऽअन्य॑स्यै॒षायै नी॒विर्भव॑त्यथाय॒ दीक्षि॑तस्य॒ सोम॑स्य॒ तस्मा॑दाह सोम॑स्य नी॒विर॑सी-
ति ॥ १५॥ अथ प्रोर्णुते । गर्भी वा॒ऽए॒ष भ॑वति॒ यो दीक्ष॑ते प्रावृ॑ता॒ वै गर्भा॑ उ-
ल्बेनेव जरा॒युणे॑व॒ तस्मा॑दे प्रोर्णुते ॥ १६॥ स प्रोर्णुते । वि॒ष्णोः शर्म॑सि॒ शर्म॒ य-
जमान॒स्येत्यु॑भयं वा॒ऽए॒षो॒ऽत्र भ॑वति यो दीक्ष॑ते वि॒ष्णुश्च॒ यज॑मानश्च॒ यद्ध्य् दीक्ष॑ते
तद्विष्णुर्भव॑ति॒ यद्यज॑ते॒ तद्यज॑मान॒स्तस्मा॑दाह वि॒ष्णोः शर्म॑सि॒ शर्म॒ यज॑मानस्येति
॥ १७॥ अथ कृष्णविषाणाꣳ सिचि बध्नीते । दे॒वाश्च॒ वा॒ऽअसु॑राश्चो॒भये॑ प्राजाप॒त्याः
प्र॒जाप॑तेः पि॒तुर्दाय॒मुपे॑यु॒र्मन एव दे॒वा उ॒पाय॒न्वाच॒मसु॑रा य॒ज्ञमेव तद्दे॒वा उ॒पाय-
न्वाच॒मसु॑रा अमूमे॒व दे॒वा उ॒पाय॑न्निमा॒मसु॑राः ॥ १८॥ ते दे॒वा य॒ज्ञम॑ब्रुवन् । योषा
वा॒ऽइयं वागुप॑मन्त्रयस्व ह्वयि॒ष्यते वै नेति स्वयं वा ह्वेवेक्षत योषा वा॒ऽइयं वा-
गुप॑मन्त्रये ह्वयि॒ष्यते वै मेति तामुपाम॑न्त्रयत सा हास्मा॒ऽञ्चा॑रकादिवैवाग्र॒ऽआसू-
द्यत्तस्मा॑द् स्त्री पुं॑सोपमन्त्रिता॒रका॑दिवैवाग्रे॒ऽसूय॑ति स॒ होवा॑चारकादिव॒ वै म॒ऽञ्श्चा-
सूयी॒दिति॑ ॥ १९॥ ते होचुः । उपै॒व भग॑वो मन्त्रयस्व ह्वयि॒ष्यते वै नेति॒ तामुप॑ा-
मन्त्रयत सा॒ हास्मै॑ निपलाशमि॒वोवा॑द॒ तस्मा॑द् स्त्री पुं॑सोपमन्त्रिता निपलाश-
मि॒वैव व॑दति स॒ होवा॑च निपलाशमिव वै मे॒ऽवादी॒दिति॑ ॥ २०॥ ते होचुः ।

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कां० ३, अ० २, ब्रा० १, कं० १-२० शतपथब्राह्मण / ३४६
भीतर होता है। इसीलिए यह (मेखला) वस्त्र के भीतर होती है। जैसे प्रजापति गर्भ होकर
उस यज्ञ से निकला, इसी प्रकार यह दीक्षित पुरुष भी गर्भ होकर उस यज्ञ से उत्पन्न होता
है ॥११॥
मेखला तीन लड़ी वाली होती है। क्योंकि अन्न तीन भागों वाला होता है। पशु अन्न
हैं। माता और पिता दो होते हैं, और तीसरा वह होता है जो पैदा होता है। इसीलिए मेखला
में तीन लड़ियां होती हैं ॥१२॥
वह मूंज से बँधी होती है। मूंज का शर वज्र है, इसलिए इससे राक्षस भाग जाते हैं।
यह केशों के समान गूँथी जाती है। अगर वह रस्सी के समान 'पसलवि' अर्थात् सूर्य की चाल के
समान बाएँ और से दाहिनी ओर को गूँथी जाय तो मानुषी हो जाय। यदि 'अपसलवि' अर्थात्
दाहिनी ओर से बाईं ओर को गूँथी जाय तो पितरों जैसी हो जाए। इसलिए केशों के समान
गूँथी जाती है ॥१३॥
उसको यह मन्त्र पढ़कर धारण करता है—"ऊर्गस्याङ्गिरसि” (यजु० ४।१०)। क्योंकि
अंगिरों ने इस 'ऊर्ज' को देखा था। “ऊर्णं म्रदाऽऊर्जं मयि धेहि” (यजु० ४।१०)—“तू ऊन के
समान नरम है, मुझे ऊर्ज दे।” यहाँ सब स्पष्ट है ॥१४॥
अब नीचे का मन्त्र पढ़कर नीवि को बाँधता है, “सोमस्य नीविरसि” (यजु० ४।१०)—
“तू सोम की नीवि है।” पहले अदीक्षित की नीवि थी, अब दीक्षित की नीवि हो गई। इसलिए
कहा 'सोम की नीवि है।' (यहाँ सोम का अर्थ 'दीक्षित' प्रतीत होता है। ऋग्वेद के ९वें मण्डल
में सोम इसी अर्थ में कई जगह आया है) ॥१५॥
अब वह (सिर को) ढकता है। जो दीक्षित होता है वह गर्भ बन जाता है। गर्भ उल्ब
ओर जरायुज से ढके होते हैं। इसलिए वह (सिर को) ढकता है ॥१६॥
वह यह मन्त्र पढ़कर ढकता है— “विष्णोः शर्मासि शर्म यजमानस्य” (यजु० ४।१०)—
“तू विष्णु की शरण है, यजमान की शरण है।” जो दीक्षित होता है वह विष्णु और यजमान
दोनों होता है। चूँकि वह दीक्षित होता है इसलिए विष्णु बन जाता है, और चूंकि यज्ञ करता है
इसलिए यजमान हो जाता है। इसलिए कहा कि 'तू विष्णु की शरण है, यजमान की शरण
है' ॥१७॥
अब वह काले हिरण के सींग को (अपने वस्त्र के) सिरे से बाँधता है। देव और असुर
दोनों प्रजापति की सन्तान अपने पिता प्रजापति के दायभाग को प्राप्त हुए। देवों ने मन को
पाया और असुरों ने वाणी को। देवों ने उस (द्यौ) लोक को पाया और असुरों ने इस (पृथिवी)
लोक को ॥१८॥
उन देवों ने यज्ञ से कहा—'यह वाक् स्त्री है। तू इसको संकेत कर। वह तुझे अपने पास
बुलायेगी।' या शायद उसने स्वयं ही सोचा कि 'वाक् स्त्री है। मैं इसको संकेत करूँ। यह मुझे
अपने पास बुला लेगी।' उसने उसकी ओर संकेत किया। परन्तु उसने दूर से उसको तिरस्कृत
कर दिया। इसीलिए स्त्री पहले पुरुष का दूर से तिरस्कार कर देती है। उसने कहा, 'इसने मुझे
दूर से ही तिरस्कृत कर दिया' ॥१९॥
वे देवता बोले, 'भले आदमी, फिर संकेत कर, वह तुझे बुला लेगी।' उसने इशारा
किया, लेकिन (वाक् ने) उसकी ओर सिर हिलाकर इनकार कर दिया। इसीलिए जब कोई
पुरुष स्त्री को बुलाता है तो वह सिर हिलाकर इनकार कर देती है। उसने कहा, 'इसने मुझे
सिर हिलाकर इनकार कर दिया' ॥२०॥

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३५० शतपथ ब्राह्मण
उपै॑व॒ भग॑वो मन्त्रयस्व ह्वयिष्यते॒ वै मेति॒ तामुपामन्त्रयत॒ सा हैनं॑ शुश्रू॒व तस्मा॑दु
स्त्री पुमांꣳसꣳ ह्वय॑तऽनूवोत्त॑मꣳ स॒ होवा॑चाकूत॒ वै मेति॑ ॥ २१॥ ते दे॒वा ई॒क्षां
चक्रि॒रे । योषा॒ वाऽइयं वाग्यदे॒नं न युवि॒तेहैव॑ मा ति॒ष्ठन्तम॒भ्येहीति॑ ब्रूहि॒ तां
तु न॒ आग॑तां प्रति॒प्रब्रूता॒दिति॒ सा हैनं॒ तदैव ति॒ष्ठन्तम॒भ्येयाय॒ तस्मा॑दु स्त्री पु-
मां॑सꣳ सꣳस्कृ॒ते ति॒ष्ठन्तम॒भ्येति॒ ताꣳ ह्येभ्य॒ आग॑तां प्रति॒प्रोवाचेयं वाऽआगा॒दिति॑
॥ २२॥ तां दे॒वाः । असुरि॒भ्योऽसु॑रायैस्ताꣳ स्वीकृ॒त्याग्रा॑वेव॒ परि॑गृह्य॒ सर्व॑हुतमजु-
ह्ववुराहु

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कां० ३, अ० २, ब्रा० १, कं० २१-३० शतपथब्राह्मण / ३५१
उन्होंने कहा, 'भले आदमी, फिर संकेत कर, वह तुझे बुला लेगी।' उसने उसकी ओर
इशारा किया। अब उस (वाणी) ने उसको बुला लिया। इसलिए जब मनुष्य इशारा करता है
तो स्त्री उसको बुला ही लेती है। उसने कहा, 'इसने मुझे बुला लिया' ॥२१॥
अब देवों ने सोचा— 'यह वाणी स्त्री है। यह कहीं इसको रिझा न ले (और कहीं यज्ञ
भी इस प्रकार असुरों के पास न चला जाय)। उससे कहा कि 'जहाँ मैं खड़ा हूँ, वहीं आ' और
जब वह आ जाय तों सूचना दे। अब वह वहीं चली आई जहाँ वह खड़ा था। इसलिए स्त्री
उसी घर में चली जाती है जहाँ पुरुष स्थित रहता है। उस (यज्ञ) ने उन (देवताओं) को
सूचना दी कि वास्तव में वह आ गई ॥२२॥
तब देवों ने उसे असुरों से अलग कर लिया। अब देवों ने उस स्वीकार करके अग्नि में
लपेटकर उसको देवताओं के लिए आहुति दे दी। और चूंकि अनुष्टुभ् छन्द से आहुति दे दी,
इसलिए उसको अपनी सत्ता में शामिल कर दिया (क्योंकि अनुष्टुभ् वाणी है)। जब वाणी को
देवों ने स्वीकार कर लिया तो असुर लोग कुछ न कह सके और 'हेऽलवो हेऽलवः' कहकर
पराजित हो गये, (हाय वाक्, हाय वाक्) ॥२३॥
इस प्रकार उन्होंने अर्थहीन वाणी बोली। और जो ऐसी वाणी बोलता है वह म्लेच्छ
है। इसलिए कोई ब्राह्मण म्लेच्छ भाषा न बोले, क्योंकि यह आसुरी भाषा है। इसी प्रकार वह
शत्रु को भाषा से वंचित कर सकता है। और जो इस रहस्य को समझता है उसके शत्रु भाषा से
वंचित होकर पराजित हो जाते हैं ॥२४॥
अब इस यज्ञ ने चाहा कि वाणी के साथ प्रसंग करूँ। उसने प्रसंग किया ॥२५॥
अब इन्द्र ने सोचा कि यज्ञ और वाणी के प्रसंग से एक भीषण राक्षस उत्पन्न होगा
और मुझे हरा देगा। इसलिए इन्द्र स्वयं गर्भ होकर उसमें प्रविष्ट हो गया ॥२६॥
जब वह एक साल बाद पैदा हुआ तो सोचने लगा, 'जिस योनि ने मुझे धारण किया,
वह तो 'महावीर्या' है। अब मैं ऐसी तरकीब करूँ कि इसमें कोई बड़ा राक्षस न पैदा हो जाय जो
मुझे हरा दे' ॥२७॥
उसको पकड़कर और अच्छी तरह भींचकर उसने तोड़ डाला और यज्ञ के सिर पर रख
दिया। कृष्णमृग यज्ञ है। कृष्ण मृगचर्म भी यज्ञ ही है और कृष्णमृग का सींग योनि है। और
चूंकि इन्द्र ने खूब भींचकर योनि को तोड़ा, इसलिए सींग को बड़ी मजबूती से वस्त्र से बाँधते हैं।
और जैसे इन्द्र गर्भ होकर उस जोड़े से उत्पन्न हुआ, इसी तरह यजमान भी गर्भ होकर उस
(सींग और चर्म) के जोड़े से उत्पन्न होता है ॥२८॥
वह इस सींग को इस प्रकार बाँधता है कि खुला भाग ऊपर को रहे, क्योंकि योनि में
गर्भ इसी प्रकार रहता है। अब दाहिनी भौं के ऊपर ललाट को (इस सींग से) छुआता है, यह
मन्त्र पढ़कर—"इन्द्रस्य योनिरसि" (यजु० ४।१०)-"तू इन्द्र की योनि है।" यह इन्द्र की योनि
ही तो है क्योंकि इसमें प्रवेश होकर ही वह यजमान उसमें प्रवेश करता है और यहाँ से उत्पन्न
होकर ही वहाँ से उत्पन्न होता है। इसीलिए कहता है कि 'तू इन्द्र की योनि है' ॥२६॥ [शतम्
१५००]
अब वह उस सींग से एक लकीर खींचता है यह मन्त्रांश पढ़कर- "सुसस्याः कृषीस्कृधि"

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३५२ शतपथ ब्राह्मण
त॒ज्जन॑यति य॒दा वै सु॒षणं॑ भव॒त्यथा॒लं य॒ज्ञाय॑ भवति य॒दो दुःष॑णं भवति॒ न त-
र्था॒त्मने॒ चनालं॑ भवति॒ तद्यश॑मे॒वैतज्जन॑यति ॥ ३०॥ अथ॒ न दी॒क्षितः॑ । काष्ठे॑न
वा न॒खेन॑ वा कण्डू॒येत॒ गर्भो वाऽए॒ष भव॑ति यो दी॒क्षते॒ यो वै गर्भ॑स्य काष्ठे॑न
वा न॒खेन॑ वा कण्डू॒येद॒पास्य॒न्त्स्ये॑त्ततो दी॒क्षितः॑ पा॒मनो॑ भवि॒तोर्दी॒क्षितं॒ वाऽअ॒-
नु रेता॑ꣳसि॒ ततो॒ रेता॑ꣳसि पा॒मना॑नि जनि॒तोः स्वा वै योनी॒ रेतो॒ न हि॑न॒स्त्ये-
षा वाऽए॒तस्य॒ स्वा योनि॑र्भवति॒ यत्कृ॑ष्णविषा॒णा तथो॒ हैन॑मे॒षा न हि॑नस्ति॒ त-
स्माद्दी॒क्षितः॑ कृष्णविषाण॒यैव क॑ण्डू॒

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का० ३, अ०, २, ब्रा० १, कं० ३०-४० शतपथब्राह्मण / ३५३
(यजु० ४।१०)-"कृषि को धान्य-पूरित कर।" इस प्रकार वह यज्ञ को उत्पन्न करता है क्योंकि
जब सुकाल होता है तो यज्ञ के लिए पुष्कल सामग्री होती है। और जब दुष्काल होता है तो
अपने लिए भी काफी नहीं होता। इसलिए यज्ञ को उत्पन्न करता है ॥३०॥
दीक्षित को खुजलाना नहीं चाहिए, न लकड़ी से, न नाखून से। जो दीक्षित होता है
वह गर्भ हो जाता है। गर्भ को यदि कोई नाखून से या लकड़ी से खुजलावे तो वह बाहर निकल-
कर मर जायगा। इससे दीक्षित पुरुष को खुजली हो जायगी और उसके बाद उसकी जो सन्तान
(रेत का अर्थ यहाँ सन्तान है) होगी वह भी खू़जलीवाली पैदा होगी। अपनी ही योनि अपनी
सन्तान को हानि नहीं पहुँचाती। और यह जो कृष्णमृग का सींग है यह उसकी योनि है। इस-
लिए वह उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसलिए दीक्षित को चाहिए कि कृष्णमृग के सींग से ही
खुजलावे। कृष्णमृग के सींग के सिवाय किसी अन्य चीज से न खुजलावे ॥३१॥
अब (अध्वर्यु) उसको दण्ड (डण्डा) देता है। राक्षसों को दूर करने के लिए, क्योंकि
डण्डा वज्र है ॥३२॥
यह उदुम्बर का होता है। तेज और अन्न की प्राप्ति के लिए, क्योंकि उदुम्बर अन्न
और तेज है। इसलिए डण्डा उदुम्बर लकड़ी का होता है ॥३३॥
यह डण्डा उसके मुख तक पहुँचना चाहिए। उतना ही उसका वीर्य (बल) होता है।
जो डण्डा मुख तक पहुँचता है वह उसके वीर्य (पराक्रम की शक्ति) के बराबर होता है ॥३४॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर उसको खड़ा करता है—"उच्च्छ्रयस्व वनस्पतऽऊर्ध्वो मा
पाह्यँहसऽआस्य यज्ञस्योदृचः" (यजु० ४।१०)—"हे डण्डे, तू खड़ा हो। इस यज्ञ के अन्त तक
पहुँचने के लिए मुझे पाप से बचा।" इसका तात्पर्य यह है कि यज्ञ की समाप्ति तक खड़ा होकर
मेरी रक्षा कर ॥३५॥
इसी अवसर पर कुछ लोग अंगुलियों को चटकाते और वाणी को बोलते हैं, क्योंकि
अब इसके पीछे कुछ भी न बोल सकेगा। परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि अगर कोई भाग
जाय और दूसरा उसको पकड़ने दौड़े और न पकड़ पावे, इस प्रकार यहाँ वह यज्ञ को नहीं पकड़
पावेगा। इसलिए उसी (पहले कहे अवसर पर) अँगुलियों को चटकावे और वाणी को
बोले ॥३६॥
जब दीक्षित पुरुष (वाणी को रोकने के पश्चात्) या तो कोई ऋचा बोले, या साम या
यजुः, तो वह यज्ञ को स्थिर बनाता है। इसलिए उसी अवसर पर अँगुलियों को चटकाता और
वाणी को रोकता है ॥३७॥
और जब वह वाणी को रोकता है तो मानो यज्ञ को उसी के आत्मा में स्थापित करता
है क्योंकि वाणी यज्ञ है। परन्तु जब वाणी को रोककर उससे यज्ञ से इतर कोई बात कहता है तो
यज्ञ छूटकर भाग जाता है। उस समय विष्णु-सम्बन्धी ऋचा या यजुः का पाठ करना चाहिए,
क्योंकि यज्ञ विष्णु है। इस प्रकार वह फिर यज्ञ को प्राप्त कर लेता है। यही उस भूल का
प्रायश्चित्त है ॥३८॥
इस पर कोई पुकारता है, 'यह ब्राह्मण दीक्षित हो गया, यह ब्राह्मण दीक्षित हो गया।'
इस प्रकार घोषित करके वह इसको देवताओं के प्रति घोषित करता है, 'यह महावीर्य है। इसने
यज्ञ को पा लिया। यह तुममें से एक हो गया। इसकी रक्षा कीजिए।' वह तीन बार कहता है
क्योंकि यज्ञ तीन भागों वाला है ॥३६॥
उसे अब तक 'ब्राह्मण' कहते हैं। उसका ब्राह्मण होना अनिश्चित है, क्योंकि ऐसा

अध्याय-२, ब्राह्मण-२

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३५४ शतपथ ब्राह्मण
अ॒न॒ग्ने॒व वा॒ऽअस्या॑तः पु॒रा जा॒या भ॑वती॒दꣳ स्या॒द्रु रु॒त्ना॑क्षसि योषि॑त॒मनु॒सच॑न्ते॒ तद्य॑त
रु॒त्ना॑त्स्येव॒ रेत॒ आ॒दध॑तीत्यथाय॑त्रा॒दा जा॑यते॒ यो ब्रा᳡ह्म॒णो यो य॒ज्ञाञ्जाय॑ते॒ तस्मा॒द्-
पि रा॒ज॒न्यं॑ वा वै॒श्यं॑ वा ब्राह्म॒ण इत्ये॑व ब्रूयाद्ब्राह्म॒णो हि जा॑यते॒ यो य॒ज्ञाञ्जाय॑ते
तस्मा॒दाहु॒र्न स॑वन॒कृतꣳ॑ रुन्द्यादिन्स्वी॑ ह्येव स॑वन॒कृतेति॑ ॥४०॥ ब्राह्म॒णम् ॥५
[२.१] ॥ ॥ प्रथमः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२४ ॥ ॥
वाचं यच्छति । स वाचंयम आस्त॒ऽआस्त॒मया॒द्यद्वाचं॑ यच्छ॑ति ॥१॥ य॒ज्ञेन॒ वै
दे॒वाः । इ॒मां जि॑तिं जि॒ग्युर्येषामियं॑ जि॒तिस्ते॑ कोचूः कथं न इ॒दं मनु॒ष्यै॒रन्व॒भ्यारो॒-
ढ्ꣳ स्या॒दिति॑ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतो॒ निर्ध॑येयु॒रेवं॑ङ्क्त्वा य॒ज्ञं यूपे॒-
न योपयि॒त्वा तिरो॒ऽभवं॒स्तद्यदे॒नेनायोपयं॒स्तस्मा᳡द्यू॒पो नाम॑ ॥२॥ तद्वा᳡ऋषीणा-
म॑नु॒श्रुत॑मास । ते य॒ज्ञꣳ स॑मभ॑र॒न्यथायं॑ य॒ज्ञः सं॑भृत ए॒वं वा॒ऽए॒ष य॒ज्ञꣳ स॑म्भर॑ति
यो दीक्ष॑ते वाग्वै य॒ज्ञः ॥३॥ तामस्त॑मिते वाचं विसृ॑जते । सं॒वत्स॒रो वै प्र॒जाप॑-
तिः॒ प्र॒जाप॑तिर्य॒ज्ञो॒ऽहोरात्रे॒ वै सं॑वत्स॒र् ए॒ते ह्ये॑नं परि॒प्लव॑माने कुरुतः सो॒ऽह्न-
र्दीक्षि॒त स रात्रिं प्राप॑त्स यावा॒नेव॑ य॒ज्ञो याव॑त्यस्य मा॒त्रा ताव॑न्तमे॒वैतदा॒त्ना वाचं॑
विसृ॑जते ॥४॥ तद्वे॑के । नक्ष॑त्रं दृष्ट्वा वाचं॑ विस॒र्ज॑यन्त्यत्रानु॒ध्यास्त॑मितो भवतीति॑
वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॒ न कु॒र्यात्स्वा॒ ते स्यु॒र्यन्मे॒धः स्यात्तस्मा॒द्द्मत्रेवानु॒ध्यास्त॑मितं म॒न्येत॒
तदै॒व वाचं॑ विसर्जयॆत् ॥५॥ अने॑नो ह्वैके वाचं॑ विसर्जयन्ति । भूर्भुवः॒ स्वरिति॑
य॒ज्ञमाप्या॑ययामो य॒ज्ञꣳ संद॑ध्म इति॒ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॒ न कु॒र्यान्न॒ ह्व स य॒ज्ञमाप्या॑य-
यति॒ न संद॑धाति॒ य ए॒तेन॒ वाचं॑ विसर्जयति॑ ॥६॥ अने॑नैव वाचं॑ विस॒र्जयेत्॑ ।
व्र॒तं कृ॑णुत व्र॒तं कृ॑णुता॒ग्निर्ब्रह्मा॒ग्निर्य॒ज्ञो वन॒स्पति॑र्य॒ज्ञिय॒ इत्ये॒ष ह्यास्या॒त्र य॒ज्ञो भ॑-
वत्येतद्ध॒विर्यथा पु॒राग्निहो॒त्रं तद्य॒ज्ञेनै॒वैतद्य॒ज्ञꣳ सं॒भृत्य॑ य॒ज्ञे य॒ज्ञं प्र॑तिष्ठापयति य॒-
ज्ञेन य॒ज्ञꣳ संत॑नोति संत॒तꣳ ह्येवा॒स्यैतद्द्तं भ॑वत्या सु॒त्यायै॑ त्रि॒ष्कृ॒त्व आ॒ह त्रि॒वृ-
द्धि य॒ज्ञः ॥७॥ अथा॒ग्निम॒भ्यावृ॑त्य वाचं॑ विसृ॑जते । न॒ ह्व स य॒ज्ञमाप्या॑ययति॒ न सं-