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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 369

कां० ३, अ० २, ब्रा० १, कं० २१-३० शतपथब्राह्मण / ३५१
उन्होंने कहा, 'भले आदमी, फिर संकेत कर, वह तुझे बुला लेगी।' उसने उसकी ओर
इशारा किया। अब उस (वाणी) ने उसको बुला लिया। इसलिए जब मनुष्य इशारा करता है
तो स्त्री उसको बुला ही लेती है। उसने कहा, 'इसने मुझे बुला लिया' ॥२१॥
अब देवों ने सोचा— 'यह वाणी स्त्री है। यह कहीं इसको रिझा न ले (और कहीं यज्ञ
भी इस प्रकार असुरों के पास न चला जाय)। उससे कहा कि 'जहाँ मैं खड़ा हूँ, वहीं आ' और
जब वह आ जाय तों सूचना दे। अब वह वहीं चली आई जहाँ वह खड़ा था। इसलिए स्त्री
उसी घर में चली जाती है जहाँ पुरुष स्थित रहता है। उस (यज्ञ) ने उन (देवताओं) को
सूचना दी कि वास्तव में वह आ गई ॥२२॥
तब देवों ने उसे असुरों से अलग कर लिया। अब देवों ने उस स्वीकार करके अग्नि में
लपेटकर उसको देवताओं के लिए आहुति दे दी। और चूंकि अनुष्टुभ् छन्द से आहुति दे दी,
इसलिए उसको अपनी सत्ता में शामिल कर दिया (क्योंकि अनुष्टुभ् वाणी है)। जब वाणी को
देवों ने स्वीकार कर लिया तो असुर लोग कुछ न कह सके और 'हेऽलवो हेऽलवः' कहकर
पराजित हो गये, (हाय वाक्, हाय वाक्) ॥२३॥
इस प्रकार उन्होंने अर्थहीन वाणी बोली। और जो ऐसी वाणी बोलता है वह म्लेच्छ
है। इसलिए कोई ब्राह्मण म्लेच्छ भाषा न बोले, क्योंकि यह आसुरी भाषा है। इसी प्रकार वह
शत्रु को भाषा से वंचित कर सकता है। और जो इस रहस्य को समझता है उसके शत्रु भाषा से
वंचित होकर पराजित हो जाते हैं ॥२४॥
अब इस यज्ञ ने चाहा कि वाणी के साथ प्रसंग करूँ। उसने प्रसंग किया ॥२५॥
अब इन्द्र ने सोचा कि यज्ञ और वाणी के प्रसंग से एक भीषण राक्षस उत्पन्न होगा
और मुझे हरा देगा। इसलिए इन्द्र स्वयं गर्भ होकर उसमें प्रविष्ट हो गया ॥२६॥
जब वह एक साल बाद पैदा हुआ तो सोचने लगा, 'जिस योनि ने मुझे धारण किया,
वह तो 'महावीर्या' है। अब मैं ऐसी तरकीब करूँ कि इसमें कोई बड़ा राक्षस न पैदा हो जाय जो
मुझे हरा दे' ॥२७॥
उसको पकड़कर और अच्छी तरह भींचकर उसने तोड़ डाला और यज्ञ के सिर पर रख
दिया। कृष्णमृग यज्ञ है। कृष्ण मृगचर्म भी यज्ञ ही है और कृष्णमृग का सींग योनि है। और
चूंकि इन्द्र ने खूब भींचकर योनि को तोड़ा, इसलिए सींग को बड़ी मजबूती से वस्त्र से बाँधते हैं।
और जैसे इन्द्र गर्भ होकर उस जोड़े से उत्पन्न हुआ, इसी तरह यजमान भी गर्भ होकर उस
(सींग और चर्म) के जोड़े से उत्पन्न होता है ॥२८॥
वह इस सींग को इस प्रकार बाँधता है कि खुला भाग ऊपर को रहे, क्योंकि योनि में
गर्भ इसी प्रकार रहता है। अब दाहिनी भौं के ऊपर ललाट को (इस सींग से) छुआता है, यह
मन्त्र पढ़कर—"इन्द्रस्य योनिरसि" (यजु० ४।१०)-"तू इन्द्र की योनि है।" यह इन्द्र की योनि
ही तो है क्योंकि इसमें प्रवेश होकर ही वह यजमान उसमें प्रवेश करता है और यहाँ से उत्पन्न
होकर ही वहाँ से उत्पन्न होता है। इसीलिए कहता है कि 'तू इन्द्र की योनि है' ॥२६॥ [शतम्
१५००]
अब वह उस सींग से एक लकीर खींचता है यह मन्त्रांश पढ़कर- "सुसस्याः कृषीस्कृधि"