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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 359 of 699

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Page 359

कां० ३, अ० १, ब्रा० ३-४, कं० २६-२८ व १-५ शतपथब्राह्मण / ३४१
जब वह कहता है—"स्वाहा॑ य॒ज्ञं मन॑सः" तो मन से यज्ञ का आरम्भ करता है। जब
कहता है—"स्वाहोरोर॒न्तरि॑क्षात्", तब अन्तरिक्ष से आरम्भ करता है। जब कहता है "स्वाहा
द्यावा॑पृथि॒वीभ्याम्" तब द्यौ और पृथिवी से आरम्भ करता है जिनमें ये सब चीजें शामिल हैं।
जब वह कहता है "स्वाहा वातादारभे" तो यज्ञ को स्वयं ही ले लेता है, क्योंकि 'वात' यज्ञ
है ॥२६॥
जब वह कहता है "स्वाहा, स्वाहा" तो यज्ञ ही स्वाहा है, इसलिए यज्ञ को धारण
करता है। अब वह वाणी को रोकता है। वाक् ही यज्ञ है, इसलिए यज्ञ को यज्ञ की आत्मा में ही
धारण करता है ॥२७॥
अब वह उसको यज्ञ में प्रवेश करता है। वह आहवनीय के पीछे और गार्हपत्य के आगे
चलता है। इस प्रकार सोम निचोड़ने तक चलता है। सोम निचोड़ने तक वह इस प्रकार क्यों
चलता है ? इसका कारण यह है—अग्नि यज्ञ की योनि है और दीक्षित पुरुष गर्भ है। गर्भ
योनि के भीतर चलता है। और जैसे दीक्षित पुरुष यहाँ चलता और फिर मुड़कर लौट देता है
उसी प्रकार योनि के गर्भ चलता है और फिर मुड़कर लौट देता है। इसलिए सोम निचोड़ने
तक यही चाल रहती है ॥२८॥
अध्याय १—ब्राह्मण ४
दीक्षा-सम्बन्धी सब यजु औद्ग्रभण कहलाते हैं, क्योंकि जो पुरुष दीक्षित होता है वह इस
लोक से देवलोक को उठता है (उद् गृभ्णीते) और इन यजुओं के द्वारा उठता है इसीलिए ये
औद्ग्रभण कहलाते हैं। इन अवान्तर (बीच में होनेवाले) कृत्यों को भी औद्ग्रभण कहते हैं।
क्योंकि ये आहुतियाँ हैं और आहुतियाँ यज्ञ हैं। यजुः का जाप तो परोक्ष यज्ञ है और यह आहुति
प्रत्यक्ष यज्ञ है। इसी यज्ञ से इस लोक से देवलोक को उठते हैं ॥१॥
स्रुवों से जो तीन आहुतियाँ दी जाती हैं उनको 'अधीत यजुः' कहते हैं। चौथी आहुति
कामना के लिए होती है। पाँचवीं आहुति जो स्रुक् या जुहू से दी जाती है वह प्रत्यक्ष में औद्-
ग्रभण कहलाती है। क्योंकि यह अनुष्टुभ् छन्द से दी जाती है। अनुष्टुभ् वाणी है। वाणी यज्ञ
है ॥२॥
यज्ञ से देवों ने वह विजय पाई जो उनकी मिली हुई है। वे कहने लगे—"यह मनुष्यों
के लिए अप्राप्य कैसे हो ?" उन्होंने यज्ञ के रस को चूसा जैसे शहद की मक्खी शहद को चूसती
हैं, और यज्ञ को नीरस करके और यूप के द्वारा यज्ञ को तितर-बितर करके छिप गये। चूंकि
उन्होंने इससे यज्ञ को तितर-बितर किया (योपयन्) इसलिए इसका यूप नाम पड़ा ॥३॥
ऋषियों ने इस बात को सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया, जैसे यज्ञ इकट्ठा किया जाता
है। यह औद्ग्रभण आहुतियों द्वारा यज्ञ को इकट्ठा करता है ॥४॥
वह पाँच आहुतियां देता है क्योंकि यज्ञ और संवत्सर की संगति हैं। साल में पाँच ऋतुए