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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 367 of 699

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Page 367

कां० ३, अ० २, ब्रा० १, कं० १-२० शतपथब्राह्मण / ३४६
भीतर होता है। इसीलिए यह (मेखला) वस्त्र के भीतर होती है। जैसे प्रजापति गर्भ होकर
उस यज्ञ से निकला, इसी प्रकार यह दीक्षित पुरुष भी गर्भ होकर उस यज्ञ से उत्पन्न होता
है ॥११॥
मेखला तीन लड़ी वाली होती है। क्योंकि अन्न तीन भागों वाला होता है। पशु अन्न
हैं। माता और पिता दो होते हैं, और तीसरा वह होता है जो पैदा होता है। इसीलिए मेखला
में तीन लड़ियां होती हैं ॥१२॥
वह मूंज से बँधी होती है। मूंज का शर वज्र है, इसलिए इससे राक्षस भाग जाते हैं।
यह केशों के समान गूँथी जाती है। अगर वह रस्सी के समान 'पसलवि' अर्थात् सूर्य की चाल के
समान बाएँ और से दाहिनी ओर को गूँथी जाय तो मानुषी हो जाय। यदि 'अपसलवि' अर्थात्
दाहिनी ओर से बाईं ओर को गूँथी जाय तो पितरों जैसी हो जाए। इसलिए केशों के समान
गूँथी जाती है ॥१३॥
उसको यह मन्त्र पढ़कर धारण करता है—"ऊर्गस्याङ्गिरसि” (यजु० ४।१०)। क्योंकि
अंगिरों ने इस 'ऊर्ज' को देखा था। “ऊर्णं म्रदाऽऊर्जं मयि धेहि” (यजु० ४।१०)—“तू ऊन के
समान नरम है, मुझे ऊर्ज दे।” यहाँ सब स्पष्ट है ॥१४॥
अब नीचे का मन्त्र पढ़कर नीवि को बाँधता है, “सोमस्य नीविरसि” (यजु० ४।१०)—
“तू सोम की नीवि है।” पहले अदीक्षित की नीवि थी, अब दीक्षित की नीवि हो गई। इसलिए
कहा 'सोम की नीवि है।' (यहाँ सोम का अर्थ 'दीक्षित' प्रतीत होता है। ऋग्वेद के ९वें मण्डल
में सोम इसी अर्थ में कई जगह आया है) ॥१५॥
अब वह (सिर को) ढकता है। जो दीक्षित होता है वह गर्भ बन जाता है। गर्भ उल्ब
ओर जरायुज से ढके होते हैं। इसलिए वह (सिर को) ढकता है ॥१६॥
वह यह मन्त्र पढ़कर ढकता है— “विष्णोः शर्मासि शर्म यजमानस्य” (यजु० ४।१०)—
“तू विष्णु की शरण है, यजमान की शरण है।” जो दीक्षित होता है वह विष्णु और यजमान
दोनों होता है। चूँकि वह दीक्षित होता है इसलिए विष्णु बन जाता है, और चूंकि यज्ञ करता है
इसलिए यजमान हो जाता है। इसलिए कहा कि 'तू विष्णु की शरण है, यजमान की शरण
है' ॥१७॥
अब वह काले हिरण के सींग को (अपने वस्त्र के) सिरे से बाँधता है। देव और असुर
दोनों प्रजापति की सन्तान अपने पिता प्रजापति के दायभाग को प्राप्त हुए। देवों ने मन को
पाया और असुरों ने वाणी को। देवों ने उस (द्यौ) लोक को पाया और असुरों ने इस (पृथिवी)
लोक को ॥१८॥
उन देवों ने यज्ञ से कहा—'यह वाक् स्त्री है। तू इसको संकेत कर। वह तुझे अपने पास
बुलायेगी।' या शायद उसने स्वयं ही सोचा कि 'वाक् स्त्री है। मैं इसको संकेत करूँ। यह मुझे
अपने पास बुला लेगी।' उसने उसकी ओर संकेत किया। परन्तु उसने दूर से उसको तिरस्कृत
कर दिया। इसीलिए स्त्री पहले पुरुष का दूर से तिरस्कार कर देती है। उसने कहा, 'इसने मुझे
दूर से ही तिरस्कृत कर दिया' ॥१९॥
वे देवता बोले, 'भले आदमी, फिर संकेत कर, वह तुझे बुला लेगी।' उसने इशारा
किया, लेकिन (वाक् ने) उसकी ओर सिर हिलाकर इनकार कर दिया। इसीलिए जब कोई
पुरुष स्त्री को बुलाता है तो वह सिर हिलाकर इनकार कर देती है। उसने कहा, 'इसने मुझे
सिर हिलाकर इनकार कर दिया' ॥२०॥