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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 355 of 699

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Page 355

कां० ३, अ० १, ब्रा० ३, क० ६-१६ शतपथब्राह्मण / ३३७
यजुः की आहुति नहीं देते कि कहीं ऐसा न हो कि दीक्षित के वस्त्र पहनकर यज्ञ की पूर्ति से यज्ञ
के अन्त को पहुँच जाय। क्योंकि समिष्ट-यजुः यज्ञ का अन्त है ॥६॥
अब शाला के आगे खड़े होकर अभ्यंजन (नवनी शरीर पर मलना) कराता है। त्वचा
से वंचित होकर पुरुष घाववाला हो जाता है। जब उसका अभ्यंजन होता है तो घाव भर जाते
हैं। क्योंकि मनुष्य की त्वचा तो गाय के ऊपर है और घी (नवनी) भी गाय की होती है। इस
प्रकार (अध्वर्यु) उसको उसी की चीज दिला देता है। इसीलिए अभ्यंजन किया जाता है ॥७॥
यह नवनी है। घी देवों का है और फाण्ट (अर्थात् वे मक्खन के कण जो मट्ठा चलाने
में ऊपर उतरा आते हैं) मनुष्यों का। नवनी न तो घी है, न फाण्ट है। वृद्धि के लिए घी और
फाण्ट दोनों होने चाहिएँ। जो वृद्धियुक्त चीज है उससे वह यजमान को वृद्धियुक्त करता है ॥८॥
वह शिर से पैर तक अनुलोम की रीति से अभ्यंजन (उबटन) करता है, इस मन्त्र को
पढ़कर- “महीनां पयोऽसि” (यजु० ४।३)। 'मही' उन गायों में से एक का नाम है और यह
(नवनी) उनका 'पय' है। इसीलिए कहा- 'महीनां पयोऽसि।' अब कहता है- “वर्चोदाऽअसि
वर्चो मे देहि” (यजु० ४।३) -“तू वर्चस् देनेवाला है, मुझे वर्चस् दे।” यह स्पष्ट है ॥६॥
अब आंख में काजल लगाता है। याज्ञवल्क्य ने कहा कि 'मनुष्य की आंख जरुमवाली है।
मेरी आंख ठीक है।' पहले उसकी आंख खराब थी। अब वह काजल लगाकर उसकी आंख को
नीरोग करता है ॥१०॥
जब देवों ने असुर राक्षसों को मारा तो शुष्ण दानव पीछे को लौटकर मनुष्यों की आंखों
में समा गया। वही आँख की पुतली होकर छोटा बालक-सा प्रतीत होता है (कुमारक पुतली
को भी कहते हैं और बालक को भी)। इस प्रकार यजमान यज्ञ में प्रवेश होते समय इस अंजन
को लगाकर मानो उस दानव के चारों ओर पत्थर की दीवार खड़ी कर देता है, क्योंकि अंजन
पत्थर का है। (सुरमा पत्थर का होता है) ॥११॥
यह त्रिककुद पहाड़ का सुरमा है। जब इन्द्र ने वृत्र को मारा तो उसकी आँख की जो
पुतली थी उसका त्रिककुद पहाड़ बना दिया। अब त्रिककुद पहाड़ से सुरमा लाने का तात्पर्य यह
है कि आँख में रख देवे। यदि त्रिककुद पर्वत का सुरमा न मिले तो त्रिककुद को छोड़कर किसी
अन्य स्थान से सुरमा लावे, क्योंकि सुरमों का फल एक ही है ॥१२॥
सुरमा सींक से लगता है, क्योंकि सींक वज्र है। इसी (सींक) की नोक पर रुई लगी
होती है जिससे राक्षस निकल जाय, क्योंकि राक्षस बिना मूल के और दोनों ओर से स्वतन्त्र होकर
हवा में घूमता है, इसी तरह जैसे आदमी हवा में बिना मूल के और बिना रोकटोक के घूमता
है। सींक के किनारे पर रुई इसीलिए लगी होती है कि राक्षस दूर हो जाय ॥१३॥
पहले दाहिनी आँख में सुरमा या अंजन लगाया जाता है। आदमी की बाईं आँख में
पहले अंजन लगाया जाता है, देवताओं की (इसके विपरीत), ऐसी ही चाल है ॥१४॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर अंजन लगाता है- “वृत्रस्यासि कनीनकः” (यजु० ४।३) -“तू
वृत्र की आँख है।” वस्तुतः यह वृत्र की ही आँख है। अब कहता है- “चक्षुर्दाऽअसि चक्षुर्मे देहि”
(यजु० ४।३) -“तू आँख देनेवाला है, मुझे आँख दे।” यह स्पष्ट है ॥१५॥
दाहिनी आँख में एक यजुः-मन्त्र पढ़कर लगाता है और एक बार चुपचाप। बाईं आँख में