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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

About this granth

The Shatapatha Brahmana (शतपथ ब्राह्मण), the Brahmana of the White Yajurveda, is the largest and most important work of Vedic prose. Named for its hundred chapters and linked by tradition to the sage Yajnavalkya, it has fourteen books in the Madhyandina recension. It explains the procedure and meaning of the new- and full-moon offerings, the setting up of the fires, the agnihotra, the soma sacrifice, the building of the fire altar and the horse sacrifice, and its final part contains the Brihadaranyaka Upanishad. The first book includes the well-known story of Manu and the fish in the great flood.

This is the first of three volumes. The text follows Albrecht Weber's edition, with the Hindi translation (Ratnadipika) of Pandit Gangaprasad Upadhyaya, edited by Swami Satyaprakash Saraswati. Introductions on the Brahmanas and on the accent marks, a note on the translation, an English preface and contents precede the text, which runs by kanda, adhyaya and brahmana. This scan is of the 2014 Govindram Hasanand edition, 699 pages.

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का० १, अ० ५, ब्रा० ३, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ६६
'यज' से बिजली को, 'ये यजामहे' से गर्ज को और 'वषट्कार' से पानी को बरसाते हैं ॥१८॥
यदि उसकी वर्षा की इच्छा हो या विशेष यज्ञ करनेवाला हो या दर्शपूर्णमास यज्ञ, इन
सब में ऐसा बोले, 'वृष्टिकामो वा अस्मि'-'मैं वर्षा का इच्छुक हूँ।' वह अध्वर्यु से कहे, 'वायु का
और बिजली का मन से ध्यान करो।' अग्नीध्र से कहे, 'तू अपने मन में बादल का ध्यान कर।'
होता से कहे कि 'गर्ज का और वर्षा का मन से ध्यान कर।' ब्रह्मा से कहे कि 'तुम सबका मत
ध्यान करो।' जहाँ जिस प्रकार ऋत्विज लोग एक-दूसरे को समझकर यज्ञ करते हैं वहाँ अवश्य
वर्षा होती है ॥१९॥
'ओ श्रावय' कहकर देवों ने विराट् अर्थात् गाय को बुलाया। 'अस्तु श्रौषट्' कहकर
बछड़े को खोला। 'यज' कहकर (बछड़े के सिर को माँ के थनों तक) उठाया। 'ये यजामहे'
कहकर गाय के पास बैठे। 'वषट्कार' से उन्होंने उसको दुहा। यह (पृथिवी) ही विराट् है। उसी
का यह दुहना है। जो पुरुष इस विराट् के इस प्रकार दुहने को जानता है उसके लिए यह विराट्
सब इच्छाओं को पूर्ण कर देती है ॥२०॥
अध्याय ५-ब्राह्मण ३
ऋतुएँ ही प्रयाज हैं। इसलिए ये पाँच होते हैं क्योंकि पाँच ऋतुएँ होती हैं ॥१॥
देव और असुर, दोनों प्रजापति की सन्तान, इस यज्ञ में जो प्रजापति अर्थात् पिता
वर्ष है, झगड़ने लगे, 'यह हमारा होगा'-'यह हमारा होगा' ॥२॥
तब देव पूजा करते हुए और पुरुषार्थ करते हुए विचरने लगे। उन्होंने इन प्रजाओं को
देखा और उनके द्वारा पूजा की। उनके द्वारा उन्होंने ऋतुओं अर्थात् वर्ष को प्राप्त किया।
उन्होंने ऋतु अर्थात् वर्ष से अपने शत्रुओं को वंचित कर दिया। इसलिए 'प्रजा' का 'प्रजय' नाम
हुआ। इसलिए 'प्रयाज' नाम हुआ। इसी प्रकार यह (यजमान) ऋतुओं अर्थात् संवत्सर को
जीत लेता है और अपने शत्रुओं को ऋतुओं अर्थात् संवत्सर से वंचित कर देता है। इसलिए
वह 'प्रयाज' से यज्ञ करता है ॥३॥
उनकी हवि घी से दी जाती है। घी ही वज्र है। इसी वज्र से देवों ने ऋतुओं और
संवत्सर को जीता और शत्रुओं को ऋतुओं अर्थात् संवत्सर से वंचित कर दिया। इसी प्रकार यह
(यजमान) भी इसी वज्ररूपी घी से ऋतुओं अर्थात् संवत्सर को जीतता है और अपने शत्रुओं
को ऋतुओं अर्थात् संवत्सर से वंचित करता है। इसलिए आहुतियाँ घी की दी जाती हैं ॥४॥
यह जो घी है वह संवत्सर का अपना ही पय (पीने की वस्तु, शक्ति का साधन) है।
इसलिए देवों ने इस (संवत्सर) को उसी के पय से अपना लिया, और यह (यजमान) भी उसी
के पय से संवत्सर को अपनाता है। इसीलिए कहा कि ये आहुतियाँ (अर्थात् प्रयाज आहुतियाँ)
घी की होती हैं ॥५॥
वह जहाँ खड़ा होकर प्रयाजों के लिए बुलावे वहाँ से हटे नहीं। संग्राम हो जाता है जब
कोई 'प्रयाजों' से यज्ञ करता है। लड़नेवालों में जो परास्त हो जाता है वही पीछे हट जाता है,
और जो विजयी होता है वह निकट-निकट चलता जाता है। इसलिए शायद (अध्वर्यु) भी निकट-

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१०० शतपथ ब्राह्मण
त॒स्माद॑भितरा॒मभि॑तरा॒मेव क्रामे॑दभितरा॒मभि॑तरा॒माहु॑तीर्जुहुयात् ॥ ६॥ तद्व तथा॒ न
कुर्यात् ॥ यत्रैव तिष्ठ॒न्प्रया॑जेभ्य आ॒श्राव॑येत्तत एव नाप॑क्रामेद्यत्रोऽए॒व स॑मिद्धत॒मं
म॒न्येत॒ तदाहु॑तीर्जुहुयात्समिद्धहो॒मेन॑ ह्येव समृद्धा आहुतयः ॥ ७॥ स आ॒श्रा-
व्याह॑ । स॒मिधो॑ यजति॒ तद्वसन्त॒ समि॑न्द्धे स व॒सन्तः समि॑द्धोऽन्या॒नृतून्त्स॒मिन्द्ध
ऽऋतवः समिद्धाः प्रजाश्च प्र॒जनय॑न्त्योष॑धीश्च पचन्ति॒ तद्वैव खलु॒ सर्वा॒नृतून्नि॒राहाथ
य॒ज्ञय॒जेत्ये॒वोत्त॑रानाहा॒ह्नामितायै जा॒मि ह कुर्याद्यत्त॒नूनपा॑तं यजे॒डो यजेति ब्रूयात्त-
स्माद्य॒ज्ञय॒जेत्ये॒वोत्त॑रानाह ॥ ८॥ स वै स॒मिधो॑ यजति । व॒सन्तो॒ वै स॒मिद्वस॒न्तमे-
व तद्देवा अवृ॑ञ्जत वसन्तात्सप॒त्नान॒न्तरा॑यन्वसन्त॒मु॑वैष एतद्वृ॑ङ्क्ते वसन्तात्सप॒त्नान-
न्त॑रेति॒ तस्मात्स॒मिधो॑ यजति ॥ ९॥ अथ त॒नूनपा॑तं यजति । ग्री॒ष्मो वै त॒नूनपा-
द्ग्री॒ष्मो ह्त्यासां॑ प्रजानां॑ तनूस्तप॑ति ग्री॒ष्ममेव तद्देवा अवृ॑ञ्जत ग्री॒ष्मात्सप॒त्नान॒न्त-
रायन्ग्री॒ष्ममु॑वैष एतद्वृ॑ङ्क्ते ग्री॒ष्मात्सप॒त्नानन्त॑रेति॒ तस्मात्त॒नूनपा॑तं यजति ॥ १०॥ अ-
थैडो॑ यजति । व॒र्षा वाऽइड इति॒ हि वर्षा इडो य॒दिदं क्षुद्रं सरीसृपं ग्रीष्महे-
मन्ताभ्यां॒ नित्यक्तं भव॑ति तद्वर्षा ईडित॑मिवा॒नमि॒हमानं॑ चरति॒ तस्मा॒द्वर्षा इडो॑
वर्षा एव तद्देवा अवृ॑ञ्जत व॒र्षाभ्यः॑ सप॒त्नान॒न्तरा॑यन्व॒र्षा उ॑ऽवैष एतद्वृ॑ङ्क्ते व॒र्षा-
भ्यः सप॒त्नानन्त॑रेति॒ तस्मा॒दिडो॑ यजति ॥ ११॥ अथ ब॒र्हिर्यजति । श॒रद्वै ब॒र्हिरिति॑
हि श॒रद्धी॑ह्ये॑षा इमा ओष॑धयो ग्रीष्महे॒मन्ताभ्यां॑ नित्यक्ता भव॑न्ति ता वर्षा वर्ध॑न्ते
ताः श॒रदि॑ ब॒र्हिषो रूपं प्रस्तीर्णाः शेरे॑ तस्माच्छ्र॒र्द्धर्हिः श॒रद॑मेव तद्देवा अवृ॑ञ्जत
श॒रदः॑ सप॒त्नान॒न्तरा॑यञ्छ॒रद॒मु॑वैष एतद्वृ॑ङ्क्ते श॒रदः॑ सप॒त्नानन्त॑रेति॒ तस्माद्व॒र्हिर्यजति ॥ १२॥
अथ स्वाहा॑स्वा॒हेति॑ यजति । अ॒न्तो वै य॒ज्ञस्य स्वाहा॑कारोऽन्त ऋतूनां॒ हेमन्तो॒
वसन्ताद्धि पराञ्चो॑ऽन्तेनैव तदन्तं॑ देवा अवृ॑ञ्जतान्तेनान्तात्सप॒त्नान॒न्तरा॑यन्नन्तेनोऽए॒-
वैष एतदन्तं॑ वृङ्क्तेऽन्तेनान्तात्सप॒त्नानन्त॑रेति॒ तस्मात्स्वाहा॑स्वा॒हेति॑ यजति ॥ १३॥
तद्वाऽए॒तत् । व॒सन्त एव हेमन्तात्पुनः॒ सू॒तेऽस्माद्धेष पु॑नर्भवति॒ पुन॒र्ह वाऽअ॒स्मिं-

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का० १, अ० ५, ब्रा० ३, कं० ६-१४ शतपथब्राह्मण / १०१
निकट जाकर आहुति देने को उद्यत हो ॥६॥
परन्तु उसको ऐसा न करना चाहिए। जहाँ खड़ा होकर प्रयाजों को बुलावे उस जगह से
हटे नहीं। जहाँ अधिक से अधिक अग्नि जलती प्रतीत हो वहीं आहुति दे, क्योंकि आहुतियाँ उसी
स्थान पर ठीक जलती हैं जहाँ अधिक आग जलती है ॥७॥
वह (अध्वर्यु) (अग्नीध्र को) बुलाकर (होता से) कहे—“समिधो यज”—“समिधा को
आग में डालो।” इस प्रकार वह वसन्त को प्रज्वलित करता है। प्रज्वलित हुआ वसन्त और
ऋतुओं को प्रज्वलित करता है। प्रज्वलित ऋतुएँ प्रजा को उत्पन्न करती हैं, ओषधियों को
पकाती हैं। इसी कथन से वह अन्य ऋतुओं को शामिल करता है। अन्य ऋतुओं के लिए वह
केवल इतना कहता है—‘यज’ (अर्थात् आहुति दो)। यदि वह कहे कि ‘तनूनपातं यज’ या
‘ईडो यज’ तो व्यर्थ का दुहराना होगा। इसलिए अन्य आहुतियों के लिए केवल ‘यज’ कह देता
है ॥८॥
अब वह समिधाओं से यजन करता है। वसन्त ही समिधा है। वसन्त को ही देवों ने
अपना लिया और वसन्त से ही शत्रुओं को वंचित कर दिया। अब यहाँ यजमान भी वसन्त को
अपनाता है और उससे अपने शत्रुओं को वंचित करता है। इसीलिए समिधा से यजन करता
है ॥६॥
अब वह ‘तनूनपातं’ का यज्ञ करता है। ग्रीष्म ही तनूनपात है। ग्रीष्म ही इन प्रजाओं
के शरीरों को तपाता है। देवों ने उस समय ग्रीष्म को अपनाया और ग्रीष्म से शत्रुओं को वंचित
कर दिया। अब यह यजमान भी ग्रीष्म को अपनाता है और ग्रीष्म से शत्रुओं को वंचित करता
है। इसलिए वह तनूनपात से यज्ञ करता है ॥१०॥
अब ईड का यज्ञ करता है। वर्षा ऋतु ईड है। ये जो छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े हैं और जो
ग्रीष्म और हेमन्त में क्षीण हो जाते हैं, वे मानो वर्षा की प्रशंसा करते हुए भोजन की तलाश में
फिरते हैं, इसलिए ‘वर्षा’ ‘ईड’ हुआ। उस समय देवों ने वर्षा को ही अपनाया और वर्षा से
शत्रुओं को वंचित कर दिया, इसी प्रकार यह यजमान भी वर्षा को ही अपनाता है और वर्षा से
ही शत्रुओं को वंचित करता है। इसलिए ‘ईड’ का यज्ञ करता है ॥११॥
अब बर्हि यज्ञ करता है। शरद् ऋतु ही बर्हि है। जो ओषधियाँ ग्रीष्म और हेमन्त में
क्षीण हो जाती हैं वे वर्षा के द्वारा बढ़ती हैं, और शरद् ऋतु में बर्हि के रूप में फैल जाती हैं, इस-
लिए शरद् ही बर्हि है। देवों ने शरद् को अपनाया और शत्रुओं को शरद् से वंचित कर दिया।
इसी प्रकार यह यजमान भी शरद् ऋतु को अपनाता है तो शत्रुओं को शरद् से वंचित करता
है। इसलिए बर्हि यज्ञ करता है ॥१२॥
अब ‘स्वाहा-स्वाहा’ कहकर यज्ञ करता है। ‘स्वाहा’-कार यज्ञ का अन्त है। ऋतुओं में
अन्तिम हेमन्त है, क्योंकि वसन्त से हेमन्त सबसे दूर है (अर्थात् हेमन्त वर्ष के अन्त में पड़ता
है और वसन्त आदि में, इसलिए अन्य ऋतुओं की अपेक्षा हेमन्त वसन्त से बहुत दूर हुआ)।
देवों ने अन्त (स्वाहा) से ही अन्त (हेमन्त) को अपनाया और अन्त की सहायता से ही अन्त से
शत्रुओं को वंचित किया। इसी प्रकार यह यजमान भी अन्त से ही अन्त को अपनाता है और
इसी अन्त (स्वाहा-यज्ञ) की सहायता से अन्त अर्थात् हेमन्त से अपने शत्रुओं को वंचित करता
है। इसलिए वह स्वाहा-यज्ञ करता है ॥१३॥
यह वसन्त ही हेमन्त के पश्चात् पुनर्जीवित होता है, क्योंकि एक के पश्चात् दूसरा पैदा

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१०२ शतपथ ब्राह्मण
लोके॑ भवति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ १४ ॥ स वै व्यतु॒ वेत्विति॒ यज॑ति । अ॒जामितायै
जा॒मि ह॑ कुर्याद्यद्वतुव्य॒त्विति॑ वेव यजे॑द्वेतुवे॒विति॑ वा व्य॒स्त्विति॒ वै योषा वे॑-
विति॒ वृषा॑ मिथुन॒मेवैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते॒ तस्मा॑द्व्यतु वे॒विति॑ यज॑ति ॥ १५ ॥ अथ
चतु॒र्थे प्र॒याजे॒ समा॑नयति ब॒र्हिषि॑ । प्र॒जा वै ब॒र्ही रे॑त॒ आज्यं॒ तत्प्र॒जास्वे॒वैतद्रेतः॑
सिच्यते॒ तेन॒ रेत॑सा सि॒क्तेने॒माः प्र॒जाः पुन॑र॒भ्याव॑र्तं प्र॒जाय॑न्ते॒ तस्मा॑च्चतु॒र्थे प्र॒याजे॒
समा॑नयति ब॒र्हिषि॑ ॥ १६ ॥ संग्रामो वाऽए॒ष संनि॑धीयते । यः प्र॒याजै॒र्यज॑ते यत॒रं
वै सं॒यत्त॑यो॒र्मित्र॒माग॒च्छति॒ स ज॑यति॒ तदे॒तदुप॑भृतो॒ऽधि जु॒हूं मित्र॒माग॑च्छति॒ तेन॒ प्र-
जयति॒ तस्मा॑च्चतु॒र्थे प्र॒याजे॒ समा॑नयति ब॒र्हिषि॑ ॥ १७ ॥ यज॑मान ए॒व जुहू॒मनु॑ ।
यो॒ऽस्माऽअ॑राती॒यति॒ स उप॑भृत॒मनु॒ यज॑मानायै॒वैतद्द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यं बलिं॒ हारय॑-
त्यत्तै॑व जु॒हूमन्वाद्य॒ उप॑भृत॒मन्वत्त॒ऽए॒वैतदा॒द्यं बलिं॑ हारयति॒ तस्मा॑च्चतु॒र्थे प्र॒याजे॒
समा॑नयति ॥ १८ ॥ स वाऽअन॑वमृश॒त्समान॑यति । स यदवा॑वमृशेद्यज॑मानं द्विषता
भ्रातृ॑व्येना॑वमृशेदत्तार॑मा॒द्येना॑वमृशे॒त्तस्मा॒दन॑वमृश॒त्समान॑यति ॥ १९ ॥ अथोत्तरां॑ जु-
हूम॒ध्यू॑हति । यज॑मानमे॒वैतद्द्विष॑ति॒ भ्रातृ॑व्ये॒ऽध्यू॑हत्युत्तारा॒माद्ये॒ऽध्यू॑हति॒ तस्मा॒दुत्त॑रां
जु॒हूम॒ध्यू॑हति ॥ २० ॥ दे॒वा ह॒ वाऽऊचुः॑ । हन्त॒ विजि॑तमेवा॒नु सर्वं॑ य॒ज्ञं सं॑स्था-
पया॑म॒ यदि॑ नो॒ऽसुर॒रक्ष॒सान्या॒सङ्ग्रेयुः संस्थि॑त ए॒व नो॑ य॒ज्ञः स्या॒दिति॑ ॥ २१ ॥ त॒
ऽउत्त॑मे प्र॒याजे॑ । स्वाहा॑का॒रेणै॑व सर्वं॑ य॒ज्ञं स॑मस्थापयन्त्स्वाहा॒ग्निमिति॑ तद॒ग्नेय-
माज्यभागं॑ समस्थापयन्त्स्वाहा॒ सोम॒मिति॑ तत्सौ॒म्यमा॒ज्यभागं॑ समस्थापयन्त्स्वाहा-
ऽग्निमिति॒ तद्य ए॒ष उ॒भय॑त्राच्युत॒ आग्ने॒यः पु॒रोडाशो भव॑ति॒ तं स॑मस्थापयन् ॥ २२ ॥
अथ॒ यथा॑दे॒वत॑म् । स्वाहा॑ दे॒वा आज्य॑पा॒ इति॑ तत्प्रयाजानुया॒जांत्स॒मस्था॑पयन्प्रया-
जानुया॒जा वै दे॒वा आज्य॑पा जुषा॒णोऽअ॒ग्निरा॒ज्यस्य॑ वेत्विति॒ तद॒ग्निं स्वि॑ष्ट॒कृतं॑
सम॑स्थापयन्न॒ग्निर्हि स्वि॑ष्ट॒कृत्स ए॒षोऽप्ये॒तर्हि॒ तथै॑व य॒ज्ञः संति॑ष्ठते॒ यथैवेनं॑ दे॒वाः
सम॑स्थापयं॒स्तस्मा॑दुत्त॒मे प्र॒याजे॒ स्वाहा॑स्वाहेति॒ यज॑ति॒ याव॑न्ति ह॒वींषि॑ भव॑न्ति

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कां० १, अ० ५, ब्रा० ३, कं० १४-२३ शतपथब्राह्मण / १०३
होता है। इसलिए जो पुरुष इस रहस्य को समझता है वह इस लोक में पुनर्जीवित होता है ॥१४॥
अब वह क्रमशः कहता है—'व्यन्तु' (वे स्वीकार करें) और 'वेतु' (वह स्वीकार करे) ।
यदि वह केवल 'व्यन्तु व्यन्तु' कहे या 'वेतु वेतु' कहे तो पुनरुक्ति-दोष आ जाय (इसलिए एक
बार 'व्यन्तु' कहता है और एक बार 'वेतु') । 'व्यन्तु' स्त्रीलिङ्ग है, 'वेतु' पुंल्लिङ्ग । इन दोनों
के जोड़ से सन्तानोत्पत्ति होती है। इसलिए पहले कहता है 'व्यन्तु', फिर कहता है 'वेतु' ॥१५॥
अब चौथे प्रयाज अर्थात् बर्हि-याज में वह (जुहू में घी) डालता है। बर्हि प्रजा है और
घी वीर्य है, इसलिए इस प्रकार वीर्य प्रजाओं से सिंचित होता है और उसी से प्रजायें बार-बार
उत्पन्न होती हैं। इसलिए चौथे बर्हि-याज में वह (जुहू में घी) छोड़ता है ॥१६॥
जो प्रयाज से यज्ञ करता है उसके लिए मानो संग्राम-सा छिड़ जाता है, और जो मित्र
जिस दल में मिल जाता है उसी की जय होती है। इसीलिए मित्र उपभृत् से चलकर जुहू में आता
है, और उसी से जय को प्राप्त होता है। यही कारण है कि वह चतुर्थ प्रयाज में (घृत) छोड़ता
है अर्थात् बर्हि-यज्ञ में ॥१७॥
यजमान जुहू के पीछे ही (खड़ा होता है) और जो उससे शत्रुता करता है वह उपभृत्
के पीछे । इस प्रकार वह अहितकारी शत्रु से यजमान के लिए बलि (भेंट) दिलवाता है। जो
खाने वाला है वह जुहू के ही पीछे (खड़ा होता है) और जिसको खाया जाता है वह उपभृत् के
पीछे । इस प्रकार वह खाने वाले के प्रति बलि दिलवाता है। यही कारण है कि वह चतुर्थ प्रयाज
में (घी) छोड़ता है अर्थात् बर्हि-यज्ञ में ॥१८॥
वह बिना छुए ही (घी) छोड़ता है। यदि वह उसको छू ले तो मानो यजमान अहित-
कारी शत्रु से छू गया, या खाद्य-पदार्थ से खानेवाला छू गया। इसलिए बिना छुए ही (घी)
डालता है ॥१९॥
अब वह जुहू को उपभृत् के ऊपर पकड़ता है। इससे मानो वह यजमान को अहितकारी
शत्रु के ऊपर उठाता है, या खानेवाले को खाद्य के ऊपर उठाता है। इसलिए वह जुहू को
(उपभृत् के) ऊपर उठाता है ॥२०॥
देवों ने कहा था कि 'अब जीत तो हो गई' इसलिए इसके पश्चात् सब यज्ञ की संस्थापना
(दृढ़ता) कर दें जिससे यदि राक्षस लोग कष्ट भी दें तो भी यज्ञ दृढ़ रीति से संस्थापित हो
जाय ॥२१॥
अन्तिम याज में वह 'देवता स्वाहाकार' से सम्पूर्ण यज्ञ की स्थापना करते हैं।
'स्वाहाग्नि' से जो आज्य भाग था वह अग्नि के लिए किया था, 'स्वाहा सोम' से जो आज्य-
भाग था उसको सोम के लिए। फिर 'स्वाहाग्नि' से वह भाग जो दोनों (अर्थात् दर्श पौर्णमास
यज्ञ) में प्रयुक्त होता है अग्नि का पुरोडाश होता है उसकी संस्थापना करता है ॥२२॥
इसी प्रकार अन्य देवों के लिए भी। 'स्वाहा देवा आज्यपा' इससे प्रयाज और अनुयाज
की संस्थापना करते हैं। प्रयाज और अनुयाज ही 'आज्यपा देव' हैं। 'जुषाणो अग्नि राज्यस्य
वेत्तु' इससे स्विष्टकृत् अग्नि की संस्थापना की, क्योंकि अग्नि ही स्विष्टकृत् है। वह अग्नि आज
तक उसी प्रकार संस्थापित चली आती है जैसी उस समय थी, जब देवों ने पहले-पहल स्थापित
की थी। इसलिए पिछले प्रयाज में 'स्वाहा स्वाहा' से जितनी आहुतियां होती हैं वे सब दी जाती

अध्याय-५, ब्राह्मण-४

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१०४ शतपथ ब्राह्मण
वि॒ष्ठितमे॒वैतद्य॒त्सर्वं॑ य॒ज्ञꣳ संस्थापय॑ति॒ तस्मा॑द्यद॒त ऊ॒र्ध्वं वि॒ल्लोम य॒ज्ञे क्रि॒येत
न तदाद्रि॑येत॒ सं॑स्थितो मे य॒ज्ञ इति॑ ह वि॒द्यात् सैष य॒ज्ञो यात॑याम॒ एवास॒ यथा॑
व॒षट्कृ॑तं॒ हुतं॒ स्वाहा॑कृतम् ॥ २३॥ ते देवा॒ अका॑मयन्त । कथं॒ न्वि॒मं य॒ज्ञं पु-
नरा॒प्याये॒माया॑तयामं कुर्याम तेना॑यातयाम्ना॒ प्रच॑रे॒मेति॑ ॥ २४॥ स य॒ज्जुह्वा॒माज्यं॑
प॒रिशि॑ष्टमासी॒त् । येन॒ य॒ज्ञंᳵ सम॑स्थापयं॒स्तेनै॒व यथा॒पूर्वꣳ॑ स्रुचो॒ऽभ्य॑घारय॒न्पुन॑रे-
वैना॑नि॒ तदा॑प्यायय॒न्नया॑तयामा॒न्यकु॑र्व॒न्नया॑तयाम॒ ह्याज्यं॒ तस्मा॑द्यत्तं॒ प्रया॒जानि॒ष्ट्वा
यथा॒पूर्वꣳ॑ स्रुचो॒ऽभि॑घारय॑ति॒ पुन॑रे॒वैना॑नि॒ तदा॑प्याययत्यया॑तयामानि करोत्यया-
तयाम॒ ह्याज्यं॒ तस्मा॒द्यस्य॒ कस्य॒ च ह॒विषो॒ऽवद्य॑ति॒ पुन॑रेव॒ तद॒भिघा॑रयति स्वि-
ष्टकृ॒तऽए॒व तत्पुन॑राप्यायत्यया॑तयामं करोत्यथ यदा॑ स्विष्टकृ॒तेऽवद्य॑ति॒ न तत॑:
पुन॑रभिघा॑रयति॒ नो हि ततः॒ कां चन॒ ह॒विषो॒ऽग्नावाहु॑तिᳵ हुता॑ भवति ॥२५॥
ब्रा॒ह्म॒णम् ॥४ [५.३.]॥ ॥
स वै॒ समि॑धो यजति । प्रा॒णा वै समिध॑: प्रा॒णान्वे॒वैतत्सम॒िन्द्धे प्रा॒णैर्ह्य॒यं पुरु॑षः
स॒मिद्ध॒स्तस्मा॑द॒भिमृ॑शेति ब्रूया॒द्यद्यु॑पतापी स्यात्स यद्यु॒ष्णः स्या॑दैव तावदा॑सीत स॒-
मिद्धो॒ हि स ताव॒द्भवति॒ यद्यु॒ शीतः॑ स्यान्नाशा॑सीत॒ तत्प्रा॒णान्वे॒वास्मि॑न्ने॒तद्द॑धाति
तस्मात्समिधो॑ यज॑ति ॥१॥ अथ तनूनपा॑तं॒ यज॑ति । रे॒तो वै तनू॒नपा॒देत॒द्वैत-
त्सिञ्च॑ति॒ तस्मा॑त्तनू॒नपा॑तं यज॑ति ॥२॥ अथे॒डो यज॑ति । प्र॒जा वा॒ऽइडो॒ यदा॒ वै
रे॒तः सि॒क्तं प्र॒जाय॑ते॒ऽथ तदी॑डितमिवा॒न्नमि॒च्छमा॑नं चर॑ति॒ तत्प्रैवैतज्जन॑यति॒ तस्मा॒-
दिडो॑ यज॑ति ॥३॥ अथ ब॒र्हिर्य॑ज॑ति । भूमा॒ वै ब॒र्हिर्भूमा॑नमे॒वैतत्प्र॒जन॑यति॒ तस्मा॒-
द्ब॒र्हिर्य॑ज॑ति ॥४॥ अथ स्वाहा॑स्वाहाकृ॒ति यज॑ति । हे॒मन्तो वा॒ऽऋतू॒नाᳵ स्वाहा॑का-
रो हे॒मन्तो॒ हीमाः प्र॒जाः स्वं वश॒मुप॑नयते॒ तस्मा॑द्धि॒मन्म्ला॑यन्त्योष॑धयः॒ प्र वन॒स्पती॒-
नां प॒लाशा॑नि मुच्यन्ते प्रतितरा॒मिव॒ वया॑ꣳसि भवन्त्यधस्तरा॒मिव॒ वया॑ꣳसि पतन्ति
वि॒पतितलो॒मेव॒ पाप॑: पु॒रुषो॑ भवति हे॒मन्तो॒ हीमाः प्र॒जाः स्वं वश॒मुप॑नयते स्वी॒-

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कां० १, अ० ५, ब्रा० ४, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / १०५
हैं। जीत के पश्चात् वह यज्ञ की दृढ़ता से संस्थापना करता है, इसलिए यदि वह यज्ञ में 'विलोम'
अर्थात् उलटा क्रम कर दे तो अवहेलना न हो। क्योंकि वह जानता है कि मेरा यज्ञ दृढ़ता से
संस्थापित है। अब वषट्कार और स्वाहाकार से जो यज्ञ रह गया था वह हो जाता है ॥२३॥
अब देवों ने चाहा कि हम इस यज्ञ को कैसे प्राप्त करें और प्राप्त करके किस प्रकार करें,
किस प्रकार उसका पालन करें ॥२४॥
अब जुहू में जो कुछ घी बच रहा था जिससे कि यज्ञ की संस्थापना की थी, उसी से
पहले के समान हवियों को सींचता है। उसी से इनको प्राप्त करता है, उसी से उसको पूर्ण
करता है क्योंकि 'आज्य' (घी) पूर्ण होता है। इसलिए पिछले प्रयाज को करके पहले के समान
हवियों को सींचता है, फिर उनको पूर्ण करता है। आज्य (घी) ही पूर्णता है। इसलिए जिस
किसी की हवि को काटता है उसी को फिर सींचता है और स्विष्टकृत् आहुति के लिए पूर्ण करता
है। परन्तु जब स्विष्टकृति के लिए काटता है तो फिर नहीं सींचता, क्योंकि इसके पश्चात् कोई
आहुति अग्नि में नहीं दी जायगी ॥२५॥
अध्याय ५—ब्राह्मण ४
अब वह समिध-यजन करता है। प्राण ही समिधा है। इस प्रकार वह प्राणों को प्रज्वलित
करता है। यह पुरुष प्राणों द्वारा ही प्रज्वलित किया जाता है। इसलिए यदि (यजमान को) ज्वर
हो तो (अध्वर्यु) कहेगा 'अभिमृश' (छुओ)। यदि गरम हो तो सन्तुष्ट होगा क्योंकि वह प्रज्वलित
हो जाता है। यदि ठण्डा हो तो चिन्ता होती है। वह इस प्रकार प्राणों को उसमें रखता है।
इसीलिए समिध-यजन करता है ॥१॥
अब तनूनपात-यजन करता है। वीर्य (रेत) ही तनूनपात है। इस प्रकार रेत को सींचता
है, इसलिए तनूनपात यज्ञ करता है ॥२॥
अब ईड-यजन करता है। प्रजा ही ईड है। जब सींचा हुआ वीर्य प्रजा के रूप में उत्पन्न
होता है तब प्रशंसा करते हुए के समान अन्न की खोज में विचरता है। इस प्रकार वह यजमान से
मानो सन्तानोत्पत्ति कराता है। इसलिए वह ईड-यजन करता है ॥३॥
अब बर्हि-यजन करता है। बर्हि का अर्थ है बहुतायत। इस प्रकार वह बहुतायत
(आधिक्य) को उत्पन्न करता है। इसीलिए वह बर्हि-यजन करता है ॥४॥
अब स्वाहा-यजन करता है। ऋतुओं में हेमन्त स्वाहाकार (सबसे पिछली) है। हेमन्त
ही इन प्रजाओं को अपने वश में करता है। इसीलिए हेमन्त में ओषधियां सूख जाती हैं, वृक्षों के
पत्ते झड़ जाते हैं। चिड़ियां छिप जाती हैं, या नीचे उतर-सी आती हैं। पापी पुरुष के बाल झड़
जाते हैं। हेमन्त इन सब प्रजाओं को वश में कर लेता है। जो इस रहस्य को समझता है वह उस

अध्याय-६, ब्राह्मण-१

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१०६ शतपथ ब्राह्मण
ह॒ वै तमर्थं॑ कुरुते॒ श्रियै॒ऽन्नाद्या॑य॒ यस्मि॑न्न॒र्थे भ॑वति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ ५॥ दे॒वाश्च
वा॒ऽसुरा॑श्च । उ॒भये॑ प्राजाप॒त्याः प॑स्पृधिरे ते द॒ण्डैर्धनु॑र्भि॒र्न व्य॑जयन्त ते हा॒विज्ञा॑-
यमाना उचुर्हन्त॒ वाचेव॑ ब्र॒ह्मान्वि॑जिगीषामहै॒ स यो नो॒ वाचं॒ व्याहृ॑तां मिथु॒नि-
न् नानु॒निष्क्रा॑मात्स सर्वं॒ परा॑जयाता॒ऽथ सर्व॑मितरे जयानिति॒ तथेति॑ दे॒वा अब्रु॑-
वंस्ते॑ दे॒वा इन्द्र॑मब्रुवन्व्या॒हरेति॑ ॥ ६॥ स इन्द्रो॑ऽब्रवीत् । एको॒ ममे॒त्यथा॒स्माक॒-
मेकेती॒तरे॑ऽब्रुवं॒स्तदु॒ तन्मिथु॑नमे॒वावि॑न्दन्मिथु॒नं ह्येक॑श्चैका च ॥ ७॥ द्वौ ममेती-
न्द्रो॑ऽब्रवीत् । अथा॒स्माकं॒ द्वेऽइती॒तरे॑ऽब्रुवं॒स्तदु॒ तन्मिथु॑नमे॒वावि॑न्दन्मिथु॒नं हि
द्वौ च॒ द्वे च॑ ॥ ८॥ त्रयो॒ ममेतीन्द्रो॑ऽब्रवीत् । अथा॒स्माकं॑ तिस्र इती॒तरे॑ऽब्रुवं॒स्तदु॒
तन्मिथु॑नमे॒वावि॑न्दन्मिथु॒नं हि त्रय॑श्च तिस्र॑श्च ॥ ९॥ च॒त्वारो॒ ममेतीन्द्रो॑ऽब्रवीत् ।
अथा॒स्माकं॒ चत॑स्र इती॒तरे॑ऽब्रुवं॒स्तदु॒ तन्मिथु॑नमे॒वावि॑न्दन्मिथु॒नं हि च॒त्वार॑श्च च॒-
तस्र॑श्च ॥ १०॥ पञ्च॒ ममेतीन्द्रो॑ऽब्रवीत् । तत॒ इत॑रे मिथु॒नं नावि॑न्द॒न्नो ह्य॑त ऊ॒र्ध्वं
मिथु॑नमस्ति पञ्च॒ पञ्चेति॒ ह्येवैतदु॑भयं भ॑वति॒ ततो॒ऽसुराः॒ सर्वं॒ परा॑जयन्त॒ सर्व॑स्मा-
द्देवा॒ऽसुरा॑नजयन्त्सर्वस्मात्सप॒त्नानसु॑रान्नि॒रभ॑जन् ॥ ११॥ तस्मा॑त्प्रथ॒मे प्रया॒जाऽइ॑ष्टे
ब्रूयात् । एको॒ ममे॒त्येका॒ तस्य॒ यम॒हं द्वेष्मीति॒ यश्च॑ न द्वि॒ष्याद्यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च
व॒यं द्वि॒ष्म इति॑ ब्रूयात् ॥ १२॥ द्वौ ममेति॑ द्विती॒ये प्र॑या॒जे । द्वे तस्य॒ यो॒ऽस्मान्द्वे-
ष्टि यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इति॑ ॥ १३॥ त्रयो॒ ममेति॑ तृती॒ये प्र॑या॒जे । ति॒स्रस्तस्य॒ यो॒-
ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इति॑ ॥ १४॥ च॒त्वारो॒ ममेति॑ चतु॒र्थे प्र॑या॒जे । चत॑स्र-
स्तस्य॒ यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इति॑ ॥ १५॥ पञ्च॒ ममेति॑ पञ्च॒मे प्र॑या॒जे । न
तस्य॒ किं च॒न यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इति॒ स पञ्च॒ पञ्चेत्ये॑व भ॑वन्त्यरा॒भ-
व॑ति॒ तथा॑स्य॒ सर्वं॒ संवृ॑ङ्क्ते॒ सर्व॑स्मात्सप॒त्नान्निर्भ॑जति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ १६॥ ब्राह्म-
णम् ॥ ५ [५.४.] ॥ ॥ अध्यायः ॥ ५॥ ॥
ऋ॒तवो॒ ह वै दे॒वेषु॑ य॒ज्ञे भा॒गमी॑षिरे । आ नो॑ य॒ज्ञे भ॑जत॒ मा नो॑ य॒ज्ञाद॒न्तर्ग॑-

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का० १, अ० ५, ब्रा० ४, कं० ५-१६ शतपथब्राह्मण / १०७
स्थान को जहाँ वह रहता है अपने वश में कर लेता है, और श्री तथा अन्न से अपने को युक्त कर
लेता है ॥५॥
देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान महत्त्व के लिए लड़ पड़े। वे डण्डों और
धनुष से एक-दूसरे को नहीं जीत सके। वे (असुर) न जीतनेवाले होकर कहने लगे—‘अब हम
ब्रह्म-वाणी से जीतेंगे। जो हमारी कही हुई वाणी को जोड़े में (दो-दो मिलकर) अर्थात् पुंल्लिङ्ग
वा स्त्रीलिङ्ग न समझ सकेगा, वह पराजित हो जायेगा और सब-कुछ खो बैठेगा, और विपक्षी
सब-कुछ ले लेंगे।” देवों ने कहा ‘अच्छा’। देवों ने इन्द्र से कहा, ‘बोलो’ ॥६॥
इन्द्र बोला, 'एको मम' (एक मेरा)। औरों ने कहा, 'अस्माकं एका' (एक हमारी)।
इस प्रकार जोड़े को प्राप्त किया। एक पुंल्लिङ्ग और एक (स्त्रीलिङ्ग) मिलकर जोड़ा होता
है ॥७॥
इन्द्र ने कहा, 'द्वौ मम' अर्थात् 'दो मेरे' (यहाँ 'द्वौ' पुंल्लिङ्ग है)। दूसरों ने कहा, 'अस्माकं
द्वे' अर्थात् 'दो हमारी' (यहाँ "द्वे' स्त्रीलिङ्ग है)। इस प्रकार उन्होंने जोड़े को प्राप्त किया
क्योंकि 'द्वौ' और 'द्वे' मिलकर जोड़ा होता है ॥८॥
इन्द्र ने कहा, 'त्रयो मम' अर्थात् 'मेरे तीन' (यहाँ 'त्रय' पुंल्लिङ्ग है)। औरों ने कहा,
'अस्माकं तिस्रः' अर्थात् 'हमारी तीन' (यहाँ 'तिस्रः' स्त्रीलिङ्ग है)। इस प्रकार उन्होंने जोड़े
को पा लिया क्योंकि 'त्रयः' और 'तिस्रः' मिलकर जोड़ा हो जाता है ॥६॥
इन्द्र ने कहा, 'चत्वारो मम' (मेरे चार)। औरों ने कहा, 'अस्माकं चतस्रः' (हमारी
चार)। इस प्रकार जोड़े को प्राप्त किया क्योंकि पुंल्लिङ्ग 'चत्वारः' और स्त्रीलिङ्ग 'चतस्रः'
मिलकर जोड़ा हो जाता है ॥१०॥
इन्द्र ने कहा, 'पंच मम' (पाँच मेरा)। अब औरों को जोड़ा न मिला। इससे आगे
जोड़ा होता ही नहीं। दोनों लिंगों में 'पंच' ही होता है। इस प्रकार सब असुर पराजित हो गये।
देवों ने असुरों का सब-कुछ ले लिया। उन शत्रुओं से सब-कुछ छीन लिया ॥११॥
इसलिए पहले प्रयाज में कहे, 'एको मम। एका तस्य यमहं द्वेष्मि।' (मेरा एक। एक
उसकी जिसको हम द्वेष करें), और यदि किसी को द्वेष न करे तो कहे, 'योऽस्मान् द्वेष्टि यं च
वयं द्विष्मः।' (जो हमारे साथ द्वेष करता है और जिसको हम द्वेष करते हैं) ॥१२॥
दूसरे प्रयाज में कहे, 'द्वौ मम। द्वे तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः।' (दो मेरे।
दो उसकी जो हमसे द्वेष करता है या जिसको हम द्वेष करते हैं) ॥१३॥
तीसरे प्रयाज में कहे, 'त्रयो मम। तिस्रस्तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः।' (तीन
मेरे। तीन उसकी जो हमको द्वेष करे और हम जिसके साथ द्वेष करते हैं) ॥१४॥
चौथे प्रयाज में कहे, 'चत्वारो मम। चतस्रस्तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः।'
(चार हमारे। चार उसकी जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं) ॥१५॥
पाँचवें प्रयाज में कहे, 'पंच मम' (पाँच मेरे)। उसके लिए कुछ नहीं जो हमसे द्वेष
करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। पाँच-पाँच करके शत्रु पराजित होता है। जो इस रहस्य
को समझता है उसको सब मिल जाता है। वह सब शत्रुओं को परास्त कर देता है ॥१६॥
अध्याय ६—ब्राह्मण १
ऋतुओं ने देवों से यज्ञ में भाग माँगा, 'हमको यज्ञ में भाग दो। हमको यज्ञ से न

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ता॒स्स्वेव नो॑ऽपि य॒ज्ञे भा॒ग इति॑ ॥ १॥ तद्ध॑ दे॒वा न ज॑ज्ञुः । तऋतवो दे॒वेष्व॑ता-
नत्सु॑सु॒रानुप॒ावर्त॑न्ताप्रियान्दे॒वान्यं द्विषतो भ्रातृ॑व्यान् ॥ २॥ ते॒ हैतामृ॑तु॒मेधां च-
क्रिरे । य॒न्निषा॑मेतामनुश‍ृण्वन्ति॒ कृष॑न्तो ह॒ स्मैव पूर्वे॑ व॒पन्तो॒ यन्ति॑ लु॒नन्तो॑ऽपरे॒
मृ॒णन्तः॑ शश्व॒द्धेभ्यो॑ऽकृष्टपच्या॒ एवौष॑धयः पेचिरे ॥ ३॥ तद्ध॑ दे॒वानामाग॑ आस ।
क॒नीय॒ इन्नु॑तो द्विषन्द्धि॒षते॒ऽरातीयति॒ किम्मे॒तावन्मात्रमुप॒ज्ञानीत॒ यथे॒दमितो॒ऽन्यथा॑-
स॒दिति॑ ॥ ४॥ ते॒ होचुः । ऋ॒तूनैवानुम॑न्त्रयामहा॒ऽइति॒ केनेति॑ प्रथ॒माने॑वैनान्य॒ज्ञे
य॒जामेति॑ ॥ ५॥ स॒ ह्वाग्नि॑रुवाच । अथ॒ यन्मां पु॒रा प्रथ॒मं य॒ज्ञस्य॒ ह्वातुं भ॑वानीति॑ न
त्वा॒माय॑तना॒च्चाव॑याम॒ इति॑ ते॒ यदृ॒तून॒भिक्लृ॒प्यमा॑ना अथा॒ग्निमाय॑तना॒न्नाच्या॑वय॒स्त-
स्माद॒ग्निरच्युतो॒ न ह॒ वाऽआ॑यतना॒च्च्यवते॒ यस्मि॒न्नाय॑तने॒ भव॑ति॒ य ए॒वमे॒तम॒ग्नि-
मच्युतं वे॒द ॥ ६॥ ते देवा अग्नि॑मब्रुवन् । परे॑ह्ये॒नांस्त्वमे॒वानुम॑न्त्रय॒स्वेति॒ स हे॒त्या-
ग्निरु॑वाच॒ऽर्तवो॒ऽवि॑दं वै वो दे॒वेषु य॒ज्ञे भा॒गमिति॑ क॒थं नो॑ऽविद॒ इति॑ प्रथ॒माने॑व
वो य॒ज्ञे य॑क्ष्यन्तीति॑ ॥ ७॥ तऋ॒तवो॒ऽग्निम॑ब्रुवन् । आ व॒यं त्वा॒मस्मासु॑ भजामो
यो नो दे॒वेषु य॒ज्ञे भा॒गमविद॒ इति॒ स ए॒षो॑ऽग्नि॒रृतु॒ष्वाभ॑क्तः स॒मिधो॑ऽअ॒ग्ने तनू॒न-
पाद॒ग्नऽइडो॑ऽअ॒ग्ने ब॒र्हिर॑ग्ने॒ स्वाहा॒ग्निमि॒त्याभ॑क्तो ह॒ वै तस्यां॑ पुण्यकृ॒त्यायां भवति
यामस्य॑ समा॒नो ब्रुवाणः॑ करो॒त्य॒ग्निम॑ते ह॒ वाऽअ॒स्माऽअ॒ग्निमन्त॑ ऋ॒तव॒ ओष॑धीः
पचन्तीदग्ँ सर्वं य ए॒वमे॒तम॒ग्निमृ॒तुष्वाभ॑क्तं वे॒द ॥ ८॥ तदा॒हुः । यदु॑त्त॒मान्प्र॒याजा॑ना-
त्रावृ॑त्त्य॒त्य कस्मा॑देनान्प्रथ॒मान्य॒जन्ती॒त्युत्त॑मान्ह्ये॒नान्य॒ज्ञेऽवा॑कल्पयन्प्रथ॒मान्वो य-
ज्ञामि॒त्यृ॒तूंस्तस्मा॑दुत्त॒मानावा॒वृत्त्य॑ प्रथ॒मान्य॑जन्ति ॥ ९॥ चतुर्थेन॒ वै प्र॒यजे॑न दे॒-
वाः । य॒ज्ञमा॑प्नुवंस्तं प॒ञ्चमेन॒ सम॑स्थापय॒न्नथ॒ यदूत॑ ऊ॒र्ध्वमस॑त्थ्सि॒तं य॒ज्ञस्य॒ स्वर्ग॒मिव
तेन लोकग्ँ समा॑श्नुवत ॥ १०॥ ते स्वर्गं लो॒कं य॒न्तः । असुरर॒क्षसेभ्य आस॑ङ्गाद्द्वि-
भयां चक्रुस्ते॒ऽग्निं पु॒रस्ता॑दकुर्वत रक्षोह॒णग्ँ वृत्त॒सांमपह॒न्तारम॒ग्निं म॑ध्य॒तोऽकु॑र्वत
रक्षोह॒णग्ँ वृत्त॒सामपह॒न्तारम॒ग्निं प॒श्चाद॑कुर्वत रक्षोह॒णग्ँ वृत्त॒सामपहन्तारग्ँ ॥ ११॥

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का० १, अ० ६, ब्रा० १, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / १०६
निकालो। हमारा भी यज्ञ में भाग हो' ॥१॥
देवों ने न माना। देवों के न मानने पर ऋतुएँ असुरों के पास चली गईं जो अप्रिय तथा
देवों के शत्रु और अहितकारी थे ॥२॥
उन (असुरों) ने ऐसी उन्नति की कि देवों ने भी सुना। जो असुर आगे-आगे जोतते-
बोते जाते थे, पीछे से उसी को दूसरे असुर काटते और इकट्ठा करते जाते थे। इनके लिए मानो
बिना जोते ही ओषधियाँ झट से पक जाती थीं (अर्थात् असुर ज्यों ही बोते थे त्यों ही बिना
समय बीते फसल पक जाती थी। आगे-आगे बोते थे, पीछे-पीछे काटते थे क्योंकि ऋतुएँ उनके
साथ थीं) ॥३॥
इससे देवों को चिन्ता हुई कि इस प्रकार शत्रु, शत्रु को हानि पहुँचावें यह तो छोटी बात
है। परन्तु इसकी हद बढ़ गई। अब कोई ऐसा उपाय होना चाहिए जिससे इस प्रकार की अवस्था
न रहे ॥४॥
उन्होंने कहा, 'पहले ऋतुओं को बुलावें।' कैसे ? 'पहले इनको यज्ञ में भाग दें' ॥५॥
अग्नि ने कहा, 'तुम पहले मुझको आहुति देते हो, अब मैं कहाँ जाऊँ?' उन्होंने कहा,
'हम तुमको तुम्हारे स्थान से नहीं हटायेंगे।' और क्योंकि ऋतुओं के बुलाने में अग्नि को उन्होंने
उसकी जगह से नहीं हटाया, इसलिए अग्नि अच्युत है। जो पुरुष समझता है कि अग्नि अच्युत है
वह अपने स्थान से च्युत नहीं होता ॥६॥
देवों ने अग्नि से कहा, 'जाओ और उन्हें यहाँ बुला लाओ।' अग्नि उनके पास गया
और बोला, 'हे ऋतुओ, मैंने तुम्हारे लिए यज्ञ में भाग प्राप्त कर लिया।' उन्होंने पूछा, 'तुमने
हमारा भाग हमारे लिए कैसे प्राप्त किया?' अग्नि ने उत्तर दिया, 'वे पहले तुम्हारे लिए आहुति
देंगे' ॥७॥
ऋतुओं ने अग्नि से कहा, 'हम तुमको अपने साथ यज्ञ में भाग देंगे, क्योंकि तुमने हमारे
लिए यज्ञ में देवों के साथ भाग दिलाया है' और क्योंकि अग्नि को ऋतुओं के साथ-साथ आहुति
मिली, इसलिए कहते हैं, 'समिधोऽअग्ने', 'तनूनपादग्ने', 'इडोऽअग्ने', 'बर्हिरग्ने', 'स्वाहाग्निम्'।
जो इस रहस्य को समझता है उसका उस पुण्य कार्य में भाग होता है जो वह पुरुष करता है, जो
अपने को उसके समान कहता है, क्योंकि वह अग्निमान् (अग्निवाला) है। अग्निमान् ऋतुएँ ही
ओषधियों तथा अन्य पदार्थों को पकाती हैं ॥८॥
इस पर कुछ लोग आक्षेप करते हैं कि जब ये पिछले प्रयाज हैं तो पहले ही आहुतियाँ क्यों
दी जाती हैं ? इसका उत्तर यह है कि इन प्रयाजों की कल्पना ही सबसे पीछे की थी, इसलिए ये
पिछले प्रयाज हैं, और क्योंकि कहा कि हम पहले आहुति देंगे इसलिए पहले प्रयाज-आहुतियाँ
दी गईं ॥९॥
देवों ने चौथे प्रयाज से यज्ञ को प्राप्त किया और पांचवें प्रयाज से उसकी स्थापना की।
उसके बाद जो कुछ असंस्थित (बिना स्थापित हुआ) बच रहा, उसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त
किया ॥१०॥
वे स्वर्गलोक को जाने लगे तो असुर और राक्षसों से डरे। उन्होंने अग्नि को अगुवा
बनाया, क्योंकि वह राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। उन्होंने अग्नि को मध्य में रक्खा
क्योंकि अग्नि राक्षसों का मारनेवाला और भगानेवाला है। उन्होंने अग्नि को पीछे रक्खा, क्योंकि
वह अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है ॥११॥

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११० शतपथ ब्राह्मण
स॒ यद्ये॑नान्पुर॒स्तात् । अ॒सुररक्ष॒सान्यासि॑संक्षन्नग्निरि॑व तान्य॒पाहन्ग् रक्षो॒हा रक्ष॑साम-
पह॒न्ता यदि॑ मध्यत॒ आ॑सि॒संक्षन्नग्निरि॑व॒ तान्य॒पाहन्ग् रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता यदि॑ प-
श्चादासि॑संक्षन्नग्निरि॑व॒ तान्य॒पाहन्ग् रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्तात् एव॒ग्॒ सर्व॑तोऽग्निभिर्गू-
र्ध्यमा॑नः स्व॒र्गं लो॒कं स॒माश्व॑वत ॥ १२॥ तयो॒ऽत्वै॑ष ए॒तत् । च॒तुर्थेनै॑व॒ प्रया॒-
जेन य॒ज्ञमाप्नो॑ति॒ तं प॑ञ्च॒मेन॒ संस्ता॒पयत्य॑थ॒ यद॑त ऊ॒र्ध्वमस॑ऽस्थितं य॒ज्ञस्य स्व॒र्गमे॒-
व ते॑न लो॒कं स॒मश्रु॑ते ॥ १३॥ स यद॒ग्नेयम॒ाज्यभा॒गं यज॑ति । अ॒ग्निमे॒वैतत्पुर॒स्ता-
त्कुरुते रक्षो॒हणं रक्ष॑सामपह॒न्तार॒मथ॒ यदा॑ग्ने॒यः पु॑रो॒डाशो भव॑त्य॒ग्निमे॒वैतन्मध्य॑तः
कुरुते रक्षो॒हणं रक्ष॑सामपह॒न्तार॒मथ॒ यद॒ग्निः॑ स्विष्ट॒कृत् यज॑त्य॒ग्निमे॒वैतत्पश्चात्कु-
रुते रक्षो॒हणं रक्ष॑सामपहन्ता॒रं ॥ १४॥ स यद्ये॑नं पु॒रस्ता॑त् । अ॒सुररक्ष॒सान्या-
सि॑संक्षन्त्य॒ग्निरि॑व॒ तान्यप॑हन्ति रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता यदि॑ मध्य॒त अ॒सुररक्ष॒सा-
न्यासि॑संक्षन्त्य॒ग्निरि॑व॒ तान्यप॑हन्ति रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता यदि॑ प॒श्चादसुररक्ष॒सा-
न्यासि॑संक्षन्त्य॒ग्निरि॑व॒ तान्यप॑हन्ति रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता स एव॒ग्॒ सर्व॑तोऽग्निभि-
र्गु॑प्यमा॑नः स्व॒र्गं लो॒कं स॒मश्रु॑ते ॥ १५॥ स यद्ये॑नं पु॒रस्ता॑त् । य॒ज्ञस्यानुव्याहुरे॑तं
प्रति॑ ब्रूयान्मुख्यामार्तिम॑रिष्य॒न्त्यो वा ब॑धि॒रो वा भ॑विष्यसीत्ये॒ता वै मु॑ख्या आ-
र्तयस्तथा॒ हैव स्यात् ॥ १६॥ यदि॑ मध्य॒तो य॒ज्ञस्यानुव्याहुरे॑त् । तं प्रति॑ ब्रूयात्प्र-
जा अ॑प॒शुर्भवि॑ष्यसी॑ति प्र॒जा वै प॒शवो॒ मध्यं॒ तथा॒ हैव॒ स्यात् ॥ १७॥ यद्यन्त॑तो
य॒ज्ञस्यानुव्याहुरे॑त् । तं प्रति॑ ब्रूयादप्रति॑ष्ठितो द॒रिद्रः क्षि॒प्रेऽमुं लो॒कमे॑ष्यसी॑ति त-
था॒ हैव स्यात्तस्मादङ्ग॒ नानु॑व्याहा॒रीव स्यादुत॒ ह्येवं॑वि॒त्परो भव॑ति ॥ १८॥ संव-
त्स॒रो ह वै प्र॑या॒जैर्जय॑मान्त्स॒न्तनो॑ति । स ह॒ त्वे॒वैनं॑ जय॑ति योऽस्य द्वारा॑णि वे॒द किग्
हि स तैर्गृ॒हैः कुर्या॒द्यानन्तरतो न व्यव॑विद्या॒द्यास्य ते भव॑न्ति तस्य वस॒न्त ए॒व
द्वार॒ग्॒ हेम॒न्तो द्वारं॒ तं वा॒ऽए॒तग्ं संवत्सर॒ग्॒ स्वर्गं॑ लो॒कं प्र॒पद्य॑ते सर्वं॒ वै संवत्स॒-
रः सर्वं वा॒ऽअक्षय्य॑मे॒तेन हास्याक्षय्य॒ग्ं सु॒कृतं भवत्यक्षय्यो॑ लो॒कः ॥ १९॥ तदा-

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कां० १, अ० ६, ब्रा० १, क० १२-१६ शतपथब्राह्मण / १११
यदि असुर और राक्षस सामने आक्रमण करते तो अग्नि उनको हटा देता, क्योंकि अग्नि
राक्षसों को मारने तथा भगानेवाला है। यदि बीच से आक्रमण करते तो अग्नि उनको हटा देता,
क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारने तथा भगानेवाला है। यदि पीछे से आक्रमण करते तो अग्नि
उनको हटा देता, क्योंकि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। इस प्रकार सब ओर से
अग्नियों से रक्षित होकर वे स्वर्ग में पहुँच गये ॥१२॥
इसी प्रकार यह (यजमान) भी चौथे प्रयाज से यज्ञ को प्राप्त करता है, पांचवें
यज्ञ को स्थापित करता है और जो यज्ञ से बच रहता है उससे स्वर्गलोक को प्राप्त करता
है ॥१३॥
वह जब आग्नेय आज्यभाग से यज्ञ करता है तो अग्नि को सामने रखता है, क्योंकि अग्नि
राक्षसों को मारने और भगानेवाला है। वह जब आग्नेय पुरोडाश से यज्ञ करता है तो अग्नि को
बीच में रखता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारने और भगानेवाला है। जब वह स्विष्टकृत् अग्नि
में यज्ञ करता है तो अग्नि को पीछे रखता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगाने-
वाला है ॥१४॥
असुर राक्षस जब आगे से आक्रमण करते हैं तो अग्नि उनको हटा देता है, क्योंकि अग्नि
राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। जब असुर राक्षस बीच से आक्रमण करते हैं तो
अग्नि उनको पीछे हटा देता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। जब
असुर राक्षस पीछे से आक्रमण करते हैं तो अग्नि उनको हटा देता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को
मारनेवाला और हटानेवाला है। इस प्रकार सब ओर से अग्नि द्वारा सुरक्षित होकर स्वर्गलोक
को प्राप्त होता है ॥१५॥
यदि कोई उसके साथ यज्ञ के पहले दुष्ट व्यवहार करे तो उसको उत्तर दें—'मुख
के रोग तुझे लग जायें । तू अन्धा या बहरा हो जायगा ।' यही मुख के रोग हैं। ऐसा ही हो
जाय ॥१६॥
यदि कोई उसके साथ यज्ञ के बीच दुष्ट व्यवहार करे तो उसको उत्तर दें—'तू प्रजाहीन
और पशुहीन हो जायगा।' क्योंकि प्रजा और पशु मध्य के हैं। ऐसा ही हो जायगा ॥१७॥
यदि कोई उससे यज्ञ के पीछे दुष्ट व्यवहार करे तो उससे कहना चाहिए—'तू-
प्रतिष्ठाहीन और दरिद्र शीघ्र ही दूसरे लोक को चला जायगा।' ऐसा ही होवे। इसलिए
किसी को दुष्ट व्यवहार नहीं करना चाहिए। जो इस रहस्य को जानता है वही लाभ में रहता
है ॥१८॥
प्रयाजों से संवत्सर को जीतता है। वही जीतता है जो उसके द्वारों को जानता है। वे
लोग घरों से क्या लाभ उठा सकते हैं जो भीतर घुसने के द्वारों को नहीं जानते ? जिस प्रकार यज्ञ
के द्वार प्रयाज हैं उसी प्रकार संवत्सर के द्वार वसन्त और हेमन्त हैं। इस संवत्सर में स्वर्गलोक
करके प्रविष्ट होता है, क्योंकि वस्तुतः संवत्सर 'सब' है। 'सब' अक्षय है। इस प्रकार उसको
अक्षय पुण्य और अक्षय लोक की प्राप्ति होती है ॥१९॥

अध्याय-६, ब्राह्मण-२

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११२ शतपथ ब्राह्मण
ङ्गः । किं दे॒वत्या॒न्या॒ज्यानी॑ति प्रा॒जाप॑त्यानीति ह ब्रूया॒दनिरु॑क्तो॒ वै प्र॒जाप॑ति॒रनि॑-
रु॒क्तान्या॒ज्यानि॒ तानि॒ हैता॒नि य॒जमान॑दे॒वत्या॒न्येव य॒जमानो॒ ह्ये॑व॒ स्वे य॒ज्ञे प्र॒जा-
प॑ति॒स्तेन॒ व्युक्ता ऋ॒त्विज॒स्तन्व॑ते॒ तं ज॑नयन्ति ॥ २०॥ सो ऽआ॒ज्यस्योपस्तीर्य॑ । द्विर्ह-
वि॒षोऽव॑दा॒याथोपरि॒ष्टादा॒ज्यस्या॒भिघा॑रयति॒ सैषाऽऽज्येन॑ मिश्रा॒हुति॑र्ह्रूयते यजमानेन
ह्ये॒वैषैतन्मिश्रा॒ हूयते॒ यदि॑ ह॒ वाऽअपि॑ दू॒रे स॒न्यज॑ते॒ यद्यन्ति॑के॒ यथा॒ हैवा॑न्ते॒ सत॑
इ॒ष्टꣳ स्या॒देवꣳ॒ है॒वैवं॒ वि॒दुष॒ इ॒ष्टं भ॑वति॒ यद्यु॒ ह्यापि॒ ब॒ह्विव॒ पापं॒ करो॑ति॒ नो
है॒व ब॒र्हिर्धा य॒ज्ञाद्भवति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ २१॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [६. १.] ॥ ॥ चतुर्थः
प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२१ ॥ ॥
य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॒तिं जिग्युर्यैषा॑मि॒यं जि॒तिस्ते होचुः क॒थं न इ॒दं मनु॑-
ष्यैरन॒भ्यारो॒ह्यꣳ स्या॒दिति॒ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतो॒ निर्ध॑येयु॒र्विदु॑-
ग्व्य य॒ज्ञं यूपेन॑ योपयि॒त्वा तिरो॒ऽभवंन्नथ॒ यदेने॒नायो॑पयं॒स्तस्मा॒द्यू॒पो नाम॒ तदृष॑-
षीणामनु॑श्रुतमास ॥ १॥ य॒ज्ञेन ह॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॒तिं जि॑ग्यु॒र्यैषा॑मि॒यं जि॒तिस्ते
होचुः क॒थं न इ॒दं मनु॑ष्यैरन॒भ्यारो॒ह्यꣳ स्या॒दिति॒ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा यथा॒ मधु॑
मधु॒कृतो॒ निर्ध॑येयु॒र्विदु॑ग्ध्य य॒ज्ञं यूपेन॑ योपयि॒त्वा तिरो॒ऽभवन्निति॒ तमन्वे॑ष्टुं दधिरे
॥ २॥ ते॒ऽर्च॑न्तः श्राम्य॑न्तश्चेरुः । श्रमे॑ण ह॒ स्म वै तद्दे॒वा जय॑न्ति॒ यदे॑षां जय्यमा॒सूर्ष॑-
यश्च॒ तेभ्यो॑ दे॒वा वैव॒ प्ररो॑चयां चक्रुः स्व॒यं वैव द॑धिरे॒ प्रेत॒ तदि॑ष्यामो॒ यतो॑ दे॒वाः
स्व॒र्गं लो॒कꣳ स॒माश्नु॑व॒तेति॒ ते किं प्ररो॑चते॒ किं प्ररो॑चत॒ऽइति॑ चेरु॒रेत्पुरोडाश॑मेव॒
कू॒र्मं भू॒त्वा सर्प॑न्तं ते॒ ह सर्व॑ऽएव॒ मेनि॑रि॒दं वै य॒ज्ञ इति॑ ॥ ३॥ ते होचुः । अ॒श्वि-
भ्यां तिष्ठ॒ सर॑स्वत्यै तिष्ठेन्द्रा॑य तिष्ठेति॒ स स॒र्पन्नेवाग्रे॑ तिष्ठेति तत॒स्तस्थावग्रे॑
वा॒ऽअस्यादिति॒ तमग्रा॑वे॒व परि॑गृह्य॒ सर्व॑ङ्गतमङ्गुरु॒राहु॑तिर्हि दे॒वानां तत एभ्यो
य॒ज्ञः प्रारो॑चत॒ तम॑सृजन्त॒ तम॑तन्वत॒ सोऽयं प॒रोऽव॑रं य॒ज्ञोऽनूच्य॑ते पि॒तैव पु॒त्राय॑
ब्रह्मचारि॑णे ॥४॥ स वा॒ऽए॒भ्यस्तत्पुरो॒डाशायत॒ । य ए॒भ्यो य॒ज्ञं प्रारो॑चयत्तस्मा-

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का० १, अ० ६, ब्रा० २, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / ११३
यदि कोई पूछे कि आज्य आहुतियां किस देव के लिए हैं तो उत्तर देना चाहिए—'प्रजा-
पति के लिए।' क्योंकि प्रजापति अनिरुक्त (अस्पष्ट) है और ये आहुतियां भी अनिरुक्त हैं।
यजमान ही उनका देवता है। अपने यज्ञ में यजमान ही प्रजापति है, क्योंकि इसी के कहने से
ऋत्विज लोग यज्ञ को फैलाते और उत्पन्न करते हैं ॥२०॥
हवि के ऊपर घी लगाकर उसमें से दो टुकड़े काटकर उन पर घी डालता है। इस प्रकार
घी से मिश्रित आहुति दी जाती है, मानो यजमान से ही मिश्रित आहुति दी जाती है। चाहे वह
दूर हो या निकट, यज्ञ इसी प्रकार किया जाता है मानो वह निकट ही है। यदि वह इस रहस्य को
समझता है, यदि वह इसको जानता है तो वह यज्ञ से कभी बाहर नहीं होता है चाहे कितना ही
पाप क्यों न करे ॥२१॥
अध्याय ६—ब्राह्मण २
यज्ञ से ही देवों ने यह (स्वर्गलोक) जीता। जब जीत चुके तो कहने लगे कि इसको
मनुष्य के न प्राप्त करने योग्य कैसे बनाया जाय ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे मधु-
मक्खी मधु को चूसती है। यज्ञ को दूह अर्थात् चूसकर, यूप से छिपाकर छिप गये। चूंकि उन्होंने
इसे यूप से छिपाया (आयोपयन्), अतः इसका 'यूप' नाम पड़ा। अब ऋषियों ने सुना—॥१॥
'यज्ञ से ही देवों ने (स्वर्गलोक) को जीता और जीतने पर उन्होंने कहा किस प्रकार हम
इसको मनुष्य से प्राप्त न करने योग्य बनावें ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे मधु-
मक्खी मधु को, और यज्ञ को दुहकर उसे छिपा दिया और आप छिप गये।' (ऋषि लोग) उसको
ढूंढ़ने लगे ॥२॥
उन्होंने पूजा और श्रम करना आरम्भ किया। श्रम से ही देवों ने जो कुछ जीतना चाहा
जीता, और ऋषियों ने भी। या तो इनको देवों ने आकर्षित किया या ये स्वयं ही चले। उन्होंने
कहा, 'आओ' उस स्थान को चलें जहाँ देवों ने स्वर्गलोक को प्राप्त किया था।' वे यह कहकर
फिरने लगे, 'यह क्या चमकता है ? यह क्या चमकता है?' पुरोडाश को कूर्म (कछुआ) के रूप
में रेंगते देखकर उन्होंने समझा कि यही यज्ञ है ॥३॥
उन्होंने कहा, 'अश्विनों के लिए ठहर ! सरस्वती के लिए ठहर ! इन्द्र के लिए ठहर !'
वह चलता ही गया। जब उन्होंने कहा, 'अग्नि के लिए ठहर' तो वह ठहर गया। यह समझकर
कि यह अग्नि के लिए ठहर गया, उन्होंने उसे अग्नि में लपेटकर सबकी आहुति दे दी। क्योंकि देवों
के लिए यह आहुति थी, उनको यज्ञ रोचक मालूम हुआ। उन्होंने यज्ञ को किया, उसको फैलाया।
यह यज्ञ परम्परा से कहा जाता है। पिता ब्रह्मचारी पुत्र के लिए उपदेश करता है ॥४॥
उन्होंने उनके लिए इसे 'पुरो' अर्थात् आगे 'अदाशयत्' अर्थात् रक्खा, जिसने इनके लिए

अध्याय-६, ब्राह्मण-३

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त्यु॑रोडाशः पुरो॒दाशो॑ ह॒ वै ना॑मैतद्यत्पुरो॒डाश॒ इति॒ स ए॒ष उ॑भय॒त्राच्यु॑त॒ आ॒ग्ने॒यो
ऽष्टाक॑पालः पुरो॒दाशो॑ भवति ॥ ५॥ स न पौर्णमा॒सँ ह॒विः । नामा॑वास्यम॒ग्नी-
षोमी॑य ए॒व पौर्णमा॒सँ ह॒विः सांना॒य्यमा॑मावा॒स्यं॑ य॒ज्ञ उ॒वैष उ॑भय॒त्रावकॢ॑प्तो ने-
द्य॒ज्ञाद्यानीति॒ न्वे॑व पुरस्ता॑त्पौर्णमा॒सस्य॑ क्रिय॒तऽए॒वमा॑मावा॒स्य॑स्यैतन्नु॒ तयो॒स्मा-
द॒त्र क्रि॑यते ॥ ६॥ य॒द्युऽएन॑मुप॒धावे॑त् । ऋ॒ध्या मा॒ याज॑ये॒त्येतै॑रे॒व याज॑ये॒द्यत्कामा
वाऽए॒तमृषयो॑ऽजुहुवुः स ए॒भ्यः काम॑ः सम॑र्ध्यत॒ यत्कामो ह॒ वाऽए॒तेन य॒ज्ञेन॒ य-
ज॑ते॒ सोऽस्मै॒ काम॑ः समृध्यते॒ यस्यै॒ वै कस्यै॑ च दे॒वता॑यै ह॒विर्गृ॑ह्यते॒ऽग्नौ वै तस्यै॑
जुह्व॒त्यग्ना॒ऽउ चेद्बो॑ष्य॒न्त्यात्किमन्यस्यै॑ दे॒वता॑या॒ऽआदिशे॒त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ ७॥ अ-
ग्निर्वै सर्वा॑ दे॒वता॑ः । अ॒ग्नौ हि सर्वा॑भ्यो दे॒वता॑भ्यो जु॒ह्वति॒ तद्यथा सर्वा॑ दे॒वता॑
उप॑धावे॒देवं तत्त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ ८॥ ॥ शतम् ५०० ॥ ॥ अ॒ग्निर्वै दे॒वाना॑मद्धा
तमा॑म् । यं वाऽअ॒द्धातमां म॒न्ये॑त॒ तमु॑पधावे॒त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ ९॥ अ॒ग्निर्वै दे॒वानां॑
मृदु॒हृद॑यतमः । यं वै मृदु॒हृद॑यतमं म॒न्ये॑त॒ तमु॑पधावे॒त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ १०॥ अ-
ग्निर्वै दे॒वानां॒ नेदि॑ष्ठम् । यं वै नेदि॑ष्ठमुपसर्त॒व्यानां॑ म॒न्ये॑त॒ तमु॑पधावे॒त्तस्माद॒ग्नय॑
ऽए॒व ॥ ११॥ स यदी॑ष्टिं कु॒र्वीत॑ । स॒प्तद॒श सामि॑धेनी॒रनु॑ब्रूया॒ऽपाङ्क्षु दे॒वतां॑ यज-
ति तद्दीक्षि॑त॒रूपं मूर्धन्व॑त्यौ याज्यानुवा॒क्ये॑ स्यातां वार्त्रघ्नावा॒ज्यभा॒गौ वि॒राज्ञी सं-
याज्ये॑ ॥ १२॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ १ [६. २.] ॥ ॥
त्वष्टु॒र्ह वै पुत्रः । त्रि॒शीर्षा ष॑ड॒क्ष आस॒ तस्य॒ त्रीण्ये॑व मु॒खान्या॑सु॒स्तद्य॒द्विश्व॑रूप
आ॑स॒ तस्मा॑द्वि॒श्वरू॑पो नाम ॥ १॥ तस्य॒ सोम॑पान॒मेवै॒कं मुख॑मास । सु॒रापा॒णमेक॑-
मन्य॒स्माऽअश॑नायै॒कं तमिन्द्रो॑ दिद्वेष॒ तस्य॒ तानि॒ शीर्षाणि॑ प्रचि॒च्छेद॑ ॥ २॥ स य-
त्सोम॑पानमास । ततः कपि॑ञ्जलः सम॑भव॒त्तस्मा॒त्स ब॒भ्रुक॑-इव ब॒भ्रुरि॑व॒ हि सो-
मो राजा॑ ॥ ३॥ अथ॒ यत्सु॒रापा॑णमास । ततः कल॑वि॒ङ्कः सम॑भव॒त्तस्मा॒त्सोऽभि॑मा-
द्यत्क॑-इव वद॒त्यभि॑माद्यन्निव॒ हि सुरां॑ पी॒त्वा व॑दति ॥ ४॥ अथ॒ यद॒न्यस्मा॒ऽअश॑

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का० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / ११५
यज्ञ को रोचक बनाया, इसलिए इसका नाम 'पुरोडाश' हुआ। पुरोडाश ही पुरोडाश है। अग्नि
के लिए आठ कपालों का पुरोडाश दोनों जगह (अर्थात् दर्श और पूर्णमास यज्ञ में) आवश्यक
है ॥५॥
यह हवि न पूर्णमासी की है न अमावस्या की। पूर्णमासी की हवि अग्नि-षोमीय है और
अमावस्या की सान्नाय्य। दोनों समय यह यज्ञ ही है। कहीं यह यज्ञ हवि-यज्ञ से अलग न रह
जाय, इसलिए यह पूर्णमासी को भी दी जाती है और अमावस्या को भी। यही कारण है कि यह
यहाँ दी जाती है ॥६॥
यदि कोई (गृहस्थी) (अध्वर्यु के पास) जावे और कहे कि मेरे लिए यज्ञ (इष्टि) करो,
तो उसे यज्ञ करना चाहिए। ऋषियों ने जब यज्ञ किया तो जो कुछ कामनायें कीं, वे सब पूरी
हुईं। इसी प्रकार यजमान इष्टि के करने में जो कुछ कामना करता है वह पूरी ही जाती है। जिस
किसी देवता के लिए हवि दी जाती है, उस-उसके लिए अग्नि में दी जाती है। यदि आहुति अग्नि
में दी जाती है तो दूसरे देवता के लिए क्यों घोषित की जाय ? इसलिए यह अग्नि के लिए ही
है ॥७॥
अग्नि ही सब देवता हैं। अग्नि में ही सब देवताओं के लिए आहुति दी जाती है। इसलिए
अग्नि के लिए घोषणा करे, इससे सब देवताओं तक जा सकता है ॥८॥ यहाँ ॥५००॥ समाप्त
हुए ॥
अग्नि ही सब देवताओं में अधिक फल देनेवाला है। जिसको सबसे अधिक फल देनेवाला
समझे उसी के पास जावे। इसलिए अग्नि के लिए (यह हवि है) ॥६॥
अग्नि देवताओं में सबसे मृदु हृदय अर्थात् नरम दिल वाला है। जिसको सबसे अधिक
नरम दिल वाला समझे उसी के पास जावे। इसलिए अग्नि के लिए (यह हवि है) ॥१०॥
अग्नि देवों में निकटतम हैं। जहाँ जाना हो, उनमें जिसको निकटतम समझे वहीं जावे।
इसलिए अग्नि के लिए (यह हवि है) ॥११॥
यदि वह कोई इष्टि करे तो १७ सामिधेनियों को बोले। वह इनको धीरे-धीरे बोले, यही
इष्टि का रूप है। याज्य और अनुवाक्य में 'मूर्धा' शब्द हो। दो आज्य भाग वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र
के लिए हों और विराज छन्द में ॥१२॥
अध्याय ६—ब्राह्मण ३
त्वष्टा के एक पुत्र था। उसके तीन सिर और छः आँखें थीं, तथा तीन मुख थे। उसका
ऐसा रूप था इसलिए उसका नाम विश्वरूप था ॥१॥
उसका एक मुँह सोम पीने के लिए था, एक सुरा पीने के लिए और एक अन्य प्रकार के
भोजन करने के लिए। इन्द्र उससे द्वेष करता था, इसलिए उसने उन सिरों को काट डाला ॥२॥
जो सोम पीने का मुँह था उसमें से चातक पक्षी उत्पन्न हुआ। इसलिए वह भूरा होता
है। सोम राजा भूरा है ॥३॥
और जो मद्य पीने का (मुँह) था उससे गौरय्या (कलविक पक्षी) उत्पन्न हुई, इसलिए
वह लड़खड़ाती आवाज में बोलती है। क्योंकि जो शराब पीता है उसकी आवाज लड़खड़ाने लगती
है ॥४॥
और जो अन्य खाना खानेवाला मुख था उससे तित्तिरी उत्पन्न हुई, इसलिए उसके शरीर

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११६ शतपथ ब्राह्मण
नाया॒स । त॒तस्तित्ति॒रिः सम॑भव॒त्तस्मा॒त्स वि॒द्युद्रूपतम॒ इव॒ सत्ये॒व घृ॒तस्तोका॒-इव
तन्मधु॑स्तोका॒-इव त्वत्प॑र्षिध्वाश्रुतिता ए॒वꣳ रूपꣳ हि स तेना॒शनमा॒वय॑त् ॥ ५ ॥ स
त्वष्टा॑ चुक्रोध । कु॒विन्मे॑ पु॒त्रमब॑धी॒दिति॒ सो॒ऽपेन्द्र॑मेव॒ सोम॒माज॑ह्रे स॒ यथाऽच्छ सो-
मः प्रसु॒त ए॒वम॑पेन्द्र ए॒वास॑ ॥ ६ ॥ इन्द्रो॑ ह वाऽईक्षां च॑क्रे । इ॒दं वै मा॒ सोमा-
दन्त॑र्यन्तीति स॒ यथा॒ बली॑यान॒बली॑यस ए॒वमनु॑पहूत ए॒व यो द्रो॑णकल॒शे शु॒क्र
आसी॒त्तं भ॒क्षयां च॑कार॒ स हैनं॑ जिहि॒ꣳस॒ सो॒ऽस्य विष्व॒ङ्गेव प्रा॒णेभ्यो॒ दुद्राव मु-
खाद्वै॒वास्य॒ न दु॒द्रावाथ॒ सर्वे॑भ्यो॒ऽन्येभ्यः॑ प्रा॒णेभ्यो॒ऽद्रवत्तद॒दः सौ॑त्रामणीतीष्टि॒स्त-
स्यां तद्व्या॒ख्याय॑ते॒ यथै॒नं दे॒वा अ॑भिषज्य॒न् ॥ ७ ॥ स त्वष्टा॑ चुक्रोध । कु॒विन्मे॒ऽनुप-
हूतः सो॒मम॑भक्षयदि॒ति स स्व॒यमे॒व य॒ज्ञविश॑सं चक्रे स यो द्रो॑णकल॒शे शु॒क्रः प-
रिशि॑ष्ट॒ आसी॒त्तं प्रव॑र्त्तयां च॒कारिन्द्रा॑शत्रुर्वर्ध॒स्वेति॒ सो॒ऽग्निमे॒व प्राप्य॒ सम्ब॑भूवाथै॒व
सम्ब॑भूवेत्यु॒ हैक॑ऽआहुः सो॒ऽग्नीषोमा॑वे॒वाभि॒सम्ब॑भूव॒ सर्वा॑ वि॒द्याः सर्वं॒ यशः॒ सर्व-
म॒न्नाद्यꣳ सर्वा॒ꣳ श्रीम् ॥ ८ ॥ स यद्वर्त॑मानः सम॑भवत् । तस्मा॒द्वृत्रोऽथ यदपात्स॒म-
भव॒त्तस्मा॒दहि॒स्तं दनु॑श्च दना॒यूश्च॑ मा॒तेव॑ च पि॒तेव॑ च परि॑जगृहतु॒स्तस्माद्दानव इ-
त्याहुः॑ ॥ ९ ॥ अथ॒ यदब्र॑वीदिन्द्र॑शत्रुर्वर्ध॒स्वेति॑ । तस्मा॒द्ध हैन॒मिन्द्र॑ ए॒व ज॑घानाथ॑
यद्ध॑ शश्वद॒वक्ष्य॒दिन्द्र॑स्य शत्रुर्वर्ध॒स्वेति॑ शश्वद्ध ह स ए॒वेन्द्र॑म॒हनि॑ष्यत् ॥ १० ॥ अथ॒
यद॑ब्रवीद॒र्धस्वेति॑ । तस्मा॒द्ध ह स्वेषु॒मात्र॑मेव॒ तिर्य॑ङ्र्धत॒ऽइषु॑मात्रं प्राङ्क्सो॒ऽवेवा-
वरं॑ समु॒द्रं द॑धाव॒व पूर्वाꣳ स याव॑त्स आ॒स सहै॑व ताव॒दन्ना॑द॒ आस॑ ॥ ११ ॥ तस्मै॑
ह स्म पूर्वा॒ह्णे दे॒वाः । अशनम॑भि॒हर॑न्ति मध्यान्दि॒ने मनु॑ष्या अपराह्णे पि॒तरः॑ ॥ १२ ॥
स वा॒ऽइन्द्र॒स्तथै॒व नु॒त्तश्च॑रन् । अ॒ग्नीषोमा॒ऽउप॑मन्त्रयां च॒क्रेऽग्नी॑षोमौ यु॒वं वै मम॑
स्थो यु॒वयोर॒हम॑स्मि॒ न यु॒वयोरिषं॒ किं चन॒ कं म॒ऽइमं॑ दस्युं॑ वर्धय

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कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० ५-१४ :शतपथब्राह्मण/ ११७
पर चितकबरे दाग होते हैं। कहीं घी के-से दाग, कहीं शहद के, से दाग, क्योंकि भिन्न-भिन्न रंग
की वस्तुयें थीं जो उसने खाईं ॥५॥
त्वष्टा को क्रोध हुआ। उसने कहा, 'क्या सचमुच मेरे पुत्र को मार डाला?' वह उस
उपेन्द्र सोम (वह सोम, जिसमें इन्द्र को भाग नहीं दिया गया) को ले आया। इस प्रकार यह
सोम निचोड़ा गया, तब वह इन्द्र के भाग से शून्य था ॥६॥
इन्द्र ने सोचा, 'यह मुझे सोम से निकालते हैं!' बस उसने बिना बुलाये ही कलश में जो
शुक्र अर्थात् शुद्ध सोम था पी लिया, जैसे बली पुरुष निर्बलों की चीज पी जाते हैं। उस (सोम)
ने उसको पीड़ा पहुंचाई। वह उसके सब प्राणों से होकर बहने लगा। केवल मुख से न बहा; सब
अन्य प्राणों से बहने लगा। इससे सौत्रामणि इष्टि हुई। उसी में यह बताया जाता है कि देवों ने
उसको किस प्रकार चंगा किया ॥७॥
त्वष्टा को क्रोध आया- 'क्या यह बिना बुलाये ही सोम पी गया?' उसने स्वयं ही यज्ञ
को बिगाड़ दिया। कलश में जो शुद्ध सोम बचा था उसको (अग्नि में) उँडेलकर कहा- 'इन्द्र-
शत्रुर्वर्द्धस्व'—"हे अग्नि तू 'इन्द्र है शत्रु जिसका' ऐसा होकर बढ़।" वह अग्नि में पहुँचते पहुँचते
(मनुष्य-रूप) हो गया। कुछ कहते हैं कि बीच में ही वह 'अग्निषोम' हो गया अर्थात् सब विद्या,
सब यश, सब अन्न और सब श्री ॥८॥
चूंकि यह वर्त्तमान (वृत् धातु का अर्थ बहना है) अर्थात् बहकर उत्पन्न हुआ, इसलिए
'वृत्र' हो गया। चूंकि बिना पैरों के उत्पन्न हुआ, इसलिए अहि (सर्प) हुआ। दनु और दनायु ने
माता-पिता के समान उसे लिया, इसलिए उसको 'दानव' कहते हैं ॥९॥
चूंकि उसने कहा, 'इन्द्र-शत्रु (बहुव्रीहि समास) बढ़ो' इसलिए इन्द्र ने उसको मार
डाला। यदि कहता, 'इन्द्र के शत्रु बढ़ो' तो अवश्य ही वह इन्द्र को मार डालता ॥१०॥
चूंकि उसने कहा, 'बढ़ो', इसलिए वह तीर के बराबर टेढ़ा और तीर के बराबर सामने
बढ़ा। उसने पश्चिमी और पूर्वी समुद्र को पीछे हटा दिया, और जितना वह बढ़ा उसी के अनुसार
उसने भोजन खाया ॥११॥
सबेरे उसको देव खाना देते हैं, दोपहर को मनुष्य और तीसरे पहर को पितर ॥१२॥
जब इन्द्र उसका पीछा कर रहा था तो उसने 'अग्नीषोम' को बुलाया और कहा, 'हे
अग्नि-सोम ! तुम दोनों मेरे हो, मैं तुम दोनों का हूँ। वह तो तुम्हारा कोई नहीं लगता। तुम
उस दस्यु को क्यों बढ़ाते हो? मेरे पास आओ' ॥१३॥
उन दोनों ने उत्तर दिया, 'हमको क्या मिलेगा?' उसने कहा कि ग्यारह कपालों का
पुरोडाश अग्नि-सोम को मिलेगा। इसलिए ग्यारह कपालों का पुरोडाश अग्नि-सोम का होता

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११८ शतपथ ब्राह्मण
वति॒ ॥ १४॥ तावे॒नमु॒पाव॑वृततु॒ः । ताव॒नु सर्वे॑ देवाः प्रेयु॒ः सर्वा॑ वि॒द्याः सर्वं॑ य-
शः सर्वमन्नाद्यꣳ सर्वा॒ श्रीस्तेने॒ष्टेन्द्र एतदभवद्यदिदमिन्द्र एष उ पौर्णमासस्य ब-
न्धुः स यो हैवं वि॒द्वाञ्पौर्णमासेन यजतऽ एताꣳ हैव श्रियं गहत्येवं यशो भव-
त्येवमन्नादो भवति ॥ १५॥ तद्धैव खलु हतो वृत्रः । स यथा दृतिर्निष्पीत एवꣳ
संलीनः शिश्ये यथा निर्धूतसक्तुर्भस्त्रैवꣳ संलीनः शिश्ये तमिन्द्रोऽभ्याद्रुद्राव हनि-
ष्यन् ॥ १६॥ स होवाच । मा नु मे प्रहार्षीस्त्वं वै तदेतर्ह्यसि यदहं व्येव मा
कुरु मामुया भूवमिति स वै मेऽन्नमेधीति तथेति तं द्वेधान्वभिनत्तस्य यत्सौम्यं
न्यक्तामास तं चन्द्रमसं चकाराथ यदस्यासुर्यमास तेनेमाः प्रजा उदरेणाविध्यत्तस्मा-
दाहुर्वृत्र एव तर्ह्यन्नाद आसीद्वृत्र एतर्हीतीदꣳ हि यदसावापूर्यतेऽस्माद्वैतच्छो-
कादाप्यायतेऽथ यदिमाः प्रजा अशनमिच्छन्तेऽस्माद्वैतद्वृत्रायोदराय बलिꣳ हरति
स यो हैवमेतं वृत्रमन्नादं वेदान्नादो हैव भवति ॥ १७॥ ता उ हैता देवता ऊचुः ।
या इमा अग्नीषोमावन्वाजग्मुरग्नीषोमौ युवं वै नो भूयिष्ठभाजौ स्थो ययोर्वामिदं
युवयोरस्मानन्वाभजतमिति ॥ १८॥ तौ होचतुः । किमावयोस्ततः स्यादिति यस्यै
कस्यै च देवतायै हविर्निर्वपांस्तद्वां पुरस्तादाज्यस्य यजानिति तस्माद्यस्यै कस्यै च
देवतायै हविर्निर्वपन्ति तत्पुरस्तादाज्यभागावग्नीषोमाभ्यां यजन्ति तन्न सौम्येऽध्वरे
न पशौ यस्यै कस्यै च देवतायै निर्वपानिति ह्यब्रुवन् ॥ १९॥ स ह्वाग्निरुवाच ।
मय्येव वः सर्वेभ्यो जुह्वतु तद्बोऽहं मय्याभजामीति तस्मादग्नौ सर्वेभ्यो देवेभ्यो
जुह्वति तस्मादाहुरग्निः सर्वा देवता इति ॥ २०॥ अथ ह सोम उवाच । मय्येव
वः सर्वेभ्यो जुह्वतु तद्बोऽहं मय्याभजामीति तस्मात्सोमꣳ सर्वेभ्यो देवेभ्यो जुह्वति
तस्मादाहुः सोमः सर्वा देवता इति ॥ २१॥ अथ यदिन्द्रे सर्वे देवास्तस्थानाः ।
तस्मादाहुरिन्द्रः सर्वा देवता इन्द्रश्रेष्ठा देवा इत्येतद्ध वै देवास्त्र्येकदे॒वत्या अभ-
वन्स यो हैवमेतद्द्वैकधा हैव स्वानाꣳ श्रेष्ठो भवति ॥ २२॥ द्वयं वाऽइदं न तृ-