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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 119

का० १, अ० ५, ब्रा० ३, कं० ६-१४ शतपथब्राह्मण / १०१
निकट जाकर आहुति देने को उद्यत हो ॥६॥
परन्तु उसको ऐसा न करना चाहिए। जहाँ खड़ा होकर प्रयाजों को बुलावे उस जगह से
हटे नहीं। जहाँ अधिक से अधिक अग्नि जलती प्रतीत हो वहीं आहुति दे, क्योंकि आहुतियाँ उसी
स्थान पर ठीक जलती हैं जहाँ अधिक आग जलती है ॥७॥
वह (अध्वर्यु) (अग्नीध्र को) बुलाकर (होता से) कहे—“समिधो यज”—“समिधा को
आग में डालो।” इस प्रकार वह वसन्त को प्रज्वलित करता है। प्रज्वलित हुआ वसन्त और
ऋतुओं को प्रज्वलित करता है। प्रज्वलित ऋतुएँ प्रजा को उत्पन्न करती हैं, ओषधियों को
पकाती हैं। इसी कथन से वह अन्य ऋतुओं को शामिल करता है। अन्य ऋतुओं के लिए वह
केवल इतना कहता है—‘यज’ (अर्थात् आहुति दो)। यदि वह कहे कि ‘तनूनपातं यज’ या
‘ईडो यज’ तो व्यर्थ का दुहराना होगा। इसलिए अन्य आहुतियों के लिए केवल ‘यज’ कह देता
है ॥८॥
अब वह समिधाओं से यजन करता है। वसन्त ही समिधा है। वसन्त को ही देवों ने
अपना लिया और वसन्त से ही शत्रुओं को वंचित कर दिया। अब यहाँ यजमान भी वसन्त को
अपनाता है और उससे अपने शत्रुओं को वंचित करता है। इसीलिए समिधा से यजन करता
है ॥६॥
अब वह ‘तनूनपातं’ का यज्ञ करता है। ग्रीष्म ही तनूनपात है। ग्रीष्म ही इन प्रजाओं
के शरीरों को तपाता है। देवों ने उस समय ग्रीष्म को अपनाया और ग्रीष्म से शत्रुओं को वंचित
कर दिया। अब यह यजमान भी ग्रीष्म को अपनाता है और ग्रीष्म से शत्रुओं को वंचित करता
है। इसलिए वह तनूनपात से यज्ञ करता है ॥१०॥
अब ईड का यज्ञ करता है। वर्षा ऋतु ईड है। ये जो छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े हैं और जो
ग्रीष्म और हेमन्त में क्षीण हो जाते हैं, वे मानो वर्षा की प्रशंसा करते हुए भोजन की तलाश में
फिरते हैं, इसलिए ‘वर्षा’ ‘ईड’ हुआ। उस समय देवों ने वर्षा को ही अपनाया और वर्षा से
शत्रुओं को वंचित कर दिया, इसी प्रकार यह यजमान भी वर्षा को ही अपनाता है और वर्षा से
ही शत्रुओं को वंचित करता है। इसलिए ‘ईड’ का यज्ञ करता है ॥११॥
अब बर्हि यज्ञ करता है। शरद् ऋतु ही बर्हि है। जो ओषधियाँ ग्रीष्म और हेमन्त में
क्षीण हो जाती हैं वे वर्षा के द्वारा बढ़ती हैं, और शरद् ऋतु में बर्हि के रूप में फैल जाती हैं, इस-
लिए शरद् ही बर्हि है। देवों ने शरद् को अपनाया और शत्रुओं को शरद् से वंचित कर दिया।
इसी प्रकार यह यजमान भी शरद् ऋतु को अपनाता है तो शत्रुओं को शरद् से वंचित करता
है। इसलिए बर्हि यज्ञ करता है ॥१२॥
अब ‘स्वाहा-स्वाहा’ कहकर यज्ञ करता है। ‘स्वाहा’-कार यज्ञ का अन्त है। ऋतुओं में
अन्तिम हेमन्त है, क्योंकि वसन्त से हेमन्त सबसे दूर है (अर्थात् हेमन्त वर्ष के अन्त में पड़ता
है और वसन्त आदि में, इसलिए अन्य ऋतुओं की अपेक्षा हेमन्त वसन्त से बहुत दूर हुआ)।
देवों ने अन्त (स्वाहा) से ही अन्त (हेमन्त) को अपनाया और अन्त की सहायता से ही अन्त से
शत्रुओं को वंचित किया। इसी प्रकार यह यजमान भी अन्त से ही अन्त को अपनाता है और
इसी अन्त (स्वाहा-यज्ञ) की सहायता से अन्त अर्थात् हेमन्त से अपने शत्रुओं को वंचित करता
है। इसलिए वह स्वाहा-यज्ञ करता है ॥१३॥
यह वसन्त ही हेमन्त के पश्चात् पुनर्जीवित होता है, क्योंकि एक के पश्चात् दूसरा पैदा