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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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कां० १, अ० ५, ब्रा० ४, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / १०५
हैं। जीत के पश्चात् वह यज्ञ की दृढ़ता से संस्थापना करता है, इसलिए यदि वह यज्ञ में 'विलोम'
अर्थात् उलटा क्रम कर दे तो अवहेलना न हो। क्योंकि वह जानता है कि मेरा यज्ञ दृढ़ता से
संस्थापित है। अब वषट्कार और स्वाहाकार से जो यज्ञ रह गया था वह हो जाता है ॥२३॥
अब देवों ने चाहा कि हम इस यज्ञ को कैसे प्राप्त करें और प्राप्त करके किस प्रकार करें,
किस प्रकार उसका पालन करें ॥२४॥
अब जुहू में जो कुछ घी बच रहा था जिससे कि यज्ञ की संस्थापना की थी, उसी से
पहले के समान हवियों को सींचता है। उसी से इनको प्राप्त करता है, उसी से उसको पूर्ण
करता है क्योंकि 'आज्य' (घी) पूर्ण होता है। इसलिए पिछले प्रयाज को करके पहले के समान
हवियों को सींचता है, फिर उनको पूर्ण करता है। आज्य (घी) ही पूर्णता है। इसलिए जिस
किसी की हवि को काटता है उसी को फिर सींचता है और स्विष्टकृत् आहुति के लिए पूर्ण करता
है। परन्तु जब स्विष्टकृति के लिए काटता है तो फिर नहीं सींचता, क्योंकि इसके पश्चात् कोई
आहुति अग्नि में नहीं दी जायगी ॥२५॥
अध्याय ५—ब्राह्मण ४
अब वह समिध-यजन करता है। प्राण ही समिधा है। इस प्रकार वह प्राणों को प्रज्वलित
करता है। यह पुरुष प्राणों द्वारा ही प्रज्वलित किया जाता है। इसलिए यदि (यजमान को) ज्वर
हो तो (अध्वर्यु) कहेगा 'अभिमृश' (छुओ)। यदि गरम हो तो सन्तुष्ट होगा क्योंकि वह प्रज्वलित
हो जाता है। यदि ठण्डा हो तो चिन्ता होती है। वह इस प्रकार प्राणों को उसमें रखता है।
इसीलिए समिध-यजन करता है ॥१॥
अब तनूनपात-यजन करता है। वीर्य (रेत) ही तनूनपात है। इस प्रकार रेत को सींचता
है, इसलिए तनूनपात यज्ञ करता है ॥२॥
अब ईड-यजन करता है। प्रजा ही ईड है। जब सींचा हुआ वीर्य प्रजा के रूप में उत्पन्न
होता है तब प्रशंसा करते हुए के समान अन्न की खोज में विचरता है। इस प्रकार वह यजमान से
मानो सन्तानोत्पत्ति कराता है। इसलिए वह ईड-यजन करता है ॥३॥
अब बर्हि-यजन करता है। बर्हि का अर्थ है बहुतायत। इस प्रकार वह बहुतायत
(आधिक्य) को उत्पन्न करता है। इसीलिए वह बर्हि-यजन करता है ॥४॥
अब स्वाहा-यजन करता है। ऋतुओं में हेमन्त स्वाहाकार (सबसे पिछली) है। हेमन्त
ही इन प्रजाओं को अपने वश में करता है। इसीलिए हेमन्त में ओषधियां सूख जाती हैं, वृक्षों के
पत्ते झड़ जाते हैं। चिड़ियां छिप जाती हैं, या नीचे उतर-सी आती हैं। पापी पुरुष के बाल झड़
जाते हैं। हेमन्त इन सब प्रजाओं को वश में कर लेता है। जो इस रहस्य को समझता है वह उस