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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 129 of 699

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Page 129

कां० १, अ० ६, ब्रा० १, क० १२-१६ शतपथब्राह्मण / १११
यदि असुर और राक्षस सामने आक्रमण करते तो अग्नि उनको हटा देता, क्योंकि अग्नि
राक्षसों को मारने तथा भगानेवाला है। यदि बीच से आक्रमण करते तो अग्नि उनको हटा देता,
क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारने तथा भगानेवाला है। यदि पीछे से आक्रमण करते तो अग्नि
उनको हटा देता, क्योंकि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। इस प्रकार सब ओर से
अग्नियों से रक्षित होकर वे स्वर्ग में पहुँच गये ॥१२॥
इसी प्रकार यह (यजमान) भी चौथे प्रयाज से यज्ञ को प्राप्त करता है, पांचवें
यज्ञ को स्थापित करता है और जो यज्ञ से बच रहता है उससे स्वर्गलोक को प्राप्त करता
है ॥१३॥
वह जब आग्नेय आज्यभाग से यज्ञ करता है तो अग्नि को सामने रखता है, क्योंकि अग्नि
राक्षसों को मारने और भगानेवाला है। वह जब आग्नेय पुरोडाश से यज्ञ करता है तो अग्नि को
बीच में रखता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारने और भगानेवाला है। जब वह स्विष्टकृत् अग्नि
में यज्ञ करता है तो अग्नि को पीछे रखता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगाने-
वाला है ॥१४॥
असुर राक्षस जब आगे से आक्रमण करते हैं तो अग्नि उनको हटा देता है, क्योंकि अग्नि
राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। जब असुर राक्षस बीच से आक्रमण करते हैं तो
अग्नि उनको पीछे हटा देता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। जब
असुर राक्षस पीछे से आक्रमण करते हैं तो अग्नि उनको हटा देता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को
मारनेवाला और हटानेवाला है। इस प्रकार सब ओर से अग्नि द्वारा सुरक्षित होकर स्वर्गलोक
को प्राप्त होता है ॥१५॥
यदि कोई उसके साथ यज्ञ के पहले दुष्ट व्यवहार करे तो उसको उत्तर दें—'मुख
के रोग तुझे लग जायें । तू अन्धा या बहरा हो जायगा ।' यही मुख के रोग हैं। ऐसा ही हो
जाय ॥१६॥
यदि कोई उसके साथ यज्ञ के बीच दुष्ट व्यवहार करे तो उसको उत्तर दें—'तू प्रजाहीन
और पशुहीन हो जायगा।' क्योंकि प्रजा और पशु मध्य के हैं। ऐसा ही हो जायगा ॥१७॥
यदि कोई उससे यज्ञ के पीछे दुष्ट व्यवहार करे तो उससे कहना चाहिए—'तू-
प्रतिष्ठाहीन और दरिद्र शीघ्र ही दूसरे लोक को चला जायगा।' ऐसा ही होवे। इसलिए
किसी को दुष्ट व्यवहार नहीं करना चाहिए। जो इस रहस्य को जानता है वही लाभ में रहता
है ॥१८॥
प्रयाजों से संवत्सर को जीतता है। वही जीतता है जो उसके द्वारों को जानता है। वे
लोग घरों से क्या लाभ उठा सकते हैं जो भीतर घुसने के द्वारों को नहीं जानते ? जिस प्रकार यज्ञ
के द्वार प्रयाज हैं उसी प्रकार संवत्सर के द्वार वसन्त और हेमन्त हैं। इस संवत्सर में स्वर्गलोक
करके प्रविष्ट होता है, क्योंकि वस्तुतः संवत्सर 'सब' है। 'सब' अक्षय है। इस प्रकार उसको
अक्षय पुण्य और अक्षय लोक की प्राप्ति होती है ॥१९॥