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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 131

का० १, अ० ६, ब्रा० २, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / ११३
यदि कोई पूछे कि आज्य आहुतियां किस देव के लिए हैं तो उत्तर देना चाहिए—'प्रजा-
पति के लिए।' क्योंकि प्रजापति अनिरुक्त (अस्पष्ट) है और ये आहुतियां भी अनिरुक्त हैं।
यजमान ही उनका देवता है। अपने यज्ञ में यजमान ही प्रजापति है, क्योंकि इसी के कहने से
ऋत्विज लोग यज्ञ को फैलाते और उत्पन्न करते हैं ॥२०॥
हवि के ऊपर घी लगाकर उसमें से दो टुकड़े काटकर उन पर घी डालता है। इस प्रकार
घी से मिश्रित आहुति दी जाती है, मानो यजमान से ही मिश्रित आहुति दी जाती है। चाहे वह
दूर हो या निकट, यज्ञ इसी प्रकार किया जाता है मानो वह निकट ही है। यदि वह इस रहस्य को
समझता है, यदि वह इसको जानता है तो वह यज्ञ से कभी बाहर नहीं होता है चाहे कितना ही
पाप क्यों न करे ॥२१॥
अध्याय ६—ब्राह्मण २
यज्ञ से ही देवों ने यह (स्वर्गलोक) जीता। जब जीत चुके तो कहने लगे कि इसको
मनुष्य के न प्राप्त करने योग्य कैसे बनाया जाय ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे मधु-
मक्खी मधु को चूसती है। यज्ञ को दूह अर्थात् चूसकर, यूप से छिपाकर छिप गये। चूंकि उन्होंने
इसे यूप से छिपाया (आयोपयन्), अतः इसका 'यूप' नाम पड़ा। अब ऋषियों ने सुना—॥१॥
'यज्ञ से ही देवों ने (स्वर्गलोक) को जीता और जीतने पर उन्होंने कहा किस प्रकार हम
इसको मनुष्य से प्राप्त न करने योग्य बनावें ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे मधु-
मक्खी मधु को, और यज्ञ को दुहकर उसे छिपा दिया और आप छिप गये।' (ऋषि लोग) उसको
ढूंढ़ने लगे ॥२॥
उन्होंने पूजा और श्रम करना आरम्भ किया। श्रम से ही देवों ने जो कुछ जीतना चाहा
जीता, और ऋषियों ने भी। या तो इनको देवों ने आकर्षित किया या ये स्वयं ही चले। उन्होंने
कहा, 'आओ' उस स्थान को चलें जहाँ देवों ने स्वर्गलोक को प्राप्त किया था।' वे यह कहकर
फिरने लगे, 'यह क्या चमकता है ? यह क्या चमकता है?' पुरोडाश को कूर्म (कछुआ) के रूप
में रेंगते देखकर उन्होंने समझा कि यही यज्ञ है ॥३॥
उन्होंने कहा, 'अश्विनों के लिए ठहर ! सरस्वती के लिए ठहर ! इन्द्र के लिए ठहर !'
वह चलता ही गया। जब उन्होंने कहा, 'अग्नि के लिए ठहर' तो वह ठहर गया। यह समझकर
कि यह अग्नि के लिए ठहर गया, उन्होंने उसे अग्नि में लपेटकर सबकी आहुति दे दी। क्योंकि देवों
के लिए यह आहुति थी, उनको यज्ञ रोचक मालूम हुआ। उन्होंने यज्ञ को किया, उसको फैलाया।
यह यज्ञ परम्परा से कहा जाता है। पिता ब्रह्मचारी पुत्र के लिए उपदेश करता है ॥४॥
उन्होंने उनके लिए इसे 'पुरो' अर्थात् आगे 'अदाशयत्' अर्थात् रक्खा, जिसने इनके लिए