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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages
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सौंदर्य लहरी १४२
अर्थः—उसके मध्य अग्नि की शिखा, पतली ऊपर को
उठी हुई खड़ी है। जो नीले मेघों में विद्युत् रेखा के सदृश
चमकती है, वह नीवारशूक के सदृश पतली, पीत वर्णा,
अणु के सदृश चमकती है। उसकी शिखा के मध्य में
परमात्मा विराजता है, वह ही ब्रह्मा, शिव, हरि, इन्द्र और
परम स्वराट् अक्षर ब्रह्म है।
इसी को सदाख्य कला समझना चाहिये। सदाख्य तत्व की
१६ कलायें नीचे दी जाती हैं। निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति,
इन्धिका, दीपिका, रेचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता,
ज्ञाना, ज्ञानामृता, आप्यायिनी, व्यापिनी और व्योमरूपा।
सब कलाओं का योग ८८ होता है, इनमें मूलाधारस्थ पृथिवी
की ४, जल की छः और आज्ञाचक्र की ईडा, पिंगला अथवा
सहस्रार की ओर बहनेवाली वरणा और असी दो कलायें मिलाने से
सब की संख्या पूरी १०० होती है। ये सब भगवती कुण्डलिनी
देवी की ही कलायें हैं। मूलाधार से उठकर सारे कुलपथ में उक्त
कलाओं के विविध रूपों में प्रकाशित होती हुई, कुण्डलिनी शक्ति
सहस्रार में अपने पति शिवजी से मिलने जब जाती है तब मानों
अनेक शृंगारों को धारण करती है।
मूलाधार से नीचे विषु संज्ञक और अधः सहस्रार दो चक्र और
भी माने जाते हैं और आज्ञा के ऊपर बिन्दु
आज्ञा के ऊपर अर्धेन्दु अथवा अर्धचन्द्रिका, निरोधिका, नाद,
९ स्तर महानाद अथवा नादान्त, शक्ति, व्यापिका,

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१५० सौन्दर्य लहरी
समनी और उन्मनी ९ स्तर हैं। इनमें प्रथम चार स्तरों की
पांच २ कलायें ५ महाभूतों के अनुसार हैं। नादान्त में वाच्य
वाचक का भेद लीन हो जाता है। नाद को वाचक अर्थात्
शब्दात्मक समझना चाहिये, उसके ५ स्तर ५ तत्वों के योग से
उत्पन्न होने वाले शब्द कहे जा सकते हैं। नीचे के ३ स्तर रूपात्मक
हैं, निरोधिका में रूप का निरोध हो जाता है। शक्ति स्तर पर
तीव्र आनन्द लहरी का अनुभव होता है, व्यापिका पर शून्य स्थान
है, इसका वेध दिव्यकरण की विशेष क्रिया द्वारा होता है। समनी
में सास्मिता समाधि होती है, और उन्मनी में उन्मनी अवस्था।
इन स्तरों को पातञ्जल योग दर्शन के अनुसार निरोधिका पर
निर्वितर्क, नादान्त पर निर्विचार, व्यापिका पर सानन्द, और समनी
पर सास्मिता संप्रज्ञात समाधियों का स्तर समझा जा सकता है।
सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्र मण्डलात्
मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्तै चिदात्मने। यो. शि. (६,३)
सुषुम्ना शांभवी शक्तिः शेषास्त्वन्ये निरर्थकाः ।
*हृल्लेखे परमानन्दे तालुमूले व्यवस्थिते ॥ (६, १९)
अत उर्ध्वं *निरोधेतु मध्यमं मध्यमध्यमं ।
उच्चारयेत्पराशक्तिं ब्रह्मरंध्र निवासिनीम् ॥ (६, १९)
गमागमस्थं गगनादि शून्यं
चिद्रूपदीपं तिमिरन्धनाशम् ।
*नोट:—हृल्लेखा और निरोधिका स्त्रीवाचक पद हैं, परन्तु यहां
पुरुष वाचक प्रयुक्त किये गये हैं ये छान्दस प्रयोग हैं।

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सौन्दर्य लहरी १५१
पश्यामि तं सर्व जनान्तरस्थं
नमामि हंसं परमात्मरूपम् ॥ ( ६, २० )
अनाहतस्य शब्दस्य तस्य शब्दस्य यो ध्वनिः ।
ध्वनेरन्तर्गतं ज्योतिर्ज्योतिषोऽन्तर्गतं मनः ॥ ( ६, २१ )
तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ।
तस्मात्सर्व प्रयत्नेन गुरुपादं समाश्रयेत् ॥ ( ६, २२ )
आधार शक्ति निद्रायां विश्वं भवति निद्रया ।
तस्यां शक्ति प्रबोधेतु त्रैलोक्यं प्रतिबुध्यते ॥ ( ६, २३ )
ब्रह्मरंध्रे महास्थाने वर्तते सततं शिवा ।
चिच्छक्तिः परमा देवी मध्यमे सुप्रतिष्ठिता ॥ ( ६,४७ )
माया शक्ति र्ललाटाग्रभागे व्योमाम्बुजे तथा ।
नादरूपा पराशक्तिर्ललाटस्यतु मध्यमे ॥ ( ६, ४८ )
भागे बिन्दुमयी शक्तिर्ललाटस्या परांशके ।
बिन्दु मध्ये च जीवात्मा सूक्ष्मरूपेण वर्तते ॥ ( ६, ४९ )
हृदये स्थूल रूपेण मध्यमेन त मध्यमे ।
अर्थः— सुषुम्ना, कुण्डलिनी, चन्द्र मण्डल से टपकने वाली
सुधा और मनोन्मनी के रूपों में प्रकट होने वाली चिदात्मिका
महाशक्ति को नमस्कार है । सुषुम्ना शांभवी शक्ति है, और शेष अन्य
सब नाडियां निरर्थका हैं । तालु मूल अर्थात् ६टे लंबिका स्थान पर
परमानन्द स्वरूपिणी हृल्लेखा (ह्रीं) शक्ति व्यवस्थित है । वहां पर

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१५२ सौन्दर्य लहरी
ब्रह्मरंध्र में निवास करने वाली पराशक्ति का उच्चारण करना चाहिये ।
फिर उसके ऊपर निरोधिका के ( १० वें स्थान ) के मध्य होते
हुए मध्य २, जहां गमनागमन की स्थिरता है, गमनादि से शून्य
है और तिमिरांध का नाश करने वाला चिद्रूप दीपक का स्थान है,
जाना चाहिये । सब मनुष्यों के अन्तर में विराजने वाले उस परमात्म-
रूप हंस कला को नमस्कार है । अनाहत् ( ४ थे ) चक्र से उदय होने
वाले शब्द, और उस शब्द में जो ध्वनि ( ११ वें और १२ वें स्तर
पर ), उस ध्वनि के अन्तर्गत जो ज्योति ( १३ वां स्तर ) है, उस
ज्योति में मन लगाकर जहां मन का लय हो जाता है वहां ( १४ वें )
से सहस्रार तक का स्तर विष्णु का परम पद है । उसके लिये पूर्ण
प्रयत्न के साथ श्री गुरु की शरण में जाना चाहिये । ( क्योंकि
१४ वें स्तर का बेध बिना दिव्य करण के नहीं होता ।) कहा
है कि मूलाधार शक्ति के सोते रहने पर सारा विश्व मोह निद्रा में
सोता रहता है, और उस शक्ति के प्रबुद्ध होने पर त्रिलोकी की
शक्तियां जाग उठती हैं। ब्रह्मरंध्र रूपी महास्थान ( सहस्रार ) में
शिवा शक्ति सदा रहती है, वहां ही परमा चिति शक्ति देवी मध्य में
सुप्रतिष्ठित है, विशुद्ध ( ५ वें ) व्योम चक्र में और ललाट के अग्र
भाग में माया शक्ति है । नाद रूपा परा शक्ति ललाट के मध्य
भाग ( ११ ) में है और विन्दुमयी शक्ति ( ८ वें स्तर पर ) ललाट
के अपरांश भाग में है। बिन्दु में जीवात्मा सूक्ष्म रूप से रहता है,
हृदय में स्थूल रूप से रहता है और दोनों के मध्य में मध्य
रूप से रहता है ।

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सौंदर्य लहरी १५३
पूर्वोक्त अनुभव प्राप्त योगी को महा वाक्यों के ज्ञान का उदय
'अहं ब्रह्मास्मि' होता है, इसलिये अगले श्लोक में 'भवानि त्वं'
ज्ञान का उदय पद से ज्ञान की भूमिका का उल्लेख किया
गया है ।
[ २२ ]
भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा
मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।
तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥
कठिन शब्दः—भवानि=हे भवानि; और मैं हो जाऊं । नीरा-
जित पदां=जिस पद की आरती उतारी जाती है ।
अर्थः—'हे भवानि ! तू मुझ इस दास पर भी अपनी
करुणामयी दृष्टि डाल, इस प्रकार कोई मुमुक्षु स्तुति करते समय
भवानि त्वं' (मैं तू हो जाऊं) इस पद का ही उच्चारण कर
पाता है, उस ही समय तू उसे निज सायुज्य पद प्रदान कर
देती है, जिस पद की ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र भी अपने मुकुटों
के प्रकाश से आरती उतारा करते हैं । अर्थात् (प्रणाम करते
रहते हैं) ।
सं० टि०:—भाष्यकार डिंडिम का मत है कि बाह्याभ्यन्तर
यागों का वर्णन करके शंकर भगवत्पाद इस श्लोक में प्रेमरूपा भक्ति

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१५४ सौंदर्य लहरी
की उत्कृष्टता दिखाते हैं, जिससे सायुज्यमोक्ष की प्राप्ति अविलंब
भगवती के अनुग्रह मात्र से प्राप्त हो जाती है ।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्वतोज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥
गीता० (१८, ५५)
व्याख्याः- भाव यह है कि जो ईश्वरी सकाम अनुष्ठान
करने वालों को उनके सुकृतों का फल देती है, वह मुमुक्षुओं को
ज्ञान का फलस्वरूपे सायुज्य पदवी भी देती है।
'प्रज्ञानंब्रह्म', 'अहम्ब्रह्मास्मि', 'तत्वमसि' और 'अयमात्माब्रह्म'
ऋक् यजुर् साम और अर्थबेदों के क्रमशः चार महावाक्य जीव-
ब्रह्मैक्य का लक्ष्य कराते हैं। गुरु शिष्य को पहिले प्रज्ञानात्मा का
स्वरूप दिखाता है और फिर उपदेश करता है कि यह आत्मा ब्रह्म
है और वह तू है। फिर शिष्य 'मैं ब्रह्म हूं' का अपरोक्ष अनुभव
करके उस पद में अपनी स्थिति रखता है। जिसको निदिध्यासन
कहते है। उपदेश के श्रवण के पश्चात् युक्तियों द्वारा समझने को
मनन कहते हैं, और तत्पश्चात् नित्य आत्मस्थिति में रहने कों
निदिध्यासन कहते हैं।
इंद्रियों द्वारा विषयों के जानने को आज्ञान कहते हैं, भिन्न-
भिन्न पदार्थों के ज्ञान को नामरूपात्मक भेद से पहचानने को संज्ञान
कहते हैं और ध्यान पूर्वक समझ कर प्राप्त किये जाने वाले विशेष-
ज्ञान को विज्ञान कहते हैं। परन्तु ये सब ज्ञान जिस एक निरपेक्ष

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ज्ञान के सापेक्षिक भेद है उसको प्रज्ञान कहते हैं। वह सबका आधार
स्वरूप प्रज्ञानात्मा ही ब्रह्म है। ब्रह्मात्मैक्य की उपलब्धि श्रवण मनन
निदिध्यासन के द्वारा कालान्तर में होती है। परन्तु शंकर भगवत्पाद
इस श्लोक में कहते हैं कि जाने बिना जाने भगवती की स्तुति करते
समय जो कोई इस श्लोक की प्रथम पंक्ति के 'भवानि त्वं' इतने मात्र
पद का उच्चारण कर पाता है, तो भगवती उसे सायुज्य मोक्ष दे देती
है। क्योंकि 'भवानि त्वं' पद का यह भी अर्थ होता है
कि मैं तू बन जाऊं। क्योंकि भगवती यह मान क्र कि यह मेरा
भक्त मुझ में लीन होकर मेरे सायुज्य पद की प्राप्ति के लिये प्रार्थना
करता है, ऐसा समझा जाने से 'दासे मयि इत्यादि' उच्चारण होने के
पूर्व ही वह सायुज्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
समाधि में समनीस्तर पर पहुंच कर योगी जो इच्छा करता है
उसकी वह कामना पूर्ण हो जाती है, इसलिये अहंब्रह्मास्मि का ध्यान
करने वाला ज्ञानी भी उस स्तर पर ब्रह्मात्मैक्य की अपरोक्षानुभूति
प्राप्त कर सकता है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं।
सायुज्य मोक्ष अन्य सालोक, सामीप्य और सारूप्य मोक्षों से
ऊंची है अर्थात् सगुण ब्रह्म के लोकों से ब्रह्मभाव ऊंचा है और
इंद्रलोक, ब्रह्मलोक, एवं विष्णुलोक उस पद के नीचे ही रह जाते
हैं। जैसा कि भगवान कहते हैं
तमेवचाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्ति प्रसृता पुराणी।
और (गीता १५, ४)
ततोमांतत्वतोज्ञात्वा विशते तदनंतरम् ॥
(१८, ५५)

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१५६ सौंदर्य लहरी
अर्थात् मानो ब्रह्मा विष्णु और स्वर्ग पति इन्द्र के मुकुटों की
ज्योतियां उस परम पद के नीचे आरती उतारने के सदृश निम्न-
स्तरों पर ही चमका करती हैं ।
अर्धनारीश्वर सदाख्य तत्त्व का ध्यान ।
अगले श्लोक में सदाशिव का ध्यान दिया गया है ।
( २३ )
त्वया हृत्वा वामं वपुरपरितृप्तेन मनसा
शरीरार्द्धं शंभोरपरमपि शङ्के हृतमभूत् ।
यदेतत्त्वद्रूपं सकलमरुणाभं त्रिनयनं
कुचाभ्यामानम्रं कुटिलशशिचूडालमकुटम् ॥
अर्थ:—हे भगवति ! शंभु का वांयां शरीर हरण करके
भी तेरा मन तृप्त नहीं हुआ, मुझे शंका होती है कि दूसरे
आधे शरीर का भी अपहरण कर लिया गया है । क्योंकि वह
सारा शरीर अरुणवर्ण की आभा से तेरा ही दिख पडता है,
उसमें तीन नेत्र हैं, वह कुचों के भार से कुछ झुका हुआ है
और द्वितीया का चन्द्र केशों के ऊपर मुकुट पर शोभा दे रहा है ।
सं० टि०:—यहां अर्धनारीश्वर का ध्यान दिखाया गया है, जिसमें
शक्ति तत्त्व की इतनी प्रधानता है कि शिवतत्त्व को जानना कठिन
होगया है । वास्तव में शक्ति तत्त्व शिव तत्त्व से भिन्न नहीं हैं ।

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सौंदर्य लहरी १५७
अर्धनारीश्वर रूपमें आधा शरीर शंकर का है और आधा
भगवती का, यह बात हम सदाख्यतत्व को समझाते समय बता आये
हैं। शंकर का शरीर स्फटिक सदृश स्वच्छ है, जो भगवती का
शरीर अरुण होने के कारण, उसकी अरुण आभा से अरुण दिखने
लगा है। और भगवती के स्तन के भार से वाम भाग के किंचित्
झुक जाने से शंकर का दक्षिण भाग भी झुक गया है; तीन नेत्र
और चन्द्र युक्त दोनों के रूप होने से यह पहचानना कठिन है,
कि दक्षिण भाग शंकर का है अथवा सारा शरीर भगवती का ही है।
सदाख्य तत्व प्रभवोन्मुख होने के कारण पूर्ण शक्ति युक्त होता है,
इसलिये अहम् विमर्ष के अध्यात्म भाव को शक्ति ने मानों
दबा रखा है।
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ।
[ २४ ]
जगत्सूते धाता हरिरवति रुद्रःक्षपयते
तिरस्कुर्वन्नेतत्स्वमपि वपुरीशः(स्थगयति) (स्तिरयति)
सदा पूर्वः सर्वं तदिदमनुगृह्णाति च शिव-
स्तवाज्ञामालम्ब्य क्षणचलितयोर्भ्रूलतिकयोः ॥
अर्थः—ब्रम्हा जगत् की रचना करते हैं, हरि पालन और
रुद्र संहार करते हैं। ईश्वर सबका तिरस्कार करके अपने स्थिर
रखते हैं। और शिव जिसके नाम के पूर्व सदा लगा हुआ है

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१५८ सौंदर्य लहरी
अर्थात् सदाशिव इस सबको लील जाते है अथवा तेरे क्षणचपल
भ्रूलताओं की आज्ञा का आलंब लेकर सब पर अनुग्रह करते
रहते हैं ।
सं० टि०:— अनुगृह्णाति का अर्थ 'अपने में लीन कर लेता
है' भी किया जा सकता है । तब श्लोक का अर्थ इस प्रकार होगा ।
तेरी आज्ञा को पाकर भ्रूलताओं के इशारे मात्र से ब्रह्मा सृष्टि करता
है, हरि पालन करता है, रुद्र संहार करता है, ईश्वर तीनों का तिरस्कार
पूर्वक तटस्थ रहता है और सदाशिव सबको अपने में ( प्रलय के
समय ) लीन कर लेता है।
ब्रह्मा जिस सृष्टि की रचना करते हैं और विष्णु पालन करते
हैं, उसका प्रलय के समय रुद्र संहार कर देते हैं। अर्थात् ब्रह्मा और
विष्णु के साथ रुद्र भी लयाभिमुख होकर महेश्वर तत्व में लीन हो
जाते हैं, और महेश्वर भी मानो तिरस्कार पूर्वक अपने नेत्र बंद कर
लेते हैं अर्थात् वे भी बीज रूप सदाशिव में लीन हो जाते हैं। परंतु
विश्व का प्रलय हो जाने पर भी प्रभव की बीज शक्ति सदाशिव में
बनी रहती है, जिसके कारण प्रलय काल के समाप्त होने पर सदाशिव
फिर नई सृष्टि का प्रभव करते हैं, मानों वे भगवती की आज्ञा के
अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश्वर सब पर अनुग्रह करके फिर
पूर्व कल्प के अनुसार सबको नया जीवन प्रदान करते हैं। अर्थात्
भगवती सबकी अधिष्ठात्री है क्योंकि प्रभव और प्रलय दोनों शक्ति
के ही कार्य हैं। और ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश्वर तो भगवती
के कर्मचारी मात्र हैं, इसलिये अगले श्लोक में कहा गया है कि

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सौंदर्य लहरी १५९
इनकी पृथक पूजा करने की आवश्यकता नहीं है, भगवती के पूजन
से सबकी पूजा हो जाती है। ब्रह्मा रजोगुण, विष्णु सत्वगुण और
रुद्र तमोगुण के अधिदेव हैं और तीनों गुण प्रकृति के अंग
हैं, अर्थात् माया की अपेक्षा से तीनों देवताओं का अस्तित्व है,
निर्गुण ब्रह्म मायातीत है। ईश्वर तत्व भी माया शक्ति के अधीन है।
परन्तु सदाशिव, जो यद्यपि माया का स्वामी है, परन्तु शक्ति का
प्रभुत्व इतना है कि विवश होकर सृष्टि करने को बाध्य होता है।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
(गीता० ९-८)
उसलिये
[ २५ ]
त्रयाणां देवानां त्रिगुण जनितानां तव शिवे
भवेत्पूजा पूजा तव चरणयोर्या विरचिता, ।
तथा हि त्वत्पादोद्वहनमणिपीठस्य निकटे
स्थिताह्येते शश्वन्मुकुलित करोत्तंस मकुटाः ॥
अर्थ:— हे शिवे ! तेरे चरणों की जो पूजा की जाती
है, उससे तेरे तीनों गुणों से उत्पन्न इन तीनों देवों का भी
पूजन हो जाता है। इसलिये यह उचित ही है कि ये तीनों
देव तेरे चरणों को धारण करने वाले मणियों के बने आसन

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१६० सौन्दर्य लहरी
के निकट अपने मुकुटों की शोभा बढाने के लिये हाथ जोडे
खडे रहते हैं ।
सं० टि० भगवती के पूजन से सब देवों का पूजन हो जाता है ।
[ २६ ]
विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिं
विनाशं कीनाशो भजति धनदोयाति निधनम् ।
वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलति दृशा
महासंहारेऽस्मिन्विहरति सतिस्त्वत्पतिरसौ ॥
कठिन शब्दः-- कीनाश=यमराज, दृशां=दृष्टि, पंचत्व=मरण
( जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया से ५ वीं अवस्था ।
अर्थः-- हे सति ! इस महा प्रलय के समय ब्रह्मा
पांचवी अवस्था को प्राप्त हो जाता है, अर्थात् मर जाता है ।
हरि विरति को प्राप्त होते हैं । कीनाश ( यमराज ) का नाश
हो जाता है । धनद ( कुवेर ) का निधन ( मरण ) हो जाता
है, जिसको कभी तन्द्रा नहीं आती वह हजार नेत्र वाला महेन्द्र
भी अपनी फैली हुई दृष्टि वाला नेत्र बन्द कर लेता है । परन्तु
सदाशिव तेरा पति तो तब भी विहार ही करता रहता है ।
सं० टि० महा प्रलय में सब देवों का लय हो जाता है, केवल
परंब्रह्म रहता हैं, और शक्ति भी उसमें अव्यक्त दशा में बनी रहती है ।

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सौंदर्य लहरी १६१
सतियों के सतीत्व की इतनी महानता है कि उनका सौभाग्य
सदा अखंड रहता है । इसलिये हे सति ! तेरा पति महा प्रलय में
भी रहता है, जब कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, महेश, इन्द्र, कुबेर और
मृत्यु की भी मृत्यु हो जाती है । यह भगवति के सतीत्व का ही प्रभाव
है कि सदाशिव तब भी बने रहते हैं । क्योंकि सदाख्य तत्व में विश्व
का बीज रहता है और बीज कभी नष्ट नहीं होता । यदि विश्व का
बीज नष्ट हो जाय तो प्रलय के पश्चात् फिर सृष्टि कैसे हो सकती
है ? वेद कहते हैं ।
यथा धाता पूर्वमकल्पयत् ।
प्रकृति सब को गर्भ में लेकर, महासूति का रूप धारण कर के
ब्रह्म में लीन हो जाती है । प्रत्येक बीज में दो दल होते हैं, उनको
भी यदि घुन खा जाय, परन्तु दोनों के संयोग का अंकुर स्थान
नष्ट न हो तो देखा जाता है कि वह बीज अंकुरित हो उठता है ।
भूत ग्रामः स एवायं भूत्वा २ प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ ( गीता ८, १९ )
अधिकारी भेद से पूजन भी तीन प्रकार का होता है । अधम
तीन प्रकार का अधिकारी के लिये मूर्ति, यंत्र इत्यादि द्वारा बाह्य
पूजन भावना युक्त पूजन किया जाता है, मध्यम
अधिकारी के लिये अन्तर्भावना युक्त ध्यानादि
अन्तर्यागों का साधन है और उत्तम अधिकार का पूजन उसकी
अद्वैत ब्रह्म भावना ही है । इनको क्रमशः अपरा पूजा, 'पराऽपरा

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१६२ सौन्दर्य लहरी
पूजा और परा पूजा कहते हैं। द्वैत भाव का सर्वथा अभाव हो
जाने पर ही परा पूजा संभव है द्वैतभाव बना रहते परा पूजा नहीं
बन सकती, वह साधक अपरा अर्थात् बाह्य पूजा का ही अधिकारी
है परन्तु अद्वैत भाव के उदय होने के पूर्व और द्वैत भाव के लय
होने को अभ्यास दशा में परा और अपरा दोनों का अभ्यास युग
पद् रहता है। योगी ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होने के पश्चात् परा
पूजा का अधिकारी बनता है, क्योंकि ऋतंभरा प्रज्ञा से अविद्या
जनित नाम रूपों के भेदोत्पादक संस्कार ऋत् के संस्कारों से इस
प्रकार नष्ट होने लगते हैं, जैसे सूर्य के उदय से पूर्व उषः कालीन
प्रकाश से धीरे २ अन्धकार में उत्पन्न होने वाली भ्रांति में दिखने
वाले रूपों और नामों के संस्कार मिटने लगते हैं और सूर्य उदय
होने पर रात्रि के अन्धकार से उत्पन्न भ्रांति का सर्वथा नाश हो
जाता है। पूर्वगत श्लोकों में भगवती की अपरा और परापरा पूजा
का वर्णन था, अगले श्लोक में परा पूजा का रूप दिखाया जाता
है। ऋतंभरा प्रज्ञा का अर्थ है ऋत् अर्थात् निरपेक्ष सत्य से
भरी हुई बुद्धि।
(२७)
जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचनं
गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः ।
प्रणामः संवेशः सुखमखिलमात्मार्पणदशा
सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥

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सौंदर्य लहरी १६३
कठिन शब्द:—सपर्या=पूजा, जल्प=बकवास ।
अर्थ:—बोलना मंत्रों के जप सदृश, कर्म काण्ड सब
मुद्राओं की विरचना के सदृश, चलना फिरना प्रदक्षिणा के सदृश,
खाना पीना आहुति के समान, सोना प्रणाम सदृश, सब सुखों
के उपभोग में आत्मसमर्पण की दृष्टि, अर्थात जो भी मेरा
विलास है सब तेरी पूजा पद्धति का क्रम हो ।
सं० टि०:—यहां ज्ञान योग का लक्षण दिखाया गया है ।
स्फोटात्मक शब्दों के सार्थक एवं निरर्थक क्रम को जल्प कहते
हैं, यहां तक कि वर्णमाला के अक्षरों के उच्चारण को एकाक्षरी मंत्र
कहा जाता है, इसी प्रकार उनके योग से जो पद बनते हैं सब मंत्रों के
तुल्य हैं, और इस न्याय से सब जल्प जप के समान है। पूजन में हाथों
के अभिनयों से अनेक प्रकार की मुद्राएं दिखाई जाती हैं अर्थात्
मुद्राएं एक प्रकार से हाथों की क्रियाएं मात्र हैं इसलिये विविध
कर्मों के करने के लिये जो भी क्रियायें हाथ करते हैं, वे सब मुद्राओं
के समान हैं। भगवती की व्यापकता सर्वत्र है, इसलिये चलते
फिरते समय सर्वत्र उस विभु की प्रदक्षिणा होती रहती है। जठराग्नि
भी शक्ति का ही रूप है, वह अन्तराग्नि अन्न पचा कर आत्मा
को बलि पहुंचाती है। हवन की अग्नि का कार्य भी हव्य
को देवता तक पहुंचाना है, इसी अभिप्राय से उसकी एक कला का
नाम हव्यवाहिनी है। खाना पीना इस दृष्टि से सब आहुति
देना है।

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१६४ सौन्दर्य लहरी
कहा है:—
या देवी सर्व भूतेषु क्षुधा रुपण संस्थिता,
नमस्तस्यै ३ नमोनमः
अहंवैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नंचतुर्विधम् ॥
(गीता० १५,-१४)
साष्टांग प्रणाम में दोनों हाथ, दोनों पैर, छाती, ग्रीवा और
मस्तक आठों अंगों से भूमि को स्पर्श करके पडा जाता है, भगवती
सर्वत्र भीतर बाहर सब जगह है, इसलिये सोते लेटते शरीर का
भूशायी होना साष्टांग प्रणाम के समान है । जितने सुख हैं वे सब
आत्मा-नंद की लहरें हैं, उनमें चित्त लगाना उसे आनंद ब्रह्म को
ही समर्पण करना मात्र है । श्रीचक्र पर पूजन करना तो एकदेशीय
पूजन है, हमारी अनेक प्रकार की विविध चेष्टायें और कृत्य निरंतर
विश्वतोमुखी भगवती का ही तो पूजन किया करती हैं, क्योंकि
वास्तविक पूजन तो भाव से संबंध रखता है और ब्राह्मी स्थिति में
रहने वाले का लक्ष्य सर्वदा ईश्वर पद में लगा ही रहता है और
उसके शरीर की क्रियायें भी तद्रूप पूजनवत् ही होती रहती हैं ।
( २८ )
सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभयजरामृत्युहरणा
विपद्यन्ते विश्वे विधिशतमखाद्या दिविषदः ।
करालं यत्क्ष्वेलं (डं) कवलितवतः कालकलना
न शम्भोस्तन्मूलं जननि तव ताटङ्कमहिमा ॥

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सौंदर्य लहरी १६५
कठिन शब्द:—दिविषद=देवता; क्ष्वेल, क्ष्वेड=विष;
कवल=ग्रास, ताटंक=कर्ण फूल ।
अर्थ:—ब्रह्मा और शतमख अर्थात् इन्द्रादि देवगण जरामृत्यु
का हरण करने वाली सुधा को भी पीकर, इस विश्व में काल के
शिकार होते हैं और कराल हलाहल विष का ग्रास करने वाले
शंभु पर काल की कलना नहीं चलती, इसका कारण हे जननि !
तेरे कर्णफूलों की महिमा है ।
सं० टि०—ताटंकों के कहने से भगवती के कानों में पहिने
जाने वाले आभूषणों से इंगित भगवती के अखण्ड सौभाग्य का
अभिप्राय है । विधवा स्त्रियां उनको उतार देती हैं । शंकर पर हला-
हल विष का असर नहीं हुआ, इसका कारण भगवती का अनादि
अनन्त अखंड सुहाग है । यह है भगवती के सतीत्व का महात्म्य। वह
नित्य है, उसका सुहाग भी नित्य है, इसलिये शंकर हलाहल को
पीकर भी अमर हैं । देवता अमृत पीकर भी मर जाते हैं । ताटंक
अर्थात् कर्णफूल सुहाग के चिन्ह माने जाते हैं ।
[ २९ ]
किरीटं वैरिञ्च्यं परिहर पुरः कैटभभिदः
कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् ।
प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं
भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ॥

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१६६ सौन्दर्य लहरी
कठिन शब्दः— जहि= (ओहाक् त्यागे) त्यागें, बचें।
अर्थः— शंकर को अकस्मात् अपने भवन में आते देख
खडी होकर स्वागतार्थ आगे बढने पर तेरी परिचारिकाओं की
इन उक्तियों की जय है कि 'सामने ब्रह्मा के मुकुट से बचें,'
'कैटभ के मारने वाले विष्णु के कठोर मुकुट से ठोकर लगेगी,'
'जम्भारि इन्द्र के मुकुट से बचकर चलें।'
सं०टि० भाव यह है कि सब देव भगवती को सदा साष्टांग प्रणाम
किया करते हैं।
व्याख्या—अभिप्राय यह है कि एक दिन जब भगवती को
इन्द्र ब्रह्मा और विष्णु प्रणाम कर रहे थे, तब अकस्मात् शंकर
आगये, पति का स्वागत करने जब भगवती उठीं, तो उनकी
परिचारकायें कहने लगीं कि ब्रह्मा इन्द्र और विष्णु के मुकुटों से
ठोकर न लगे, इसलिये उन से बचकर चलिये ।
विष्णु भगवान को मधुसूदन और कैटभारि भी कहते हैं क्योंकि
कैटभ भिद् मधु और कैटभ दो राक्षस उनके कान के मैल से
उत्पन्न हो गये थे। वे जब ब्रह्माजी को खाने लपके
ब्रह्माजी ने भगवान को शेष शय्या पर सोते देखकर भगवती की प्रार्थना
की। प्रार्थना से प्रसन्न होकर नारायण के नेत्रों में निवास करने वाली
महामाया ने भगवान्‌को जगा दिया, तब भगवान ने दोनों राक्षसों का
वध किया, और नाभि से उत्पन्न हुए कमल पर बैठे ब्रह्माजी को भय
से मुक्त किया। उपरोक्त आख्यायिका में नारायण आध्यात्म भाव है

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सौंदर्य लहरी १६७

और शेष भगवान विराट की कुण्डलिनी वत् आधार शक्ति । नारायण
को सुलाने वाली निद्रा देवी महासुप्ति स्वरूपा बीजशक्ति है ।
पद्म जो नाभि से निकलता है वह स्पन्दस्वरूपा रजोगुण की विमर्ष
शक्ति है, और ब्रह्मदेव स्वयं शब्दब्रह्म स्वरूप प्रणव है। ब्रह्मदेव को
विराट के प्राण और बुद्धि समझना चाहिये । प्रणव का प्रथम
स्वरूप ध्वन्यात्मक होता है फिर शब्दों का रूप धारण कर के वेदों के
रूप में व्यक्त होने लगता है । वेदों के शब्दों से फिर उनके वाच्य
अर्थ स्वरूप रूपात्मिका सृष्टि का प्रसार होने लगता है । शब्द से
विराट ब्रह्माण्ड का श्रोत्र, श्रोत्र से आकाश, और आकाश से स्थूल
शब्दों का संबंध है । विराट् भगवान के कानों से आकाश की
उत्पत्ति कही गई है, कानों का मैल शब्दब्रह्म रूपी ब्रह्मदेव को
खाने के लिये उद्यत नाद का आवरण है, जो निद्रा के कारण जम
गया है, और जिससे मधु और कैटभ दो राक्षसों की उत्पत्ति बताई
जाती है । आलस्य प्रमादादि की मादकता को मधु कह सकते हैं, और
ज्ञान के ऊपर आवरण डालने वाले भ्रांति विक्षेपादि को कैटभ कह
सकते हैं । कैटभ का अर्थ कीटवत् आभा वाला किया जा सकता
है । कान के मैल को भी कीट कह सकते हैं, कीट का अर्थ कीडा
भी होता है । अर्थात् कैटभ वह प्रकाश है जो मलावृत्त होने के
कारण भ्रांति उत्पन्न करता है, अथवा उसका प्रकाश कीटाणु सदृश
है । ये दोनों ज्ञान के महानशत्रु हैं । भगवान जागकर अर्थात्
अध्यात्म जागृति होने पर दोनों का नाश होता है । दुर्गा सप्तशति
में इस समय ब्रह्मदेव से की गई भगवती की प्रार्थना पढने योग्य
है, जो विषयान्तर भय से यहां नहीं दी जाती ।

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१६८ सौंदर्य लहरी
शक्ति के जागते ही शंकर से मिलने की आतुरता में सहस्रार
पर चढ़ते समय नीचे के चक्रों पर प्रणाम करते हुए ब्रह्मा विष्णु
और इन्द्र के मुकुटों से उसको ठोकर लगने की आशंका सूचक
परिचारिकाओं की उपरोक्त उक्तियां स्वाभाविक ही हैं। मूलाधार में
ब्रह्मा का स्थान है और तत् सम्बन्धी पृथ्वी तत्व का स्वामी इन्द्र
है, स्वाधिष्ठान में विष्णु का स्थान है। ये दोनों चक्र अन्धकारमय
माने जाते हैं देखें श्लोक ३२, ३३ की व्याख्या में 'षोडशी विज्ञान'
का विषय पृष्ठ १८३। अन्धेरे में ठोकर लगने की सम्भावना रहती
है। अर्थात् साधक की शक्ति उन्नेय पथ पर इस मण्डल में रुक कर
ठिठकनी नहीं चाहिये। श्लोक ९ में बताये गये चक्रों के बेधक्रम
और ४१ वें श्लोकोक्त समयाचार की व्याख्या भी इस सम्बन्ध में
ध्यान में रखने योग्य है। कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर
शिवभाव का प्रादुर्भाव होना साधकों के अनुभव की बात है।
परिचारिकाओं का विभिन्न चक्रों की योगिनीओं से अभिप्राय
हो सकता है।
ब्रह्म भाव
( ३० )
स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाऽऽद्याभिरभितो
निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः ।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो
महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम् ॥
कठिन शब्दः-घृणि=किरण, संवर्ताग्नि=प्रलयाग्नि, नीराजन=आरती