सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी १५३
पूर्वोक्त अनुभव प्राप्त योगी को महा वाक्यों के ज्ञान का उदय
'अहं ब्रह्मास्मि' होता है, इसलिये अगले श्लोक में 'भवानि त्वं'
ज्ञान का उदय पद से ज्ञान की भूमिका का उल्लेख किया
गया है ।
[ २२ ]
भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा
मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।
तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥
कठिन शब्दः—भवानि=हे भवानि; और मैं हो जाऊं । नीरा-
जित पदां=जिस पद की आरती उतारी जाती है ।
अर्थः—'हे भवानि ! तू मुझ इस दास पर भी अपनी
करुणामयी दृष्टि डाल, इस प्रकार कोई मुमुक्षु स्तुति करते समय
भवानि त्वं' (मैं तू हो जाऊं) इस पद का ही उच्चारण कर
पाता है, उस ही समय तू उसे निज सायुज्य पद प्रदान कर
देती है, जिस पद की ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र भी अपने मुकुटों
के प्रकाश से आरती उतारा करते हैं । अर्थात् (प्रणाम करते
रहते हैं) ।
सं० टि०:—भाष्यकार डिंडिम का मत है कि बाह्याभ्यन्तर
यागों का वर्णन करके शंकर भगवत्पाद इस श्लोक में प्रेमरूपा भक्ति