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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 202 of 415

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Page 202

१५२ सौन्दर्य लहरी
ब्रह्मरंध्र में निवास करने वाली पराशक्ति का उच्चारण करना चाहिये ।
फिर उसके ऊपर निरोधिका के ( १० वें स्थान ) के मध्य होते
हुए मध्य २, जहां गमनागमन की स्थिरता है, गमनादि से शून्य
है और तिमिरांध का नाश करने वाला चिद्रूप दीपक का स्थान है,
जाना चाहिये । सब मनुष्यों के अन्तर में विराजने वाले उस परमात्म-
रूप हंस कला को नमस्कार है । अनाहत् ( ४ थे ) चक्र से उदय होने
वाले शब्द, और उस शब्द में जो ध्वनि ( ११ वें और १२ वें स्तर
पर ), उस ध्वनि के अन्तर्गत जो ज्योति ( १३ वां स्तर ) है, उस
ज्योति में मन लगाकर जहां मन का लय हो जाता है वहां ( १४ वें )
से सहस्रार तक का स्तर विष्णु का परम पद है । उसके लिये पूर्ण
प्रयत्न के साथ श्री गुरु की शरण में जाना चाहिये । ( क्योंकि
१४ वें स्तर का बेध बिना दिव्य करण के नहीं होता ।) कहा
है कि मूलाधार शक्ति के सोते रहने पर सारा विश्व मोह निद्रा में
सोता रहता है, और उस शक्ति के प्रबुद्ध होने पर त्रिलोकी की
शक्तियां जाग उठती हैं। ब्रह्मरंध्र रूपी महास्थान ( सहस्रार ) में
शिवा शक्ति सदा रहती है, वहां ही परमा चिति शक्ति देवी मध्य में
सुप्रतिष्ठित है, विशुद्ध ( ५ वें ) व्योम चक्र में और ललाट के अग्र
भाग में माया शक्ति है । नाद रूपा परा शक्ति ललाट के मध्य
भाग ( ११ ) में है और विन्दुमयी शक्ति ( ८ वें स्तर पर ) ललाट
के अपरांश भाग में है। बिन्दु में जीवात्मा सूक्ष्म रूप से रहता है,
हृदय में स्थूल रूप से रहता है और दोनों के मध्य में मध्य
रूप से रहता है ।