सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in context१६८ सौंदर्य लहरी
शक्ति के जागते ही शंकर से मिलने की आतुरता में सहस्रार
पर चढ़ते समय नीचे के चक्रों पर प्रणाम करते हुए ब्रह्मा विष्णु
और इन्द्र के मुकुटों से उसको ठोकर लगने की आशंका सूचक
परिचारिकाओं की उपरोक्त उक्तियां स्वाभाविक ही हैं। मूलाधार में
ब्रह्मा का स्थान है और तत् सम्बन्धी पृथ्वी तत्व का स्वामी इन्द्र
है, स्वाधिष्ठान में विष्णु का स्थान है। ये दोनों चक्र अन्धकारमय
माने जाते हैं देखें श्लोक ३२, ३३ की व्याख्या में 'षोडशी विज्ञान'
का विषय पृष्ठ १८३। अन्धेरे में ठोकर लगने की सम्भावना रहती
है। अर्थात् साधक की शक्ति उन्नेय पथ पर इस मण्डल में रुक कर
ठिठकनी नहीं चाहिये। श्लोक ९ में बताये गये चक्रों के बेधक्रम
और ४१ वें श्लोकोक्त समयाचार की व्याख्या भी इस सम्बन्ध में
ध्यान में रखने योग्य है। कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर
शिवभाव का प्रादुर्भाव होना साधकों के अनुभव की बात है।
परिचारिकाओं का विभिन्न चक्रों की योगिनीओं से अभिप्राय
हो सकता है।
ब्रह्म भाव
( ३० )
स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाऽऽद्याभिरभितो
निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः ।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो
महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम् ॥
कठिन शब्दः-घृणि=किरण, संवर्ताग्नि=प्रलयाग्नि, नीराजन=आरती