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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 216 of 415

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Page 216

१६६ सौन्दर्य लहरी
कठिन शब्दः— जहि= (ओहाक् त्यागे) त्यागें, बचें।
अर्थः— शंकर को अकस्मात् अपने भवन में आते देख
खडी होकर स्वागतार्थ आगे बढने पर तेरी परिचारिकाओं की
इन उक्तियों की जय है कि 'सामने ब्रह्मा के मुकुट से बचें,'
'कैटभ के मारने वाले विष्णु के कठोर मुकुट से ठोकर लगेगी,'
'जम्भारि इन्द्र के मुकुट से बचकर चलें।'
सं०टि० भाव यह है कि सब देव भगवती को सदा साष्टांग प्रणाम
किया करते हैं।
व्याख्या—अभिप्राय यह है कि एक दिन जब भगवती को
इन्द्र ब्रह्मा और विष्णु प्रणाम कर रहे थे, तब अकस्मात् शंकर
आगये, पति का स्वागत करने जब भगवती उठीं, तो उनकी
परिचारकायें कहने लगीं कि ब्रह्मा इन्द्र और विष्णु के मुकुटों से
ठोकर न लगे, इसलिये उन से बचकर चलिये ।
विष्णु भगवान को मधुसूदन और कैटभारि भी कहते हैं क्योंकि
कैटभ भिद् मधु और कैटभ दो राक्षस उनके कान के मैल से
उत्पन्न हो गये थे। वे जब ब्रह्माजी को खाने लपके
ब्रह्माजी ने भगवान को शेष शय्या पर सोते देखकर भगवती की प्रार्थना
की। प्रार्थना से प्रसन्न होकर नारायण के नेत्रों में निवास करने वाली
महामाया ने भगवान्‌को जगा दिया, तब भगवान ने दोनों राक्षसों का
वध किया, और नाभि से उत्पन्न हुए कमल पर बैठे ब्रह्माजी को भय
से मुक्त किया। उपरोक्त आख्यायिका में नारायण आध्यात्म भाव है