सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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पूजा और परा पूजा कहते हैं। द्वैत भाव का सर्वथा अभाव हो
जाने पर ही परा पूजा संभव है द्वैतभाव बना रहते परा पूजा नहीं
बन सकती, वह साधक अपरा अर्थात् बाह्य पूजा का ही अधिकारी
है परन्तु अद्वैत भाव के उदय होने के पूर्व और द्वैत भाव के लय
होने को अभ्यास दशा में परा और अपरा दोनों का अभ्यास युग
पद् रहता है। योगी ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होने के पश्चात् परा
पूजा का अधिकारी बनता है, क्योंकि ऋतंभरा प्रज्ञा से अविद्या
जनित नाम रूपों के भेदोत्पादक संस्कार ऋत् के संस्कारों से इस
प्रकार नष्ट होने लगते हैं, जैसे सूर्य के उदय से पूर्व उषः कालीन
प्रकाश से धीरे २ अन्धकार में उत्पन्न होने वाली भ्रांति में दिखने
वाले रूपों और नामों के संस्कार मिटने लगते हैं और सूर्य उदय
होने पर रात्रि के अन्धकार से उत्पन्न भ्रांति का सर्वथा नाश हो
जाता है। पूर्वगत श्लोकों में भगवती की अपरा और परापरा पूजा
का वर्णन था, अगले श्लोक में परा पूजा का रूप दिखाया जाता
है। ऋतंभरा प्रज्ञा का अर्थ है ऋत् अर्थात् निरपेक्ष सत्य से
भरी हुई बुद्धि।
(२७)
जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचनं
गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः ।
प्रणामः संवेशः सुखमखिलमात्मार्पणदशा
सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥