सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in context१६० सौन्दर्य लहरी
के निकट अपने मुकुटों की शोभा बढाने के लिये हाथ जोडे
खडे रहते हैं ।
सं० टि० भगवती के पूजन से सब देवों का पूजन हो जाता है ।
[ २६ ]
विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिं
विनाशं कीनाशो भजति धनदोयाति निधनम् ।
वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलति दृशा
महासंहारेऽस्मिन्विहरति सतिस्त्वत्पतिरसौ ॥
कठिन शब्दः-- कीनाश=यमराज, दृशां=दृष्टि, पंचत्व=मरण
( जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया से ५ वीं अवस्था ।
अर्थः-- हे सति ! इस महा प्रलय के समय ब्रह्मा
पांचवी अवस्था को प्राप्त हो जाता है, अर्थात् मर जाता है ।
हरि विरति को प्राप्त होते हैं । कीनाश ( यमराज ) का नाश
हो जाता है । धनद ( कुवेर ) का निधन ( मरण ) हो जाता
है, जिसको कभी तन्द्रा नहीं आती वह हजार नेत्र वाला महेन्द्र
भी अपनी फैली हुई दृष्टि वाला नेत्र बन्द कर लेता है । परन्तु
सदाशिव तेरा पति तो तब भी विहार ही करता रहता है ।
सं० टि० महा प्रलय में सब देवों का लय हो जाता है, केवल
परंब्रह्म रहता हैं, और शक्ति भी उसमें अव्यक्त दशा में बनी रहती है ।