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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 208 of 415

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Page 208

१५८ सौंदर्य लहरी
अर्थात् सदाशिव इस सबको लील जाते है अथवा तेरे क्षणचपल
भ्रूलताओं की आज्ञा का आलंब लेकर सब पर अनुग्रह करते
रहते हैं ।
सं० टि०:— अनुगृह्णाति का अर्थ 'अपने में लीन कर लेता
है' भी किया जा सकता है । तब श्लोक का अर्थ इस प्रकार होगा ।
तेरी आज्ञा को पाकर भ्रूलताओं के इशारे मात्र से ब्रह्मा सृष्टि करता
है, हरि पालन करता है, रुद्र संहार करता है, ईश्वर तीनों का तिरस्कार
पूर्वक तटस्थ रहता है और सदाशिव सबको अपने में ( प्रलय के
समय ) लीन कर लेता है।
ब्रह्मा जिस सृष्टि की रचना करते हैं और विष्णु पालन करते
हैं, उसका प्रलय के समय रुद्र संहार कर देते हैं। अर्थात् ब्रह्मा और
विष्णु के साथ रुद्र भी लयाभिमुख होकर महेश्वर तत्व में लीन हो
जाते हैं, और महेश्वर भी मानो तिरस्कार पूर्वक अपने नेत्र बंद कर
लेते हैं अर्थात् वे भी बीज रूप सदाशिव में लीन हो जाते हैं। परंतु
विश्व का प्रलय हो जाने पर भी प्रभव की बीज शक्ति सदाशिव में
बनी रहती है, जिसके कारण प्रलय काल के समाप्त होने पर सदाशिव
फिर नई सृष्टि का प्रभव करते हैं, मानों वे भगवती की आज्ञा के
अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश्वर सब पर अनुग्रह करके फिर
पूर्व कल्प के अनुसार सबको नया जीवन प्रदान करते हैं। अर्थात्
भगवती सबकी अधिष्ठात्री है क्योंकि प्रभव और प्रलय दोनों शक्ति
के ही कार्य हैं। और ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश्वर तो भगवती
के कर्मचारी मात्र हैं, इसलिये अगले श्लोक में कहा गया है कि