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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 204

१५४ सौंदर्य लहरी
की उत्कृष्टता दिखाते हैं, जिससे सायुज्यमोक्ष की प्राप्ति अविलंब
भगवती के अनुग्रह मात्र से प्राप्त हो जाती है ।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्वतोज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥
गीता० (१८, ५५)
व्याख्याः- भाव यह है कि जो ईश्वरी सकाम अनुष्ठान
करने वालों को उनके सुकृतों का फल देती है, वह मुमुक्षुओं को
ज्ञान का फलस्वरूपे सायुज्य पदवी भी देती है।
'प्रज्ञानंब्रह्म', 'अहम्ब्रह्मास्मि', 'तत्वमसि' और 'अयमात्माब्रह्म'
ऋक् यजुर् साम और अर्थबेदों के क्रमशः चार महावाक्य जीव-
ब्रह्मैक्य का लक्ष्य कराते हैं। गुरु शिष्य को पहिले प्रज्ञानात्मा का
स्वरूप दिखाता है और फिर उपदेश करता है कि यह आत्मा ब्रह्म
है और वह तू है। फिर शिष्य 'मैं ब्रह्म हूं' का अपरोक्ष अनुभव
करके उस पद में अपनी स्थिति रखता है। जिसको निदिध्यासन
कहते है। उपदेश के श्रवण के पश्चात् युक्तियों द्वारा समझने को
मनन कहते हैं, और तत्पश्चात् नित्य आत्मस्थिति में रहने कों
निदिध्यासन कहते हैं।
इंद्रियों द्वारा विषयों के जानने को आज्ञान कहते हैं, भिन्न-
भिन्न पदार्थों के ज्ञान को नामरूपात्मक भेद से पहचानने को संज्ञान
कहते हैं और ध्यान पूर्वक समझ कर प्राप्त किये जाने वाले विशेष-
ज्ञान को विज्ञान कहते हैं। परन्तु ये सब ज्ञान जिस एक निरपेक्ष