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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

तीसरा अध्याय

तीसरा अध्याय
पहला खंड
पवस्व वाचो अग्रियः सोम चित्राभिरूतिभिः. अभि विश्वानि काव्या.. (१)
हे सोम! आप प्रमुख हैं, आगे की पंक्ति में रहने वाले हैं. आप हमारी स्तुतियों पर ध्यान
दीजिए. हमारी सभी स्तुतियों और प्रार्थनाओं को सुनिए. आप पूजनीय व संरक्षणशील हैं.
(१)
त्व ꣳ समुद्रिया अपो ऽ ग्रियो वाच ईरयन्. पवस्व विश्वचर्षणे.. (२)
हे सोम! आप सभी के कर्मों को ध्यान से देखने वाले हैं. आप अग्रगण्य स्तुतियों के
प्रेरक हैं. अंतरिक्ष के जल आप को प्राप्त होते हैं. (२)
तुभ्येमा भुवना कवे महिम्ने सोम तस्थिरे. तुभ्यं धावन्ति धेनवः.. (३)
हे सोम! आप के ही लिए ये लोक स्थिर हैं. आप की महानता के कारण ये लोक स्थिर
हैं. गाएं आप को दूध देने के लिए दौड़दौड़ कर आप के पास आ रही हैं. (३)
पवस्वेन्दो वृषा सुतः कृधी नो यशसो जने. विश्वा अप द्विषो जहि.. (४)
छाना हुआ आप का रस स्फूर्तिदायी है. आप छनते हुए अपनी धाराओं से पवित्र होइए.
हम लोगों को यशस्वी बनाइए. हमारे सभी शत्रुओं का नाश कीजिए. (४)
यस्य ते सख्ये वय ꣳ सासह्वाम पृतन्यतः. तवेन्दो द्युम्न उत्तमे.. (५)
हे सोम! हम आप के मित्र हैं. हम ने आप से तेजस्विता पाई है. हम सभी शत्रुओं को
नष्ट करने की क्षमता वाले हो गए हैं. (५)
या ते भीमान्यायुधा तिग्मानि सन्ति धूर्वणे. रक्षा समस्य नो निदः.. (६)
हे सोम! आप के अस्त्रशस्त्र भयंकर हैं. वे शत्रुओं को डरा देने वाले हैं. उन की सहायता
से शत्रुओं द्वारा की गई निंदा की पीड़ा से हमारी रक्षा कीजिए. (६)
वृषा सोम द्युमाँ असि वृषा देव वृषव्रतः. वृषा धर्माणि दध्रिषे.. (७)
हे सोम! आप शक्तिमान, प्रकाशमान, इच्छापूरक एवं बल बढ़ाने के लिए संकल्पशील
हैं. हे इच्छापूरक! आप देवता और मनुष्य सब के लिए कल्याणकारी कर्म धारण करने वाले
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हैं. (७)
वृष्णस्ते वृष्ण्य २४ शवो वृषा वनं वृषा सुतः. स त्वं वृषन्वृषेदसि.. (८)
हे सोम! आप शक्तिशाली, बहुत सामर्थ्यवान हैं. आप की सेवा भी शक्तिवर्द्धक है. आप
का रस एवं आप स्वयं भी बलवर्द्धक हैं. (८)
अश्वो न क्रदो वृषा सं गा इन्दो समर्वतः. वि नो राये दुरो वृधि.. (९)
हे सोम! आप शक्तिमान हैं. आप घोड़े की तरह आवाज करते हैं. आप हमें गोधन और
अश्वधन देते हैं. आप हमारे लिए धन के द्वार खोलते हैं. (९)
वृषा ह्यसि भानुना द्युमन्तं त्वा हवामहे. पवमान स्वर्द्दशम्.. (१०)
हे सोम! आप अवश्य ही शक्तिवर्द्धक हैं. आप पवित्र व प्रकाशमान हैं. हम यज्ञ में आप
को बुलाते हैं. (१०)
यदद्भिः परिषिच्यसे मर्मृज्यमान आयुभिः. द्रोणे सधस्थमश्रुषे.. (११)
हे सोम! यजमान आप को शुद्ध बनाते हैं. जल से आप को सींचा जाता है. जल मिलाने
के बाद आप को द्रोणकलश में स्थापित किया जाता है. (११)
आ पवस्व सुवीर्यं मन्दमानः स्वायुध. इहो ष्विन्दवा गहि.. (१२)
हे सोम! हमारे यज्ञ में पधार कर आप उस की शोभा बढ़ाइए. आप आनंददायी हैं. आप
हमें वीर बनाइए. हमें श्रेष्ठ वीर्य (संतान) प्रदान कीजिए. (१२)
पवमानस्य ते वयं पवित्रमभ्युन्दतः. सखित्वमा वृणीमहे.. (१३)
हे सोम! छलनी में छन कर पवित्र होने वाले आप से हम मित्रता की इच्छा रखते हैं.
(१३)
ये ते पवित्रमूर्म्मयो ऽ भिक्षरन्ति धारया. तेभिर्नः सोम मृडय.. (१४)
हे सोम! अपनी लहरों जैसी झरती हुई पवित्र धाराओं से हमें सुख प्रदान कीजिए. (१४)
स नः पुनान आ भर रयिं वीरवतीमिषम्. ईशानः सोम विश्वतः.. (१५)
हे सोम! आप संसार के ईश्वर व पवित्र हैं. आप हमें धनवान, अन्नवान और वीर पुत्रवान
बनाने की कृपा कीजिए. (१५)
दूसरा खंड
अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्.. (१)
अग्नि सभी धन पास रखने वाले, देवताओं को यज्ञ में बुलाने वाले, यज्ञ को ठीक तरह
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कराने वाले व देवों को हवि पहुंचाने वाले हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (१)
अग्निमग्निं ꣳ हवीमभिः सदा हवन्त विश्पतिम्. हव्यवाहं पुरुप्रियम्.. (२)
हे अग्नि! आप प्रजापालक, हविवाहक, सर्वप्रिय, बुलाने योग्य व अनेक नाम वाले हैं.
आप हम सब के नेता हैं. हम मंत्रों से आप का आह्वान करते हैं. (२)
अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे. असि होता न ईड्यः.. (३)
हे अग्नि! आप अरणियों से उत्पन्न होने वाले व देवताओं के दूत हैं. आप आसन फैलाने
वाले यजमान के लिए देवताओं को बुला लाइए. आप मददगार और उपासना के योग्य हैं.
(३)
मित्रं वय ꣳ हवामहे वरुण ꣳ सोमपीतये. या जाता पूतदक्षसा.. (४)
हम शुद्ध, बलवान और यज्ञस्थल में प्रकट होने वाले मित्र और वरुण देवता का सोमरस
पीने के लिए यज्ञ में आह्वान करते हैं. (४)
ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती. ता मित्रावरुणा हुवे.. (५)
मित्र और वरुण देवता यजमान पर दयालु हैं. वे सत्यमार्गियों पर कृपालु हैं. उन
प्रकाशमान मित्र और वरुण देवताओं का हम आह्वान करते हैं. (५)
वरुणः प्राविता भुवान्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः. करतां नः सुराधसः.. (६)
मित्र और वरुण देवता अपने सभी रक्षा साधनों से हमारी रक्षा करें. वे हमारे शरणदाता
हैं. वे हमें यशस्वी धन प्रदान करने की कृपा करें. (६)
इन्द्रमिद्गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः. इन्द्रं वाणीरनूषत.. (७)
साम गाने वाले पुरोहितों ने बृहतसाम गा कर इंद्र की स्तुति की. यजमानों ने भी मंत्र गा
कर इंद्र की स्तुति की. शेष बचे हुए लोगों ने भी वाणी से इंद्र की स्तुति की. (७)
इन्द्र इद्धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (८)
इंद्र वज्रधारी हैं. वे सोने के आभूषणधारी हैं. उन की वाणी सुनते ही हरि नामक घोड़े
रथ में जुत जाते हैं. अब वे अपने उन्हीं घोड़ों को एक साथ रथ में जोतने वाले हैं. (८)
इन्द्र वाजेषु नो ऽ व सहस्रप्रधनेषु च. उग्र उग्राभिरूतिभिः.. (९)
हे इंद्र! आप किसी से नहीं हार सकते. आप हमें अपना प्रबल संरक्षण प्रदान कीजिए.
जिन युद्धों में हजारों हाथीघोड़ों का लाभ होता है, उन युद्धों में भी आप हमारी सहायता
कीजिए. (९)
इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्य ꣳ रोहयदि्व. वि गोभिरद्रिमैरयत्.. (१०)
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हे इंद्र! संसार को प्रकाश देने के लिए आप ने स्वर्गलोक में सूर्य की स्थापना की. उसी
प्रकार अपनी रश्मियों (किरणों) से बरसात के लिए बादलों को प्रेरित किया. (१०)
इन्द्रे अग्ना नमो बृहत्सुवृक्तिमेरयामहे. धिया धेना अवस्यवः.. (११)
अपने संरक्षण की कामना से हम अग्नि और इंद्र के पास हवि और स्तुति पहुंचाते हैं.
हम बुद्धि और मनोयोग से दोनों देवताओं की उपासना करते हैं. (११)
ता हि शश्वन्त ईडत इत्था विप्राय ऊतये. सबाधो वाजसातये.. (१२)
अनेक बुद्धिमान लोग अग्नि और इंद्र की रक्षा के लिए उपासना करते हैं. वे लोग वैसे ही
उन की उपासना करते हैं, जैसे अन्न के लिए लड़तेझगड़ते हैं. (१२)
ता वां गीर्भिर्विपन्यवः प्रयस्वन्तो हवामहे. मेधसाता सनिष्यवः.. (१३)
हम स्तुतियों से अग्नि और इंद्र की उपासना करते हैं. उन को आमंत्रित करते हैं. हम धन
के इच्छुक हवि के साथ आप दोनों को यज्ञ में आमंत्रित करते हैं. (१३)
तीसरा खंड
वृषा पवस्व धारया मरुत्वते च मत्सरः. विश्वा दधान ओजसा.. (१)
हे सोम! आप शक्तिवर्द्धक हैं. आप धारा रूप में छनिए. आप द्रोणकलश में पधारिए.
आप अपने बल से विश्व को धारण करने वाले मरुतों के मित्र इंद्र को आनंद प्रदान कीजिए.
(१)
तं त्वा धर्तारमोण्यो ३: पवमान स्वर्दृशम्. हिन्वे वाजेषु वाजिनम्.. (२)
हे सोम! आप पवित्र, स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक को धारण करने वाले व सर्वद्रष्टा हैं. आप
को हम युद्धों में जाने के लिए प्रेरित करते हैं. हमें आप अन्न आदि दीजिए. (२)
अया चित्तो विपानया हरिः पवस्य धारया. युजं वाजेषु चोदय.. (३)
हे सोम! आप हरे हैं. आप को अंगुलियों से निचोड़ा गया है. आप द्रोणकलश में धारा
रूप में झरते जाइए. आप अपने मित्र इंद्र को युद्धों में जाने के लिए प्रेरित कीजिए. (३)
वृषा शोणो अभिकनिक्रदद्गा नदयन्नेषि पृथिवीमुत द्याम्.
इन्द्रस्येव वग्नुरा शृण्व आजौ प्रचोदयन्नर्षसि वाचमेमाम्.. (४)
हे सोम! हमारी प्रार्थनाओं को सुन कर आप उसी तरह आवाज करते हैं, जैसे गायों को
देख कर लाल बैल आवाज करता है. आप स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक पर पधारते हैं. इंद्र के
शब्दों के समान हम आप की आवाज सुनते हैं. आप अपना स्वरूप सब को बोध कराते हैं.
यजमान की प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा करते हैं. (४)
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रसाय्यः पयसा पिन्वमान ईरयन्नेषि मधुमन्तमंशुम्.
पवमान सन्तनिमेषि कृण्वन्निन्द्राय सोम परिषिच्यमानः.. (५)
स्वादिष्ट और मीठा सोमरस गाय का दूध मिलाने से और स्वादिष्ट और मीठा हो जाता
है. पानी मिला कर छानने पर धारा रूप धारण कर के सोम इंद्र को प्राप्त हो जाते हैं. (५)
एवा पवस्व मदिरो मदायोदग्राभस्य नमयन्वधस्नुम्.
परि वर्णं भरमाणो रुशन्तं गव्युर्नो अर्ष परि सोम सिक्तः.. (६)
हे सोम! आप स्फूर्तिदायी हैं. आप वृत्रासुर का वध हो जाने के बाद पानी बहाने वाले
मेघों को झुकाइए. उन के जल में मिल कर छनते जाइए. आनंददायी होइए. आप पानी में
मिल कर और चमकीले हो जाइए. आप गाय के दूध के रूप में हमारे चारों ओर प्रवाहित
होइए. (६)
चौथा खंड
त्वामिद्धि हवामहे सातौ वाजस्य कारवः.
त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः.. (१)
हे इंद्र! हम यजमान अपने अन्न की बढ़ोतरी की आकांक्षा से आप को आमंत्रित करते
हैं. आप पर्वतवासी, सत्पति व वृत्रहंता हैं. श्रेष्ठ जन विपत्ति के समय आप को स्मरण करते
हैं. (१)
स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया मह स्तवानो अद्रिवः.
गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे.. (२)
हे इंद्र! आप हाथ में वज्र धारण करते हैं. आप बलधारी व शक्तिधारी हैं. आप यजमानों
की प्रार्थना से प्रसन्न होइए. उन्हें अन्नधन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (२)
अभि प्र वः सुराधसमिन्द्रमर्च यथा विदे.
यो जरितृभ्यो मघवा पुरूवसुः सहस्रेणेव शिक्षति.. (३)
हे यजमानो! इंद्र नाना प्रकार के वैभव देने वाले हैं. आप हजारों विधियों से उन्हें प्रसन्न
करने की कोशिश करो. (३)
शतानीकेव प्र जिगाति धृष्णुया हन्ति वृत्राणि दाशुषे.
गिरेरिव प्र रसा अस्य पिन्विरे दत्राणि पुरुभोजसः.. (४)
दुश्मनों का संहार करते समय इंद्र यजमान की वैसे ही रक्षा करते हैं, जैसे सेनानी शत्रु
पर चढ़ाई के समय सेना की. उन का यह संरक्षण यजमानों को झरने के जल की तरह शांति
और तृप्ति प्रदान करता है. (४)
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त्वामिदा ह्यो नरो ऽ पीप्यन्वज्रिन् भूर्णयः.
स इन्द्र स्तोमवाहस इह श्रुध्युप स्वसरमा गहि.. (५)
हे वज्रधारी इंद्र! यजमान आप को हवि प्रदान करते हैं. वे ही यजमान आप को सोमरस
भेंट करते हैं. स्तोता (उपासक) आप के लिए साम गा रहे हैं. आप सुनिए और यज्ञ में
पधारिए. (५)
मत्स्वा सुशिप्रिन्हरिवस्तमीमहे त्वया भूषन्ति वेधसः.
तव श्रवा ॐ स्युपमान्युक्थ सुतेष्विन्द्र गिर्वणः.. (६)
हे सुंदर ठुड्डी वाले इंद्र! आप अस्त्रशस्त्रधारी हैं. आप उपासना के योग्य हैं. हम
यजमान अनेक प्रकार की सामग्री से आप की पूजा करते हैं. हम आप को सजाते व सोमरस
से छकाते हैं. हम और भी प्रिय पदार्थ आप को भेंट करते हैं. आप अश्वपालक हैं. (६)
पांचवां खंड
यस्ते मदो वरेण्यस्तेना पवस्वान्धसा. देवावीरघश ॐ सहा.. (१)
हे सोम! आप का रस वरेण्य, मददायी व दिव्य हैं. आप परिष्कृत होइए. (१)
जघ्निर्वृत्रममित्रिय ॐ सस्नििर्वाजं दिवेदिवे. गोषातिरश्वसा असि.. (२)
हे सोम! आप वृत्रासुर अमित्रों (शत्रुओं) के नाशक, दिव्य व संघर्षशील हैं. आप गोधन
व अश्वधन प्रदान करते हैं. (२)
सम्मिश्लो अरुषो भुवः सूपस्थाभिर्न धेनुभिः. सीदं च्छ्येनो न योनिमा.. (३)
हे सोम! बाज जैसे घोंसले में सुशोभित होता है, उसी प्रकार आप अपने सदन में
सुशोभित होते हैं. आप गायों के दूध में मिलने पर चमचमाते हैं. (३)
अयं पूषा रयिर्भगः सोमः पुनानो अर्षति.
पतिर्विश्वस्य भूमनो व्यख्यद्रोदसी उभे.. (४)
हे सोम! आप विश्वपति व पवित्र हैं. आप पूषा और भग के लिए प्रवाहित होइए. आप
पृथ्वीलोक और स्वर्गलोक दोनों को प्रकाशित करते हैं. (४)
समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः.
सोमासः कृण्वते पथः पवमानास इन्दवः.. (५)
हे सोम! आप मददायी व प्रिय हैं. आप के लिए की गई स्तुतियां एकदूसरे से होड़ करती
हैं. आप सभी का पथप्रदर्शन करते हैं. (५)
य ओजिष्ठस्तमा भर पवनाम श्रवाय्यम्.
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यः पञ्च चर्षणीरभि रयिं येन वनामहे.. (६)
सोम ओजवान, अंधकार दूर करने वाले और पवित्र हैं. आप पंचों से प्रशंसा प्राप्त करने
योग्य रस हमें प्रदान करने की कृपा कीजिए. (६)
वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः.
प्राणा सिन्धूनां कलशाँ अचिक्रददिन्द्रस्य हार्द्याविशन्मनीषिभिः.. (७)
हे सोम! आप बुद्धि बढ़ाने वाले, विलक्षण, स्वर्गलोक व उषा को जानते हैं. आप
दिनरात को प्रकाशित व जाग्रत करते हैं. आप मनीषियों द्वारा इंद्र के लिए परिष्कृत किए
जाते हैं. आप आवाज करते हुए पात्र में प्रवाहित होते हैं. (७)
मनीषिभिः पवते पूर्व्यः कविर्नृभिर्यतः परि कोशा असिष्यदत्.
त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरन्निद्रस्य वायु ॐ सख्याय वर्धयन्.. (८)
सोम पवित्र, अपूर्व व कवि हैं. मनीषी और मनुष्य आप को परिष्कृत करते हैं. आप
तीनों सवनों में इंद्र की प्रसिद्धि फैलाते हैं. सोम इंद्र को तृप्ति देते हैं. सोम वायु की मित्रता की
बढ़ोतरी के लिए प्रवाहित होते हैं. (८)
अयं पुनान उषसो अरोचयदय ॐ सिन्धुभ्यो अभवदु लोककृत्.
अयं त्रिः सप्त दुदुहान आशिर ॐ सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः.. (९)
सोम पवित्र व चमकने वाले हैं. वे हितकारी और उषा को प्रकाशित करते हैं. सोमरस
नदियों में जल की बढ़ोतरी करता है. यह तीन गुणे सात को पोसता हुआ प्रवाहित होता है.
यह सब के हृदय में निवास करता है. (९)
छठा खंड
एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः. एवा ते राध्यं मनः.. (१)
हे इंद्र! आप शूरवीर हैं. आप संग्रामों में शूरवीरों को अपनी वीरता दिखाने का अवसर
प्रदान करते हैं. आप उन युद्धों में स्थिर रहते हैं. इसीलिए आप का मन आराधना के योग्य है.
(१)
एवा रातिस्तुविमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः. अधा चिदिन्द्र नः सचा.. (२)
हे इंद्र! आप सभी ऐश्वर्य धारण करते हैं. आप की कृपा कभी भी समाप्त नहीं होती है.
आप हम पर कृपा कीजिए. (२)
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते. मत्स्वा सुतस्य गोमतः.. (३)
हे इंद्र! आप बलवान, शक्ति के स्वामी एवं ब्रह्मा के समान हैं. आप हमें बुद्धिमान बनाने
की कृपा कीजिए. (३)
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इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः
रथीतम २४ रथीनां वाजानां २४ सत्पतिं पतिम्.. (४)
हे इंद्र! आप समुद्र जैसे भरेपूरे हैं और विश्व को धारण करते हैं. आप सत्पति, शक्तिपति
और दैवी शक्तियों के स्वामी हैं. हम वाणी से आप की उपासना करते हैं. (४)
सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते.
त्वामभि प्र नोनुमो जेतारमपराजितम्.. (५)
हे इंद्र! हम आप के सखा हैं. आप शक्तिमान हैं. आप की छत्रछाया में हम कभी किसी
से भयभीत न हों. आप अपराजेय व विजेता हैं. हम आप को नमन करते हैं. (५)
पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः.
यदा वाजस्य गोमत स्तोतृभ्यो म २४ हते मघम्.. (६)
हे इंद्र! आप का दान अपूर्व है. आप हमें (पूर्ण) संरक्षण देते हैं. आप जब उपासकों को
अन्नधन दान देते हैं तो वह कभी क्षीण नहीं होता. (६)