रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
About this granth
Rasikapriya (रसिकप्रिया) is Keshavdas's Braj Bhasha treatise on the erotic sentiment (shringara rasa), written in the late sixteenth century under the patronage of Prince Indrajit Singh of Orchha. It became the model for describing types of heroes and heroines in Hindi Riti poetry, later poets followed its scheme, and its scenes were painted widely in Rajasthani and Pahari miniatures.
Its sixteen prabhavas treat the nature of rasa and the kinds of shringara, the types of hero, the companion and the messenger, the types of heroine and their gestures, the eight situations of the heroine such as one whose lover is devoted, one betrayed and one who waits adorned, the lover's pique and its appeasement, and love in union and separation. For each definition Keshav gives his own verses on Radha and Krishna.
This edition carries the Priyaprasad commentary of Acharya Vishwanath Prasad Mishra, the noted critic and editor of Riti poetry, and runs to 286 pages.
त्रयोदश प्रभाव २४५
शब्दार्थ—आजु कें० = यदि दीवाली की रात सानंद मनाई जाय तो
अगले वर्ष की दीवाली तक अच्छे दिन बीतते हैं। पै = से। मति० = बुद्धि
मान की निद्रा से जाग उठी, मान छोड़कर बुद्धि कल्याण-साधन में लगी ।
चित्त-बिहार = मनोरंजन ।
सूचना—इस छंद के विषय में भी सरदार लिखते हैं—'पूर्ववत् यह
भी ग्रन्थ को बनायो है। तातें नारायण कवि तिलक नाहीं लिख्यो।'
राधिका को मिलैबो—( कबित्त )
(४५२) जौ हौं गनों औगुननि तौ तूँ गनै गुनगन,
जौ हौं गनों गुन तौ तूँ औगुन के गन मैं ।
केसौदास ऐसें प्रीति छिपावति छलनि मैं,
जैसें छनछबि छूटै छिपै जाइ घन मैं ।
भारी है निठुर निसि भादों की भयावनी में,
सु क्यों बसै घर जाको पीउ बसै बन मैं ।
बैठे तें उठावै, उठि चले तें मचलि रहै,
सोई मेरी क्यों न कहै जोई तेरे मन मैं ।११।
शब्दार्थ—छनछबि = बिजली। ऐसें० = तू अपनी प्रीति छल करके ऐसे
छिपाती है जैसे बिजली चमकती है, पर बादल में छिप जाती है। तेरे प्रेम
की केवल झलक मिलती है। जौ हौं० = मैं प्रिय के अवगुणों को गिनती हूँ तो
तू गुण गिनती है, मैं गुण गिनती हूँ तो तू अवगुण गिनती है। सु क्यों० =
जिसका प्रिय वन में बसता है वह घर में कैसे बस सकेगी। मेरी = मेरी
( प्यारी )। उठि० = यदि उठकर चलती हूँ तो न जाने देने के लिए मचलने
लगती है। जो तेरे मन में है वह क्यों नहीं कहती ( कि मुझे प्रियतम से ले
चलकर मिला दे)।
कृष्ण को मिलैबो—( कबित्त )
(४५३) सिखै हारी सखी डरपाइ हारी कादंबिनी,
दामिनो दिखाइ हारी दिसि अधरात की ।
झुकि झुकि हारी रति मारि मारि हारयो मार,
हारी झकझोरति त्रिबिध गति बात की ।
११—राधिका-प्रिया । औगुननि-औगुन । गुनगन-गुनन गन । औगुन
के गन में -अगुन गनन में । केसौदास-केसौराइ । ऐसें-ऐसी । छनछबि-छन-
छवि । छनछवि०-छिनछवि छूटि छिपै जाइ घन मैं, छिन छूटि छवि छिपै छुटि
घन मैं । सु क्यों-कैसे । तें मचलि०-तहीं बैठि रहै । मेरी०-क्यों न कहै बीर,
क्यों न कहे प्यारी ।
२४४ रसिकप्रिया
पाइिन लागत सोंधो चढ़ावत पान खवावतहीं निसि जागे ।
कान्ह चलौ उठि बैठे कहा ? मन मूसि परायो ब रूसन लागे ।८।
शब्दार्थ—भूषन-भेद = विविध प्रकार के गहने । बनाइकै = सजाकर ।
बागे = वस्त्र । राग = प्रेम । सोंधो = सुगंध । मूसि = चुराकर । रूसन लागे =
रूठने लगे ।
भावार्थ—उस समय का तो ध्यान कीजिए जब विविध प्रकार के गहनों,
पुष्पों और वस्त्रों से सजकर उसे आकृष्ट करने के लिए आया करते थे । भाग्य,
सोहाग और प्रेम को बढ़ाकर हृदय से उस पर अनुरक्त हुए । पैरों पड़ते, सुगंध-
द्रव्य लगाते और पान खिलाते हुए ही तुम रात रात भर जागते रह जाते
थे । अतः हे कृष्ण, उठकर चलिए । यहाँ क्या बैठे हैं, दूसरे का मन चुराकर
अब रूठने चले हैं ?
राधा को मिलैबो—( सवैया )
(४५०) दुर्लभ देवनिहूँ काँ सु तौ हरि को मन हाँसिन ही हरि लीनो ।
टारहु जैं हिय तें कबहुँ अब ज्यों गुरु को दियो मंत्र प्रबीनो ।
लेत लियो तौ न देत दियो अब मानहु ता दिन दुःख नवीनो ।
माँगन आवै तौ दीजै भटू अपनो मन, जौ वह जाइ न दीनो ।६।
शब्दार्थ—जैं = ( जिन ) मत । लेति० = लेते समय तो बड़े आनंद से
उसे ले लिया, पर अब वह दिया नहीं जाता, प्रत्युत देने में एक नया दुःख ही
खड़ा हो जाता है । अतः यदि माँगने आएँ तो श्रीकृष्ण को चाहे उनका मन
मत लौटाना पर अपना मन दे देना ।
सूचना—यह छंद सरदार की टीका में तो है, पर उन्होंने लिखा है—
‘यह कबित्त केशव को नाहीं तातें नारायण कवि नाहीं लिखो’ । हस्तलिखित
प्रतियों में भी यह छंद है । लीथोवाली प्रति में नहीं है । इसमें केशव की
छाप नहीं है ।
पुनः—( सवैया )
(४५१) आजु देवारि की राति जौ कीजै तौ आजु के द्योस लौं है है सभागी ।
बात सुनी जननी पै जबै तब ही मति मान की नींद सं जागी ।
अंग सिंगारि निहारि निसा तिन चित्तबिहारनि सों अनुरागी ।
दीप दै देवनि जाइ .... मिलि केसवराय सा खेलन लागो ।१०।
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.....-बागे । चढ़ावत-लगावत । निसि०-रसपागे । परायो ब-परायौ
सु । ६—मन-पु० । ही-इ । हरि-हठि । जें-जो । तौन देत०-तौन मानहु
सों मानिहौ तादिन । दुक्ख-दुस्ट । १०-पुनः-मध्य को मिलैबो । तौ-सु ।
जबै-जहीं । केसवराय-केसबदास ।
त्रयोदश प्रभाव २४५
शब्दार्थ—आजु के० = यदि दीवाली की रात सानंद मनाई जाय तो
अगले वर्ष की दीवाली तक अच्छे दिन बीतते हैं। पै = से। मति० = बुद्धि
मान की निद्रा से जाग उठी, मान छोड़कर बुद्धि कल्याण-साधन में लगी।
चित्त-बिहार = मनोरंजन।
सूचना—इस छंद के विषय में भी सरदार लिखते हैं—'पूर्ववत् यह
भी ग्रन्थ को बनायो है। तातें नारायण कवि तिलक नाहीं लिख्यो।'
. राधिका को मिलैबो—( कबित्त )
(४५२) जौ हौं गनौँ औगुननि तौ तूँ गनै गुनगन,
जौ हौं गनौँ गुन तौ तूँ औगुन के गन में।
केसौदास ऐसैं प्रीति छिपावति छलन में,
जैसैं छनछबि छूटै छिपै जाइ घन में।
भारी है निठुर निसि भादों की भयावनी में,
सु क्यों बसै घर जाको पीउ बसै बन में।
बैठे तँ उठावै, उठि चले तँ मचलि रहै,
सोई मेरी क्यों न कहै जोई तेरे मन में।११।
शब्दार्थ—छनछबि = बिजली। ऐसैं० = तू अपनी प्रीति छल करके ऐसे
छिपाती है जैसे बिजली चमकती है, पर बादल में छिप जाती है। तेरे प्रेम
की केवल झलक मिलती है। जौ हौं० = मैं प्रिय के अवगुणों को गिनती हूँ तो
तू गुण गिनती है, मैं गुण गिनती हूँ तो तू अवगुण गिनती है। सु क्यों० =
जिसका प्रिय वन में बसता है वह घर में कैसे बस सकेगी। मेरी = मेरी
(प्यारी)। उठि० = यदि उठकर चलती हूँ तो न जाने देने के लिए मचलने
लगती है। जो तेरे मन में है वह क्यों नहीं कहती (कि मुझे प्रियतम से ले
चलकर मिला दे)।
कृष्णा को मिलैवो—( कबित्त )
(४५३) सिखै हारी सखी डरपाइ हारी कादंबिनी,
दामिनी दिखाइ हारी दिसि अधरात की।
झुकि झुकि हारी रति मारि मारि हारयो मार,
हारी झकझोरति त्रिबिध गति बात की।
११—राधिका-प्रिया। औगुननि-औगुन। गुनगन-गुनन गन। औगुन
के गन में-अवगुन गनन में। केसौदास-केसौराइ। ऐसैं-ऐसी। छनछबि-छन-
रुचि। छनछवि०-छिनछवि छूटि छिपै जाइ घन मैं, छिन छूटि छवि छिपै छुटि
घन मैं। सु क्यों-कैसे। तँ मचलि०-तहीं बैठि रहै। मेरी०-क्यों न कहै बीर,
क्यों न कहै प्यारी।
२४६ रसिकप्रिया
दई निरदई दई याहि काहे ऐसी मति,
जारति जु रैनदिन दाह ऐसे गात की।
कैसेहूँ न मानै हौं मनाइ हारी केसौराय;
बोलि हारी कोकिला बुलाइ हारी चातकी।१२।
शब्दार्थ—कादंबिनी=मेघावली, बादलों की घटा । झुकि=क्रोध करके ।
बात =वायु ।
भावार्थ—सखियाँ उसे शिक्षा देकर हार मान बैठीं। मेघों की घटा
छाकर उसे डरवाकर हार गई। दिगंत में आधी रात के समय चमकनेवाली
बिजली अपनी दमक दिखाकर हार गई। रति कुपित हो होकर हार गई,
कामदेव अपनी मार मारकर थक गया। त्रिविध ( शीतल, मंद, सुगंध )
वायु की गति भी उसे झिंझोड़कर शांत हो बैठी। न जाने उस निर्दय दैव ने
उसे कैसी बुद्धि दी है कि वह रातदिन कोमल शरीर को ऐसी जलन से जला
रही है। यह तो किसी प्रकार भी मानती ही नहीं। कोयल बोलते बोलते चुप
हो गई। चातकी भी 'पी पी' करके उसे बुला न सकी। यहाँ तक कि उसकी
सखी होकर भी मैं मनाते मनाते ऊब गई, पर उसने न माना, न माना (अब
यदि आप चलकर मनाएँ तो कदाचित् मान जाय )।
राधिका को श्रृंगार—( सवैया )
(४५४) दीनो मैं पाइ झँवाइ महावर आँज्यो मैं आँजन आँखि सुहाई ।
भूषन भूषित कीने मैं केसव माल मनोहर मैं पहिराई ।
दर्पन लै अब दीपति देखि सखी, सब अंग सिँगारि सिधाई ।
बंक बिलोकनि, अंक लै पान खवावै को कान्ह-कुमार की नाई ।१३।
शब्दार्थ—दीनो मैं०=मैंने पैरों को झाँवें से रगड़कर महावर लगा दिया ।
आँज्यो=( आँखों ) में अंजन लगाया । आँज्यो मैं० = मैंने सुंदर आँखों में
अंजन भी लगा दिया । हू = भी । कर = हाथ में । देखि = देखो । सिधाई =
भोले भाले ढंग से ( मैंने )। बंक बिलोकनि० =अब तिरछी दृष्टि करके तुझे
गोद में लेकर श्रीकृष्ण की तरह भला पान कौन खिलाए (मुझ सीधी सादी से
तो वैसी मुद्रा हो नहीं सकती, तू उन्हीं के पास चल । वे ही तुझे इस प्रकार
से पान खिलाएँगे )।
कृष्ण को शृंगार—( सवैया )
(४५५) पाग बनी अरु बागो बन्यो पटुआ पटुका कटि राजत नीको ।
सोंधो बन्यो अति चारु चढ़ावत हार बन्यो उर भावतो जीको ।
१२—दिसि-निसि । झुकि झुकि-झकी झुकि । याहि-वाहि । र्काह-काहे ।
निरदई०-निरदई वाहि ऐसी कहि मति दई । दिन-ऐन । ऐसे-ऐसो । हौं-
ही । केसौराय-केसोदास । १३-आँज्यो-आँजो । मैं-हू, ही पै । अब-कर ।
त्रयोदश प्रभाव २४७
बीरा बन्यो मुख खात मनोहर, मोहिं सिंगार लग्यो सब फीको।
भाल भली बिधि जौ लौं गुपाल कियो उहिं बाल बनाइ न टीको ।१४।
शब्दार्थ - पाग = पगड़ी । बनी = शोभित हुई। बागो = अँगरखा ।
पटुआ = दुपट्टा । पटुका = कमर में बाँधने का वस्त्र । सोंधो = सुगंध । बीरा =
पान का बीड़ा । वह बाल = राधिका ।
भावार्थ- (आपकी पगड़ी भी बनी है, अँगरखा भी छजता है, गले का
दुपट्टा भी ठीक बन गया, कमर में कसा हुआ पटका भला लगता है। ( चंदन
का लेप अंगराग आदि ) चढ़ाते समय सुगंध की व्यवस्था भी ठीक बन गई,
वक्षःस्थल पर मन को भानेवाला हार भी ठीक बन गया। पान का बीड़ा
मुँह में खाते समय खूब छजा, पर मुझे तो तब तक ये सब श्रृंगार फीके लगते
हैं जब तक उस नायिका ने आपके ललाट पर भली भाँति रचकर टीका नहीं
लगाया (चलिए उससे टीका लगवा आइए) ।
सूचना-हस्तलिखित प्रति में निम्नलिखित एक छंद और मिलता है-
मुग्धा को मिलैबो-( सवैया )
ऊजरु है यह गाउँ भदू मुँह कान्ह को नाउँ जु लीजत पैहै ।
जानै को मारी तू कौनहि का करी को है रे छैल छबीली जौ तैं है।
बात सँभारि कहौ सुनिहै कोउ आगि लगावों कोऊ जल दैहै।
कान्ह ही मारी तो बारी है बावरी तू उनको कैसे मारि सकै है।
राधा को झुकिवो-( कवित्त )
(४५६) फिरि फिरि फेरि फेरि फेरचो मैं हरी को मन,
मन फेरें फिरी पुनि भाग की भली घरी ।
पल पल पाइनि परति हुतो जनकें सु,
पारचो पीय तेरें पाइ पी के पाइ हौं परी।
बड़िनि की बेटिनि की बड़ीये बड़ाई मेटि,
केसौदास बड़ेन में जौ तूँ हौं बड़ो करी ।
हौं तौ जानी मनाएँ तें मेरो गुन मानिहै, मैं
ताहि क्यों मनाई तैं जु मोहीं सों मनी धरी ।१५।
१४-पटुआ-बटुआ । कटि राजत-कटरा कटि । चढ़ावत-मनोहर ।
भावतो-भावत । बीरा-बीरी। कियो-दियो । उहि-वह । १५-परति ०--परिहु
तिय । बड़िनि०-बड़ी बड़ी बधून । बड़ेन ०---बड़ेनहू में जो तू मैं । जानी-जान्यौ,
जानो । मनाएँ०-मन में तूं । मैं-हौं । मनाई० - मनाइहौं जो मोहूँ । मनी०-
भली करी ।
२४८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ -झुकिबौं = मान करना । हुती=थी । गुन मानिहै = एहसान
मानेगी, कृतज्ञ होगी। मनी = ( मन्यु ) अभिमान, गर्व । मोहीं सों मनी
धरी = मुझपे ही तूने अभिमान कर रखा है ।
भावार्थ-बारंबार फेरते फेरते मैंने किसी प्रकार श्रीकृष्ण का मन फेर
लिया, उनके मन के बदल जाने से भाग्य की भली घड़ी हुई (तेरा भाग्य
जागा ) ! क्षण क्षण पर जिनके पैरों पर तू पड़ा करती थी, उन्हें लाकर
तेरे पैरों पर गिराया, मैं स्वयम् उनके पैरों पर गिरी । बड़ी प्रतिष्ठित जाति
की बेटियों की बड़ी बड़ाई को हटाकर मैंने बड़ों में भी तुझे बड़ा बनाया ।
इतने उपकार के बाद मैं तो मन में यह समझती थी कि तू मेरा उपकार
मानेगी (पर तूने सब पर पानी फेर दिया) । अब मैं भला उसे किस प्रकार
मनाऊँ, जब इतना उपकार करने पर भी तू मुझी से अभिमान कर रही है।
पुनः-( सवैया )
(४५७) केसवराय बुलावंत हैं चित चारु बिलोचन नीचे करौ जू ।
कालि करै बर एक बिसौ परौं बीसबिसे ब्रत तें न टरौ जू ।
आगिलगै तेरे कालि के सीस, परौं पर जाइ बजागि परौ जू ।
आज मिलौ तौ मिलौ ब्रजराजहि नाहिं तौ नीके ह्वै राज करौ जू १६
शब्दार्थ-कालि करै=कल करे। बर = अच्छा । कालि करै० = यदि
कल ही कल उनसे मिलो तो अच्छा । एक बिसौ = थोड़ा ही निश्चय ।
परौं = परसो । बीसबिसे = बीसों बिस्वा, पूर्ण निश्चय । बजागि = बज्राग्नि,
भयंकर अग्नि ।
भावार्थ---(सखी कहती है कि ) श्रीकृष्ण बुला रहे हैं, चित्त को सुंदर
लगनेवाले नेत्रों को थोड़ा नीचे तो करो ( मेरी ओर तो देखो, क्रोध से नेत्रों
को चढ़ाए मत रहो ) एक बिस्वा अच्छा हो कि कल मिल लो, यदि कल
मिलने का पूरा निश्चय न हो तो परसों तो इस (मिलन) व्रत से एकदम
मत टलो (अवश्य मिलो)। (इस पर नायिका बिगड़कर कहती है) तेरे
कल के सिर में आग लगे और परसों में फूंका पड़े ( भयंकर आग लगे ) ।
(तब सखी कहती है) आज मिलना हो तो श्रीकृष्ण से मिल लो, नहीं तो
अपना राज रजो (फिर उनसे मिलने की आवश्यकता ही नहीं) ।
सूचना-यह छंद सरदार की टीका में है तो, पर इसका अर्थ यह कह-
कर छोड़ दिया गया है-'यह कवित्त भी प्राचीन पुस्तकन में नाहीं मिलत
तातें नारायण कबि अर्थ याको नाहीं लिख्यो ।' यह हस्तलिखित प्रतियों में
मिलता है, किंतु लीथोवाली प्रति में नहीं है।
१६- कैसवराय-केसवदास । बिलोचन-सुलोचन । नीचे करौ-चेतहु ।
करै-फलै । एक-बीस । टरौ-टरै । तेरे-तेरी । ह्वै-ह्वैं ।
त्रयोदश प्रभाव २४६
कृष्ण को झुकिवो-( सवैया )
(४५८) तासो बसाइ कहा कहि केसव कामलता तरु तेंदु रई ।
बिधि की लिपि लोपो न जाइ जाइ अमोलिक लै मनि सीस भुजंग दई
अपनो मुख देखहु आरसी लै पुनि बात कहौ परमान-लई ।
वृषभान-सुता पर और सुहागिल बाउ कहाँ लगि जीभ गई । १७।
शब्दार्थ—तासों बसाइ कहा = उससे क्या वश चलता है ? कामलता =
कामदेव की लता ( राधिका) । तरु = वृक्ष। तेंदु = तेंदू। रई = अनुरक्त
हुई । मेटि न०= मिटाई नहीं जा सकती । अमोलिक = अमूल्य । भुजंग = सर्प;
उपपति (परकीया नायिकाओं से प्रेम करनेवाला) । दई=दी । परमान-लई=
प्रमाणयुक्त । सुहागिल = सौभाग्यवती, नायिका। बाउ कहाँ लगि जीभ गई =
भला जीभ कहाँ तक गई है, आप कैसी बढ़ बढ़कर बातें करने लगे हैं।
भावार्थ-इसमें क्या वश चल सकता है कि कामलता तेंदू के वृक्ष
(नीरस, श्रीकृष्ण) से प्रेम करती है। ब्रह्मा का लिखा मिटाया तो जा नहीं
सकता, देखो तो अमूल्य मणि ( मन ) लेकर भुजंग के सिर पर पटक दी
( तुम्हारे ऐसे लंपट को मन सौंप दिया)। हाथ में दर्पण लेकर अपना मुँह
तो देखो । बातें कहो तो प्रामाणिक कहो ( बेसिर पैर की बातें मत करो)।
भला वृषभानु की पुत्री राधिका की और अन्य सौभाग्यवती स्त्रियों की चर्चा
ही क्या, भला तुम्हारी जीभ कहाँ तक बढ़बढ़ गई है ( कि ऐसी बातें बकते
हो) । (नायक ने कदाचित् कह दिया है कि राधिका न मिलेंगी तो मुझे
क्या नायिकाओं का टोटा है, इसी पर सखी फटकार रही है)।
राधिका सों उराहनो-( कवित्त )
(४५६) केसौदास कौन बड़ो रूप, कुलकानि पै .
अनोखो एक तेरेहीं अनख उर ओलियै ।
आपनें सयान काहू मानसे न मानै तूं,
गुमान के बिमान बैठि व्योम व्योम डोलियै ।
ऐंड सों ऐंडाइ अति अंचल उड़ाइ ऐसी,
छाँडि ऐंड बैंड चितवनि निरमोलियै ।
दीनो मन हाथ जिनि हीरा सो हरषि कै,
ता हरि सों हरिननैनी हरेहूँ तो बोलियै । १८।
१७—तेंदु-तिंदु । लिपि-गति । लोपी-मेटी । अमोलिक-अलौषित, अलौ-
किक । पुनि-कर । बाउ०-बारौ जहाँ । १८-पै०-ही पै नोंखो । अनख-मनुप ।
काहू-कान्हू । बैठि-चढ़ी । ऐंडाइ-ऐंडति । उड़ाइ-उड़ात । जिनि-जिहि ।
कै ता-ऐसे । तौ-न ।
२५० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—कानि=मर्यादा । अनख = रोष । श्रोलियै = घुस गया हैं,
उत्पन्न हो गया है । सयान = चतुराई । मानसै = मनुष्य को । ऐंड = गर्व ।
ऐंडाति = टेढ़ी मेढ़ी होती है । ऐंड बेंड = टेढ़ी मेढ़ी । निरमोलियै = निर्मूल्य,
अमूल्य । हरेहूँ = धीरे से भी ।
भावार्थ—तेरी कुल-मर्यादा क्या बड़ी है, केवल रूप पर ही तेरे हृदय
में ऐसा अनोखा रोष उत्पन्न हो गया है । अपने चातुर्य के सामने तू किसी
व्यक्ति को कुछ समझती ही नहीं । गुमान के विमान पर चढ़ी हुई आकाश ही
आकाश में उड़ी फिरती है (धरती पर तो पैर ही नहीं रखती) । गर्व से तू
टेढ़ी मेढ़ी हुई जा रही है, तेरा अंचल भी उड़ रहा है (उसके सँभालने की
भी चिंता नहीं, कुछ तो लज्जा कर !) । ऐसा बेतुका हठ छोड़, तू तो अत्यंत
अमूल्य दृष्टिवाली है । (कुछ तो विचार कर कि) हे हरिणनयनी, जिन
श्रीकृष्ण ने अपना हीरे सा (बहुमूल्य) मन प्रसन्नतापूर्वक तुझे दे डाला,
क्या उनसे धीरे से भी बोलना न चाहिए ।
कृष्ण को उराहनो-(कवित्त)
(४६०) सौंहनि को सोच न सकोच काहू बोच की को,
पोछौ प्यारे पीक-लीक लोचन किनारे की ।
माखन की चोरी की है थोरी थोरी मोहूँ सुधि,
जानति बिसेष वहै जोरी है जु बारे की ।
मेरियै कुमति और कहा कहौं केसौदास,
लागति है लाल लाज इहाँ पाइ धारे की ।
एती है मुठाई, वह अबहीं रुठाई, यह
छारहू तौ छूटी नाहिं पाइन के पारे की । १९।
शब्दार्थ—सोच = चिंता, परवा । सकोच = संकोच, लज्जा । बीच की
को = मध्यस्थ का । जोरी = जोड़ी । बारे की = लड़कपन की । पाइ धारे
की = यहाँ आने की । एतो है = इतनी अधिक । रुठाई = रुष्ट कर दिया ।
छारहू = धूल भी । पाइन के पारे की = पैरों पर पड़ने की ।
भावार्थ—आपको न तो शपथों की चिंता है और न बीच में पड़नेवाली
का ही संकोच है । भला नेत्रों के किनारे लगी हुई पान की पीक का चिह्न तो
पोछ डालिए । (दूसरी नायिका के यहाँ जाकर जो आपने चोरों की सी
करतूत की है यह नई बात नहीं है, लड़कपन से आप घर का मक्खन छोड़कर
१९—बिसेष०-बहै किसोरी । जोरी-मोरी । पाइ-पांव, पग । रुठाई-
रुढ़ाई । यह. वह । २०-के दुख-की दुख । पाइहै-पैहै मैं । जी की०-जीय
की तोहि ।
त्रयोदश प्रभाव २५१
दूसरों के यहाँ) जो मक्खन की चोरी किया करते थे उसकी आपके साथ न
रहने पर भी मुझे थोड़ी थोड़ी सुध अब तक बनी हुई है और वह भी यह
बात जानती है, क्योंकि लड़कपन से वह आपके साथ ही रह रही है। मेरी
यह बुद्धि बुरी ही है (कि मैं आपको समझाने आती हूँ) और अधिक क्या
कहूँ, हे लाल, मुझे तो यहाँ पैर रखने में लज्जा जान पड़ती है। आप इतना
अधिक झूठ बोल रहे हैं और उसे अपनी करनी से अभी अभी रुष्ट भी कर
चुके हैं। देखिए अभी तक (नायिका के) पैरों पर गिरने के कारण (आपके
माथे में लगी) धूल भी नहीं छूटी है और फिर वैसी ही करनी करने लगे।
राधा-वचन सखी सों अपरंच-(सवैया)
(४६१) आँधी सी धाइ है, दाई दवारि सी, दासिन के दुख देह दही है।
ताप के तूल तँबोलिनि, मालिनि, नाइनि नाह के नेह नही है।
तेरी सौं तेरी सौं मेरी सखी सुनि तेरी अकेली की आस रही है।
कान्ह मिलाउ कि मोहिं न पाइहै आपने जी की मैं तोसों कही है। २०
शब्दार्थ-आँधी सी = आँधी की भाँति कष्टप्रद । धाइ = धात्री, धाय।
दाइ = दाई । दवारि सी = दावाग्नि की भाँति कष्ट देनेवाली । दही है =
(मेरी देह) जल रही है। तूल = (तुल्य) समान। नाह = नाथ, प्रिय ।
नही है = जुड़ी हुई है, संलग्न है (प्रिय से प्रेम कर लिया है) सौं = शपथ ।
सुनि = सुनो। तेरी अकेली = केवल एक तेरी ही। मोहिं नं० = मुझे न
पाएगी (मैं मर जाऊँगी)।
सूचना-यह छंद सरदार की टीका और हस्तलिखित प्रतियों में तो है,
पर लीथोवाली प्रति में नहीं है। इसमें केशव की छाप भी नहीं है।
(दोहा)
(४६२) इहि बिधि स्याम-सिंगार-रस, बहु बिधि बरनो लोइ ।
चारि बरन चहुँ आश्रमनि, कहत सुनत सुख होइ ।२१।
शब्दार्थ-बहु बिधि बरनो लोइ = लोगों ने बहुत प्रकार से वर्णन
किया है।
(४६३) राधा राधा-रमन के करयो सिंगार सुबेष ।
रस आदिक आगे कहौं, और रसनि को भेष ।२२।
शब्दार्थ-करचो = वर्णन किया है। भेष = स्वरूप ।
सूचना-यह छंद केवल सरदार की टीका में मिलता है।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां सखीजनकर्मवर्णनं
नाम त्रयोदशः प्रभावः ।१३।
२१-रस-सब। लोइ-सोइ ।
चतुर्दश प्रभाव
अथ हास्यरस-लक्षणम्-- (दोहा)
(४६४) नयन नयन कछु करत जब, मन को मोद उदोत ।
चतुर चित्त पहिचानिये, तहाँ हास्यरस होत । १ ।
भावार्थ- नेत्रों (चेष्टाओं) और वचनों को कुछ का कुछ करने से जहाँ
मन में प्रसन्नता का उदय हो वहाँ हास्यरस होता है।
हास्यरस के भेद-- (दोहा)
(४६५) मंदहास कलहास पुनि, कहि केसव अतिहास ।
कोबिद कबि बरनत सबै, अरु चौथो परिहास । २ ।
मंदहास-लक्षण-- (दोहा)
(४६६) बिगसहिं नयन, कपोल कछु, दसन, दसन के बास ।
मंदहास तासों कहत, कोबिद केसौदास । ३ ।
शब्दार्थ--बिगसहि = थोड़े खुले हों। दसन के बास = दाँतों का आव-
रण, होंठ ।
भावार्थ- जहाँ नेत्र, कपोल, दाँत और होंठ (हँसने में) थोड़े थोड़े
खुल जायें वहाँ मंदहास होता है ।
(४६७) बरनत बाढ़े ग्रंथ बहु, कहे न केसवदास ।
औरौ रस यों जानियो, सबै प्रछन्न प्रकास । ४ ।
शब्दार्थ-औरौ रस० - अन्य रसों के संबंध में भी यही समझना
चाहिए अर्थात् शृंगार के अतिरिक्त अन्य सभी रसों का विस्तार-भय से संक्षेप
में ही निरूपण किया गया है। सबमें प्रच्छन्न० = सबमें प्रच्छन्न और प्रकाश
भेद होते हैं ।
सूचना- यह दोहा केवल हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
राधिका को मंदहास, यथा-- (सवैया)
(४६८) भेद की बात सुने तें कछू वह मासक तें मुसुक्यान लगी है ।
बैठति है तिनमैं हठिकै जिनको तुमसों मति प्रेमपगी है ।
१-कछु-ये, जब-जहँ, कछु । मन-जन । पहिचानिये-पहिचानिजौ ।
२-बरनत-बरनी । ३-बिगसहि-बिकसहि । दसन के-बसन के । कहत-
कहै । ४-बहु-जिंहि । कहे न-जेहि कहि, जेहि कबि ।
चतुर्दश प्रभाव २५३
जानति हौं नलराज दमैंती की दूतकथा रस-रंग रँगी है ।
पूजैगी साध सबै सुख की बड़भाग की केसव ज्योति जगी है ।५।
शब्दार्थ—भेद की बात=रहस्य की बातें । मासक तें = एक मास से ।
हठिकै = बरबस । जिनकी० = जो तुमसे प्रेम करते हैं । नलराज = राजा
नल । दमैंती = दमयंती । दूतकथा० = नल और दमयंती की दूतकथा के
आनंद के रंग में रँग गई है, उनकी दूतकथा चाव से सुनती है । साध =
( सं० श्रद्धा ) उत्कट अभिलाष । बड़भाग० = परम सौभाग्य का उदय
हो गया है ।
विवरण—'भेद की बात' से मुसकाना मंदहास है ।
सूचना—यह सवैया 'कविप्रिया' के हास्य 'रसवत्' में भी उद्धृत है ।
अंतर यह है कि यहाँ पहली पंक्ति चौथी पंक्ति हो गई है । लीथोवाली प्रति में
यह छंद नहीं है ।
अपरंच—( सवैया )
(४६६) जानै को पान खवावत क्योंहूँ गई अँगुरी गड़ि ओठ नवीने ।
तैं चितयो तबहीं तिहिं रीति री लाल के लोचन लीलि से लीने ।
बात कही हरएँ हँसि केसव मैं समुझी वे महारस भीने ।
जानति हौं पिय के जिय के अभिलाष सबै परिपूरन कीने । ६ ।
शब्दार्थ—गड़ि गई=लग गई, छू गई । लीलि से० = खा सी गईं, ऐसा
आँखें फाड़ फाड़कर देखा कि नेत्रों को खा सी गई । हरएँ = धीरे से ।
भावार्थ—( सखी का वचन नायिका प्रति ) न जाने किस प्रकार पान
खिलाते समय तेरे नए ( कोमल होंठ में उनकी उँगली गड़ गई, उस समय तूने
ऐसी कड़ी दृष्टि से देखा कि नायक के नेत्रों को खा सी गई ( आँखें फाड़ फाड़
कर रोषपूर्वक देखा ) और धीरे धीरे हँसकर फिर कुछ कहा भी । मैं
समझती हूँ कि वे अत्यंत रसिक हैं । मैं जानती हूँ कि तूने नायक के हृदय के
सभी अभिलाष ( इसी मुद्रा से ) पूर्ण कर दिए ।
विवरण—नायिका को नायक के विनोद का स्मरण कराकर हँसाना
चाहती है, उद्देश्य मिलाने का है ।
श्रीकृष्णजू को मंदहास, यथा—( कवित्त )
(४७०) दसन-बसन माँझ दमकै दसन-दुति,
बरषि मदन-सर करत अचेत है।
५—बड़-तन । ६—अँगुरी०-लगि अंगुली । तैं-तौ । रीति०-भाँति जु ।
केसव-कै सुनि ।
२५४ रसिकप्रिया
झाईं झलकति लोल लोचन कपोलनि में,
मोल लेत मन क्रम बचन समेत हौ।
भौंहैं कहैं देत भाउ सुनौ मेरी भावती के,
भावते छबीले लाल मौन कौन हेत हौ।
केसव प्रकास हास हँसि कहा लेहुगे जू,
ऐसें ही हँसे तें तौ हिये कौं हरे लेत हौ।७।
शब्दार्थ—दसन-बसन = दांतों का वस्त्र, होंठ। सर = बाण। क्रम =
कर्म। प्रकास = प्रत्यक्ष, खुलकर।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायक प्रति) आपके होठों के भीतर ही दांतों
की चमक दमदमाती है, इस प्रकार आप कामबाण की वृष्टि करके अचेत कर
देते हैं। चंचल नेत्रों और कपोलों में (हास की एक हलकी) छाया सी झल-
मला रही है। इसी के द्वारा मनसा, वाचा, कर्मणा आप मोल ले लेते हैं
(मनोहर छटा से देखनेवाला मुग्ध हो जाता है)। भौंहें भेद की बातें बतला
रही हैं। हे मेरी प्यारी सखी के प्रिय छबीले लाल, आप मौन किसलिए हैं?
जब आप इस प्रकार (मंदहास) से ही हंसकर हृदय को चुराए ले रहे हैं तो
खुलकर हँसने पर न जाने क्या करेंगे? (जब मंदहास में यह छटा है तो
खुले हास में न जाने कितनी अधिक मनोहरता होगी)।
कलहास-लक्षण—(दोहा)
(४७१) जहँ सुनिये कलध्वनि कछू, कोमल बिमल बिलास।
केसव तन मन मोहियै, बरनहु कबि कलहास।८।
भावार्थ—जहाँ कोमल चेष्टाओं के साथ मनोहारिणी मधुर ध्वनि भी
थोड़ी थोड़ी हो वहाँ कलहास होता है (मंदहास में ध्वनि कुछ भी नहीं होती
कलहास में ध्वनि भी होती है)।
श्रीराधिकाजू को कलहास यथा—(सवैया)
(४७२) काछैं सितासित काछनी केसव पातुर ज्यों पुतरीनि बिचारौ।
कोटि कटाक्ष नचै गतिभेद नचावत नायक नेह निनारौ।
बाजत है मृदुहास मृदंग सु दीपति दीपनि को उजियारौ।
देखत हौ हरि देखि तुम्हें यह होत है आँखिन ही में अखारौ।६।
शब्दार्थ—काछैं = पहने हुए। सितासित = (सित + असित) श्वेत और
काली। काछनी = यहाँ एक प्रकार का घाँघरा। पातुर ज्यों = वेश्या की
७—माँझ-माह, मंद। दमके-दरसे। सर-रस, द्युति। देत-भेद।
सुनौ-कहो। हँसे तें-तो हँसनि ही तें हियो अरि। ८—बरनहु-बरनत।
६—निनारो-निहारो, निन्यारो। है-जु। ही में-बीच।
चतुर्दश प्रभाव २५५
भाँति । पुतरीन = पुतलियाँ । बिचारौ = समझो । गतिभेद = नाच की अनेक
चालें । नायक = वेश्याओं को नाच सिखानेवाला उस्ताद । निनारौ = न्यारा,
विलक्षण, चतुर । दीपति = चमक ( आँखों की ) । उजियारौ = प्रकाश ।
अखारो = नाच का समाज, नाचरंग ।
भावार्थ—( सखी का वचन नायक प्रति ) आपको देखकर तो नायिका
के नेत्रों में नाच का समाज जुड़ जाता है । पुतलियों को श्वेत और श्याम रंग
की काछनी पहने हुए नाचनेवाली समझिए । करोड़ों कटाक्ष ही नाच की
अनेक गतियाँ हैं । नचानेवाला उस्ताद चतुर प्रेम है । मृदुहास ही मृदंग की
भाँति बजता है । ( आँखों में ) जो ज्योति ( जगती ) है वही दीपकों का
प्रकाश है । आप देख रहे हैं न ?
अलंकार—उपमागर्भित सावयव रूपक ।
सूचना—'सरदार' ने अपनी टीका में कहा है कि 'यह छंद मंदहास में
उदाहरण देने योग्य है' । किंतु प्रतियों में यह 'कलहास' के उदाहरण में ही
मिलता है ।
अपरंच, यथा—( सवैया )
(४७३) प्रेम घने रस-बैन सने गति नैननि की सर-मैन भई ही ।
बाल-बहिक्रम-दीपति देह त्रिबिक्रम की गति लीलि लई ही ।
भौंहैं चढ़ाइ सखीनि दुराइ इतै मुसकाइ उतै चितई ही ।
केसव पाइहौ आजु भलें चित चोरि लै कालि गुवालि गई ही ।१०।
शब्दार्थ—रस-बैन=आनंद के वचन । सर-मैन=कामबाण । बहिक्रम=
वयःक्रम, वयःसंधि । त्रिबिक्रम=वह अवतार जिसने साढ़े-तीन डग में त्रिलोक
तथा बलि का शरीर नाप लिया था । त्रिबिक्रम की०=त्रिविक्रम की दीप्ति को
भी दबा दिया है ।
भावार्थ—( सखी का वचन नायक से ) अत्यंत प्रेम और आनंद से युक्त
उसने वचन कहे थे । नेत्रों की चाल तो कामबाण की भाँति थी । उस बाला
के वयःक्रम (वयःसंधि) के कारण उसके शरीर में जो दीप्ति दिखाई पड़ रही
थी उसने तो त्रिविक्रम के तेज को भी दबा दिया था ( उस दीप्ति के कारण
आप भी उसके वश में हो गए थे ) । भौंहें चढ़ाकर सखियों को हटाकर
इधर की ओर मुख करते हुए देखकर उसने उधर की ओर देखा था । इस
प्रकार जो गोपिका कल आपका चित्त चुरा ले गई थी आज आप उसे निश्चित
पाएँगे ।
१०—सर-रस । मई-मई है । बहिक्रम-बयक्रम । पाइहौ-पाइहै । लै-
जु । गुवालि-जु आलि ।
२५६ रसिकप्रिया
सूचना—यह सवैया लीथोवाली प्रति में नहीं है। हस्तलिखित और
'सरदार' वाली प्रति में है। पर सरदार ने लिखा है कि 'यह कवित्त प्राचीन
पुस्तकन में नाहीं मिलत यातें नारायण कवि याको अर्थ नाहीं लिखो।'
श्रीकृष्णजू को कलहात, यथा—( सवैया )
(४७४) आजु सखी हरि तोसों कछू बड़ी बार लौं बात कही रसभीनी ।
मेलि गरैं पटुका पुनि केसव हारि हियें मनुहारि सी कीनी ।
मोहिं अचंभो महा सु इहा कहि बाँह कहा बड़ो बार लौं लीनी ।
तैं सिर हाथ दियो उनिकैं उनि गाँठि कहा हँसि आँचर दीनी ।११।
शब्दार्थ—बार लौं=देर तक । रसभीनी=रसीली । पटुका=कमर में
बाँधा जानेवाला वस्त्र । मेलि गरैं पटुका=गले में कमर का पटका डालकर ।
हारि=हार मानकर । मनुहारि=प्रार्थना । बड़ी बार लौं=बहुत
देर तक ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, आज श्रीकृष्ण
तुमसे बड़ी देर तक कुछ रसीली बातें करते रहे, गले में पटका डालकर और
हृदय से हार मानकर तेरी मनुहार सी करते रहे। (यहाँ तक तो कोई अचरज
की बात नहीं, पर ) मुझे इस बात का बड़ा अचरज होता है कि उन्होंने
बड़ी देर तक तुम्हारी बाँह (बड़े प्यार से ) ली। तुम भला बतलाओ न
क्या बात है ? तुमने उनके मस्तक पर हाथ क्यों रखा और उन्होंने हँसकर
अंचल के छोर में गाँठ क्यों दी ? (नायिका ने सौत के यहाँ जाने की बात
पर मान किया था, नायक ने अपने गले में पटका डालकर अपनी दीनता
दिखाते हुए उसकी विनती की कि अब ऐसी भूल न होगी, क्षमा करो । उसने
देर तक नायिका की बाँह पकड़कर शपथ ली। नायिका ने सिर पर हाथ
रखकर क्षमा की और उन्होंने यह कहकर अंचल के छोर में गाँठ दी कि अब
गाँठ बाँधता हूँ, कभी ऐसा न करूँगा ) !
सूचना—'सरदार' ने सिर पर हाथ रखने का एक तात्पर्य 'संकेत में
मिलना' भी लिया है ।
अतिहास-लक्षण — ( दोहा )
(४७५) जहाँ हँसहिं निसंक ह्वै, प्रकटहिं सुख मुखबास ।
आधे आधे बरन पद, उपजि परत अतिहास ।१२।
११—बार-बेर । सी-सो । बांह-चाह । बड़ी-बहू । बार लौं-बारन ।
१२—हँसहिं-हँसे । ह्वै-कै । प्रगटहि-प्रकटैं । आधे०-अर्ध बरन पद होत है ।
१७ चतुर्दश प्रभाव २५७
शब्दार्थ—मुख . मुखवास = मुख की नैसर्गिक सुगंध । आधे० = आधे
अक्षरों के ही शब्द निकलें, अस्फुट शब्द निकलें।
भावार्थ—जहाँ निःशंक हँसने से मुख की नैसर्गिक सुगंध निकलने लगे
और अस्फुट शब्द भी हों वहाँ अतिहास होता है।
श्रीराधिकाजू को अतिहास, यथा-(कवित्त)
(४७६) तैसीयै जगत ज्योति सीस सीसफूलनि की,
चिलकत तरुनि तिलक तेरे भाल को।
तैसीये दसन द्युति दमकति केसौदास,
तैसोई लसत लाल लाल कंठमाल को।
तैसीयै चमक चारु चिबुक कपोलनि की,
चमकत देखौ नकमोती चल चाल को।
हरैं हरैं हँसि नेक चतुर चपलनैनि,
चित्त चकौंधै मेरे मदनगुपाल को ।१३।
शब्दार्थ-चिलकत = चमकता है। तरुनि = नायिका। लाल = लाल रंग-
वाला। लाल = माणिक। चिबुक = ठुड्डी। चल चाल को = चल चाल-
वाला, चंचल। हरैं हरैं = धीरे धीरे।
भावार्थ-(सखी-वचन नायिका प्रति) हे तरुणी, एक तो सिर पर के
शीशफूल वैसे ही (अत्यंत दीप्तिपूर्वक) चमक रहे हैं, दूसरे तेरे माथे पर
लगा तिलक भी वैसा ही चमचमा रहा है। तीसरे दांतों की द्युति भी वैसी ही
हों रही है, चौथे कंठहार में लगा लाल वर्णवाला माणिक भी दमक रहा है,
पांचवें सुंदर ठुड्डी और कपोलों की भी वैसी ही चमक है, छठे नाक (की
बेसर) का मोती भी वैसा ही दमक रहा है। (इतनी अधिक चमक है कि
कहा नहीं जाता)। अतः ऐ चतुर चंचल नेत्रवाली, तू थोड़ा धीरे धीरे हँस
क्योंकि (इतनी चमकों के कारण) मेरे मदनगोपाल का चित्त चकाचौंध में
पड़कर व्यग्र हो जाता है।
श्रीकृष्णजू को अतिहस, यथा-(कवित्त)
(४७७) गिरि गिरि उठि उठि रीझि रीझि लावैं कंठ,
बीच बीच न्यारे होत छबि न्यारी न्यारी सौं।
आपुस में अकुलाइ आधे आधे आखरनि,
आछी आछी बात कहैं आछी एक यारी सौं।
सुनत सुहाइ सब समुझि परै न कछू,
केसौदास की सौं दुरि देखे मैं हुस्यारी सौं।
१३-चिलकत-झलकत। तरुनि-तिलकु, सिलकु, तिलनि । तैसीये-
तैसेई। लाल लाल-लाल कंठ। चमकत-झलकत।
२५८ रसिकप्रिया
तरनि-तनूजा-तीर तरबर-तर ठाढ़े,
तारी दै दै हँसत कुँवर कान्ह प्यारी सों ।१४।
शब्दार्थ—आधे आधे आखरनि = अस्फुट वचनों से । आछी = मनो-
हारिणी । यारी = मित्रता । सुहाइ = अच्छा लगता है । दुरि = छिपकर ।
हुस्यारी=चतुराई । तरनि = सूर्य । तनूजा = पुत्री । तरनि-तनूजा = यमुना ।
तर = तले, नीचे ।
भावार्थ—( सखी का वचन सखी से ) वे हँसते हँसते गिर गिर पड़ते हैं,
फिर उठते हैं और रीझ रीझकर एक दूसरे के गले लगते हैं । बीच बीच में
( कभी कभी ) वे विलक्षण शोभा ( मुद्रा ) के साथ दूसरे से पृथक् भी हो
जाते हैं । वे उतावले होकर परस्पर अस्फुट अक्षरों से अच्छी अच्छी बातें भी
मनोहारिणी मित्रता के साथ करते हैं । उनकी बातें सुनने में तो अच्छी
लगती हैं, पर समझ में कुछ नहीं आतीं । तेरी शपथ मैंने छिपकर चतुराई से
देखा है ( देख आई हूँ, तू भी चल ), यमुना के तट पर तरुवर ( कदंब ) के
नीचे खड़े होकर कुँवर कन्हैया प्यारी राधिका से ताल बजा बजाकर हँस रहे हैं।
अलंकार—समुच्चय ।
अथ परिहास-लक्षण-( दोहा )
( ४७५) जहाँ परिजन सब हँसि उठैं, तजि दंपति की कानि ।
केसव कौनहुँ बुद्धिबल सो परिहास बखानि ।१५।
शब्दार्थ—परिजन = सखा, सखी आदि निकट रहनेवाले लोग । कानि
= मर्यादा ।
श्रीराधिकाजू को परिहास, यथा-( सवैया )
(४७६) आई है एक महाबन तें तिय गावति मानो गिरा पगु धारी ।
सुंदरता जनु काम की कामिनि बोलि कह्यो वृषभानुदुलारी ।
गोपिकै ल्याइ गुपालहि वै अकुलाइ मिलीं उठि आदर भारी ।
केसव भेंटत ही भरि अंक हँसीं सब कीक दै गोपकुमारी ।१६।
शब्दार्थ—गिरा=सरस्वती । पगु धारी = आई, पधारी । बोलि =
बुलाकर । कीक दै = खिलखिलाकर ।
भावार्थ—( सखियों ने राधा का मान छुड़ाने के लिए अथवा विनोद के
लिए श्रीकृष्ण को गोपी के वेश में गीत गाते हुए आने को कहा इधर) राधिका
को बुलाकर उनसे कहा कि 'महावन में रहनेवाली एक गायिका गाती हुई
१४—यारी-हारी । कछू-अब । केसोदास-कैसोराइ । १५—तनूजा-
तनैया । कुँवर-कुमार । कान्ह-काहू । १६—मानों-गीत । बोलि-टेरि ।
गुपालहि वै-गुपाल हिये । उठि-करि । आदर-सादर । कीक-कूक । कीक
दै-की कहै ।
आ रही है, ऐसा गाती है मानो स्वयम् सरस्वती ही अवतरित होकर आ गई
हो । सुन्दरता भी ऐसी हैं मानो कामदेव की पत्नी रति हो । इस प्रकार उस
गोपिका को लाकर राधिका के पास कर दिया । वे अत्यंत आदर के साथ
उतावली से उठकर उस गोपिका ( गोपाल ) से भेंटने लगीं तब सखियाँ
खिलखिलाकर हँस पड़ीं ।
श्रीकृष्णजू को परिहास, यथा-(सवैया)
(४८०) सखि बात सुनौ इक मोहन की निकसी मटुको सिर री हलकै ।
पुनि बाँधि लई सुनियै नतनारु कहूँ कहूँ बुंद करी छलकै ।
निकसीं उहि गैल हुते जहँ मोहन, लीनी उतारि जबै चलकै ।
पतुकी धरी स्याम खिसाइ रहे उत ग्वारि हँसी मुख आँचल कै।१७।
शब्दार्थ—हलकै = रीती, खाली । नतनारु = मटकी का मुँह बाँधने का
कपड़ा । छलकै = छलकने के । हुते = थे । चलकै = आकर । पतुकी = मटकी ।
भावार्थ— ( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, मोहन की एक बात
सुनो । वह ग्वालिनी दूध की खाली मटकी सिर पर लेकर चली । उसने उसका
मुँह कपड़े से ढँककर बाँध दिया था और ( दूध ) छलकने की सी बूँदें भी
मटकी में कहीं कहीं डाल दी थीं । फिर वह उस मार्ग से होकर निकली जहाँ
मोहन रहते थे । मोहन ने दूध की मटकी समझकर उसके पास आकर (दान
लेने के लिए वह मटकी उतरवा ली ) । उसने मटकी रख दी, खोलने पर
जब कुछ न निकला तब कृष्ण लज्जित हो गए । उधर वह ग्वालिनी भी
मुँह में अंचल लगाकर हँसने लगी ।
सूचना—( १ ) यह सवया केवल सरदारवाली प्रति में मिलता है ।
( २ ) रसग्राहकचंद्रिका में यह दोहा अधिक है—
कह्यो हासरस बरनि यों अरु रस सुगम कबित्त ।
करुनादिक सिंगारमय बरने समझहु चित्त ।
अथ करुणरस-लक्षण-( दोहा )
(४८१) प्रिय के बिप्रिय करन तें, आनि करुनरस होत ।
ऐसो बरन बखानियै, जैसे तरुन कपोत ।१८।
शब्दार्थ—बिप्रिय = अप्रिय, कष्टदायिनी बात । प्रिय के० = प्रिय के
लिए अप्रिय कार्य करने से करुणरस होता है । बरन = वर्ण, रंग । तरुन
कपोत = युवा कबूतर । ऐसो बरन० = करुणरस का रंग युवा कबूतर की
भाँति होता है ।
१७—सखि०--जुवती सुनि औगुन मोहन के । री हलकै-रीतिम लैके ।
सुनियै--सुनिए । नतनारु--नतनासु । पतुकी--पिनुकी । १८-तें-को । आनि-
अति । करुन०-करुनारस तहँ होत, करना रस होत ।
२६० रसिकप्रिया
श्रीराधिकाजू को करुणरस, यथा-(कवित्त)
(४८२) तेज सूर से अपार, चंद्रमा से सुकुमार,
संभु से उदार उर उर धरियत है ।
इंद्रजू से प्रभु पूरे, रामजू से रनसूरे,
कामजू से रूप रूरे हिय हरियत है ।
सागर से धीर गनपति से चतुर अति,
ऐसे अबिबेक कैसैं दिन भरियत है ।
नंद अतिमंद भला जसुदा सौं कहौं कहा,
ऐसे पूत पाइ पसुपाल करियत है ।१६।
शब्दार्थ—तेज = प्रताप । सूर = सूर्य । उदार = विशाल । उर=वक्षः-
स्थल । उर धरियत है=हृदय में समझे जाते हैं । प्रभु = स्वामित्ववाले ।
रन-सूरे = रणशूर, वीर । रूरे = सुंदर । अबिबेक = मूर्खता । कैसैं दिन
भरियत है = दिन कैसे व्यतीत होते हैं । मतिमंद = मंदबुद्धि । पसुपाल =
पशुपाल, गोचारण आदि ।
भावार्थ—सूर्य की भाँति अपार तेजवाले, चंद्रमा की भाँति सुकुमार,
शिव की भाँति उदार वक्ष, इंद्र की भाँति प्रभुत्ववाले, राम की भाँति वीर,
काम की भाँति सुंदर छवि से हृदय हरनेवाले, समुद्र की भाँति धीर, गणेश
की भाँति अत्यंत चतुर पुत्र को पाकर उससे पशु चराने का काम कराना
कैसी मूर्खता है। नंद तो अत्यंत मंदबुद्धि जान पड़ते हैं, यशोदा को क्या
कहूँ ? ( भला ऐसी मूर्खता से ) उनके दिन कैसे कटते हैं ।
सूचना—'प्रिय का दुःख' आलंबन होने से यहाँ करुणरस है ।
श्रीकृष्णजू को करुणरस, यथा— ( कवित्त )
(४८३) चंपे की सी कली भली केसव सुबास भरी,
रूप की सी मंजरी मधुर मन भाइयै ।
बेद की सी बानी, अति बानी तें सयानी, देव-
राय की सी रानी जानी जग सुखदाइयै ।
काम की कला सी, चपला सी, कामकला सी,
कमला सी देह धरें पूरे पून्य पाइयै ।
कौनैं कीनी निपट कुचालि जाति ग्वालि ऐसी,
राधिका कुँबरि पर गोरस बिछाइयै ।२०।
१६—उर--प्रति । अति-चर । २०—भली-अलौ । भरी-मली । बेद-
देव । जानी०-केसोदास जग जाइए । काम की०-कामअबला सो कमला
सी देखी देह धरे पूरन प्रताप तेज ।
२६२ रसिकप्रिया
को मानसरोवर त्याग देना पड़ा, बेल कठोर हो गया, केसर पीली पड़ गई,
अनार का हृदय फट गया । कनक = सोना (वर्ण) । तन = शरीर । तनक० =
थोड़ा थोड़ा करके अर्थात् (अत्यंत कष्ट सहकर) । ससि = चंद्रमा (मुख) ।
घटत बढ़त = भय से घटता है, कृपा करेंगी इस आशा से बढ़ता है । बंधुजीव =
फूल दुपहरिया, गुल्लाला (तलवों की ललाई) । गंधहीनो = गंधरहित ।
कोबिद = पंडित, चतुर ।
वचन-सखी की उक्ति सखी से । राधिका के निकट ही वह दूसरी
सखी से ये बातें करती है जिससे कोप छूट जाय ।
सूचना-राधिका ने सौत पर कोप किया है ।
श्रीकृष्ण जू को रौद्ररस, यथा-(कवित्त)
(४८६) मीडि मार्यो कलह, बियोग मार्यो बोरिकै,
मरोरि मार्यो अभिमान भार्यो भय भान्यो है।
सबको सुहाग अनुराग लटि लीनो दीनों,
राधिका कुँवरि कहँ सब सुख सान्यो है।
कपट कपटि डार्यो निपट कै औरनि सों,
मेटी पहिचानि मन में हू पहिचान्यो है।
जीत्यो रतिरन मथ्यो मनमथहू को मन,
केसोदास कौन कहुँ रोष उर आन्यो है। २३।
शब्दार्थ-मींडि मारयो कलह = कलह को मींजकर मार डाला ।
बोरिकै = डुबोकर । भारयो भय भान्यो है = भारी भय को भी भंग कर डाला
है । कपट = छल । कपटि डारयो = नोच लिया । निपट कै = एकदम । मन
में हू = मन से भी । मेटी पहिचानि मन में हू पहिचान्यो हैं = मन से भी
जानने की पहचान मिटा दी है ।
भावार्थ- (सखी की उक्ति नायक से) आपने कलह को मींजकर मार
डाला, वियोग को डुबोकर मारा, अभिमान को मरोड़ फेंका, भारी भय का
भी अंगभंग कर दिया, सबका सौभाग्य और अनुराग लूटकर राधिका कुमारी
को देकर उन्हें सब प्रकार के सुख से युक्त कर दिया है । कष्ट को तो एकदम
नोच कर फेंक दिया, औरों को मन द्वारा पहचानने की पहचान भी मिटा
दी है और रति के युद्ध में कामदेव का भी मन मथ डाला है (क्रोध करके
जैसी वीरता दिखाई जाती है वैसी तो आप दिखा चुके) अब किसके लिए
रोष हृदय में ले आए हैं (अब किसे नष्ट करना या जीतना है)। (युद्ध के
पक्ष में 'मींडि डार्यो' आदि का शब्दार्थ लिया गया है, प्रकृत अर्थ इस प्रकार
२३-मारयो-मारौ । मैं हूँ-केहूँ । केसोदास-केसौराइ । कहुँ-हूँ पै ।
चतुर्दश प्रभाव २६३
होगा—आपने कलह करना त्याग दिया, वियोग को भी दूर कर दिया,
अभिमान नहीं करते, भय भी नहीं रहा, औरों को जो सौभाग्य और अनुराग
पहले प्राप्त होता था वह राधिका को मिला है। कपट है नहीं दूसरों से मन
में भी जान-पहचान नहीं करते, रति में आप कामदेव से भी बढ़कर हैं, अब
आपके रोष करने का क्या कारण है ? रोष छोड़िए ) ।
अथ वीररस-लक्षण-(दोहा)
(४८७) होहि बीर उत्साहमय, गौर बरन द्युति अंग।
अति उदार गंभीर कहि, केसव पाइ प्रसंग ॥२४॥
शब्दार्थ—उत्साहमय = उत्साह से युक्त । गौर० = शरीर की चमक,
गौर वर्ण । उदार = उच्च भावमय । पाइ प्रसंग = अवसर आने पर ।
श्रीराधिकांजू को वीररस, यथा-(कबित्त)
(४८८) गति गजराज साजि देह की दिपति बाजि,
हाव रथ भाव पत्ति राजि चली चाल सों।
केसौदास मंदहास असि कुच भट भिरे,
भेट भए प्रतिभट भले नखजाल सों।
लाज-साज कुलकानि सोच पोच भय भानि,
भौंहैं धनु तानि बान लोचन बिसाल सों।
प्रेम को कवच कसि साहस सहायक लै,
जीत्यो रति-रन आज मदनगुपाल सों ॥२५॥
शब्दार्थ—गति = चाल । गजराज = हाथी । बाजि = घोड़ा । हाव =
शृंगारिक चेष्टाएँ। भाव = उमंगें । पत्ति = पैदल सिपाही । राजि = समूह ।
चली चाल सों = चाल से चली, अपनी गति से चली । लाज-साज = लज्जा-
शीलता । कुलकानि = कुल की मर्यादा । सोच पोच=बुरा संकोच । भानि =
तोड़कर । असि = तलवार । भिरे = लड़े । जाल = समूह । प्रतिभट =
प्रतिद्वंद्वी, योद्धा ।
भावार्थ—( सखी का वचन नायिका प्रति ) चाल रूपी हाथी, अंगदीप्ति
रूपी घोड़ा, हाव रूपी रथ, उमंग रूपी ठीक चाल से चलनेवाली पैदल सेना
सजाकर, भौंह रूपी धनुष पर विशाल नेत्र रूपी बाण चढ़ाकर, लज्जाशीलता,
कुल की मर्यादा, बुरा संकोच और भय रूपी बाधक प्रतिपक्षियों को मारकर,
मंदहास रूपी तलवार, कुच रूपी भटों को प्रतिद्वंद्वी के नखाघात रूपी भालों
२४-प्रति०-अति उर धरि गंभीर । २५-हाव-हास । राजि-राजै ।
चाल-बाल । भय-भव । पत्ति०-पैदरित । जाल-जान । कसि-साजि । जीति-
जीत्यो । रति-रागु ।