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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 286 में से

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पृष्ठ 240

त्रयोदश प्रभाव २४५
शब्दार्थ—आजु कें० = यदि दीवाली की रात सानंद मनाई जाय तो
अगले वर्ष की दीवाली तक अच्छे दिन बीतते हैं। पै = से। मति० = बुद्धि
मान की निद्रा से जाग उठी, मान छोड़कर बुद्धि कल्याण-साधन में लगी ।
चित्त-बिहार = मनोरंजन ।
सूचना—इस छंद के विषय में भी सरदार लिखते हैं—'पूर्ववत् यह
भी ग्रन्थ को बनायो है। तातें नारायण कवि तिलक नाहीं लिख्यो।'
राधिका को मिलैबो—( कबित्त )
(४५२) जौ हौं गनों औगुननि तौ तूँ गनै गुनगन,
जौ हौं गनों गुन तौ तूँ औगुन के गन मैं ।
केसौदास ऐसें प्रीति छिपावति छलनि मैं,
जैसें छनछबि छूटै छिपै जाइ घन मैं ।
भारी है निठुर निसि भादों की भयावनी में,
सु क्यों बसै घर जाको पीउ बसै बन मैं ।
बैठे तें उठावै, उठि चले तें मचलि रहै,
सोई मेरी क्यों न कहै जोई तेरे मन मैं ।११।
शब्दार्थ—छनछबि = बिजली। ऐसें० = तू अपनी प्रीति छल करके ऐसे
छिपाती है जैसे बिजली चमकती है, पर बादल में छिप जाती है। तेरे प्रेम
की केवल झलक मिलती है। जौ हौं० = मैं प्रिय के अवगुणों को गिनती हूँ तो
तू गुण गिनती है, मैं गुण गिनती हूँ तो तू अवगुण गिनती है। सु क्यों० =
जिसका प्रिय वन में बसता है वह घर में कैसे बस सकेगी। मेरी = मेरी
( प्यारी )। उठि० = यदि उठकर चलती हूँ तो न जाने देने के लिए मचलने
लगती है। जो तेरे मन में है वह क्यों नहीं कहती ( कि मुझे प्रियतम से ले
चलकर मिला दे)।
कृष्ण को मिलैबो—( कबित्त )
(४५३) सिखै हारी सखी डरपाइ हारी कादंबिनी,
दामिनो दिखाइ हारी दिसि अधरात की ।
झुकि झुकि हारी रति मारि मारि हारयो मार,
हारी झकझोरति त्रिबिध गति बात की ।
११—राधिका-प्रिया । औगुननि-औगुन । गुनगन-गुनन गन । औगुन
के गन में -अगुन गनन में । केसौदास-केसौराइ । ऐसें-ऐसी । छनछबि-छन-
छवि । छनछवि०-छिनछवि छूटि छिपै जाइ घन मैं, छिन छूटि छवि छिपै छुटि
घन मैं । सु क्यों-कैसे । तें मचलि०-तहीं बैठि रहै । मेरी०-क्यों न कहै बीर,
क्यों न कहे प्यारी ।