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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 286 में से

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पृष्ठ 245

२४८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ -झुकिबौं = मान करना । हुती=थी । गुन मानिहै = एहसान
मानेगी, कृतज्ञ होगी। मनी = ( मन्यु ) अभिमान, गर्व । मोहीं सों मनी
धरी = मुझपे ही तूने अभिमान कर रखा है ।
भावार्थ-बारंबार फेरते फेरते मैंने किसी प्रकार श्रीकृष्ण का मन फेर
लिया, उनके मन के बदल जाने से भाग्य की भली घड़ी हुई (तेरा भाग्य
जागा ) ! क्षण क्षण पर जिनके पैरों पर तू पड़ा करती थी, उन्हें लाकर
तेरे पैरों पर गिराया, मैं स्वयम् उनके पैरों पर गिरी । बड़ी प्रतिष्ठित जाति
की बेटियों की बड़ी बड़ाई को हटाकर मैंने बड़ों में भी तुझे बड़ा बनाया ।
इतने उपकार के बाद मैं तो मन में यह समझती थी कि तू मेरा उपकार
मानेगी (पर तूने सब पर पानी फेर दिया) । अब मैं भला उसे किस प्रकार
मनाऊँ, जब इतना उपकार करने पर भी तू मुझी से अभिमान कर रही है।
पुनः-( सवैया )
(४५७) केसवराय बुलावंत हैं चित चारु बिलोचन नीचे करौ जू ।
कालि करै बर एक बिसौ परौं बीसबिसे ब्रत तें न टरौ जू ।
आगिलगै तेरे कालि के सीस, परौं पर जाइ बजागि परौ जू ।
आज मिलौ तौ मिलौ ब्रजराजहि नाहिं तौ नीके ह्वै राज करौ जू १६
शब्दार्थ-कालि करै=कल करे। बर = अच्छा । कालि करै० = यदि
कल ही कल उनसे मिलो तो अच्छा । एक बिसौ = थोड़ा ही निश्चय ।
परौं = परसो । बीसबिसे = बीसों बिस्वा, पूर्ण निश्चय । बजागि = बज्राग्नि,
भयंकर अग्नि ।
भावार्थ---(सखी कहती है कि ) श्रीकृष्ण बुला रहे हैं, चित्त को सुंदर
लगनेवाले नेत्रों को थोड़ा नीचे तो करो ( मेरी ओर तो देखो, क्रोध से नेत्रों
को चढ़ाए मत रहो ) एक बिस्वा अच्छा हो कि कल मिल लो, यदि कल
मिलने का पूरा निश्चय न हो तो परसों तो इस (मिलन) व्रत से एकदम
मत टलो (अवश्य मिलो)। (इस पर नायिका बिगड़कर कहती है) तेरे
कल के सिर में आग लगे और परसों में फूंका पड़े ( भयंकर आग लगे ) ।
(तब सखी कहती है) आज मिलना हो तो श्रीकृष्ण से मिल लो, नहीं तो
अपना राज रजो (फिर उनसे मिलने की आवश्यकता ही नहीं) ।
सूचना-यह छंद सरदार की टीका में है तो, पर इसका अर्थ यह कह-
कर छोड़ दिया गया है-'यह कवित्त भी प्राचीन पुस्तकन में नाहीं मिलत
तातें नारायण कबि अर्थ याको नाहीं लिख्यो ।' यह हस्तलिखित प्रतियों में
मिलता है, किंतु लीथोवाली प्रति में नहीं है।

१६- कैसवराय-केसवदास । बिलोचन-सुलोचन । नीचे करौ-चेतहु ।
करै-फलै । एक-बीस । टरौ-टरै । तेरे-तेरी । ह्वै-ह्वैं ।