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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 286 में से

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पृष्ठ 247

२५० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—कानि=मर्यादा । अनख = रोष । श्रोलियै = घुस गया हैं,
उत्पन्न हो गया है । सयान = चतुराई । मानसै = मनुष्य को । ऐंड = गर्व ।
ऐंडाति = टेढ़ी मेढ़ी होती है । ऐंड बेंड = टेढ़ी मेढ़ी । निरमोलियै = निर्मूल्य,
अमूल्य । हरेहूँ = धीरे से भी ।
भावार्थ—तेरी कुल-मर्यादा क्या बड़ी है, केवल रूप पर ही तेरे हृदय
में ऐसा अनोखा रोष उत्पन्न हो गया है । अपने चातुर्य के सामने तू किसी
व्यक्ति को कुछ समझती ही नहीं । गुमान के विमान पर चढ़ी हुई आकाश ही
आकाश में उड़ी फिरती है (धरती पर तो पैर ही नहीं रखती) । गर्व से तू
टेढ़ी मेढ़ी हुई जा रही है, तेरा अंचल भी उड़ रहा है (उसके सँभालने की
भी चिंता नहीं, कुछ तो लज्जा कर !) । ऐसा बेतुका हठ छोड़, तू तो अत्यंत
अमूल्य दृष्टिवाली है । (कुछ तो विचार कर कि) हे हरिणनयनी, जिन
श्रीकृष्ण ने अपना हीरे सा (बहुमूल्य) मन प्रसन्नतापूर्वक तुझे दे डाला,
क्या उनसे धीरे से भी बोलना न चाहिए ।
कृष्ण को उराहनो-(कवित्त)
(४६०) सौंहनि को सोच न सकोच काहू बोच की को,
पोछौ प्यारे पीक-लीक लोचन किनारे की ।
माखन की चोरी की है थोरी थोरी मोहूँ सुधि,
जानति बिसेष वहै जोरी है जु बारे की ।
मेरियै कुमति और कहा कहौं केसौदास,
लागति है लाल लाज इहाँ पाइ धारे की ।
एती है मुठाई, वह अबहीं रुठाई, यह
छारहू तौ छूटी नाहिं पाइन के पारे की । १९।
शब्दार्थ—सोच = चिंता, परवा । सकोच = संकोच, लज्जा । बीच की
को = मध्यस्थ का । जोरी = जोड़ी । बारे की = लड़कपन की । पाइ धारे
की = यहाँ आने की । एतो है = इतनी अधिक । रुठाई = रुष्ट कर दिया ।
छारहू = धूल भी । पाइन के पारे की = पैरों पर पड़ने की ।
भावार्थ—आपको न तो शपथों की चिंता है और न बीच में पड़नेवाली
का ही संकोच है । भला नेत्रों के किनारे लगी हुई पान की पीक का चिह्न तो
पोछ डालिए । (दूसरी नायिका के यहाँ जाकर जो आपने चोरों की सी
करतूत की है यह नई बात नहीं है, लड़कपन से आप घर का मक्खन छोड़कर
१९—बिसेष०-बहै किसोरी । जोरी-मोरी । पाइ-पांव, पग । रुठाई-
रुढ़ाई । यह. वह । २०-के दुख-की दुख । पाइहै-पैहै मैं । जी की०-जीय
की तोहि ।