रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
About this granth
Rasikapriya (रसिकप्रिया) is Keshavdas's Braj Bhasha treatise on the erotic sentiment (shringara rasa), written in the late sixteenth century under the patronage of Prince Indrajit Singh of Orchha. It became the model for describing types of heroes and heroines in Hindi Riti poetry, later poets followed its scheme, and its scenes were painted widely in Rajasthani and Pahari miniatures.
Its sixteen prabhavas treat the nature of rasa and the kinds of shringara, the types of hero, the companion and the messenger, the types of heroine and their gestures, the eight situations of the heroine such as one whose lover is devoted, one betrayed and one who waits adorned, the lover's pique and its appeasement, and love in union and separation. For each definition Keshav gives his own verses on Radha and Krishna.
This edition carries the Priyaprasad commentary of Acharya Vishwanath Prasad Mishra, the noted critic and editor of Riti poetry, and runs to 286 pages.
द्वादश प्रभाव २२३
अमृत की पराकाष्ठा की प्राप्ति होती है । लुकाछिपी के द्वारा उनसे नेत्रों को
मिलाने और प्रायः चुराए रखने में क्या सुख ? ( लुक-छिपकर थोड़ा नेत्र
मिला लेने से कितना सुख मिलेगा ) जब तक प्रिय के मन में अपने मन को
डालकर ( स्वच्छंदतापूर्वक ) विचरण करने के लिए न छोड़ दिया जाय ( मन
से मन भली भाँति मिल न जाय, खुलकर न मिल जाय ) ।
सूचना—बिहारी ने भी 'महुख' शब्द का प्रयोग किया है—
छिनक छबीले लाल वह जौ लगि नहिं बतराइ ।
ऊख महुख पीयूख की तौ लगि भूख न जाइ ॥—बिहारी-सतसैया
'देव' ने भी इसका बहुत प्रयोग किया है । यह 'मयूख' भी लिखा मिलता है ।
जनी को वचन श्रीकृष्ण सों, यथा—( कबित्त )
(४१७) ऐसी बातें ऐसें ही धौं कैसें कै कही परति,
जाकी गति मति लाज-पट सों लपेटी हैं।
मेरें ही न आवै, मेरी बीर एती बेर वे तौ,
जानति हौं धाइ ही के साथ लौटि लेटी हैं।
ऐसी तौ हैं चेरिन की चेरी बाकी केसवदास,
जैसी तुम हाहा करि पाइ परि भेंटी हैं।
जानति हौं नंदजू के ढोटा हौ जू, जानौ बोल,
उतहिं वेऊ तौ बृषभानजू की बेटी हैं ।६।
शब्दार्थ-ऐसें ही धौं = जिस प्रकार तुम कह रहे हो । जाकी० = जिसकी
चालढाल लज्जा रूपी वस्त्र में लिपटी है, जो अत्यंत लज्जाशील है । मेरे ही =
मेरे यहाँ तो कभी आती ही नहीं । हाहा करि = विनय करके । ढोटा = पुत्र ।
भावार्थ—( जनी की उक्ति नायक से ) आप जैसे कह रहे हैं वैसे भला
मुझसे और उस पर भी ऐसी बातें, उससे कैसे कही जा सकती हैं ? यही नहीं
उससे जिसकी चालढाल अत्यंत लज्जाशील है ( प्रेम की ये प्रगल्भ बातें ) ।
अरी मैया, मेरे यहाँ तो वह आती नहीं और फिर इस समय ( रात में ) मेरा
अनुमान है कि वह ( घूम-फिरकर ) धाय के साथ साथ लौटी है और आराम
कर रही है ( इस बीच जाकर कैसे ये बातें कहूँ ? ) । जैसी नायिका से विनय
करके और पैरों पड़कर आज आपने आलिंगन किया है, वैसी तो उसकी दासी
की दासी हैं । जानती हूँ कि आप नंद जी के लाड़ले हैं, आपके बोल मैंने पह-
चाने । उधर वे भी वृषभानु की लाड़िली पुत्री हैं ( मेरी तो हिम्मत नहीं कि
उनसे जाकर ऐसी बातें कह सकूँ ) ।
६—श्रीकृष्ण सों-प्रिय प्रति । ही धौं-हिये । कैसें०-कैसे कही परति धौं,
कैसे कही परत न । पट-पाट । बेर-बार । जानति०-जात धाइ ही के घर साथ ।
केसौदास-केसौराइ । ढोटा-बेटा । बोल-जाहू । उतहिं०-वेऊ तौ उतहिं ।
right after it: "देती" has 'द', 'े', 'त', 'ी'. Look at the 'ी' matra on "ती": it goes up from the right vertical line and curves left over the 'त'.
Now look at "देखत..." in L33: does the letter after 'ह' curve over the 'ह'?
NO! It has a vertical line and TWO SLANTS going up! It is "देखत हौ"!
Wait, wait! Let me look really closely at L33:
"देखत हौ-देखे बिना मुख।" or "देखत ही-देखे बिना सुख।"
Wait, look at "देखे बिना मुख": is it "मुख" or "सुख"? The letter is 'म' with 'ु', then 'ख': wait, 'स' with 'ु' has a loop on the left like in 'सु तो'. Here it's 'स' or 'म'? In "सुख" (L19: "बड़ो सुख दीने"), look at 'सुख' in L19: 'स' with 'ु' + 'ख'. Look at L33: it's identical to 'सुख' in L19! Wait, is it "सुख"?
Wait, look at the footnote again: "देखे बिना मुख" or "देखे बिना सुख"? In L6: "मुख स्याम सभागैं". A variant for "मुख" might be "सुख" ("देखे बिना सुख स्याम सभागै
पर पैर रखने"
Wait! Is it "पलँग" or "पलंग"?
In line 25: "पलँग" (with an anusvara over ल, but is it लँ or लं?)
Wait, look at line 25: "पलँग को स्पर्श किया था ( पैर रखा था ) । ( और पलँग पर पैर रखने"
Look at "पलँग": it has an anusvara above 'ल'. It's "पलँग" or "पलंग"? Just a dot (anusvara). "पलंग".
Line 26:
"पर भी ) रति ( प्रीति, घुंघची ) को हटाकर तुमने उनकी प्रीति तोलनी"
Notice spacing around parentheses: "पर भी )", "( प्रीति, घुंघची )".
Line 27:
"आरंभ की । कसमें खाने पर अपने मुँह को उनके सामने किया । ऐसा"
Line 28:
"क्यों ? तुममें अब तक तो ऐसी चालढाल नहीं थी, भला रात में पान खिलाते"
Line 29:
"समय ( उनसे ) चिढ़ क्यों रही थीं ?"
Line 30:
"सूचना—सरदार कवि ने यह माना है कि पड़ोसिन ने स्वयम् आहट"
Line 31:
"नहीं पाई है । नायक ही उससे कह गया है । धाय, सखी आदि की अपेक्षा"
Line 32:
"पड़ोसिन से कहना नायिका को उलाहना देने के लिए अधिक संभव
द्वादश प्रभाव २२७
परोसिन को वचन कृष्ण सों, यथा—( सवैया )
(४२३) हाँसी में बातक वासों कही हँसि वेहूँ कही सु हितै करि लेख्यो ।
आँखें मिली न मिली सखियाँ मिलबोई सु केसव क्यों अवरेख्यो ।
चिच्याइ मरै चुप साधै कि चातक स्वाति समै ही स्रवै सु बिसेख्यो ।
आजुहीं क्यों वह आवै यहाँ जिनि आगि लगैं हूँ न आँगन देख्यो ।१२।
शब्दार्थ—हाँसी में = हँसी में, झूठमूठ । बातक = एक बात (मेरे
यहाँ क्यों आने लगीं आदि) । वासों = उससे (नायिका से) । सु = वह
बातचीत । हितै करि लेख्यो = आपने अपने अनुकूल समझ लिया । आँखें
मिली न = आँखें चार नहीं हुईं । अवरेख्यो = निश्चित कर लिया । चिच्याइ
मरै = चिल्लाकर मरता रहे । चुप साधै कि = अथवा चुप होकर रहे । स्रवै=
पानी बरसाता है । सु = वह (बादल) । बिसेख्यो = विशेष रूप से, अत्यधिक ।
भावार्थ—(पड़ोसिन और नायिका को किसी दिन बातचीत करते हुए
नायक ने देखा । पड़ोसिन से नायिका को न आने का उलाहना दिया और
नायिका ने भी नायक की ओर देखते हुए हँसी में ही उलाहने का उत्तर देते
हुए आने की बात कही । नायक नायिका से मिलने के लिए उसी दिन पड़ो-
सिन के यहाँ आया है इस पर पड़ोसिन कह रही है) वाह आप भी अच्छे
निकले । उससे हँसी में मैंने एक बात कही और उसने भी हँसी में मुझे कुछ
उत्तर दे दिया, इधर आपने उसे ही अपनी घात की बात जान लिया । जब
आपसे न आँख मिली और न सखियाँ ही मिलने के लिए गईं तब आपने
मेरे यहाँ उससे भेंट होने का निश्चय कैसे कर लिया ? भला वह भलीमानस
आज मेरे यहाँ क्यों आने लगी, वह तो ऐसी है कि जब घर में आग लगी
थी तब भी आँगन झाँकने नहीं गई । (आप चातक की ठान क्यों नहीं
ठानते, क्योंकि ) चातक या तो चिचियाता हुआ मरता रहता है या चुप्पी ही
साध लेता है । बादल तो स्वातीं नक्षत्र में ही उसके ऊपर ध्यान देकर विशेष
जल गिराता है (ढारस रखिए, कभी न कभी आप पर भी उसकी कृपादृष्टि
हो ही जायगी) ।
मालिन को वचन राधिका सों, यथा—(कवित्त)
(४२४) दुरिहै क्यों भूषन बसन दुति जोबन की,
देह ही की ज्योति होति द्योस ऐसी राति है ।
नाह को सुबास लागेँ द्वै है कैसी केसव,
सुभाव हो की बास भौर-भीर फारे खाति है ।
१२—बातक-बात वै । वेहूँ-वाहू । हितै-हित्वै । क्यों-कै । मरै-मरो ।
साधै-साधो । स्रवै-सवै । आवै०-आवति हपाँ । जिनि-जिहि ।
२२८ रसिकप्रिया
देखि तेरी सूरति की मूरति बिसूरति हौं,
लालन को दृग देखिबे कों ललचाति है।
चलिहै क्यों चंदमुखी कुचनि के भार भएँ,
कचनि के भार तौ लचकि लंक जाति है ॥१३॥
शब्दार्थ—दुरिहै = छिपेगी । जोति = ज्योति, दीप्ति । नाह = नाथ,
नायक । सुभाव ही की = स्वाभाविक । भौंर-भीर फारे खाति है = भौरों की
भीड़ फाड़े खाती है, भौंरे घेरे रहते हैं । सूरति की = सौंदर्यवाली । बिसूरति
हौं = मैं सोच रही हूँ । कुच = स्तन । भार = बोझ । लंक = कमर, कटि ।
भावार्थ—देह की स्वाभाविक दीप्ति से जब रात दिन की भाँति प्रकाश-
युक्त हो जाती है तब फिर यौवन की द्युति उत्पन्न होने पर और भूषण एवम्
वस्त्रों से सुसज्जित हो जाने पर तेरी दीप्ति कैसे छिपाए छिपेगी ? जब शरीर
की स्वाभाविक सुगंध ही से भौंरों की भीड़ तुझे घेरे रहती है तब नायक की
सुगंध लगने से न जाने क्या दशा होगी ? मैं तो तेरी सुंदर मूर्ति देखकर
(उसके ऊपर पड़नेवाले झंझटों का ध्यान करके ) सोच कर रही हूँ और तू
निश्चिन्त होकर नायक को अपनी आँखों से देखने के लिए लालायित हो रही
है (नायक को देखने पर तेरी जो दशा होगी उसकी कल्पना से ही मैं दुखी
हो रही हूँ और तू उसी के लिए प्रयत्नशील है ) । अभी केशों के बोझ से तो
तेरी कमर लचक जाती है, जब कुचों का भार होगा तब न जाने तू कैसे
चल सकेगी ?
सूचना—(१) केशवदास ने इसे 'कविप्रिया' में अभूतोपमा के उदाहरण
में दिया है । (२) 'सुबास', 'भौंर' आदि की बात लाने से 'मालिन' जान
पड़ती है।
मालिन को वचन श्रीकृष्ण सों, यथा—(कवित्त)
(४१५) घेरौ जिनि मोहि घर जान देहु घनस्याम,
घरिक में लागी डर देखिबो क्यों द्वामिनी ।
होइ कोऊ ऐसी वैसी आवै इत उत ह्वैकै,
वह बृषभानजू की बेटी गजगामिनी ।
आदित को आयो अंत आवौ बलि बलि जाउँ,
आवती हैं वेऊ बनी, आई बनि जामिनी ।
१३—सुभाव-सुदेहु, सुबास । लंक-कांट ।
द्वादश प्रभाव २२६
काम के डरनि तुम कुंज गह्यो केसोदास ।
भौरन के भय भौन गह्यो उनि भामिनी ।१४।
शब्दार्थ--घेरौ जनि = रोकों मत । घनस्याम = श्रीकृष्ण; बादल ।
-घरिक में = एक घड़ी में । देखिबी = देखोगे । दामिनी=बिजली । लागी उर०=
बिजली की भाँति उसे हृदय से लगी देखोगे । ऐसी वैसी = साधारण । इत
उत ह्वैकै = इधर उधर से । आदित = ( आदित्य ) सूर्य । बनि=सजकर ।
बनी = श्रृंगार किए हुए । जामिनी = रात्रि । काम = कामोद्दीपन । भामिनी=
मन को भाने वाली, प्यारी नायिका ।
भावार्थ-हे कृष्ण, आपने काम के भय से ( कारण ) कुंज में प्रवेश
किया और भौरों के भय से वे घर में बैठी हैं। अब सूर्यास्त का समय हो रहा
है (वैराग्य-वेश त्यागिए ) शीघ्र सजकर प्रस्तुत हो जाइए, मैं बलिहारी जाती
हूँ । रात्रि आ ही गई, वे भी शृंगार किए हुए आ रही हैं ( वे पद्मिनी और
कमलबदनी हैं, उन्हें सुगंध-लोलुप भौंरे दिन में घेरे रहते हैं ) । यदि कोई
साधारण घराने की लड़की होती तो इधर उधर से ( किसी प्रकार ) आ ही
जाती, पर एक तो वे वृषभानु की पुत्री हैं ( बड़े घराने की हैं ) दूसरे गज-
गामिनी हैं ( धीरे धीरे चलती हैं ) । हे घनश्याम, मुझे मत रोकिए (नायिका
के घर जाने दीजिए ) घड़ी भर में उन्हें आप दामिनी की भाँति अपने हृदय
से लगी देखेंगे ।
सूचना-( १ ) नायक दुखी होकर जंगल में चला गया है ।
( २ ) सुवास की चर्चा करने से मालिन है ।
बरइनि को वचन कृष्ण सों, यथा-( कबित्त )
(४२६) मैन ऐसो मन मृदु मृदुल मृनालिका के
सूत ऐसी सुरधुनि मनहि हरति हैं।
दारथो कैसे बीज दाँत, पान से करुन ओठ,
केसोदास देखे दृग आनंद भरति हैं।
एरी मेरी तेरी मोहिं भावति भलाई तातें,
बूझति हौं तोहि और बूझत डरति हैं।
१४-देखिबी ज्यों-लागि लीजो, देखि लीजो। ह्वैकै-होइ, ह्वै सो । वह-
वेऊ, वे तौ । बलि बलि-अघनन, बन बलि । आई०-ओर आई, आई अरु ।
काम कें०-जैसे तुम काम के डरनि कुंजभौन गह्यो केसोराइ । के भय०-भयनि
भवन गह्यो, उन भौन गह्यो । उनि-उहि ।
२३० रसिकप्रिया
माखन सी जीभ, मुख कंज सो कोवँर, कहु
काठ सी कठेठी बातें कैसैं निकरति हैं ।१५।
शब्दार्थ—मैन = ( मदन ) मोम । मृदु = कोमल । मृनालिका = कमल-
नाल । सूत = कमलनाल तोड़ने से जो पतले सूत दिखाई पड़ते हैं । सुर-
धुनि = स्वर की ध्वनि (मधुर राग) । मननि मनों को । दारधो = (दाड़िम)
अनार । पान = ( पर्ण ) पल्लव । देखे० = आँखों से देख लेने पर हृदय में
आनंद भर देती है । एरी = एरी सखी । बूझति हौं = पूछती हूँ । और० =
और हम पूछते हुए हृदय से डरती हैं। कंज = कमल । कोवँर = कोमल ।
कठेठी = कठोर । निकरति ० = निकलती है ।
अलंकार—विभावना ।
सूचना—'पान' कहने से बरइन है ।
बरइनि को वचन कृष्ण सों, यथा—( कवित्त )
(४२७) नैननि नवावौ नेक अति ही अनीति करें,
जानति न तुम जैसें ब्रज जानियत हैं।
चंचल चरित्र चित्त, चेटक चटकि लावौ,
चेरे कै चितनि अभिसार सौंपियत हैं।
एकनि के पैठे उर, उररि उरोजन में,
डर डोलैं केसौदास कैसैं वै जियत हैं।
ऐसी कहूँ होति है जो बालनि के चोरि चोरि
मन मनमथ ही के हाथ बेचियत हैं ।१६।
शब्दार्थ—नवावौ नेक = थोड़ा दबाओ, रोको । अनीति = अन्याय ।
चेटक = जादू । चटकि = शीघ्रता से । अभिसार० = अभिसार को सौंप देता
है, चक्कर में डाल देता है या अभिसार के लिए प्रेरित करता है । पैठे =
घुसे । उररि = उलझकर । बालनि = नायिकाओं ( ब्रजांगनाओं ) ।
भावार्थ—हे प्यारे, भला ऐसा भी कहीं किया जाता है ? तुम ब्रजांग-
नाओं के मन चुरा चुराकर उन्हें काम के हाथ बेच देते हो । इन नेत्रों को
१५—मृदु–तब । के–से । ऐसी–कैसे । मनहि–मन को, मननि । पान
से०–पान सो उदरु, बिंब से अरुन । केसौदास०--देखि देखि केसौदास । मेरी-
बोर । और–उर । कोवँर–कुंवरि, कुँवर, कोमल । १६—नवावौ--नवेंबो ।
अति ही--निपट । न--हौ । ब्रज--जग । चेटक०--चेटको चटका गाथो । चेरे
कै–चोरि कै । उररि--उरझि । डर०--उरझे तें । केसौदास--केसौराइ । वै--ति ।
के चोरि०--की चोरीचोरी, के चोराचोरी । मन०--चित मति मनमथ हाथ, मन
मनमथ चाक ।
नवम से षोडश प्रभाव: मान-मोचन, दर्शन-मिलन एवं सम्पूर्ण संयोग-वियोग रस
द्वादश प्रभाव २३१
दबाओ, ये बहुत ही अनौति कर रहे हैं। तुम इन्हें उतना नहीं जानते जितना
इन्हें ब्रज जानता है। ये अत्यंत चंचल स्वभाव और चित्तवाले हैं, ये शीघ्र
ही जादू डाल देते हैं यही नहीं, चित्तों पर जादू डालकर उन्हें चक्कर में भी
डाल देते हैं। ये किसी के स्तनों से उलझकर हृदय में घुस जाते हैं।
(चित्त) डरे डरे घूमते हैं। इनके डर से इधर उधर भागते फिरते हैं, न
जाने कैसे जीते हैं।
शिल्पिनी को वचन राधिका सों, यथा—( सवैया )
(४२८) अबहीं पुनि बोलि री बोलि लगी जक पौरिहूँ लौं उठि जान न दीने।
मेरे ही जान भई उलटी तुम्हहीं बस केसव वे कहँ कीने।
जौ तौ इतौ दुख पावति हौ तलफैं दृग मीन मनो जल झीने।
तौ कत छाड़ति हौ छिन एक रहौ किनि चित्र ज्यों हाथहिं लीने ।१७।
शब्दार्थ—बोलि री बोलि = बुला री बुला । जक = धुन, रट । पौरिहूँ
लौं = दरवाजे तक भी न जाने दिया । उलटी बस = उलटी तू ही उनके
वशीभूत हो गई है । इतौ = इतना ( अधिक ) । तलफैं = तड़पते हैं । झीने =
कम, थोड़े ।
भावार्थ—हे सखी, अभी उन्हें यहाँ से उठकर तूने द्वार तक जाने भी न
दिया कि 'बुला ले बुला ले' की रट फिर लगा दी । मेरी समझ से तो तू ही
उनके वश में हो गई है । उन्हें तो तूने केवल कहने के लिए वश कर रखा है।
यदि तू ( वियोग से ) इतना दुख पाती है और तेरे नेत्र थोड़े पानी में की
मछली की तरह तड़पते हैं तो उन्हें पल भर के लिए भी तू क्यों छोड़ती है ?
हाथ में चित्र की भाँति लिए ही क्यों नहीं रहती ?
अलंकार—उत्प्रेक्षा ।
सूचना—यहाँ 'चित्र' शब्द से 'शिल्पिनी' सूचित है ।
शिल्पिनी को वचन कृष्ण सों, यथा—( सवैया )
(४२६) खोट तुरी जिमि खूँट रहौ गहि ठौर कुठौरनि जानिहू जाहू ।
लाज न आवति मारे समाजन लागें अलोक के ताजन ताहू ।
कोटि बिचार बिचारहु केसव देखहु बूझि हितू सब काहू ।
नेह ही के फिरि लागिहौ संग न नैननि के सँग ओर निबाहू ।१८।
१७—उलटी--फिरि तू । तुम्हहीं ०--बस केसव हैं कहिबे कहँ । तौ--पै ।
पावति--देखति । झीने--हीने, जीने । कत--कहा, कित । १८—खोट--खेट, खोटु,
खाटु । जानिहू--जानि न । लाज न--लालन । समाजन--सभाजन । बूझि--बोलि ।
नेह ही--नेह हू ।
२३२ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—खोट = खोटा, शरारती ! तुरी = घोड़ा । खूँट = ओर, दिशा ।
अलोक = बदनामी । ताजन = चाबुक, कोड़ा । ओर निबाहू = अंत तक निर्वाह
भावार्थ—खोटे शरारती घोड़े की भाँति आप जिधर जाते हैं, सीधे चले
जाते हैं । ठौर कुठौर को जानकर भी उधर ही जाते हैं । समाज द्वारा मारे
गए बदनामी के कोड़े के लगने पर भी लज्जा नहीं आती ( आप शोख होते
जाते हैं ) । अनेक प्रकार के विचारों द्वारा विचार लीजिए तथा जो आपके
हितुआ हों उनसे भी पूछ लीजिए, प्रेम के ही साथ लगने से काम बनेगा, नेत्रों
का साथ देने से अंत तक निर्वाह नहीं हो सकता ( आप नायिका से प्रेम
करके भी जो अपने नेत्रों को बेलगाम छोड़े रहते हैं सो ठीक नहीं ) ।
चुरिहेरिन को वचन राधिका सों, यथा—( कबित्त )
(४३०) मन मन मिलें कहा मिलिहै मिले को सुख,
मिलिहू धौं देखहु बोलाइ काहू बाल सों ।
भूलि परे भौंहनि हीं बाँधिहौ कितेक दिन,
बाँधौ बलि जाउँ बनमाली बनमाल सों ।
मुँह मोरें मारें न मरति रिस केसोदास,
मारहु धौं मेरे कहें कमल सनाल सों ।
नैननिहीं बिहँसि बिहँसि कौ नौ बोलिहौ जू,
कबहूँ तौ बोलियै बिहँसि मुख लाल सों ।१६।
शब्दार्थ—मन मन मिले = केवल मन से मन मिलाने से । कहा =
क्या । भूलि = चूक । बनमाली = श्रीकृष्ण । बनमाल सों = वनमाला से
अर्थात् स्वागत करके, आलिंगन करके । कमल सनाल = मृणालयुक्त कमल
( हथेली सहित भुजा ) ।
भावार्थ— केवल मन को मन से मिलाने से मिलाने का क्या सुख मिलेगा ?
यदि आपको मेरी बात का विश्वास न हो तो आप किसी प्रेम करनेवाली स्त्री
को बुलाकर और उससे पूछकर ही समझ लीजिए । यदि नायक से भूल हो
जाय तो आप भौंहों से कितने दिनों तक बाँधेंगी ? ( भौंहें टेढ़ी करने से वे
कब तक चूक न करेंगे ? ) । मैं आपकी बलिहारी जाती हूँ उन वनमाली को
वनमाला से बाँधो (उनका स्वागत करो, आलिंगन करो, रूठो मत) । क्या कहीं
मुँह मोड़ लेने से प्रेम का रोष मारने के मान का होता है ? (नहीं, मुँह फेरने
से क्रोध नहीं दबेगा ) । यदि आप उन्हें किसी अपराध का दंड देना चाहती
हैं तो मेरे कहने से उन्हें मृणालयुक्त कमल से मारिए ( अपनी भुजाओं से
१६—हीं-धौं । न मरति-मान रति, नाम मन । मरति०—मारै रिस
केसोदास, रति रिस प्यारेलाल । कबहूँ-बबहू । तौ-धौं ।
द्वादश प्रभाव २३३
उन्हें भेंटिए) । केवल नेत्रों से हँस हँसकर कब तक बोलोगी ? नायक से
कभी हँसकर मुख से तो बोलो।
सूचना—'सरदार' ने 'वनमाल' का अर्थ 'कुंज' किया है ।
छुरिहेरिन को वचन कृष्ण सों, यथा—( सवैया )
(४३१) आपुन हूजै दुखी दुख जाके सु ताहि कहा कबहुँ दुख दीजै ।
जा बिन और सुहाइ न केसव ताहि सुहाइ सु तौ सब कीजै ।
भाग बड़े जु रची तुमसों वह तौ बिझकाइ कहौ कह लीजै ।
जौ रिस जाइ तौ जैयै मनावन तातो है दूध सिराइ तौ पीजै२०।
शब्दार्थ—आपुन० = जिसके दुख से स्वयम् लोग दुखी होते हैं। बिझ-
काइ = तंग करके, चिढ़ाकर । तातो = गरम । सिराइ = ठंडा हो जाए ।
भावार्थ—जिसके दुख से कोई स्वयम् दुखी होता है क्या उसे भी वह
कभी दुख देता है ? जिसके बिना और कुछ नहीं अच्छा लगता उसे जो कुछ
अच्छा लगे वही करना चाहिए । बड़े भाग्य से तो उसने आपसे प्रेम किया,
अब उसे तंग करने से आपको क्या मिलेगा ? जब उसका रोष कुछ हटे तब,
आपको मनाने जाना चाहिए ( व्यर्थ चिढ़ाने के विचार से जाना ठीक नहीं) ।
अभी दूध गरम है, ठंडा हो जाए तब उसे पीजिए (अभी वह क्रुद्ध है शांत
हो जाय तब उसके पास जाइए ) ।
अलंकार—लोकोक्ति ।
सुनारिन को वचन राधिका सों, यथा—( सवैया )
(४३२) लोल अमोल कटाक्ष कलोल अलौलिक सों पट ओलि कै फेरे ।
पानिप सों अति पैने रसाल बिसाल बने मनभावते मेरे ।
केसव चीकने चौगुने चोखे चितै कै भए हरि न्यायनि चेरे ।
सोच-सकोचन श्रीरति-रोचन धीरज-मोचन लोचन तेरे ।२१।
शब्दार्थ—लोल = चंचल । अमोलं = अमूल्य । कलोल = क्रीड़ा । अलौ-
लिक सों=अचंचलता से, स्थिरता से । ओलिकै = आड़ करके । फेरे=चलाए ।
पानिप = शोभा; पानी । पैने = लपलपाते । चीकने = सुंदर । चौगुने = अत्य-
धिक । चोखे = धारदार, तीक्ष्ण । न्यायनि = उचित ही; ठीक ही । चेरे =
दास । सकोचन=( सोच को ) कम करनेवाले । श्री = शोभा । रति=प्रीति ।
रोचन = बढानेवाले । मोचन = छुड़ानेवाले ।
२०—सु--हो । बड़े--बड़ो । बिझकाइ--बिरचाइ, बिरझाइ । कह--कहा ।
रिस जाइ--रिसियाइ । तौ-त, न । २१—ओलि-खोलि । पैने०-बैन बिसाल !
भए--किए । मोचन-मोहन ।
२३४ रसिकप्रिया
भावार्थ—चंचल, अमूल्य, कटाक्षों की क्रीड़ा करनेवाले, पानिप (शोभा;
पानी) से अत्यंत लपलपाते, रसयुक्त, विशाल, मेरे मन को भानेवाले सचिक्कण,
अत्यंत क्षीण नेत्र पट (घूँघट) की ओट से ही स्थिरता के साथ जब तूने
चलाए और हरि ने तेरी ओर देखा तब सब ही तेरे दास हो गए । तेरे नेत्र
सोच को कम करनेवाले शोभा और प्रीति बढ़ानेवाले तथा धैर्य छुड़ा
देनेवाले हैं।
सूचना—(१) 'ओलि' के स्थान पर 'खोलि' पाठ भी मिलता है । इस
पाठ के द्वारा 'म्यान से निकालकर' अर्थ करना होगा । नेत्रों पर 'तलवार' का
आरोप किया गया है ।
(२) 'अमोल', 'पानिप' आदि नाम लेने से 'सुनारिन' है ।
सुनारिन को वचन कृष्ण सों, यथा—(कवित्त)
(४३३) हाँसी में हँसे तें हरि हरैं कै झुकति मन-
हारि कै हँसति हरि हियें अनुरागी है ।
प्रेम की पहेली गूढ़ जानत जनावतहीं,
आजु अधरातक लौं मेरे संग जागी है ।
अब लौं ज्यों धरी धीर तैसें दिन द्वैक और,
धरौ गिरिधर तुमतें को बड़भागी है ।
भावती तिहारी वह काल्हि ही तें केसौराय,
काम की कथान कछु कान देन लागी है ।२२।
शब्दार्थ—हरैं कै = धीरे धीरे । झुकति = सिर नवा लेती है । मनहारि =
प्रार्थना । हियें= हृदय में, छाती में । जानत = बूझती । जनावतहीं= बुझाती हुई ।
भावार्थ—हँसी में भी हँसने पर धीरे धीरे वह सिर नवा लेती है ।
प्रार्थना करके तो हँसती ( और हँसाती ) है । अपनी छाती की ओर देखकर
प्रेम प्रकट करती है । आज तो कोई आधी रात तक प्रेम की गूढ़ पहेली
बूझती-बुझाती हुई मेरे साथ जागती रह गई । जिस प्रकार अब तक धैर्य
रखा उसी प्रकार दो दिन और धैर्य रखो । हे गिरिधर, तुमसे बढ़कर भाग्य-
शाली और कोई नहीं । तुम्हारी यह प्रेमिका कल से ही काम-कथा में कुछ
कान देने (मन लगाने) लगी है ।
रामजनी को वचन राधिका सों, यथा-( कवित्त )
(४३४) कोमल कमल वे तो अमल ये तित्त चल,
मलिन नलिन नवनील के से पात हैं।
२२—हँसे तें—झुकें तें । हरैं कै—हरिकै । मनहारि—मन हरि, मन हरे ।
संग—साथ । धरौ ०—धीर धरयो । केसौराय--केसौदास
द्वादश प्रभाव २३५
सूधे साधु सुद्ध वे तौ कुटिल प्रसिद्ध ये तौ,
केसव मरम-चोर परम किरात हैं।
पाइहैं पकरि तब पाइहै न कैसैंहू तूँ,
थोरो इठलाति ये तौ अति इठलात हैं।
बरजति क्यों न तो सों कब की कहति, मेरे
मोहन के मनै तेरे नैन छूवै छूवै जात हैं ।२३।
शब्दार्थ—अमल = स्वच्छ । तिक्ष = तीक्ष्ण । चल = चंचल । नलिन =
कमल । पात = पत्र, दल । सूधे = सीधे । साधु = सज्जन । सुद्ध = पवित्र ।
किरात = भील, दुर्जन ।
भावार्थ—( श्रीकृष्ण के मन की शुद्धता और राधिका के नेत्रों की अस्पृ-
श्यता का वर्णन है ) श्रीकृष्ण का मन तो कमल की तरह कोमल और स्वच्छ
है, पर ये तेरे नेत्र तीक्ष्ण, चंचल, मलिन और नए नीले कमल के पत्र के ऐसे
हैं । वे (श्रीकृष्ण मन से) तो सीधे, सज्जन और पवित्र हैं और ये कुटिल, मर्म
(चित्त) को चुरानेवाले एवम् निरे किरात ( अत्यंत अपवित्र, दुष्ट ) हैं। पर
जब वे इसे पकड़ लेंगे ( तेरे नेत्र उनके मन में धँस जाएँगे ) तब तू इन्हें किसी
प्रकार पा न सकेगी ( फिर वहाँ से निकलेंगे नहीं ) तू तो थोड़ा इठलाती है,
पर ये तेरे ये नेत्र अधिक इठला रहे हैं। मैं न जाने कब से तुझे मना कर रही
हूँ (पर मना करने पर भी) तेरे ये (कुटिल सिरचढ़े) नेत्र मेरे मोहन के मन
को बार बार छू छू जाते हैं ( तूने नेत्र तो लगाना आरंभ कर दिया, पर ये
लगने पर फिर वश में न रह जाएँगे ।
रामजनी को वचन कृष्ण सों, यथा--( सवैया )
(४३५) कौनहूँ तोष कहा भयो केसव कामिनि कोटिक सों हित ठाटैं ।
रंच न साध सधै सुख की बिनराधिकै अधिक लोचन डाटैं ।
क्यों खरी सीतल बास करै मुख जौ भखियै घनसार के साटैं ।
लालच हाथ रहै ब्रजनाथ पै प्यास बुझाइ न ओस के चाटैं ।२४।
शब्दार्थ—तोष = तृप्ति । हित = प्रेम । ठाटें = करने से । रंच = किंचित्
भी । साध = इच्छा । सधै = पूरी हो । अधिक = आधे । डाटें = देखने से ।
खरी = खड़िया । घनसार = कपूर । साटें = बदले में ।
भावार्थ—क्या करोड़ों कामिनियों से प्रेम का ठाट ठटने से आपकी कोई
२३-अमल-श्रमल । प्रसिद्ध-करम । मरम-परम । मरम-चोर-चितचोर।
इठलाति-इतराति । तो सों-तू ही । मनै-नैन । २४—रंचन-रंचक । सधै-
सुधै । जो०-जो रे भक्षी ।
२३६ रसिकप्रिया
तृप्ति हो गई ? (निश्चित जानिए कि ) राधिका को, आधे ही नेत्र से सही,
बिना देखे सुख की इच्छा थोड़ी भी पूरी नहीं हो सकती। यदि कपूर के बदले
में ( उजली उजला ) खरिया खा ली जाय तो क्या वह मुँह को शीतल और
सुवासित कर सकती है ? ( तुम जो बहुतों से प्रेम कर रहे हो, इसमें) हे
ब्रजनाथ, केवल लालच ही हाथ रहेगा ( तृप्ति न होगी ) । क्या कभी ओस
चाटने से भी प्यास बुझती है ?
अलंकार—लोकोक्ति ।
संन्यासिनी को वचन राधिका सों, यथा-( कवित्त )
(४३६) छुटै न छुटाएँ जब करिहौ धौं कैसी बात,
केसौदास अनयास प्यास भूख भागिहै।
खेल भूलि जाइगो जुड़ाइगो न चित्त चेति,
कछु ना सुहाइगो री रैनिदिन जागिहै ।
ताते तें तपति दूनी सीरे तें सहस गुनी,
उपजि परैगी उर ऐसी और आगि है।
ऐंड सों ऐंडाइ जिन अंचल उड़ात, ओली,
ओड़ति हौं काहू की जु डीठि उड़ि लागिहै ।२५।
शब्दार्थ—अनयास = बिना परिश्रम, यों ही । खेल = क्रीड़ा । जुड़ाइगो
न = चित्त को शांति न मिलेगी । चेति = सावधान हो । ताते तें = उष्ण
उपचारों से । सीरे = शीतल उपचारों से । और = अन्य, विलक्षण । ऐंड़ =
लटक, गर्व की मुद्रा । ओली = चादर, अंचल । ओली ओड़ति हौं = अंचल
पसारकर प्रार्थना करती हूँ ।
भावार्थ—देख तू ऐंड़ से ऐंड़ा मत, तेरा अंचल उड़ा ( हटा ) जा रहा
है । मैं तुझसे आँचल पसारकर प्रार्थना करती हूँ ( ऐसा मत कर ) । किसी
की दृष्टि आकर लग जाएगी । जब ( दृष्टि लग जाएगी और ) छुटाने से
भी न छूटेगी तब क्या करेगी ? यों ही तेरी प्यास और भूख भाग जाएगी ।
क्रीड़ा भूल जाएगी, चित्त शांत न रहेगा, सावधान हो जा । फिर कुछ भी
अच्छा न लगेगा । रातदिन तू जागती ही रहेगी। हृदय में ऐसी विलक्षण
आग उत्पन्न हो जायगी कि उष्ण उपचारों से तो दूनी होगी और शीतल
उपचारों से सहस्रों गुनी हो जाया करेगी ।
२५—छुटैं न-छूटिहै, न छूटिहै । बात-तब । भागिहै-लागिहै । न-री ।
और-एक । ओली-प्रति । ओड़ति हौं-जानति हैं। उड़ि-उर ।
द्वादश प्रभाव २३७
सूचना—'नजर' लगने और दृष्टि लगने ( प्रेम करने ) की एक सी ही
अवस्था मानी गई है ।
संन्यासिनि को वचन कृष्ण सों, यथा—( कबित्त )
(४३७) सीतलहू हीतल तिहारें न बसति वह,
तुम न तजत तिल ताको उर ताप-गेहु ।
आपनो ज्यौ हीरा सो पराएँ हाथ ब्रजनाथ,
दैहै तौ अकाथ हाथ मैन ऐसो मन लेहु ।
एते पर केसोदास तुम्हैं न प्रवाह वाहि,
वहै जक लागी भागी भूख सुख भूल्यो देहु ।
माड़ौ मुख छाड़ौ छिन छल न छबीले लाल,
ऐसी तौ गँवारिन सों तुमहूँ निबाहौ नेहु ।२६।
शब्दार्थ—हीतल = हृदय । तिल = थोड़ा भी । ताप गेहु = ताप का
घर, उत्तप्त । ज्यौ = जी, चित्त । अकाथ = व्यर्थ । मैन = मोम । प्रवाह =
(परवाह) चिंता । वाहि = उसे । जक = रट, धुन । माड़ौ = केसर आदि
से सुशोभित करते हो ।
भावार्थ—छबीले लाल, तुम भी कैसी गँवारिन से प्रेम का निर्वाह कर
रहे हो । वह तो तुम्हारे शीतल हृदय में बसती नहीं और तुम उसके उत्तप्त
हृदय को क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़ते (कितना कष्ट सहते हो)।
(आप ऐसे उदार हैं कि) अपना हीरे के ऐसा (मूल्यवान्) मन दूसरे के
हाथ देकर व्यर्थ ही उसका मोम के ऐसा (तुच्छ) मन लिये हुए हैं। इतने
पर भी आपको तो अपने मन की परवा नहीं, पर उसे अपने मन की धुन
लगी है। उसी धुन में उसकी भूख भाग गई है, देह की सुध नहीं, सुख
भूला हुआ है। फिर भी तुम (केसर से) उसका मुख सुशोभित करते हो
और वह क्षण भर के लिए छल नहीं छोड़ती। (व्यंग्य यह है कि आपका
हृदय उसके वियोग से उत्तप्त नहीं, उसे आप भूले हुए हैं, पर वह विरह से
जलती हुई भी क्षण भर के लिए आपको नहीं भुलाती । आपने अपना हीरे
सा कठोर मन दूसरों को सौंप दिया है और उसका मोम सा कोमल हृदय
आपके वश में है। आपको तो अपनी कोई चिंता नहीं • पर वह अपने मन
की बराबर चिंता करती है, इसी मन की दुर्दशा में भूख मारी गई है, देह
की सुधबुध नहीं रह गई है। आपके वियोग में उसका मुँह केसर की तरह
२६—तजत-तजहु । आपनो-आपने । ज्यो-जो । सो-को । अकाथ हाथ-
अकाथ साथ । मैन०-माखन सो । केसोदास-केसोराइ । देहु-गेहु : माड़ौ०-
मांजौ मुख छाड़ौ ।
२३८ रसिकप्रिया
पीला पड़ गया, है पर आपके मुख पर आंच भी नहीं—ऐसी नागरी से आप
कैसे बुरे ढंग से प्रेम को निबाह रहे हैं ! ) ।
अलंकार—व्याजर्निंदा ।
पटइनि को वचन राधिका सों, यथा—( सवैया )
(४३८) याही कों मेरी गुसाइँनि मैं मिलई पहिलेँ बतियाँ छलि छैलो ।
बातैं मिलै अँखियाँ मिलई सखियान की आँखिनि पारि कै ऐलो ।
आँखि मिले मुँह लागि रहै मन लेहु मिलै ब गहैं हम गैलो ।
मिले मन माई कहा करिहौ मुहुँ ही के मिलैं तौ कियो मन मैलो ।२७।
शब्दार्थ—याही को = इसीलिए। छलि छैलो = छैल ( नायक ), को
छलकर । बातैं मिलै = बात हो जाने पर । अँखियाँ मिलई = साक्षात्कार
कराया । पारिकै = डालकर । ऐलों = धूल । मुँह लागि रहै = मुँह मिला,
बातें करने का अवसर मिला । मन लेहु मिलै ब = अब उनके मन मिला न
लो । गहैं हम गैलो = हम अपनी गली पकड़ें । माई = हे सखी ।
भावार्थ—क्या इसी अवसर के लिए मैंने वे सब बातें की थीं ? मैंने
नायक को छलकर तुम्हारी बातें मिलाईं ( बातचीत पक्की की ) । बातें मिल
जाने पर सखियों की आँखों में धूल डालकर आँखें मिलाईं ( साक्षात्कार
कराया ) । आँखें मिलने पर मुँह मिला ( बातचीत का अवसर मिला ) ।
अच्छा अब मन भी मिला लो, हम अपने रास्ते जाएँ। जब तुमने मुँह के
मिलने पर ही मन इतना मैला कर लिया तब मन के मिल जाने पर न जाने
क्या करोगी ( जिसने इतना उपकार किया उसके साथ यह व्यवहार ! ) ।
सूचना—( १ ) मानमोचन कराना चाहती है ।
( २ ) 'मिलाने' का तारतम्य होने से पटइन भासित होती है ।
पुनः—( सवैया )
(४३६) गेह को नेह की देह की दीबें की भूषन की जिन भूख भगाई ।
मोहिं हँसी-दुख दोऊ दई तिनहीं सों जनावति है चतुराई ।
केसवदास बड़ाई दई तौ कहा भयो जाति-सुभाव न जाई ।
सोने सिंगारहु सोंधे चढ़ावहु पीतर की पिवराई न जाई ।२८।
शब्दार्थ—दीबे की = देने की, धन दे सकने की शक्ति । भूषन = आभू-
षण । हंसी = आनंद । दई = हे दैव । सोंधे = सुगंध ।
२७—लागि०-सों मिलिहै । लेहु-नेहु । मिले०-माई मिले मन का ।
तौ-तें, जो । २८—की-के । की-के । की-के । दीबे-दीखै । को-कें । भगाई-
भराई । केसवदास-केसवराइ । तो-सो । जाति-जान । चढ़ावहु-बिमायन ।
द्वादश प्रभाव २३६
भावार्थ—जिन्होंने घर, प्रेम, शरीर, धन और आभूषण की तेरी भूख
मिटा दी, मुझे हंसी भी आती है और दुख भी होता है कि हे ईश्वर, आज तू
उन्हीं से चतुराई कर रही है। भला तुझे इतनी बड़ाई दी भी गई तो क्या
हुआ, कभी भी जाति-स्वभाव नहीं जाता। पीतल को चाहे सोने से सिंगारा
जाय चाहे उस पर सुगंध का लेप ही क्यों न किया जाय उसकी पितराई
( दुर्गुण ) जाती नहीं।
अलंकार—लोकोक्ति ।
सूचना—सरदार ने लिखा है—'याही पेंच तें केशव सामान्या कहि
चुके...... हमारे शिष्य नारायण कवि को भ्रम भयो कि यह कबित्त
और को है।'
हस्तलिखित प्रतियों में भी यह छंद मिलता है। हाँ, लीथोवाली प्रति में
यह नहीं है। छंद 'केशव' का ही जान पड़ता है। धन और भूषणादि की
इच्छा पूर्ण करने की बात होने से इसमें सामान्या ही नायिका होगी।
पटइनि को वचन कृष्ण सों, यथा—( सवैया )
(४४०) वा मृगनैनी ज्यों औरनहीं जु लगावत हौ मुँह ऐसे न हूजै ।
सोनैंई सी सुनपीतर होइ तौ केसव कैसहूँ हाथ न छूजै ।
आप गिरा गुन जौ सिखवै तऊ काक न कोकिल ज्यों कल कूजै ।
सुंदर स्याम बिराम करौ कछु आम की साध न आमिलि पूजै ।२६।
शब्दार्थ—ज्यों = भाँति । सुनपीतर = घटिया पीतल । गिरा = सरस्वती ।
काक = कौआ । न कल कूजै = सुंदर स्वर से नहीं बोलता । बिराम करौ =
रुको, अपने कार्य बंद करो। साध = प्रबल इच्छा ।
भावार्थ—उस मृगनयनी की भाँति आप जो अन्य स्त्रियों को मुंह लगाते
हैं, एसा न होना चाहिए। सोने की तरह सोनपीतल भी होता है पर उसे कोई
हाथ से नहीं छूता । यदि स्वयम् सरस्वती ( बोलने का ) गुण सिखाए तो भी
कौआ कोयल की तरह सुंदर वाणी नहीं बोलता । इसलिए हे श्यामसुंदर,
अब आप अपनी करतूत बंद करें। क्या कभी आम की इच्छा इमली पूर्ण
कर सकती है ?
अलंकार—लोकोक्ति ।
( दोहा )
(४४१) बैन ऐन-सुख मैन करि, कहे सखिनि के धर्म ।
केसव कहौं कछूक अब तिनके कोबिद कर्म ।३०।
२६—सोनेंई०-सोने सो जो कहूँ पीतर । होइ-होहि । धर्म-नर्म, मर्म,
कर्म ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का लिप्यंतरण है:
२४० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—ऐन = ( अयन ) घर । ऐन-सुख = सुख का घर, सुखदायक ।
मैन=( मदन ) काम । कोबिद = चातुर्यपूर्ण ।
इति श्रीमन्महाराजकुमार इंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां
सखीजनवर्णनं नाम द्वादशः प्रभावः ॥१२॥
त्रयोदश प्रभाव
अथ सखीजनकर्म-वर्णन—(दोहा)
(४४२) सिक्षा, बिनय, मनाइबो, मिलवै करि सिंगार ।
झुकि अरु देइ उराहनो, यह तिनको ब्योहार ।१।
शब्दार्थ—सिक्षा=सीख । मिलवै = मिलाती है। झुकि = क्रुद्ध होकर ।
राधिका सों शिक्षा-(सवैया)
(४४३) नाह लगें मुख सौति दहैं दुख, नाहिं लगें दुख देह दह्रैगो ।
नाहीं अबै सुख देति है केसव, नाह सदा सुख देत रह्रैगो ।
नाही तें नाही री नाहीं भलाई, भली सब नाह ही तें पै कहैगो ।
नाह सों नेह निबाहि बलाइ ल्यौं; नाहीं सों नेह कहा निबहैगो।२।
भावार्थ—(मानवती नायिका को सखी शिक्षा दे रही है) हे सखी, पति
के मुख लगने पर ( प्रेम करने पर ) दुःख सौतों को जलाता है और यदि
'नहीं' मुख लगेगी तो वही दुख तेरे शरीर को जलाएगा । 'नहीं' केवल इस
समय सुख देती है और पति सदा सुख देता रहेगा । 'नहीं' से भलाई
नहीं है, नहीं है। पति के अनुकूल रहने से ही सब भली कहेंगे । इसलिए मैं
तेरी बलैया लेती हूँ तू नायक से प्रेम का निर्वाह कर, 'नहीं' से भला क्या
प्रेम मिलेगा ।
सूचना—यहाँ देह को केशव ने संस्कृत के अनुकूल पुंलिंग ही रखा है ।
कृष्ण की शिक्षा—( कबित्त )
(४४४) कुंकुम उबटि कुमकुमा के न्हवाइ जल,
सोंधो सिर लाइ याहि लाए कहा रास में ।
चंदन चढ़ाइ फूलमाल पहिराइ भूलि,
वेही काज आँजि मौलि कीनी है प्रकास में ।
१—वर्णन-कथन । मिलवै-मिलिबो, मिलवहि । करि-करहि । सिंगार-
सिंगार । अरु-के । २—राधिका सों-नायिका सों शिक्षा सखी की, राधिका की
शिक्षा प्रकास । दुख देह-मुख देह । तें-री । री-तें । भली-भलो । ही
तें-हिते । बलाइ ल्यों-री बाबरी ।
१६ त्रयोदश प्रभाव २४१
केसव कपूर पूरि काहे कौ खवाचौ पान,
जौ पै मन मगन है ऐसे ही बिलास में ।
वाहि न मनावौ हरि हाहा करि पाइ परि,
सब ही सुबास बसै जाके मुखबास में ।३।
शब्दार्थ—कुंकुम = केसर । उबटि = मलकर । सोंधो सिर लाइ = सिर में
सुगंध लगाकर । आँजि माँजि = अंजन लगाकर साफ सुथरी करके, श्रृंगार
करके । प्रकास में = सबके समक्ष । पूरि = डालकर । बिलास = आनंद ।
वाहि = उसे ( अन्य नायिका को ) ।
भावार्थ—केसर का उबटन लगाकर और केसर के ही जल से स्नान
कराके सिर में सुगंध लगाकर इसे रास में क्यों ले आए हो ? चंदन चढ़ाकर
और फूलमाला पहनाकर, भूल करके बिना किसी मतलब के इसे सँवार-सिंगार
कर प्रकाश में किया है ( सबके सामने लाए हो)। पान में कपूर डालकर उसे
क्यों खिलाते हो, यदि आपका मन ऐसे ही विलास में मग्न है तो आप जाकर
और पैरों पड़कर विनय करके उसे क्यों नहीं मनाते जिसके मुख की सुगंध में
सब प्रकार की सुगंध मिलती है । ( व्यंग्य यह है कि तुम दिखाने को तो आप
अपनी नायिका लेकर आए हो, पर तुम्हारी दृष्टि में कोई और स्त्री है, उसे
ही जाकर सँवारिए सिंगारिए ) ।
राधा सों विनय—( सवैया )
(४४५) ऐसेंही क्यों चुप ह्वै रहिहौं सखि हौं सहिहौं सतराहट सौ लौं ।
क्यों सरिहै मिलिबे बिन तोहि तऊ मिलियै मिलियै दिन जौ लौं ।
केसव कोरि करौ उपचार मिलै को कहा मिलिहै सुख तौ लौं ।
देखि धौं अंगनि आरसी लै मिलिहै पिय सों मन ही मन कौ लौं ।४।
शब्दार्थ—सतराहट = झिड़की । सौ लौं = सौ तक (अनेक) । सरिहै =
( काम ) चलेगा । मिलियै दिन जौ लौं = जब तक मिलने का दिन मिले ।
उपचार = उपाय ।
भावार्थ—मैं इस प्रकार कैसे चुप रहूँगी । मैं तो तेरी सैकड़ों तक
झिड़कियाँ सहूँगी और वही बारवार कहूँगी ) । बिना मिले तेरा काम कैसे
चलेगा । तब तक मिलते रहना चाहिए जब तक मिलने का दिन ( मौका )
३—कुँकुव०-कुंकुम जवादिसेंद । कुमकुमा०-कुमकुमा के नहवाइ, कुंकु-
मान अन्हवाइ । फूलमाल-फूलि फूल, फूले फूल, पुनि फूल । आँजि-आज । जौ
पै०-मन जो मगन है जू । ऐसेंही-ऐसोई, वेसेई । ४—हौं सहिहौं=होत कहा ।
तऊ०-तऊ मिलिहै । देखि०-देखियै । मिलिहै-मिलिहौ ।
२४२ रसिकप्रिया
मिलता जाय । इस प्रकार चाहे करोड़ों उपाय करो, पर मिलने का सुख तब
तक मिल ही नहीं सकता ( जब तक मिला न जाय ) । थोड़ा दर्पण लेकर
अपने अंगों को तो देख ले ( दुबली होती जा रही है ) । इस प्रकार प्रिय से
मन ही मन कब तक मिलती रहेगी ?
कृष्ण सों विनय—( कबित्त )
(४४६) कंज कैसे फूले नैन दारचौं से दसन ऐन,
बिंब से अधर, हास सुधा सो सुधारचो है ।
बेनी पिकबैनी की त्रिबेनी सी बनाइ गुही,
बार कै सेवार करिहाँ कों करि हारचो है ।
कीने कुच अमल कलपतरु के से फल,
केसौदास यातें बिधि मुगध बिचारचो है ।
देखौ न गुपाल सखी मेरी को सरीर सब,
सोने सों सँवारि सब सोंधे सों सँवारचो है ।५।
शब्दार्थ—दा०यों = (दाड़िम) अनार । ऐन = ठीक । बिंब = बिंबाफल,
कूँदरू । सुधारचो = बनाया हुआ ( आनंददायक ) । बेनी = वेणी, चोटी ।
पिकबैनी = कोयल के से कंठ ( वाणी ) वाली । कै = करके ।
भावार्थ—उसके नेत्र कमल के से हैं, दाँत ठीक अनार ( के दाने ) की
भाँति हैं, ओठ बिंबाफल से हैं और हँसी अमृत के समान आनंददायक है ।
उस कोकिल के से कंठ वाली की चोटी त्रिवेणी ( गंगा, यमुना, सरस्वती के
संगम ) की भाँति, केश सेवार के से करके ब्रह्मा कमर बनाते बनाते अंत.में
हार ही बैठा । उसने कल्पवृक्ष के सुंदर फलों के से उसके कुच बनाए हैं,
इसलिए ब्रह्मा ( अपनी ) उस सृष्टि पर स्वयम् मुग्ध है । इसलिए हे गोपाल
आप मेरी सखी का शरीर देखिए न ! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि वह
(शरीर) सोने से बनाया गया है और सुगंध से सँवारा गया है (सोने में सुगंध
नहीं होती, पर उसका शरीर देखकर ऐसा जान पड़ता है कि सोना और सुगंध
दोनों एकत्र हैं ) ।
राधा को मनाइबो—( सवैया )
(४४७) 'नाहीं'सिखौबति नाहीं भली सखि पावक सों तिनको मुँह डाहौ ।
भौंहनि के भुलबौ भद्दू भावनि नैननि के मत सों हित बाढ़ौ ।
५—कंज-मुख । बिंब-लाल । गुही-बीर । बार० बार सी बारीक, धार
सो बारीक, बार ज्यों सिवार । अमल०-अमल धमलका के फल के से । सब
सोंधे-मनौं मैन, मनु सैन, मानो मैन । सँवारचो-सुधारचो ।
त्रयोदश प्रभाव २४३
कालि तें कालि कै होन दई हँसी, पाइ परौं न परौ मुँह काढ़ौ ।
राज करौ यह राज सदा रहै केसव चित्र ज्यों आगे ही ठाढ़ौ ।६।
भावार्थ—जो 'नहीं' सिखाती हैं वे भली नहीं हैं । 'नहीं' सिखानेवाली
स्त्रियों का मुख आग से जला दो । भौंहों के ( इस रोष भाव ) को भुला दो,
नेत्रों के अनुकूल चलकर प्रेम बढ़ायो । कल-कल करके तो तुमने खूब अपनी
हँसी होने दी । पैरों पड़ती हूँ अब पड़ी ( लेटी ) न रहो अपना मुँह ( चादर
में से ) बाहर निकालो । चलो रजो राजो, तुम्हारा यह राज सदा रजा रहे
और चित्र की भाँति ज्यों का त्यों आगे खड़ा रहे ।
सूचना—हस्तलिखित प्रति में और सरदार की टीका में यह छंद मिलता
है, पर लीथोवाली प्रति में नहीं है । सरदार ने लिखा है—'यह कबित्त प्राचीन
पुस्तकन में नाहीं मिलत तातें नारायण कवि नहीं लिख्यो ।
पुनः—( सवैया )
(४४८) रीझि रिझाइ झरोखनि झाँकि रही मुख देखि दिखाइ सुबाहीं ।
बोलन आएँ अबोली भई अब केसव ऐसी हमें न सुहाहीं ।
मैं बहुतै बहराई हैं तो सी तू बहरावति मोहिं वृथाहीं ।
एहीं समान सदा चलिहौ हरि सों हँसि 'हाँ' करै मोहीं सों नाहीं ।७।
शब्दार्थ—रीझि = मुग्ध होकर । रिझाइ = मुग्ध करके । सुबाहीं=स्व-
भावतः, प्रकृत्या । बोलन = बोलने के लिए । अबोल = मौन । बहराई =
भुलावा दिया । सयान = चतुराई ।
भावार्थ—स्वयम् मुग्ध होकर और नायक को मुग्ध करके झरोखों से
झाँक कर स्वभावतः उनका मुख देख रही है और अपना दिखा रही है । पर
जब यहाँ बोलने के लिए आते हैं तब चुप्पी साध लेती है । मुझे ऐसी स्त्रियाँ
अच्छी नहीं लगतीं । तेरी ऐसी बहुतों को मैंने भुलावा दिया है, पर तू जो मुझे
भुलावा देना चाहती है वह व्यर्थ है । क्या सदा तेरी यही चतुराई चलती रहेगी ?
कैसी विलक्षण है कि नायक से तो हँसकर 'हाँ' करती है और मुझसे 'नहीं' ।
कृष्ण को मनाइबो—( सवैया )
(४४६) भूषन-भेद बनाइकै केसव फूल बनाइ बनाइकै बागे ।
भाग बढ़ाइ सुहाग बढ़ाइक राग बढ़ाइ हियें अनुरागे ।
६—पावक-जावक । सों-लों । होन-दौन । न परो-तन प्यौ । यह
जहँ । राज-आज । आगे०-आग ही डाढ़ो । ७—री-पै । एहीं-याही, ऐसे ।
करै-करि । मोहीं-मोहिं, मोहू ।