Skip to content
SarvaKosh
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 219 of 286

Read in context
Page 219

द्वादश प्रभाव २२३
अमृत की पराकाष्ठा की प्राप्ति होती है । लुकाछिपी के द्वारा उनसे नेत्रों को
मिलाने और प्रायः चुराए रखने में क्या सुख ? ( लुक-छिपकर थोड़ा नेत्र
मिला लेने से कितना सुख मिलेगा ) जब तक प्रिय के मन में अपने मन को
डालकर ( स्वच्छंदतापूर्वक ) विचरण करने के लिए न छोड़ दिया जाय ( मन
से मन भली भाँति मिल न जाय, खुलकर न मिल जाय ) ।
सूचना—बिहारी ने भी 'महुख' शब्द का प्रयोग किया है—
छिनक छबीले लाल वह जौ लगि नहिं बतराइ ।
ऊख महुख पीयूख की तौ लगि भूख न जाइ ॥—बिहारी-सतसैया
'देव' ने भी इसका बहुत प्रयोग किया है । यह 'मयूख' भी लिखा मिलता है ।
जनी को वचन श्रीकृष्ण सों, यथा—( कबित्त )
(४१७) ऐसी बातें ऐसें ही धौं कैसें कै कही परति,
जाकी गति मति लाज-पट सों लपेटी हैं।
मेरें ही न आवै, मेरी बीर एती बेर वे तौ,
जानति हौं धाइ ही के साथ लौटि लेटी हैं।
ऐसी तौ हैं चेरिन की चेरी बाकी केसवदास,
जैसी तुम हाहा करि पाइ परि भेंटी हैं।
जानति हौं नंदजू के ढोटा हौ जू, जानौ बोल,
उतहिं वेऊ तौ बृषभानजू की बेटी हैं ।६।
शब्दार्थ-ऐसें ही धौं = जिस प्रकार तुम कह रहे हो । जाकी० = जिसकी
चालढाल लज्जा रूपी वस्त्र में लिपटी है, जो अत्यंत लज्जाशील है । मेरे ही =
मेरे यहाँ तो कभी आती ही नहीं । हाहा करि = विनय करके । ढोटा = पुत्र ।
भावार्थ—( जनी की उक्ति नायक से ) आप जैसे कह रहे हैं वैसे भला
मुझसे और उस पर भी ऐसी बातें, उससे कैसे कही जा सकती हैं ? यही नहीं
उससे जिसकी चालढाल अत्यंत लज्जाशील है ( प्रेम की ये प्रगल्भ बातें ) ।
अरी मैया, मेरे यहाँ तो वह आती नहीं और फिर इस समय ( रात में ) मेरा
अनुमान है कि वह ( घूम-फिरकर ) धाय के साथ साथ लौटी है और आराम
कर रही है ( इस बीच जाकर कैसे ये बातें कहूँ ? ) । जैसी नायिका से विनय
करके और पैरों पड़कर आज आपने आलिंगन किया है, वैसी तो उसकी दासी
की दासी हैं । जानती हूँ कि आप नंद जी के लाड़ले हैं, आपके बोल मैंने पह-
चाने । उधर वे भी वृषभानु की लाड़िली पुत्री हैं ( मेरी तो हिम्मत नहीं कि
उनसे जाकर ऐसी बातें कह सकूँ ) ।
६—श्रीकृष्ण सों-प्रिय प्रति । ही धौं-हिये । कैसें०-कैसे कही परति धौं,
कैसे कही परत न । पट-पाट । बेर-बार । जानति०-जात धाइ ही के घर साथ ।
केसौदास-केसौराइ । ढोटा-बेटा । बोल-जाहू । उतहिं०-वेऊ तौ उतहिं ।