रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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माखन सी जीभ, मुख कंज सो कोवँर, कहु
काठ सी कठेठी बातें कैसैं निकरति हैं ।१५।
शब्दार्थ—मैन = ( मदन ) मोम । मृदु = कोमल । मृनालिका = कमल-
नाल । सूत = कमलनाल तोड़ने से जो पतले सूत दिखाई पड़ते हैं । सुर-
धुनि = स्वर की ध्वनि (मधुर राग) । मननि मनों को । दारधो = (दाड़िम)
अनार । पान = ( पर्ण ) पल्लव । देखे० = आँखों से देख लेने पर हृदय में
आनंद भर देती है । एरी = एरी सखी । बूझति हौं = पूछती हूँ । और० =
और हम पूछते हुए हृदय से डरती हैं। कंज = कमल । कोवँर = कोमल ।
कठेठी = कठोर । निकरति ० = निकलती है ।
अलंकार—विभावना ।
सूचना—'पान' कहने से बरइन है ।
बरइनि को वचन कृष्ण सों, यथा—( कवित्त )
(४२७) नैननि नवावौ नेक अति ही अनीति करें,
जानति न तुम जैसें ब्रज जानियत हैं।
चंचल चरित्र चित्त, चेटक चटकि लावौ,
चेरे कै चितनि अभिसार सौंपियत हैं।
एकनि के पैठे उर, उररि उरोजन में,
डर डोलैं केसौदास कैसैं वै जियत हैं।
ऐसी कहूँ होति है जो बालनि के चोरि चोरि
मन मनमथ ही के हाथ बेचियत हैं ।१६।
शब्दार्थ—नवावौ नेक = थोड़ा दबाओ, रोको । अनीति = अन्याय ।
चेटक = जादू । चटकि = शीघ्रता से । अभिसार० = अभिसार को सौंप देता
है, चक्कर में डाल देता है या अभिसार के लिए प्रेरित करता है । पैठे =
घुसे । उररि = उलझकर । बालनि = नायिकाओं ( ब्रजांगनाओं ) ।
भावार्थ—हे प्यारे, भला ऐसा भी कहीं किया जाता है ? तुम ब्रजांग-
नाओं के मन चुरा चुराकर उन्हें काम के हाथ बेच देते हो । इन नेत्रों को
१५—मृदु–तब । के–से । ऐसी–कैसे । मनहि–मन को, मननि । पान
से०–पान सो उदरु, बिंब से अरुन । केसौदास०--देखि देखि केसौदास । मेरी-
बोर । और–उर । कोवँर–कुंवरि, कुँवर, कोमल । १६—नवावौ--नवेंबो ।
अति ही--निपट । न--हौ । ब्रज--जग । चेटक०--चेटको चटका गाथो । चेरे
कै–चोरि कै । उररि--उरझि । डर०--उरझे तें । केसौदास--केसौराइ । वै--ति ।
के चोरि०--की चोरीचोरी, के चोराचोरी । मन०--चित मति मनमथ हाथ, मन
मनमथ चाक ।