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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 227 of 286

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Page 227

२३२ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—खोट = खोटा, शरारती ! तुरी = घोड़ा । खूँट = ओर, दिशा ।
अलोक = बदनामी । ताजन = चाबुक, कोड़ा । ओर निबाहू = अंत तक निर्वाह
भावार्थ—खोटे शरारती घोड़े की भाँति आप जिधर जाते हैं, सीधे चले
जाते हैं । ठौर कुठौर को जानकर भी उधर ही जाते हैं । समाज द्वारा मारे
गए बदनामी के कोड़े के लगने पर भी लज्जा नहीं आती ( आप शोख होते
जाते हैं ) । अनेक प्रकार के विचारों द्वारा विचार लीजिए तथा जो आपके
हितुआ हों उनसे भी पूछ लीजिए, प्रेम के ही साथ लगने से काम बनेगा, नेत्रों
का साथ देने से अंत तक निर्वाह नहीं हो सकता ( आप नायिका से प्रेम
करके भी जो अपने नेत्रों को बेलगाम छोड़े रहते हैं सो ठीक नहीं ) ।
चुरिहेरिन को वचन राधिका सों, यथा—( कबित्त )
(४३०) मन मन मिलें कहा मिलिहै मिले को सुख,
मिलिहू धौं देखहु बोलाइ काहू बाल सों ।
भूलि परे भौंहनि हीं बाँधिहौ कितेक दिन,
बाँधौ बलि जाउँ बनमाली बनमाल सों ।
मुँह मोरें मारें न मरति रिस केसोदास,
मारहु धौं मेरे कहें कमल सनाल सों ।
नैननिहीं बिहँसि बिहँसि कौ नौ बोलिहौ जू,
कबहूँ तौ बोलियै बिहँसि मुख लाल सों ।१६।
शब्दार्थ—मन मन मिले = केवल मन से मन मिलाने से । कहा =
क्या । भूलि = चूक । बनमाली = श्रीकृष्ण । बनमाल सों = वनमाला से
अर्थात् स्वागत करके, आलिंगन करके । कमल सनाल = मृणालयुक्त कमल
( हथेली सहित भुजा ) ।
भावार्थ— केवल मन को मन से मिलाने से मिलाने का क्या सुख मिलेगा ?
यदि आपको मेरी बात का विश्वास न हो तो आप किसी प्रेम करनेवाली स्त्री
को बुलाकर और उससे पूछकर ही समझ लीजिए । यदि नायक से भूल हो
जाय तो आप भौंहों से कितने दिनों तक बाँधेंगी ? ( भौंहें टेढ़ी करने से वे
कब तक चूक न करेंगे ? ) । मैं आपकी बलिहारी जाती हूँ उन वनमाली को
वनमाला से बाँधो (उनका स्वागत करो, आलिंगन करो, रूठो मत) । क्या कहीं
मुँह मोड़ लेने से प्रेम का रोष मारने के मान का होता है ? (नहीं, मुँह फेरने
से क्रोध नहीं दबेगा ) । यदि आप उन्हें किसी अपराध का दंड देना चाहती
हैं तो मेरे कहने से उन्हें मृणालयुक्त कमल से मारिए ( अपनी भुजाओं से
१६—हीं-धौं । न मरति-मान रति, नाम मन । मरति०—मारै रिस
केसोदास, रति रिस प्यारेलाल । कबहूँ-बबहू । तौ-धौं ।