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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished362 pages

About this granth

Rasaratnasamuchchaya (रसरत्नसमुच्चय) is a major text of rasashastra, the branch of Ayurveda that purifies mercury, sulphur, mica, metals and gems and turns them into medicines. It is ascribed to Vagbhatacharya, usually called Rasa-Vagbhata to distinguish him from the author of the Ashtanga Hridaya.

The opening part describes the pharmacy, apparatus, crucibles, heating methods and technical terms, followed by the purification and incineration of the major and minor minerals, metals and gems. Later chapters give mineral formulations for treating particular diseases.

This edition was published in 1939 by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Benares, as No. 91 of the Haridas Sanskrit Series. It carries the Suratnojjvala Hindi commentary of Pandit Ambikadatta Shastri, Ayurvedacharya of Banaras Hindu University, with notes, introduction, indices and appendices. Each verse is followed by a plain Hindi explanation, and the book long served students and practising vaidyas. The opening leaves of this copy also carry a few remedies handwritten in Nepali by an earlier owner.

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THE
HARIDAS SANSKRIT SERIES
91

Rasaratna Samuchchaya

by
S'RĪ VĀGBHATĀCHĀRYA

Edited with-
THE SURATNOJJVALĀ HINDI COMMENTARY
and
Notes, Introduction, Indices, Appendices etc.,.
By
PANDIT S'RĪ AMBIKĀDATTA S'ĀSTRĪ
Ayurvedacharya ( A. M. S. ) B. H. U.


PUBLISHED BY
JAYA KRISHNA DÂS HARIDÂS GUPTA
The Chowkhamba Sanskrit Series Office.
Benares City.
1939

Page 4Permalink

PRINTED BY
JAYA KRISHNA DAS GUPTA,
VIDYA VILAS PRESS, BENARES CITY.
1939.


Registered According to Act XXV of 1867.
All Rights Reserved by the Publishers.

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* श्रीः *
→* हरिदास-संस्कृत-ग्रन्थमाला *←

९१


श्रीवाग्भटाचार्यविरचितः

रसरत्नसमुच्चयः ।


काशी-हिन्दू-विश्वविद्यालयेऽधिगतप्राच्यपाश्चात्य
चिकित्साशास्त्रतत्त्वेन श्री कृष्णात्मजेन
आयुर्वेदाचार्य, ए. एम्. एस्. इत्युपाधिधारिणा
पण्डित श्री अम्बिकादत्त-शास्त्रिणा
विरचितया—
पारदगन्धकाभ्रकलाहताम्रादिरसोपरसधातूपधात्वादीनां विज्ञानानुमत-
वर्णनोपेतेन ज्वरादिसमस्तरोगपथ्यापथ्यप्राच्यपाश्चात्यमतानुमत-
निदानाद्यनेकविषयोपबृंहितेन च
विमर्शेण विभूषितया—
सुरत्नोज्जवलाख्य-भाषा-टीकयाऽऽलङ्कृतः ।
तेनैव संशोधितश्च ।


प्रकाशकः—
जयकृष्णदास हरिदास गुप्तः
चौखम्बा संस्कृत सीरिज़ आफिस,
विद्याविलास प्रेस, बनारस सिटी ।

१९९६

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हेर्मा प्रकृती ॥
आलुस्वँ आलुवं ममोहूना
रात सुत्नेमान्छी ५०००। जप
गरेपछि सीध्द हून्छ. फेयहरी
लाग्देवाउने जेगेनेरै)

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⥤ भूमिका ⥢

वर्तमान् समय में पृथ्वीमण्डल पर अनेक चिकित्सा प्रणालियां प्रचलित हैं जैसे आयुर्वेद, एलोपेथी, होमियोपेथी, यूनानी, जलचिकित्सा ( हाइड्रोपेथी ), विद्युच्चिकित्सा आदि। इन सब चिकित्साओं की जननी कहलाने का सौभाग्य आयुर्वेदचिकित्सा प्रणाली को ही प्राप्त है, अथवा यों कह सकते हैं कि इन सब का अन्तर्भाव आयुर्वेद के अन्दर ही हो सकता है। जो लोग एलोपेथी ही को वैज्ञानिक कह कर अन्य चिकित्सा को अवैज्ञानिक कहने का साहस करते हैं उनकी धारणा एक दम असत्य है क्योंकि एलोपेथी के अन्दर जितने भी विषय ( Anotomy, Physiology, Surgery, Toxicology, Jurisprudence, Midwifery, Materiamedica, Medicine etc., ) हैं उन सबका वर्णन आयुर्वेद के अन्दर करोड़ों वर्ष पहिले से लिखा हुआ मिलता है। इस लिए हम दावे के साथ कह सकते हैं कि संसार भर की चिकित्साप्रणालियों में सर्वप्रथम तथा सर्वश्रेष्ठ यदि कोई चिकित्सा प्रणाली है तो वह आयुर्वेदचिकित्सा प्रणाली ही है। हमारे आयुर्वेद के अन्दर इस समय कोई शाखा पिछड़ी हुई है तो वह सिर्फ शल्यशालाक्य चिकित्सा ही है। इसका कारण इस शाखा को प्रोत्साहन नहीं मिलना है तथा वैद्यबन्धुओं का आलस्य और आधुनिक भूपालों की उपेक्षा आदि है। अब इसकी सर्वोत्कृष्ट उन्नति होने का समय अत्यन्त निकट ही है। अस्तु आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली आसुरी, मानुषी और दैवी इस तरह तीन भागों में विभक्त है जैसे कहा भी है—

सा दैवी प्रथमा सुसंस्कृतरसैर्या निर्मिता सद्रसै-
श्चूर्णस्नेहकषायलेहरचिता स्यान्मानवी मध्यमा।
शस्त्रच्छेदनलास्यलक्ष्मणकृताऽचाराधमा साऽऽसुरी-
त्यायुर्वेदरहस्यमेतदखिलं तिस्रश्चिकित्सा मताः ॥ १ ॥

आसुरी मानुषी दैवी चिकित्सा त्रिविधा मता।
शस्त्रैः कषायैर्लोहाद्यैः क्रमेणान्त्याः सुपूजिताः ॥ २ ॥

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[ २ ]

इन तीनों में दैवी ( रस ) चिकित्सा सर्व श्रेष्ठ मानी गई है । यह मानना सोलहों आना ( पूर्णतया ) सत्य भी है क्योंकि शल्यचिकित्सा केवल वर्धित या विकृत हुए शरीराङ्ग को काट सकती है । किन्तु उस विकार का पूर्ण निर्मूलन नहीं कर सकती है । जैसे अर्श (Piles), अर्बुद ( Tumours ) आदि का छेदन करने पर भी अनेकों बार उनकी पुनरुत्पत्ति होते देखी गई है किन्तु रसचिकित्सा के द्वारा चिकित्सा करने पर लाभ ( रोगनाश ) देर से होता है किन्तु स्थाई होता है इस लिए रसचिकित्सा सर्वोत्तम है । रसों के सेवन करने से शरीर रोगों से प्रथम ही पृथक् रहता है ।

“प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम्”

इस लिए इस चिकित्सा को दैवी चिकित्सा कहना अत्युक्ति नहीं है अपि तु यथार्थ ही है । अत एव रसचिकित्सक सर्व चिकित्सकों में उत्तम “उत्तमो रस वैद्यस्तु मध्यमो मूलिकादिभिः ।
अधमः शस्त्रदाहाभ्याम्”
माना गया है । यद्यपि काष्ठौषधियों द्वारा निर्मित चूर्ण, अवलेह आदि भी शरीर के लिये हितकर हैं तथापि चूर्ण अवलेहादिक की तरह रसों का अधिक प्रयोग नहीं करना पड़ता है तथा रस अरुचिकर कभी भी नहीं होते हैं और शीघ्रातिशीघ्र शरीर को आरोग्य प्रदान करते हैं ।

अल्पमात्रोपयोगित्वादरुचेरप्रसङ्गतः ।
क्षिप्रमारोग्यदायित्वादौषधेभ्योऽधिको रसः ॥

इस लिये निर्विवाद सिद्ध हो गया कि रसचिकित्सा अन्य चिकित्साओं में तो श्रेष्ठ है ही परन्तु आयुर्वेदीय ‘अष्ट”अङ्गों’ में भी सर्व प्रथम मानी गई है । इस रस चिकित्सा का आविर्भाव सर्व प्रथम महादेवजी ने किया है । अत एव यह चिकित्सा दैवी है । बाद में रसचिकित्सा के प्रवर्तक कई आचार्य हुए हैं ।

आदिमश्चन्द्रसेनश्च लङ्केशश्च विशारदः ।
कपाली मत्तमाण्डव्यौ भास्करः शूरसेनकः ॥ १ ॥
रत्नकोशश्च शम्भुश्च सात्विको नरवाहनः ।

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[ ३ ]

इन्द्रदो गोमुखश्चैव कम्बलिव्र्यांडिरेव च ॥ २॥
नागार्जुनः सुरानन्दो नागबोधिर्यशोधनः ।
खण्डः कापालिको ब्रह्मा गोविन्दो लम्पको हरिः ॥ ३॥

इन आचार्यों ने कई रस ग्रन्थ बनाये हैं। निम्न रसतन्त्र या संहिताओं का नामोल्लेख मिलता है।

रसेन्द्रसंहितासिद्धलक्ष्मीश्वरतन्त्रचन्द्रसेनसिद्धान्त
दत्तात्रेयसंहितालम्पटतन्त्रलङ्केशसिद्धान्त
अगस्त्यसंहितास्वच्छन्दभैरवतन्त्रकपिलसिद्धान्त
नासत्यसंहितामन्थानभैरवतन्त्रब्रह्मसिद्धान्त
गोरक्षसंहिताकाकचण्डीश्वरतन्त्र(१)रसरत्नाकर
रुद्रयामलतन्त्रहरीश्वरतन्त्ररसरत्नप्रदीप
महारसायनतन्त्रमहादेवतन्त्ररसपारिजात
कामधेनुतन्त्रनागार्जुनतन्त्ररसेन्द्रसारसङ्ग्रह
दत्तात्रेयतन्त्रबालतन्त्ररसरत्नसमुच्चय आदि।

इनमें से बहुत से ग्रन्थ लुप्त हैं तथा जो मिलते हैं उनमें यह रस-रत्नसमुच्चय नामक ग्रन्थ भी रसचिकित्सा का एक सर्वाङ्गीण ग्रन्थ है। यद्यपि इस का प्रचार कुछ वर्षों पहिले कम था किन्तु इसके अन्दर अनेक रसों के उत्तमोत्तम योग तथा पारद के अनेक संस्कारों का उत्तम वर्णन होने से अब दिनों दिन इसकी आवश्यकता बढ़ती जा रही है तथा यह ग्रन्थ अब वैद्य समुदाय में अधिक प्रचलित हो रहा है तथा बिहार आदि अनेक स्थानों की सम्मानित परीक्षाओं में भी रखा हुआ है। इस ग्रन्थ में अनेक उत्तमोत्तम योग हैं, जिनका अनुभव करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि इन योगों का प्रयोग किया जाय तो चिकित्सा में आश्चर्यजनक लाभ हो सकता है। यह ग्रन्थ तीस अध्यायों में विभक्त है।

प्रथमाध्याय-में हिमालयवर्णन, रस ( पारद ) के उत्कर्ष का वर्णन, मूर्च्छित पारद के गुण तथा उसकी उत्पत्ति, भेद और निरुक्ति आदि पारदसम्बन्धी वर्णन है।


( १ ) काशी संस्कृत ग्रन्थमाला नं० ७३ में मुद्रित है।

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[ ४ ]

द्वितीयाध्याय-में आठ महारसों के भेद, गुण, शोधन तथा मारण और उनकी उत्पत्ति का अत्यन्त सुन्दर वर्णन है। यथा—

अभ्रवैक्रान्तमाक्षीकविमलाद्रिजसस्यकम् ।
चपलो रसकश्चेति....................................॥

तृतीयाध्याय-में अष्ट उपरसों की उत्पत्ति, भेद, गुण, शोधन तथा उनके प्रयोगों का वर्णन है । यथा—

"गन्धाश्मगैरिकासीसकाङ्क्षीतालशिलाञ्जनम् ।
कङ्कुष्ठं चेत्युपरसाः....................................॥

चतुर्थाध्याय-में रत्नों के भेद, नाम, गुण, शोधन, मारण और प्रयोगों का वर्णन है। यथा—

वैक्रान्तः सूर्यकान्तश्च हीरकं मौक्तिकं मणिः ।
चन्द्रकान्तस्तथा चैव राजावर्तश्च सप्तमः ॥
गरुडोद्गारकश्चैव ज्ञातव्या मणयस्त्वमी ।
पुष्परागो गोमेदश्च पद्मरागः प्रवालकम् ॥
वैदूर्यं च तथा नीलः................................॥

पञ्चमाध्याय-में शुद्धलोह ( स्वर्ण, रजत, ताम्र, लौह अर्थात् मुण्ड, तीक्ष्ण, कान्त ), पूतिलोह ( नाग, वङ्ग ) और मिश्रलोह ( पित्तल, कांसा, भरत, रूक्मलोह ) की उत्पत्ति, भेद, गुणदोष, शोधन, मारण और प्रयोगों का वर्णन है ।

षष्ठाध्याय-में शिष्योपनयन, रसविद्या गुरुलक्षण, शिष्य और अनुचरों का गुण, रसशाला और रसमण्डप का निर्माण, रसलिङ्ग की स्थापना, पूजन और ध्यान, शिष्यदीक्षादानविधि, कालिनीलक्षण और होमविधि का वर्णन है ।

सप्तमाध्याय-में रसशालानिर्माण, उपरस, महारस, अष्ट लोह और उपकरणों की पूजाविधि, पद्महस्तवैद्यादिकों का लक्षण तथा रससाधनीय पदार्थों का वर्णन और परिचारकों के लक्षण का वर्णन है।

अष्टम व नवम अध्याय-में क्रमशः परिभाषावर्णन, व दोलायन्त्र, विद्याधरयन्त्र, घटयन्त्र, पातनयन्त्रादिकों का वर्णन है ।

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[ ५ ]

दशमाध्याय-में विविध मूषा तथा विविधपुट तथा अम्लवर्ग, विष-वर्ग, दुग्धवर्ग, रक्तादिवर्ग, शोधनीयगणादिकों का वर्णन है ।

एकादशाध्याय—में मानपरिभाषा, पारद के अष्टादश संस्कार तथा २५ प्रकार के बन्धनों का विस्तृत वर्णन है ।

बारहवें से पच्चीसवें अध्याय-में शरीर में होने वाले समस्तरोगों (जैसे ज्वर, रक्तपित्त, कास, श्वास, हिक्का, वैस्वर्य, क्षय, अरुचि, प्रसेक, छर्दि, हृद्रोग, तृष्णा, मदात्यय, अर्श, उदावर्त, अतिसार, ग्रहणी, प्रवाहिका, विसूची, अग्निमान्द्य, मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, प्रमेह, सोमरोग, पिडिका, विद्रधि, वृद्धि, गुल्म, शूल, उदररोग, पाण्डु, शोफ, विसर्प, कुष्ठ, श्वित्र, वातव्याधि, वातरक्त, वन्ध्यारोग, गर्भिणीविकार, सूतिकारोग, बालरोग, उन्माद, अपस्मार, नेत्ररोग, कर्णरोग, नासिकारोग, मुखरोग, शिरोरोग, व्रण, अस्थिभग्न, भगन्दर, गलगण्ड, गण्डमाला, क्षुद्ररोग, उष्णवात ( औपसर्गिक मेह ) उपदंश आदि गुह्यरोग, विषजन्य रोग के लक्षण, भेद, निदान तथा चिकित्सा का विस्तृत वर्णन है।

छब्बीसवें अध्याय-में जरारोग की निदानचिकित्सा, मासिकरसायन, षाण्मासिकरसायन, पाक्षिकरसायन, अष्टमासिक रसायन, त्रिवार्षिक-रसायन, सहस्रवर्षायुष्करसायन, त्रिफलारसायन और कान्ताभ्रक रसायनादि का वर्णन है ।

सत्ताइसवें अध्याय-में वाजीकरण के लिये अनेक प्रकार के दिव्य रसों का वर्णन तथा स्तम्भनशक्तिवर्द्धक उपाय हैं ।

अट्ठाइसवें अध्याय-में लोह अर्थात् स्वर्ण, रजत ताम्रादिकों के अनेक कल्पों का वर्णन है ।

उन्तीसवें अध्याय-में विषों की उत्पत्ति, विषों के भेद, गुणदोष तथा अनेक रोगों पर विषके कल्पों का वर्णन है ।

तीसवें अध्याय-में रसमारण, रसजारण तथा रस ( पारद ) के अनेक रोगों को नष्ट करने के लिये अनेक कल्पों का वर्णन, ग्रन्थोप-संहार, आचार रसायन, आयुर्वेदोपदेश का पालन, कुवैद्यवर्जन, शास्त्रज्ञ वैद्य का साफल्य, चिकित्सा की सर्वत्र सफलता, वैद्य और रोगी

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[ ६ ]

का परस्पर कर्तव्य, वैद्य की सर्वत्र आवश्यकता तथा ग्रन्थकार की विज्ञप्ति आदि का सुन्दर वर्णन है ।

इस प्रकार प्रथमाध्याय से लेकर तीसवें अध्याय तक आये हुए विषयों के अवलोकन करने से इस ग्रन्थ की कितनी आवश्यकता है यह सहज ही में विदित हो सकता है। इस प्रकार का अन्य रस ग्रन्थ मिलना अत्यन्त असम्भव है। ऐसे ही रस ग्रन्थ के ऊपर अन्वेषण करने से आतुरों का अधिक हित तथा आयुर्वेद की उन्नति में परम सहायता हो सकती है। इस ग्रन्थ की हिन्दी में आजतक कोई ऐसी सरल तथा गूढार्थों का प्रबोध कराने वाली वैज्ञानिक अन्वेषण से परिपूर्ण टीका नहीं निकली थी। इस महती क्षति की पूर्ति के लिए काशीस्थ सुप्रसिद्ध चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय के अध्यक्ष श्रीमान् बाबू जयकृष्णदास जी गुप्त ने 'जो कि आयुर्वेदोद्धार तथा विद्वज्जन तथा आयुर्वेदमृतपान करने के लिए उत्कण्ठित छात्रों के हित का विचार सदा चाहते हैं, एक ऐसी विस्तृत भाषा टीका जो कि वैज्ञानिक व्याख्यानों से परिपूर्ण हो, लिखने के लिए प्रार्थना की। उस प्रार्थना को मैंने भी स्वीकार करके कार्य करना प्रारम्भ कर दिया ।

इस ग्रन्थ की टीका के उत्तम रूप से समाप्ति होने में कई कारण हैं। सर्व प्रथम रसेन्द्र की संस्कृत टीका के अवलोकन करने से प्रसन्न हुए काशीस्थ वैद्यशिरोमणि गुरुजनों का शुभाशीर्वाद तथा मेवाड़ा-धिराज रविकुलकमलदिवाकर श्री श्री श्री १००८ श्री जी हजूर भूपाल सिंह जी के प्रधान चिकित्सक (राजवैद्य) श्रीमान् डाक्टर रविशङ्कर जी का शुभाशीर्वाद तथा आगे आयुर्वेदोद्धार सम्बन्धी कार्य करने का प्रोत्साहन और उक्त महाराणाधिराज उदयपुर (मेवाड़) की पूर्ण स्नेहदृष्टि तथा सहायता ही प्रधान है।

इस टीका की विशेषतायें—

मूलग्रन्थ में जितने विषय लिखे हुए हैं उतने अन्य रस ग्रन्थों में इस प्रकार स्पष्ट और विस्तृत नहीं हैं अत एव यह ग्रन्थ स्वयं ही अत्यन्त उपादेय है, फिर भी टीका इतनी स्पष्ट और विस्तृत तथा वैज्ञानिक अन्वेषणों

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[ ७ ]

से परिपूर्ण होने के कारण यह एक पूर्ण रस ग्रन्थ बन गया है तथा इसटीका के समान पूर्व में कोई ऐसी टीका नहीं थी और न बनेगी कारण यह है कि ग्रन्थारम्भसे लेकर ग्रन्थ समाप्ति तक मूलका अर्थ स्पष्टतया लिख कर नीचे विमर्श के अन्दर खनिजों का वैज्ञानिक पूर्ण वर्णन तथा रोगों का डाक्टरी के मत से भेद निदानादिक का जहां तहां वर्णन कर दिया गया है। अत एव मुझे पूर्ण विश्वास है कि ऐसी टीका “न भूता न भविष्यति” हां हो सकता है कि इसी का अनुकरण कर के कुछ इधर उधर परिवर्तन कर के अन्य टीका प्रकाशित हो किन्तु वह भी निम्न पद्यानुकूल होगी।
“उत्पत्स्यते हि मम कोऽपि समानधर्मा कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी”
अस्तु जो कुछ है संसार के पूज्य विद्वानों की सेवा में उपस्थित है।
हंसः श्वेतो बकः श्वेतः को भेदो बकहंसयोः।
नीरक्षीरविभागे तु हंसो हंसो बको बकः॥

विशेषतायें—

[ १ ]
प्रथमाध्याय में सर्व प्रथम लिखे हुए पारद के विषयका विमर्श ३८ पृष्ठों में वर्णित है। पारद का स्वरूप, सङ्केत (Symbol), परमाणुभार (Atomic weight), आपेक्षिकघनत्व (Relative Density), हिमाङ्क (Freezing Point), कथनाङ्क (Boiling Paint) आदि का परिभाषा के सहित वर्णन है तथा उसके पश्चात् पारद की उपस्थिति, पारद की सर्वप्रथम प्राप्ति, पारद निकालने योग्य खनिज, पारद की परीक्षा (Test), पारदीय खनिज प्राप्ति के स्थान, पारद के दोषों का समन्वय, पारद के भेद, शुद्धाशुद्धपारद के लक्षण आदि पारदसम्बन्धि अनेक बातों पर प्राच्य-पाश्चात्य मत से अच्छा वर्णन किया गया है जिस से हमारे वैद्य बन्धुओं को पारद के ज्ञान की विशेष करके नव्य ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति हो जाय।

[ २ ]
द्वितीयाध्याय में लिखित अभ्रकादिक अष्ट महारसों के विमर्श में प्रत्येक महारस की उत्पत्ति, भेद, प्राप्तिस्थान, गुणदोष आदि का आधुनिक मत से वर्णन है।

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[ ८ ]

[ ३ ]
तृतीयाध्याय में लिखित गन्धकादिक अष्ट उपरसों की उपलब्धि, भेद, प्राप्तिस्थान आदि विषयों का वर्णन किया गया है ।

[ ४ ]
एकादशाध्याय में पारद के संस्कारों की सब विधियां टिप्पणी के रूप में प्रत्येक स्थान पर लिखी गई हैं ।

[ ५ ]
प्रत्येक ज्वर के लक्षण, प्रत्येक ज्वर का पथ्य तथा अपथ्य का विशेष उल्लेख किया गया है । साथ २ रसनिर्माण में जो २ पारिभाषिक शब्द आये हैं उन की टिप्पणी में परिभाषा लिख दी हैं ।

[ ६ ]
इसी तरह रक्त पित्त, कास, श्वास, हिक्का, स्वरभङ्ग, राज्यक्ष्मा, छर्दि, हृद्रोग, मदात्यय, अर्श, उदावर्त, अतीसार, ग्रहणी, मूत्रकृच्छ्र, प्रमेह, वृद्धि, गुल्म, उदररोग, पाण्डु, शोथ, विसर्प, कुष्ठ, वातव्याधि, वातरक्त, भगन्दर, नेत्र रोग आदि समस्त रोगों के विषय में विमर्श लिख दिया है जिस में सब रोगों का पथ्यापथ्य तथा जहां तहां डाक्टरी मत से रोग भेद आदि का वर्णन भी किया गया है ।

[ ७ ]
सर्व प्रकार के विषों का भेद, उन के शोधन की विधि तथा प्रयोगों का वर्णन किया गया है ।

[ ८ ]
सर्व प्रकार के क्षुद्र रोगों का पृथक् २ लक्षण, पृथक् २ चिकित्सा तथा पथ्यापथ्य का अन्य रसग्रन्थों की सहायता से पूर्ण वर्णन कर दिया है ।

[ ९ ]
कहीं २ पर अनेक रोग तथा उन की चिकित्सा का प्रक्षिप्त रूप से आवश्यक होने के कारण वर्णन कर दिया गया है ।

[ १० ]
रसायन और वाजीकरण का लक्षण, कुटीनिर्माणविधि, चरकोक्ताचार, रसायन आदि अनेक उपयुक्त विषयों का चरक सुश्रुतादि ग्रन्थों के आधार पर वर्णन किया गया है ।

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[ ६ ]

इस तरह मैने टीका की विशेषता को संक्षेप में दिखलाई है। विमर्शा-नुक्रमणिका के अवलोकन करने से विज्ञ महानुभावों को विदित हो जायगा कि यह टीका कहां तक उपयुक्त है।

इस टीका के लिखने में चरक, सुश्रुत, वाग्भट, रसेन्द्रसारसङ्ग्रह, भैषज्यरत्नावली, रसतरङ्गिणी, खनिजविज्ञान, प्रारम्भिक रसायन आदि अनेक ग्रन्थों की सहायता प्राप्त हुई है अतः उन ग्रन्थकर्त्ताओं के प्रति परम श्रद्धा प्रकट करता हूं तथा उनके ऋण से कभी भी निर्मुक्त नहीं हो सकता। सर्वप्रथम श्रीमान् विप्रकुलावतंस, हिन्दूविश्वविद्यालय के प्राण, देशोद्धारक, भगवद्भक्त, कुलपति महोदय श्रीमनामना मदनमोहन मालवीय जी के प्रति असीम श्रद्धा प्रगट करता हूं क्यों कि आप ही की साधना से यह प्राच्यनव्यायुर्वेदीय विद्यालय स्थापित हुआ और इसी में मैंने जन्तुशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र तथा आयुर्वेद और डाक्टरो का उच्चज्ञान प्राप्त करके इस प्रकार की वैज्ञानिक टीका के लिखने में प्रवृत्ति प्रदर्शित की। इस टीका के लिखने में विशेष कर अनेक जटिल स्थलों पर पूज्यपाद गुरुवर्य, चिकित्सकचूडामणि, आयुर्वेद विद्यालय (हिन्दू यूनिवरसीटी) के प्रधानाध्यक्ष श्रीमान् पं० सत्यनारायण जी शास्त्री ने चिकित्सा के सिद्धान्तों में तथा खनिजविषयों पर श्रीमान् कविराज प्रतापसिंह जी (रसशास्त्राध्यापक आयुर्वेद फार्मेसी सुपरिन्टेण्डेण्ट) ने अत्यन्त सहायता प्रदान की है अतः उक्त दोनों महानुभावों के प्रति मैं परम श्रद्धा प्रगट करता हूं। साथ ही साथ आयुर्वेद कालेज के पाश्चात्य चिकित्साशास्त्र के अध्यापक तथा अनेक ग्रन्थों के लेखक आयुर्वेदाचार्य डा० भास्कर गोविन्द घाणेकर जी के प्रति परमश्रद्धा प्रगट करता हूं क्यों कि आप ही ने सर्व प्रथम अपनी सुकृतियों के द्वारा हम लोगों की इस नवीनप्रकार की टीका लेखन पद्धति में रुचि उत्पन्न की तथा एक मार्ग सा बना दिया। इनके अतिरिक्त डा० मुकुन्द स्वरूप जी वर्मा (सरसुन्दरलाल हास्पिटल सुपरिन्टेण्डेण्ट तथा वायस-प्रिंसिपल आयुर्वेदकालेज तथा सर्जरी के प्रोफेसर) तथा पं० जगन्नाथजी शर्मा वाजपेयी एम० ए० (प्रोफेसर आयुर्वेद कालेज) तथा अन्य समस्त-

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[ १० ]

गुरुओं के प्रति भी परम श्रद्धा प्रकट करता हूं, क्यों कि आप लोगों के सदुपदेश तथा प्रोत्साहन का ही फल है कि मैं इस टीका के लिखने में सफल हुआ।

आयुर्वेद प्रेमी तथा छात्रों के हितचिन्तक और सरस्वतीसेवापरायण परम वैष्णवभक्त चौखम्बा पुस्तकालय के अध्यक्ष श्रीमान् जयकृष्णदास जी को मैं अनेक धन्यवाद देता हूं, क्यों कि आपने अपने उदारभावसे तथा सरस्वती की सेवा और आयुर्वेद की उन्नति तथा छात्रों के हित आदि अनेक विषयों का विचार रखकर आयुर्वेद ग्रन्थों के प्रकाशन की सदिच्छा प्रगट की तथा अब दिनों दिन प्रत्यक्ष रूप में प्रगट भी हो रही है, इस ग्रन्थ के प्रकाशन में तन, मन, धन सब कुछ व्यय करके इस कार्य को पूर्ण किया। अन्त में मैं इस ग्रन्थ के प्रारम्भिक प्रूफ संशोधन में पं० रामचन्द्र पराशीकरजी ने अपना समय दिया अतः उन्हें धन्यवाद देता हूं।

ग्रन्थ की छपाई का कार्य बहुत ही शीघ्रता से हुआ है इसलिये अनेक स्थानों पर अत्यन्त ध्यान देने पर भी सम्भव है अशुद्धियां रह गई हों तो पाठक क्षमा करें, आगामी संस्करण में सब ठीक कर दी जायगीं। इस टीका से यदि वैद्यक शास्त्र तथा वैद्यसमुदाय का स्वल्प भी उपकार हुआ तो मैं अपने श्रम को सफल समझूंगा।

गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥
सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु
हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्।
इति।

संवत् १९९६<br>ज्येष्ठ शुक्ल<br>पूर्णिमानिवेदयति-विद्वदनुचरः<br>अम्बिकादत्तशास्त्री<br>आयुर्वेदाचार्य ( A. M. S. )<br>हिन्दू विश्वविद्यालय<br>आयुर्वेदकालेज, काशी
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समर्पणम्

श्रीमन्महीमहेन्द्रमहाराजाधिराजमहाराणेति
विरुदालङ्कृतानां हिन्दूकुलपतीनां
के० सी० एस० आई० जी० सी० आई० इत्युपाधिविभूषितानां
६ श्रीमेदपाटेश्वराणां
"श्रीभूपालसिंहवर्म" महोदयानां
करकमलयोः
द्वितीयमिदं कृतिपुष्पं सप्रणयोल्लसन्मानसा समर्प्यते


श्रीएकलिङ्गेश्वरपादपद्म
सम्पूजयन् धर्मपुरःसरेण ।
सम्पालयन् स्वाः प्रकृतीरिदानीं
श्रीमेदपाटाऽवनिपालकोऽसौ ॥ १ ॥

"भूपालवर्मा" वसुधाधिपेन्द्र
आस्ते तदीये च करारविन्दे ।
रत्नोज्ज्वलाख्यां रसरत्नटीकां
समर्पयेऽहं मुदितात्मना वै ॥ २ ॥

श्रीमतां शुभचिन्तकः
अम्बिकादत्त शास्त्री "आयुर्वेदाचार्यः"

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रसरत्नसमुच्चयस्य मूलविषयानुक्रमणिका—


विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
प्रथमोऽध्यायः ।अभ्रभेदाः६०
मङ्गलाचरणम्१पिनाकादीनां लक्षणानि"
टीकाकारकृतमङ्गलाचरणं व्याख्या-प्रयोजनञ्च"वर्णभेदेनाभ्रकस्य भेदास्तेषां क्रियाविषयश्च"
ग्रन्थकर्तॄणां नामानि२ग्रासयोग्याभ्रम्६१
हिमालयवर्णनम्३निश्चन्द्रसचन्द्राभ्रयोर्गुणदोषौ"
महादेवस्थितिवर्णनम्४अशुद्धाभ्रस्य दोषाः"
रसोत्कर्षवर्णनम्५अभ्रशोधनमारणे६२
पारदस्य विशेषतो महत्ता६धान्याभ्रकम्६३
मूर्च्छितादिपारदगुणाः७धान्याभ्रमारणम्"
पारदे सर्वौषधाना मन्तर्भावः९अभ्रमारणम्"
रसस्य जीवन्मुक्तिकारणता१०मतान्तर"
रसोत्पत्तिवर्णनम्१३अभ्रकसत्त्वपातनम्६४
रसानां भेदाः१४प्रकारान्तर"
रसादीनां निरुक्तिः१६किट्टात्सत्त्वग्रहणम्६५
रससंस्कारकारणम्१७सत्त्वशोधनम्"
रसस्य स्थानान्तरगतिवर्णनम्१८सत्त्वानां मृदुकरणम्"
हिङ्गुलोत्पत्तिवर्णनम्१९अभ्रमारणम्६६
द्वितीयोऽध्यायः ।मारणे प्रकारान्तरम्६७
महारसाः५८सत्त्वस्यशोधनमारणे"
गन्धाभ्रयोः स्वरूपम्"अभ्रप्रयोगः६८
अभ्रकगुणाः"वैक्रान्तः"
वैक्रान्तस्य वर्णभेदाः"

२ र० स०

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[ २ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्कः
वैक्रान्तस्य गुणाः६९विमलस्य मारणम्७८
वैक्रान्तोत्पत्तिः,,विमलस्य सत्त्वपातनविधिः,,
वैक्रान्तस्य स्थानं निरुक्तिश्च७०मतान्तरेण सत्त्वपातनम्७९
मतान्तरेण वर्णभेदकथनम्,,विमलस्य प्रयोगविधिर्गुणाश्च,,
वर्णभेदेन कार्यभेदकथनम्,,अथ शिलाजंतु८०
आहरणविधिः७१शिलाजतुभेदाः,,
गुणान्तरम्,,शिलाजतुन उत्पत्तिः,,
शोधनम्,,शुद्धशिलाजतुलक्षणम्८१
मतान्तरे शोधनमारणे७०गुणाः८२
मतान्तरम्७१शोधनम्८३
सत्त्वपातनम्७२शिलाजतुमारणम्,,
मतान्तरम्,,प्रयोगविधिः,,
मृतवैक्रान्तस्य प्रयोगविधिर्गुणाश्च,,सत्त्वपातनम्,,
प्रयोगान्तरम्७३कर्पूरशिलाजतुनो लक्षणादिकम्८४
अथ माक्षिकम्,,सस्यकः,,
माक्षिकोत्पत्तिवर्णनम्,,सस्यकोत्पत्तिवर्णनम्,,
माक्षिकस्य गुणाः,,प्रशस्तसस्यकलक्षणम्,,
माक्षिकभेदाः७४गुणाः८५
माक्षिकगुणाः७५शोधनम्,,
सुवर्णमाक्षिकशोधनमारणे,,मतान्तरम्,,
सत्त्वपातनम्,,तुत्थखर्परमारणम्,,
विशुद्धताम्यसत्त्वलक्षणम्७६तुत्थसत्त्वपातनम्,,
सुवर्णमाक्षिकरसायनम्,,मतान्तरम्८६
सुवर्णमाक्षिकरसायनम्७७प्रयोगविधिः,,
विमलभेदाः,,भालुकितन्त्रोक्तप्रयोग विधिः,,
विमलस्य लक्षणगुणाः७८अथ चपलः,,
विमलभेदानां प्रयोगनिर्देशः,,गुणाः८८
विमलशोधनम्,,शोधनम्८९
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[ ३ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
सत्त्वपातनम्८९कुष्ठे गन्धकप्रयोगः१००
रसकः”कण्डूहर प्रयोगः”
सस्यकस्य प्रयोगविषयो गुणाश्च९०गन्धकतैलम्१०१
शोधनम्”गन्धकगुणाः”
मतान्तरम्”गैरिकम्११०
रसकस्य ताम्रादिरञ्जनविधिः९१गैरिकभेदाः”
खर्परस्य भस्म तथा सत्त्वपातनविधिश्च”पाषाणस्वर्णगैरिकयोर्लक्षणम्”
मतान्तरम्९२गैरिकशोधनम्१११
मतान्तरम्”कासीसरसायनम्”
मतान्तरम्”कासीसभेदाः”
सत्त्वमारणम्९३बालुकासीसगुणाः११२
प्रयोगविधिः”पुष्पकासीसगुणाः”
तृतीयोऽध्यायः ।कासीस शोधनम्”
उपरसानां नामानि”सत्त्वग्रहणनिर्देशः”
गन्धकोत्पत्तिः”शोधनान्तरम्११३
गन्धकभेदाः९५कासीसप्रयोगः”
गन्धकगुणाः९६तुवरीनिरूपणम्”
बलिवसाख्यगन्धकोत्पत्तिः”तुवरीपरिचयः”
गन्धकशुद्धिः९७तुवरीभेदाः११४
मतान्तरम्”तुवरीलक्षणगुणाः”
मतान्तरम्९८तुवरीशोधनम्”
प्रयोगः”तुवरीसत्त्वपातनविधिः”
गन्धकद्रुतिः”तालकसन्निरूपणम्११५
प्रयोगविधिः९९तालकभेदाः”
अन्यविधप्रयोगविधिः”पत्रतालकलक्षणम्”
गन्धकसेवने वर्ज्यानि”पिण्डतालकलक्षणम्”
गुणाः”
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[ ४ ]

विषयाःपृष्ठाङ्काःविषयाःपृष्ठाङ्काः
हरतालशुद्धिः११६स्रोतोऽञ्जनसत्त्वपातनविधिः१२४
अशुद्धतालसेवनदोषाः,,कङ्कुष्ठनिरूपणम्,,
मतान्तरेण तालशोधनम्,,कङ्कुष्ठोत्पत्तिवर्णनम्,,
मतान्तरेण शोधनमारणनिरूपणम्,,द्विविधकङ्कुष्ठलक्षणम्,,
सत्त्वपातनम्११७कङ्कुष्ठोत्पत्तौ मतान्तराणि,,
मतान्तरम्,,गुणाः१२५
मनःशिलानिरूपणम्११९रसोपरसानां सामान्यशोधनं सत्त्वपातनविधिश्च,,
मनःशिलाया भेदाः,,कङ्कुष्ठशोधनम्,,
त्रिविधमनःशिलालक्षणानि,,रेचकयोगः,,
गुणाः,,ताम्बूलानुपानवर्जनम्१२६
अशुद्धशुद्धदोषगुणाः,,विषनाशार्थं कङ्कुष्ठप्रयोगविधिः,,
शोधनम्१२०साधारणरसपरिगणनम्,,
मतान्तरम्,,कम्पिल्लः,,
सत्त्वपातनम्,,गुणाः१२७
मतान्तरम्,,गौरीपाषाणः,,
अञ्जनानां संनिरूपणम्,,शोधनम्१२८
अञ्जनभेदाः,,सत्त्वग्रहणम्१२९
सौवीराञ्जनगुणाः१२२गुणाः,,
रसाञ्जनगुणाः,,नवसारनिरूपणम्,,
स्रोतोऽञ्जनगुणाः,,नवसारोत्पत्तिः,,
लेखनस्वरूपम्,,मतान्तरेणोत्पत्तिः१३०
पुष्पाञ्जनगुणाः१२३गुणाः,,
नीलाञ्जनगुणाः,,वराटिकावर्णनम्,,
शोधनम्,,वराटिकालक्षणम्,,
अञ्जनसत्त्वाहरणम्,,उत्तमादि वराटिका,,
स्रोतोऽञ्जनलक्षणम्,,गुणाः,,
अञ्जनरसबन्धनम्,,
रसाञ्जनस्य विशेषशोधनम्,,