सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः। ८३

द्वितीयोऽध्यायः। ८३

अथ शिलाजतुमारणम्—
शिलया गन्धतालाभ्यां मातुलुङ्गरसेन च ।
पुटितो हि शिलाधातुर्म्रियतेऽष्टगिरिण्डकैः ॥ ११३ ॥

शिलाजीत की मारण विधि-शिलाजीत को मनः शिला, गन्धक तथा हरताल के साथ बिजौरे निम्बू के रस से घोट कर गोला बनाकर गज पुट में आठ जङ्गली उपलों द्वारा पुट देने से उसकी भस्म हो जाती है ॥ ११३ ॥

अथ प्रयोगविधिः—
भस्मीभूतशिलोद्भवं समतुलं कान्तं च वैक्रान्तकं
युक्तं च त्रिफलाकटुत्रिकघृतैर्वल्लेन तुल्यं भजेत् ।
पाण्डौ यक्ष्मगदे तथाग्निसदने मेहेषु मूलामये ॥
गुल्मप्लीहमहोदरे बहुविधे शूले च योन्यामये ॥ ११४ ॥
सेवेत यदि षण्मासं रसायनविधानतः ।
वलीपलितनिर्मुक्तो जीवेद्वर्षशतं सुखी ॥ ११५ ॥

शिलाजीत की भस्म, कान्तलौह भस्म और वैक्रान्तभस्म इन्हें समान २ भाग में परस्पर मिलाकर घोट लें । बाद में एक रत्ती की मात्रा से त्रिफला और त्रिकटु चूर्ण तथा घृत के सङ्ग सेवन करने से पाण्डुरोग, राजयक्ष्मा, अग्निमांद्य, प्रमेह, अर्श, गुल्म, प्लीह वृद्धि, जलोदर तथा अनेक प्रकार के उदर शूल और स्त्रियों के योनि रोग नष्ट हो जाते हैं । यदि इस रसायन को विधि पूर्वक ६ मास सेवन करे तो बालों का श्वेत होना तथा गिरना बन्द होकर सुख पूर्वक सौ वर्ष तक मनुष्य जीता रहता है ॥ ११४-११५ ॥

अथ सत्त्वपातनम्—
पिष्टं द्रावणवर्गेण साम्लेन गिरिसम्भवम् ।
क्षिप्त्वा मूषोदरे रुद्ध्वा गाढैर्ध्मातं हि कोकिलैः ॥
सत्त्वं मुञ्चेच्छिलाधातुस्तत्क्षणाल्लोहसन्निभम् ॥ ११६ ॥

शिलाजीत को द्रावक वर्ग की गुड़, गुग्गुल, गुञ्जा, घृत इन औषधियों के साथ तथा काञ्जी इत्यादि अम्ल से पेषण करके मूषायन्त्र में डाल कर उसका मुख अवरुद्ध कर के बेर के कोयलों की अग्नि में फूंकने से सत्व निकल जाता है । यह सत्व लौह सदृश दृढ होता है ॥ ११६ ॥

८४ रसरत्नसमुच्चये—

अथ कर्पूरशिलाजतुनो लक्षणादिकम्—

पाण्डुरं सिकताकारं कर्पूराद्यं शिलाजतु ।
मूत्रकृच्छ्राश्मरीमेहकामलापाण्डुनाशनम् ॥ ११७ ॥
एलातोयेन सम्भिन्नं सिद्धं शुद्धिमुपैति तत् ।
नैतस्य मारणं सत्त्वपातनं विहितं बुधैः ॥ ११८ ॥
इति शिलाजित्त्वधिकारः ।

कर्पूर गन्धवाली शिलाजीत पाण्डुवर्ण तथा वालू के आकार की होती है । इस के सेवन से मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, प्रमेह, कामला और पाण्डुरोग नष्ट होता है । इस की शुद्धि इलायची के काथ में घोटने से होती है । आयुर्वेद के विद्वानों ने इसका मारण और सत्त्व पातन का विधान नहीं कहा है ॥ ११७-११८ ॥

अथ सस्यकः —

अथ सस्यकोत्पत्तिवर्णनम्—

पीत्वा हालाहलं वान्तं पीतामृतगरुत्मता ।
विषेणामृतयुक्तेन गिरौ मरकताह्वये ।
तद्वान्तं हि घनीभूतं सञ्जातं सस्यकं खलु ॥ ११९ ॥

किसी समय अमृत पान किये हुए गरुड़ जी ने हालाहल नामक विषका पान कर लिया । इस कारण अमृत और हालाहल विष के एकत्र होने से मरकत नामक पर्वत पर उन्हें वमन होगई । कुछ समय के पश्चात् वह वमन पदार्थ घन स्वरूप होकर नील तुत्थ के रूप में परिणत होगया ॥ ११९ ॥

प्रशस्तसस्यकलक्षणम्—

मयूरकण्ठसच्छायं भाराढ्यमतिशस्यते ॥ १२० ॥
द्रव्यं विषयुतं यत्तद्द्रव्याधिकगुणं भवेत् ।
सुधाहलाहलैर्युक्ता सुधाधिकगुणा तथा ॥ १२१ ॥

जो नील तुत्थ ( सस्यक ) मयूर के कण्ठ के समान नील वर्ण और भार युक्त हो वह औषध कर्म में अत्यन्त श्रेष्ठ है । किसी द्रव्य में विष मिल जाने से उस के गुण बढ़ जाते हैं । इसी तरह हालाहल विष से युक्त सुधा भी सुधा (अमृत) से भी अधिक गुण प्रद हो जाती है ॥ १२०-१२१ ॥

द्वितीयोऽध्यायः ।
८५

अथ गुणाः—
निःशेषदोषविषहृद्गदशूलमूलकुष्ठाम्लपैत्तिकविबन्धहरं परञ्च ॥
रसायनं वमनरेककरं गरघ्नं श्वित्रापहं गदितमत्र मयूरतुत्थम् ॥१२२॥
नील तुत्थ कुपित वात पित्तादि सम्पूर्ण दोष, विषप्रभाव, हृदय रोग, शूल, अर्श, कुष्ठ, अम्लपित्त तथा विबन्ध (मलावरोध) को नष्ट करता है। यह अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है। इस से वमन तथा विरेचन कर्म होते हैं और श्वेत कुष्ठ तथा विष के आक्रमण को दूर करता है ॥ १२२ ॥

अथ शोधनम्—
सस्यकं शुद्धिमाप्नोति रक्तवर्गेण भावितम् ॥ १२३ ॥
नीलतुत्थ रक्त वर्ग में कही हुई जपाकुसुमादि औषधियों के रस की भावना से शुद्ध होता है ॥ १२३ ॥

अथ मतान्तरम्—
स्नेहवर्गेण संसिक्तं सप्तवारमदूषितम् ॥
दोलायन्त्रेण सुस्विन्नं सस्यकं प्रहरत्रयम् ।
गोमहिष्याजमूत्रेषु शुद्धयते तुत्थखर्परम् ॥ १२४ ॥
अथवा नील तुत्थ को तप्त कर स्नेह वर्गोक्त घृत, तैल, वसा आदि पदार्थों में सात बार बुझा कर शुद्ध करते हैं। केवल दोलायन्त्र में ३ प्रहर तक गौ, भैंस और बक़री के मूत्र के साथ स्वेदन करने से भी नीलतुत्थ शुद्ध हो जाता है ॥ १२४ ॥

अथ तुत्थखर्परमारणम्—
लकुचद्रावगन्धाश्मटङ्कणेन समन्वितम् ।
निरुध्य मूषिकामध्ये म्रियते कौक्कुटैः पुटैः ॥ १२५ ॥
शुद्ध नीलतुत्थ को समान गन्धक और टङ्कण के साथ बड़हल के फल के स्वरस में घोट कर मूषायन्त्र में बन्ध कर के कुक्कुट पुट देने से भस्म हो जाती है॥१२५॥

अथ तुत्थसत्त्वपातनम्—
सस्यकस्य तु चूर्णं तु पादसौभाग्यसंयुतम् ।
करञ्जतैलमध्यस्थं दिनमेकं निधापयेत् ॥ १२६ ॥
अन्धमूषास्यमध्यस्थं ध्मापयेत्कोकिलत्रयम् ।
इन्द्रगोपाकृति चैव सत्त्वं भवति शोभनम् ॥ १२७ ॥

८६ रसरत्नसमुच्चये—

नीलतुत्थ चूर्ण के साथ चौथाई भाग की मात्रा में सुहागा मिला कर घोटेँ । फिर उसको करञ्ज के तैल में एक दिन तक भिगो दे । तदनन्तर उसका गोला बनाकर अन्धमूषा में बन्दकर वैर (बदरी) काष्ठ के कोयलों की अग्नि में तीन दिन तक फूंकने से इन्द्रगोप (बीर बहूटी) के समान सुन्दर लालवर्ण का सत्व प्राप्त होता है॥ १२७॥

अथ मतान्तरम्—

निम्बुद्रवालपटङ्काभ्यां मूषामध्ये निरुध्य च ।
ताम्ररूपं परिध्मातं सत्वं मुञ्चति सस्यकम् ॥ १२८ ॥
शुद्धं सस्यं शिखिक्रान्तं पूर्वभेषजसंयुतम् ।
नानाविधानयोगेन सत्त्वं मुञ्चति निश्चितम् ॥ १२९ ॥

अथवा नीलतुत्थ चूर्ण के साथ कुछ टङ्कण (सुहागा) मिलाकर निम्बू के रस से घोट कर गोला बनावै । पश्चात् मूषायन्त्र में बन्दकर फूंकने से ताम्र के समान लाल वर्ण का सत्व प्राप्त होता है । शुद्ध नील तुत्थ चूर्ण को सत्त्वपातन कराने वाली पूर्वोक्त औषधियों के साथ मिला कर भिन्न २ सत्त्वपातन की विधियों द्वारा अग्नि देने से सत्व प्राप्त हो जाता है ॥ १२८-१२९ ॥

अथ प्रयोगविधिः—

सत्त्वमेतत्समादाय खरभूनागसत्त्वयुक् ।
तन्मुद्रिका कृतस्पर्शा शूलघ्नी तत् क्षणाद्भवेत् ॥ १३० ॥
चराचरं विषं भूतडाकिनीदृग्गतं जयेत् ।
मुद्रिकेयं विधातव्या दृष्टप्रत्ययकारिका ॥ १३१ ॥

नील तुत्थ का सत्व, दुरालभा और केंचूए (अर्थ वर्म) का सत्व इन को मिला कर अंगूठी बनवावे । इस के स्पर्श मात्र से शीघ्र ही शूल नष्ट हो जाता है । किसी पुस्तक में खर के स्थान में कर्ष शब्द लिखा है उस मत से एक कर्ष केंचूए का सत्व लेना चाहिए, दुरालभा नहीं लेवें । इस अंगूठी के प्रभाव से स्थावर और जङ्गम विष तथा भूत, प्रेत और डाकिनियों की दृष्टि से उत्पन्न बाधाएं दूर हो जाती हैं तथा यह मुद्रिका प्रत्यक्ष विश्वास पैदा कराने वाली है ॥ १३०-१३१ ॥

अथ भालुकितन्त्रोक्तप्रयोगविधिः—

रामवत्स्रोमसेनानीर्मुद्रितेऽपि तथाऽक्षरम् ।
हिमालयोत्तरे पार्श्वे अश्वकर्णो महाद्रुमः ।

द्वितीयोऽध्यायः । ८७

तत्र शूलं समुत्पन्नं तत्रैव विलयं गतम् ॥ १३२ ॥
मन्त्रेणानेन मुद्राम्भो निपीतं सप्तमन्त्रितम् ।
सद्यःशूलहरं प्रोक्तमिति भालुकिभाषितम् ॥ १३३ ॥
अनया मुद्रया तप्तं तैलमग्नौ सुनिश्चितम् ।
लेपितं हन्ति वेगेन शूलं यत्र क्वचिद्भवेत् ॥
सद्यः सूतिकरं नार्याः सद्यो नेत्ररुजापहम् ॥ १३४ ॥
इति सस्यकाधिकारः ।

राम शब्द से लेकर गतम् यहां तक मन्त्र का स्वरूप है। इस मन्त्र को पढ़ते हुए मुद्रा को जल में छोड़ दे' । इस तरह सात वार मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित कर के पीलाने से शीघ्र ही शूल नष्ट होजाता है । यह भालुकि महर्षि का कथन है । इस अंगूठी को तैल में डाल कर अग्नि पर पकावें । फिर जहां कहीं शूल चलता हो वहां इस तैल के लगाने से शूल चलना वन्द हो जाता है तथा गर्भवती स्त्रियों के हस्त पाद पर लगा के मर्दन करने से तुरन्त प्रसव होता है । नेत्रों में लगाने से नेत्र पीड़ा दूर हो जाती है ॥१३२-१३४॥

अथ चपलः—
गौरः श्वेतोऽरुणः कृष्णश्चपलस्तु चतुर्विधः ।
हेमाभश्चैव ताराभो विशेषाद्रसबन्धनः ॥ १३५ ॥
शेषौ तु मध्यौ लाक्षावच्छीघ्रद्रावौ तु निष्फलौ ।
वङ्गवद्द्रवते वह्नौ चपलस्तेन कीर्तितः ॥ १३६ ॥

चपल धातु सर्षप वर्ण युक्त ( गौर ) और श्वेत, रक्त तथा कृष्ण इस तरह चार प्रकार का होता है। गौर और श्वेत चपल पारद के बन्धन करने में श्रेष्ठ हैं । शेष रक्त तथा कृष्ण वर्ण की चपल लाह के समान शीघ्र द्रव हो जाने के कारण मध्यम कही गई है तथा उन से विशेष फल भी नहीं होता है । यह धातु अग्नि में वङ्ग ( रांगा ) के समान द्रव हो जाता है । इस कारण इसको चपल कहते हैं ॥ १३५-१३६ ॥

**विमर्श:—**चपल को बिस्मथ ( Bismuth ) कहते हैं । इसका संकेत Bi है तथा परमाणु भार ( Atomic weights ) २०९ है ।
**उपस्थिति—**यह धातु मुक्तावस्था में भी पाई जाती है । इस धातु की प्राप्ति

४८ रसरत्नसमुच्चये-

प्रायः बिस्मथ आक्साइड ( Bismuth oxide Bi ₂ S ₂ ) और बिस्मथ तथा बिस्मथ सल्फाईड ( Bismuth sulphide बिस्मथ ग्लांस Bi ₂ S ₂ ) । इन दो प्रधान खनिजों से होती है तथा टङ्गस्टेन और वङ्ग के खनिजों के साथ भी थोड़ी मात्रा में बिस्मथ पाया जाता है ।

बिस्मथ की उपलब्धि बिस्मथ आक्साइड ( Bismuth oxide ) को कोयलों के साथ गरम करने से आक्साइड लघ्वीकृत हो बिस्मथ मुक्त हो जाता है तथा द्रव अवस्था में बह कर कोयले से पृथक् हो जाता है ।

यह क्रिया इस प्रकार होती है ।
₂ Bi ₂03+C=4 Bi+3 co 2

गुण—बिस्मथ भूरे रङ्ग की रक्त आभा ली हुई क्रिस्टलीय धातु है । यह कठोर और भङ्गुर होती है । इस में चमकीली धातुकद्युति होती है । इस का विशिष्ट घनत्व ७८ होता है । यह ७०° से० पर के तापक्रम पर पिघलती है ।

यह वायु या आक्सिजन से आक्रान्त नहीं होती है परन्तु तीव्र आंच से वायु में आक्साइड के रूप में परिणत हो जाती है । तनु गन्धकाम्ल और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की भी इस पर कोई क्रिया नहीं होती है । तप्त गन्धकाम्ल से यह बिस्मथ सल्फेट ( Bi 2 so 4 ) 3 और सल्फर डाई-आक्साइड ( Sulphur Di oxide ) में परिणत हो जाता है । तनु अथवा समाहृत नाइट्रिक अम्ल से यह शीघ्रता से आक्रान्त होकर बिस्मथ नाइट्रेट बनती है और नाइट्रोजन का आक्साइड मुक्त करती है ।

बिस्मथ का उपयोग—आज कल इस का स्टीरियो टाइप में अधिक प्रयोग होता है तथा निम्न तापक्रम पर पिघलने वाली अनेक धातुओं के निर्माण में प्रयुक्त होती है । बिस्मथ के अनेक आक्साइड होते हैं । उन में बिस्मथ ट्राइ-आक्साइड् और बिस्मथ पेण्टाक्साइड मुख्य हैं । बिस्मथ का सल्फाईड प्रकृति में भी पाया जाता है और कृत्रिम रीति से भी तैयार हो सकती है । बिस्मथ के सामान्य नाइट्रेट और भास्मिक नाइट्रेट होते हैं । इसका पाश्चात्य चिकित्साशास्त्र में उदर रोग और उपदंश आदि में विशेष प्रयोग होता है । किन्तु हमारे चिकित्सक इसका प्रयोग नहीं करते हैं । वैद्य बन्धुओं को इसका प्रयोग कर के लाभ उठाना चाहिए ।

अथ गुणाः—
चपलो लेखनः स्निग्धो देहलोहकरो मतः ।
रसराजसहायः स्यात्तिक्तोष्णमधुरो मतः ॥ १३७ ॥
चपलः स्फटिकच्छायः षडस्रः स्निग्धको गुरुः ।
त्रिदोषघ्नोऽतिवृष्यश्च रसबन्धविधायकः ॥ १३८ ॥