रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
द्वितीयोऽध्यायः । ७५
द्वितीयोऽध्यायः । ७५
माक्षिकगुणाः—
माक्षीकधातुः सकलामयघ्नः प्राणो रसेन्द्रस्य परं हि वृष्यः ।
दुर्मेललोहद्वयमेलनश्च गुणोत्तरः सर्वरसायनाग्र्यः ॥ ७७ ॥
माक्षिक धातु सम्पूर्ण रोग नाशक है, पारद के गुणों का उत्कर्ष करता है तथा अत्यन्त वृष्य है । परस्पर कठिनता से मिश्रित होने वाले लोह द्वय को मिला देता है ॥ ७७ ॥
अथ सुवर्णमाक्षिकशोधनमारणे—
एरण्डतैललुङ्गाम्बुसिद्धं शुद्ध्यति माक्षिकम् ।
सिद्धं वा कदलीकन्दतोयेन घटिकाद्वयम् ।
तप्तं क्षिप्तं वराक्वाथे शुद्धमायाति माक्षिकम् ॥ ७८ ॥
मातुलुङ्गाम्बुगन्धाभ्यां पिष्टं मूषोदरे स्थितम् ।
पञ्चक्रोडपुटैर्दग्धं म्रियते माक्षिकं खलु ॥ ७९ ॥
एरण्डस्नेहगव्याज्यैर्मातुलुङ्गरसेन वा ।
खर्परस्थं दृढं पक्वं जायते धातुसन्निभम् ॥
एवं मृतं रसे योज्यं रसायनविधावपि ॥ ८० ॥
माक्षिक का चूर्ण कर एरण्ड तेल (रेड़ी तेल), बिजौरे निम्बू का रस या केले की जड़ के रस में डालकर दोलायन्त्र विधि से दो घण्टे तक स्वेदन करने से शुद्ध हो जाती हैं । अथवा त्रिफला के क्वाथ में तपा कर सात बार बुझाने से शुद्ध हो जाता है । बिजौरे निम्बू का रस और समान गन्धक शुद्ध माक्षिक में मिला कर खरल करें । बाद में गोला बनाकर मूषायन्त्र में रख कर वाराह पुट में पांच पुट देने से निश्चय ही माक्षिक की भस्म हो जाती है । इसी तरह एरण्ड तैल या गाय के घी को कड़ाह में डालकर उसमें सोनामाखी को खूब पकाने से भस्म सदृश हो जाता है । केवल बिजौरे के रस से भी पकाने पर भस्म हो जाती है, इस तरह मृत माक्षिक को रस और रसायन में उपयोग करना चाहिए ॥ ७८-८० ॥
अथ सत्त्वपातनम्—
त्रिंशांशनागसंयुक्तं क्षारैरम्लैश्च मर्दितम् ।
ध्मातं प्रकटमूषायां सत्त्वं मुञ्चति माक्षिकम् ॥ ८१ ॥
७६ रसरत्नसमुच्चये—
सप्तवारं परिद्राव्य क्षिप्तं निर्गुण्डिकारसे ।
माक्षीकसत्त्वसम्मिश्रं नागं नश्यति निश्चितम् ॥ ८२ ॥
क्षौद्रगन्धर्वतैलाभ्यां गोमूत्रेण घृतेन च ।
कदलीकन्दसारेण भावितं माक्षिकं मुहुः ॥
मूषायां मुञ्चति ध्मातं सत्त्वं शुल्वनिभं मृदु ॥ ८३ ॥
माक्षिक के चूर्ण में तीसवें भाग की मात्रा से नागभस्म मिलाकर समान भाग क्षार (स्वर्जिका, यवक्षार, टङ्कण) और अम्ल रसों से घोट कर गोला बनाकर सत्व पातन करने की मूषा में रखकर फूंकने से माक्षिक अपना सत्व छोड़ देता है। इस सत्व को अग्नि पर तप्त कर निर्गुण्डी के रस में सात बार बुझाने से माक्षिक के सत्व के साथ मिश्रित नाग निश्चय ही नष्ट हो जाता है। माक्षिक को क्रम से शहद, एरण्डतैल, गोमूत्र घृत और केले के कन्द के रस में भावना देकर गोला बना कर मूषा में रख कर फूंकने से ताम्र के समान लाल और मृदु सत्व निकल जाता है ॥ ८१-८३ ॥
अथ विशुद्धताप्यसत्वलक्षणम्—
गुञ्जाबीजसमच्छायं द्रुतद्रावं च शीतलम् ।
ताप्यसत्त्वं विशुद्धं तद्देहलोहकरं परम् ॥ ८४ ॥
गुञ्जाबीज के समान रक्तवर्ण और अग्नि पर जल्दी पिघलने वाला तथा शीतल शुद्ध माक्षिक सत्व होता है। वह देह को श्रेष्ठ बनाता है ॥ ८४ ॥
अथ सुवर्णमाक्षिकरसायनम्—
माक्षीकसत्त्वं च रसेन पिष्टं कृत्वा विलीने च बलिं निधाय ।
सम्मिश्र्य सम्मर्च च खल्वमध्ये निःक्षिप्यसत्त्वं द्रुतिमभ्रकस्य ॥ ८५ ॥
विधाय गोलं लवणाख्ययन्त्रे पचेद्दिनाद्धं मृदुवह्निना च ।
स्वतः सुशीतं परिचूर्ण्य सम्यग्वल्लोन्मितं व्योषविडङ्गयुक्तम् ॥ ८६ ॥
संसेवितं क्षौद्रयुतं निहन्ति जरां सरोगांस्त्वपमृत्युमेव ।
दुस्साध्यरोगानपि सप्तवासरैर्नैतेन तुल्योऽस्ति सुधारसोऽपि ॥८७॥
माक्षिक सत्व को शुद्ध समान भाग पारे के साथ खूब घोट कर चमक रहित कजली बनावे। फिर उसमें सत्व के बराबर ही गन्धक मिला कर घोटे, गन्धक के मिल जाने पर माक्षिक सत्व के समान भाग ही में अभ्रक सत्व की द्रुति मिलाकर
द्वितीयोऽध्यायः। [५७]
घोट कर गोला बनावे। उस गोले को लवण नामक यन्त्र में रख कर मृदु अग्नि से आधे दिन तक पकावे। स्वाङ्गशीतल होने पर निकाल कर चूर्ण कर ले। इसमें से एक रत्ती की मात्रा में लेकर सोंठ, मिर्च, पीपल और वायविडङ्ग के चूर्ण में मिलाकर शहद के साथ सेवन करने से समग्र रोग, जरा तथा अत्यन्त कष्टसाध्य भी रोग और अकाल मृत्यु सात दिन में दूर हो जाते हैं। इसके समान अमृत रस भी गुण नहीं करता है ॥ ८५-८७ ॥
अथ सुवर्णमाक्षिकरसायनम्—
एरण्डोत्थेन तैलेन गुञ्जा क्षौद्रं च टङ्कणम् ।
मर्दितं तस्य वापेन सत्त्वं माक्षिकजं द्रवेत् ॥ ८८ ॥
इति माक्षिकाधिकारः ।
एरण्ड तेल, गुन्जा का चूर्ण, शहद और सुहागा इनके चूर्ण के साथ सुवर्ण माक्षिक सत्व के चूर्ण को डाल कर अग्नि पर गलाने से सोना माखी के सत्व का द्रवण हो जाता है ॥ ८८ ॥
विमलभेदाः—
विमलस्त्रिविधः प्रोक्तो हेमाद्यस्तारपूर्वकः ।
तृतीयः कांस्यविमलस्तत्तत्कान्त्या स लक्ष्यते ॥ ८९ ॥
कुछ लोग (पर्यायमुक्तावलोकार) विमल को रूपमाखी कहते हैं। विमल भी माक्षिक धातु का ही एक भेद है। विमल के ३ भेद हैं। सुवर्ण का भाग मिला रहने से सुवर्ण विमल, चांदी का भाग मिला रहने से तार विमल और कांस्य का भाग रहने से कांस्य विमल कहलाता है। चमक से ही विमल के भेदों का ज्ञान होता है ॥ ८९ ॥
विमल— इसको रौप्यमाक्षिक कहते हैं। बाजारों में इसके चतुष्कोण कण मिलते हैं और उनका वर्ण स्वर्ण के समान होता है। इसी लिये इसको फूल्स गोल्ड ( Fools gold ) भी कहते हैं तथा अज्ञ लोग इसे स्वर्ण माक्षिक मान कर स्वर्ण के अभाव में प्रयुक्त करते हैं। किन्तु यह गन्धक तथा लोहे का यौगिक है। इस में स्वल्प मात्रा में भी स्वर्ण नहीं रहता है।
जो असली स्वर्णमाक्षिक होता है उसमें ताम्र का अंश रहता है तथा वह कणरूप में नहीं आता है। "सत्त्वं चन्द्रार्कसङ्काशम्" इस पद से सिद्ध होता है कि प्राचीनाचार्यों ने भी असली स्वर्णमाक्षिक में ताम्र की उपस्थिति को माना है।
७८ : रसरत्नसमुच्चये—
**उपलब्धि—**आज कल माक्षिक धातु विशेष करके बिहार, नेपाल, पञ्जाब और बुन्देलखण्ड की रियासतों में मिलता है तथा विदेश में भी इसकी खाने हैं।
अथ विमलस्य लक्षणगुणाः—
वर्तुलः कोणसंयुक्तः स्निग्धश्च फलकान्वितः ।
मरुत्पित्तहरो वृष्यो विमलोऽतिरसायनः ॥ ६० ॥
जो विमल गोल तथा चारों ओर कोण युक्त हो तथा स्पर्श में स्निग्ध और फलकाकार हो वह श्रेष्ठ है, तथा कुपित वात और पित्त को नष्ट करता है तथा अत्यन्त रसायन और वृष्य है ॥ ९० ॥
विमलभेदानां प्रयोगनिर्देशः—
पूर्वो हेमक्रियासूक्तो द्वितीयो रूप्यकृन्मतः ।
तृतीयो भेषजे तेषु पूर्वपूर्वो गुणोत्तरः ॥ ६१ ॥
सुवर्ण विमल सोने के जारण मारण या उसके स्थान में प्रयुक्त होता है । तार विमल चांदी के कार्य में और तृतीय कांस्य विमल औषध में काम आता है । इन तीनों में पूर्व से पूर्व श्रेष्ठ माना गया है ॥ ९१ ॥
अथ विमलशोधनम्—
आटूरूषजले स्विन्नो विमलो विमलो भवेत् ।
जम्बीरस्वरसे स्विन्नो मेषशृङ्गीरसेऽथवा ॥
आयाति शुद्धिं विमलो धातवश्च यथाऽपरे ॥ ६२ ॥
विमल को दोला यन्त्र द्वारा वासा के रस में या नीम्बू के रस में या मेढा-सिङ्गी के रस में दो घण्टे तक स्वेदन करने से शुद्ध हो जाता है । इस विधि से अन्य धातुओं को भी शुद्ध करना चाहिये ॥ ९२ ॥
अथ विमलस्य मारणम्—
गन्धाश्मलकुचाम्लैश्च म्रियते दशभिः पुटैः ॥ ६३ ॥
विमल के चूर्ण में समान भाग शुद्ध गन्धक मिलाकर बड़हर (लकुच) के स्वरस में या निम्बू के रस में घोट कर १० पुट देने से भस्म हो जाती है ॥ ९३ ॥
अथ विमलस्य सत्वपातनविधिः—
सटङ्कण्लंकुचद्रावैर्मेषशृंग्याश्च भस्मना ।
पिष्टो मूषोदरे लिप्तः संशोष्य च निरुध्य च ॥ ६४ ॥