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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

चतुर्थोऽध्यायः । १३५

चतुर्थोऽध्यायः । १३५

चतुर्थोऽध्यायः ।

अथ रत्ननिरूपणम्—

अथ मणयः—

मणयोऽपि च विज्ञेयाः सूतबन्धनकारकाः ॥ १ ॥

सर्व प्रकार के रत्न भी पारद का बन्धन करते हैं तथा अन्य भी उनके अनेक अद्भुत गुण हैं ॥ १ ॥

अथ मणीनां नामानि—

वैक्रान्तः सूर्य्यकान्तश्च हीरकं मौक्तिकं मणिः ।
चन्द्रकान्तस्तथा चैव राजावर्त्तश्च सप्तमः ॥ २ ॥
गरुडोद्गारकश्चैव ज्ञातव्या मणयस्त्वमी ।
पुष्परागो गोमेदश्च पद्मरागो प्रवालकम् ॥ ३ ॥
वैदूर्य्यं च तथा नील एतेऽपि मणयो मताः ।
यत्नतः सङ्ग्रहीतव्या रसबन्धस्य कारणात् ॥ ४ ॥

रत्नों के नाम–वैक्रान्त, सूर्य्यकान्त, हीरा, मोती, मणि, चन्द्रकान्त, राजावर्त्त, मरकत ( पन्ना ) ये आठ रत्न हैं और पुखराज, गोमेद, पद्मराग, प्रवाल, वैदूर्य और नीलम ये भी मणि या रत्न हैं । ये रत्न पारद का बन्धन करते हैं इसलिये इन्हें सावधानी से इकट्ठा करना चाहिए ॥ २–४ ॥

अथ श्रेष्ठमणीनां नामानि—

पद्मरागेन्द्रनीलाख्यौ तथा मरकतोत्तमः ।
पुष्परागः सवज्राख्यः पञ्च रत्नवराः स्मृताः ॥ ५ ॥

पद्मराग, इन्द्रनील, मरकत, पुखराज और हीरा ये पांच उत्तम रत्न हैं ॥५॥

अथ ग्रहप्रसादकरत्नानि—

माणिक्यमुक्ताफलविद्रुमाणि तार्क्ष्यं च पुष्पं भिदुरं च नीलम् ।
गोमेदकं चाथ विदूरकं च क्रमेण रत्नानि नवग्रहाणाम् ॥ ६ ॥

पद्मराग, मोती, मूंगा, मरकत ( पन्ना ), पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद,

१३६ रसरत्नसमुच्चये—

वैदूर्य्य, ये नवग्रहों की गणनानुसार उनके नौरत्न हैं अर्थात् इन रत्नों के धारण करने से या दान करने से वे ग्रह शान्त रहते हैं ॥ ६ ॥

सूर्य,चन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि,राहुकेतु
पद्मरागमोतीमूंगापन्नापुखराजहीरानीलमगोमेदवैदूर्य्य

ग्रहानुसारेण रत्नपरिगणनम्—
ग्रहानुमैत्र्या कुरुविन्दपुष्पप्रवालमुक्ताफलतार्क्ष्यवज्रम् ।
नीलाख्यगोमेदविदूरकं च क्रमेण मुद्राधृतमिष्टसिद्धयै ॥७॥

पद्मराग, पुखराज, प्रवाल, मोती, मरकत, हीरा, नीलम, गोमेद, वैदूर्य्य इन नवरत्नों की क्रम से सूर्यादि ग्रहों के साथ मित्रता होने से इनकी मुद्रा बनाकर धारण करना इष्टसिद्धि के लिये श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥

रत्नप्रयोगविषयः—
रसे रसायने दाने धारणे देवताऽर्चने ।
सुलक्षणानि सुजातीनि रत्नान्युक्तानि सिद्धये ॥ ८ ॥

उत्तम जाति और उत्तम लक्षण वाले रत्न रस, रसायन, दान, धारण, देवार्चन और इष्टसिद्धि के लिये उत्तम कहे गये हैं ॥ ८ ॥

अथ माणिक्यम्—
द्विविधमाणिक्यनिर्देशः—
माणिक्यं पद्मरागाख्यं द्वितीयं नीलगन्धि च ॥ ९ ॥

मणिक्य नाम का रत्न दो तरह का होता है, एक पद्मराग और दूसरा नील-गन्धि कहलाता है ॥ ९ ॥

श्रेष्ठमाणिक्यलक्षणम्—
कुशेशयदलाच्छायं स्वच्छं स्निग्धं गुरु स्फुटम् ।
वृत्तायतं समं गात्रं माणिक्यं श्रेष्ठमुच्यते ॥ १० ॥

जो माणिक्य लालवर्ण के कमल के पत्रों के समान लाल वर्ण का हो तथा स्वच्छ, स्निग्ध, भारी, दीप्तिमान, गोल और विस्तृत तथा समानावयव युक्त हो वह श्रेष्ठ होता है और ये लक्षण पद्मराग माणिक्य में होते हैं ॥ १० ॥

श्रेष्ठनीलमाणिक्यलक्षणम्—
नीलं गङ्गाम्बुसम्भूतं नीलगर्भारुणच्छवि ।