सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

सभी डर रहे हैं आपसे

22साहिब बन्दगी

व्यापार करने वाले से कौन-सी स्पर्द्धा हुई! इस तरह जो चीज़ आपके पास है, जब वो किसी के पास है ही नहीं तो स्पर्द्धा किस बात की! इसलिए चाहे सब आपसे मुकाबला करते रहें, पर वास्तव में आपकी किसी से स्पर्द्धा नहीं है।

सभी डर रहे हैं आपसे

पहले एक बार आस्था चैनल से आपको फ़ोन आया कि कुछ लोग कह रहे हैं कि आपका प्रोग्राम मत दो। पर चैनल वालों ने कहा कि हम तो देंगे, क्योंकि हमें तो पैसे से मतलब है। उन्होंने बंद नहीं किया। फिर कुछ समय बाद फिर फ़ोन आया कि महात्मा लोग कह रहे हैं कि इनका प्रोग्राम मत दो, हमारा वजूद मिट रहा है, ये कैसी बातें कह रहे हैं!

कई महात्मा अपने आपको बचाने के लिए, अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए आपको कोई ओपन सत्संग नहीं करने देना चाहता है। परेड ग्राउण्ड जम्मू में कई बार जब औरों को पता चलता है कि आप आ रहे हैं तो पहले ही अपना सत्संग रख देते हैं। कोई सतवा शुरू कर देता है। सतवा परेड ग्राउण्ड में पहले कभी नहीं होता था। वहाँ पर बच्चे क्रिकेट खेलते हैं, पर वे वो पिचें ही ख़राब कर देते हैं। उन्हें तो अपना स्वार्थ ही सूझता है, बच्चों की कोई परवाह उन्हें कहाँ! आपको देखकर वो भी शुरू हो गये हैं। उन्हें डर है कि कहीं आप सबको पाखण्ड से छुड़ा लेंगे तो उनके पास कोई नहीं आयेगा, उनका वजूद ही मिट जायेगा। इसलिए अपने वजूद को बनाए रखने के लिए वे आपके रास्ते में रुकावटें डालते रहते हैं। सतवारी चौक जम्मू, गाँधी नगर का दशहरा ग्राउण्ड आदि जगहों पर तो इन लोगों ने सत्संग पर रोक ही लगवा दी। किसी ने सुरक्षा की दृष्टि से ग्राउण्ड देना मना कर दिया तो कोई जानबूझकर मोटी रक़म माँगने लगा ताकि आप सत्संग न कर पाएँ। जब आप को ऐसे कई स्थानों पर सत्संग करने से मना

निराले सद्गुरु | 23


किया तो "आप ने कहा ऐसा ही होता रहा तो मैं रुकने वाला नहीं हूँ। मैं अपनी बात करने आया हूँ और चौराहें पर खड़ा होकर भी बोलूंगा, हमें भय नहीं है।'"

जो भी चीज़ विकास करती है तो उसका विरोध भी होता है। जैसे कोई अच्छा होता है तो दूसरे ईर्ष्या करने लगते हैं। मानव-तन में ये दोष हैं।

तो पाखण्डी भी आपसे ईर्ष्या करते हैं; वे रुकावटें डालते हैं। कहीं भी ओपन प्रोग्राम होता है तो वहाँ रुकावट डालने की कोशिश करते हैं। पाखण्डियों की कलयुग में चलती भी बहुत है। एक तो निरंजन की दुनिया, फिर ऊपर से महाकलयुग। ऐसे में निरंजन के चेलों ने सत्य का विरोध तो करना ही है।

आपका अधिक विकास देख व्यवधान डालने की कोशिश करें तो यह उनकी मजबूरी है। भाइयों के प्रति भी ईर्ष्या होती है। कभी-कभी अपने प्रति भी यह ईर्ष्या हो जाती है। अपने लिए भी यह ईर्ष्या स्वाभाविक हो जाती है।

जब साहिब-बंदगी पंथ छोटा था, तो कुछ बात नहीं थी, पर जैसे ही विकास हुआ तो दूसरे पंथों को परेशानी हुई। उन्होंने सतवारी, परेड ग्राउण्ड, गाँधी नगर (दशहरा ग्राउण्ड), हर जगह रुकावटें देनी शुरू की। वहाँ प्रोग्राम नहीं होने दिया। आपने किसी के सत्संग में रुकावट नहीं दी। कहीं उन्होंने आपके बड़े-बड़े पोस्टर फाड़ दिये। ये हरकतें कभी भी अच्छे लोगों की नहीं हो सकती हैं। यानी आदि निरंजन, निराकार की भक्ति के बड़े-बड़े पंथ ही हमारे देश में छाए हुए हैं, इसी निराकार, निरंजन को सन्तों ने काल पुरुष कहा। आज उन्हीं की चलती है। असल बात यह है कि वे केवल हाथी की तरह बड़े हैं, पर अंदर से खाली हैं, इसलिए उन्हें डर है कि साहिब-बंदगी पंथ के विकसित हो जाने से उनका वजूद समास हो जायेगा। पर आख़र झूठ की हार ही होती है।

24 साहिब बन्दगी

दुनिया समझेगी इन बातों को। आख़िर आप जो कहते हैं कि जो वस्तु मेरे पास है, वो कहीं नहीं है। इसमें वज़न है। अन्य बड़े-बड़े पंथ वाले जानते हैं कि उनके पास कुछ नहीं है, केवल किताबी बातें हैं, इसलिए साहिब बन्दगी का विरोध उनकी मजबूरी है। जो ऐसा नहीं करते, वे अच्छे हैं। भक्तों की यही निशानी होती है कि खुद भी आगे बढ़ो और दूसरों को भी आगे बढ़ने दो। अपना भी कल्याण करो, दूसरों का भी कल्याण करो। जो केवल अपने कल्याण तक सीमित है, वो भक्त नहीं हो सकता है। इसलिए जो पंथ विरोध करने वाले हैं, उनमें से किसी का लक्ष्य पैसा है, किसी का लक्ष्य इज्जत है, किसी का लक्ष्य रोमांस है, किसी का लक्ष्य राजाओं की तरह रहना है।

आप इन चीज़ों से परेशान नहीं होते, पर समाज को समझना होगा कि क्या ऐसी हरकतें कभी कोई भक्त कर सकता है! यानी भारत के बड़े-बड़े धार्मिक पंथों में भक्त नहीं रह रहे! इस रहस्य को समझना होगा। सत्य है, ये लोग भक्त नहीं हैं। एक भक्त दूसरे भक्त को कष्ट नहीं दे सकता, क्योंकि वो सबमें एक आत्मा देखता है। उसकी दृष्टि विश्व व्यापक होती है। आपने अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ भी कोई कार्यवाही क्यों नहीं की, इसका एक ही कारण है और वो यह कि आप कहते हैं कि वो भी हमारे ही हैं। कितनी प्यारी सोच है आपकी! दुनिया कब सच्चे संत को पहचानेगी!

यदि आप किसी पेड़ पर बैठकर सत्संग करेंगे तो भी आपकी संगत आपके पास आयेगी। पेड़ों पर बैठकर किसी जंगल में सत्संग सुनना पड़ेगा तो भी सुनेगी। आपने जो रंग दिया है, वो उतरने वाला नहीं है; फिर बाकी किसी का रंग नहीं चढ़ सकता है, सब फीका लगता है।

पाखण्डियों के इन गंदे कामों से आपकी संगत और अधिक मजबूत होती है। इसलिए सच में ये निंदक आपकी संगत का भला करने वाले हैं, उन्हें भक्ति में अधिक मजबूत करने वाले हैं। फिर इसी से संगत

निराले सद्गुरु
25

बढ़ती भी है। बेचारे पाखण्डियों पर तरस भी आता है कि कितनी मेहनत करते हैं, पर उसका रिजल्ट उलटा ही होता है। बाद में खुद बेचारे यह देख परेशान हो जाते हैं कि साहिब-बंदगी वाले तो भी हार नहीं मान रहे हैं; एक जगह सत्संग नहीं होने दो तो दूसरी जगह पहुँच जाते हैं; वहाँ अपनी गंदी हरकत का परिचय दो तो तीसरी जगह पहुँच जाते हैं; पर रुकते नहीं हैं; कहीं न कहीं रास्ता ढूँढ़ ही निकालते हैं और संगत भी ऐसी है कि कहीं भी प्रोग्राम हो, पहुँच जाती है। संगत पर आपका इतना रंग देख वे आखिर खुद परेशान हो जाते हैं और कुछ देर के लिए शांत हो जाते हैं। पर आपका सिलसिला नहीं रुकता। उन पंथों की पोल को समझ लोग टूटकर आपके पास आते रहते हैं। जब बड़े-बड़े टूटते हैं तो आमदनी कम होते देख उनके पेट का दर्द फिर बढ़ जाता है और वे फिर अपनी गंदी हरकतें दिखाना शुरू कर देते हैं। जैसे किसी को प्रेम का रोग हो जाता है तो किसी डॉ० की कोई दवा काम नहीं आती है। ऐसे ही इनके पेट का दर्द किसी गोली से नहीं जाता है। उसका हल ही निंदा है, उसका हल ही गंदी हरकतें है, सत्संग में रुकावट डालना है।

क्या ऐसे लोगों को यह नहीं पता है कि उनका आख़िर क्या हाल होगा ! एक शेर होता है; हिरण उसके सामने बड़ी कलाबाजी दिखाता है, बड़ी तेज़ भागकर दिखाता है। शेर चाहे तो उसे जल्दी पकड़ ले, पर वो ऐसा नहीं करता; वो उसे भागने देता है। जब भागते-भागते वो थक जाता है, उसका खून गर्म हो जाता है, तब शेर उससे एक फीट लंबी 28 फीट छलांग लगाता है और उसे पकड़ लेता है। ऐसे ही अभी आप इन पाखण्डियों को अपने खेल दिखाने दे रहे हैं, पर जब आप अपना खेल दिखायेंगे तो इनका वजूद ही मिट जायेगा।

पाखण्डियों के पास आपकी प्रोग्राम लिस्ट रहती है। उन्हें ठीक-ठीक मालूम रहता है कि आप कब और कहाँ प्रोग्राम देने वाले हैं। जब

26 साहिब बन्दगी

भी आपका ओपन प्रोग्राम परेड ग्राउण्ड, जम्मू में होता है तो वे रुकावट देने की सोचते हैं। कई बार उन्हें इसमें सफलता भी मिल जाती है। वे उन्हें अधिक पैसा खिलाकर पहले से आपके सत्संग के लिए बुक हुई ग्राउण्ड को भी अपने पाखण्ड और स्वार्थ के लिए बुक करवा लेते हैं। दुनिया तो ऐसी है ही। चाहे वे नाचें-गायें, कुछ भी करें, लोग पहुँचते-ही-पहुँचते हैं। खैर, दुनिया को तो सच्चाई का पता नहीं होता कि बाबा जी कैसा है, उनका लक्ष्य क्या है! पर जो बाबा जी के साथी होते हैं, वे कैसे भक्त हुए! वे भक्त हो ही नहीं सकते हैं। वे भी पाखण्डी ही हुए। क्या वे धूर्त नहीं हुए! पक्का हुए। बाबा जी खुद तो छल-कपट करके नरक में जा ही रहे हैं, पर साथ-ही-साथ चेलों को भी पकड़कर ले जा रहा है। चेले बेचारों का क्या कसूर! उन्हें तो माँ के गर्भ में 9-10 महीने वाला कष्ट भूल गया है न, इसलिए दोबारा अब नरकों की मार का स्वाद चखना चाहते हैं।

आप इसके बावजूद शांत रहते हैं; उनकी तरह ऐसे धूर्त वाले काम नहीं करते। यही तो आपमें और उनमें बाहरी दृष्टि से मुख्य अन्तर नज़र आता है। यह किसी एक बाबा की बात नहीं समझ लेना। इस जहाँ में आप सबसे निराले हैं। इसलिए सबका मुकाबला ही आप के साथ है।

कुछ स्त्रियों को, छोटे-छोटे बच्चों को जानबूझकर आगे कर देते हैं। दुनिया एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए बड़े तमाशे कर रही है। सब एक तरफ हैं और आप एक तरफ। फिर भी वे आपके हौसले को दबा नहीं पाते हैं। जितनी रुकावटें वे देते जाते हैं, आप उतना अधिक परिश्रम करके उन्हें शिष्ट तरीके से जबाब देते जाते हैं और आखिर में वे हारकर थक जाते हैं और कुछ देर शांत पड़े रहकर पुनः अपनी घिनौनी हरकतें शुरू कर देते हैं। उन्हें क्या मालूम कि आप थकने वालों में हैं ही नहीं। आप तो कई-कई रातें बिना सोए भी गुज़ार लेते हैं; कई-कई दिन बिना कुछ खाए भी रह लेते हैं। पर बाकी महात्मा यह सब तो कर नहीं सकते हैं। साहिब जी के