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निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

सब महात्माओं से अलग हैं आप

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बस यही लगता है कि जहाँ आप हों, वहीं चले जाएँ। जब भी आप अपने प्रेमियों को याद करते हैं तो वे रुक नहीं पाते हैं, सब काम छोड़कर आपके पास पहुँच जाते हैं। तभी तो संगत कहती है-
जदों तारां खड़कदीयां, मेरे कोलों रुकेया नेइ जादां॥

सब महात्माओं से अलग हैं आप

किसी महापुरुष की पहचान दाढ़ी या जटाएँ नहीं है, इसलिए आपने इसकी ज़रूरत नहीं समझी, इसका सहारा नहीं लिया। कभी भभूत नहीं रमाई, बाल नहीं बढ़ाए, रँगे चोले नहीं पहने; सोचा कि बाहरी सहारा नहीं चाहिए। केवल भारत में आपका व्यक्तित्व है कि कोई चिह्न नहीं रखा। कुछ भिन्न-2 चिह्न रखकर इज्जत चाहते हैं। आपको इज्जत नहीं चाहिए। कुछ तो सत्संग में अपने लोगों को कहते हैं कि बीच-बीच में तालियाँ बजाते रहना..... हौसला बढ़ाने के लिए। फिर ताली से उसका क्या हाल होगा! वो तो नीचे गिर जाएगा। ‘अस्तुति निंदा नाहिं जिन, बैरी मीत समान। कह नानक सुन रे मना, मुक्त ताहि को जान॥’ महात्माओं के रहन-सहन को देख आपको दुख होता है। कोई साथ में बॉडीगार्ड लेकर घूम रहा है, कोई कमांडो, कोई लाल बत्ती का सहारा लेकर घूम रहा है। आपको भी सरकार ने एक बॉडीगार्ड दिया था। वो नाम भी नहीं लिया। मोटू-सा था। उसने सोचा कि यहाँ तो आज़ादी है, मिठाइयाँ वगैरह खाने को हैं, कोई टेंशन भी नहीं है। पर आपको वो चुभा। आपने अपने लोगों को कहा कि इसे हटाओ। मेरी संगत कह रही है कि साहिब जी असां डोरां तेरे उते सुट्टियाँ।’ इस बंदूक वाले को देख उनके दिल में आयेगा कि साहिब ने अपनी डोरें इस पर फेंकी हुई हैं ....रक्षा के लिए। इसलिए कहा कि इसे दूर करो।

एक ने आपसे कहा कि गाड़ी में लाल बत्ती लगवा लो; बड़ी संगत हो गयी है; आपको मंजूरी मिल जायेगी। आपने कहा कि नहीं

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साहिब बन्दगी

लगानी है। जो गाड़ी रोशनी देती है, वही रहने दो। जिनको मंजूरी नहीं
है, वे भी लगाए हुए हैं। ऐसा इसलिए करते हैं कि दिखाते हैं कि हम भी
कुछ हैं। पर यह कोई महात्मा की निशानी नहीं है; यह तो दिखावे वाली
बात है कि मैं खास आदमी हूँ।

शीश उतारे भूईँ धरे, तापर राखे पाँव।
कहें कबीर धर्मदास से, ऐसा होय तो आव॥

ये महात्मा नहीं हैं। आपकी जान को तो बड़ा ख़तरा भी है।
आपके लिए 10 लाख की सुपारी भी दी। आप नहीं डरे। आपके लोग
डरे; उन्होंने अपने घरों से तस्वीरें निकाल दीं। क्योंकि ऐसा करने के लिए
उन्हें मजबूर किया गया, धमकाया गया। आपने कहा कि ऐसा मत करो,
बाद में पछताओगे। आप बेपरवाह रहे।

.....तो आपने कहा कि बॉडिगार्ड नहीं चाहिए। एक तो वो बात
थी; फिर दूसरी बात थी कि वो मोटू था। आपने विचार किया कि जब
तक कोई हमला करेगा, तब तक यह तो फैसला भी नहीं कर पायेगा
जबकि मैं हमलावर की रिवालवर ही छीन लूँगा। क्योंकि आप फौज में
रहे हैं; यही तो सीखा है। आप Quick Reaction Team के
कमाण्डर भी रहे हैं। वो तो बार-बार पैंट ऊँची करता था; ऐसा लगता था
कि ज़मीन में गिर जाएगी। तो कोई बात होती तो पहले अपनी पैंट ठीक
करता, इसलिए आपने सोचा कि इसकी ज़रूरत नहीं है। फिर संतों को
यह सब शोभा ही नहीं देता है। मुख्य बात यह है। कबीर साहिब का कौन
सा बॉडिगार्ड था, नानक देव जी का कौन बॉडिगार्ड था! पर बलिहारी
कलयुग के महात्माओं की।

एक आदमी आपके पास आया और कहा कि नाम दो। आपने
कहा कि पहले कुछ सत्संग सुनो, तुम नये लग रहे हो। उसने कहा-
महाराज! मेरी उम्र 55 साल हो गयी है; कब स्वाँस छूट जाए, कोई पता
नहीं। उसने बताया; कहा कि मैं भारत वर्ष के बड़े-बडे पंथों को देखा,

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महात्माओं के संपर्क में आया, उन्हें देखा, पर कोई मुझे जंचा नहीं। पहले एक के पास गया तो वहाँ देखा कि बाबा जी सोया है तो 4 बंदूक वाले आगे तो 4 बंदूक वाले पीछे पहरा दे रहे हैं। फिर बुलिट प्रूफ कैबिन के अंदर से वो सत्संग करता था। मैंने सोचा कि इसने संगत के लिए कुछ नहीं सोचा और अपनी सुरक्षा का पूरा इंतजाम किया हुआ है। यदि इसे खुद अपनी जान के लाले पड़े हुए हैं तो हमें निर्भयता कैसे प्रदान करेगा! एक महात्मा को किसका डर! यह सोच मैं वहाँ से बिना नाम लिए ही चला आया। फिर कहा कि मैं भारत के बहुत बड़े पंथ से जुड़ा। पर मैंने देखा कि वहाँ पैसे का सौदा था। पैसे वालों के लिए इंतजाम अच्छा था, ग़रीबों के लिए बेकार। कुल मिलाकर अच्छा नहीं लगा। फिर जम्मू आया तो आपकी बड़ी निंदा सुनी। आपको भी देखा। मैंने चुपके से आपको देखा। मैंने देखा कि आप सबसे निराले हैं, सब काम खुद करते हैं, कहीं पतीला माँजने लग जाते हैं, कहीं कुछ। फिर आप फकड़ टॉइप लगे। आप निडर होकर घूमते रहते हैं। कोई बॉडीगार्ड भी नहीं है आपका। मैंने आपको परख लिया है; अब मुझे नाम दे दो।

लोग मोटे-मोटे महात्माओं को देख रहे हैं तो सोच रहे हैं कि वाह! क्या महात्मा है! एक ने आपसे कहा कि बड़े दुबले हो; हमारे गुरु जी तो लाल, गोल-मटोल हैं। आपने कहा कि तुमने यह कभी सोचा है कि उन्हें कितनी परेशानी है। मैं जानता हूँ कि क्या करते होंगे। जितना खाया, उतना फैलेगा। कण्ट्रोल नहीं किया। जमकर खाया; रोग हो गये। आपने कहा कि गुरु जी को मेरे हवाले करो। जहाँ-जहाँ मैं जाऊँगा, उनको साथ-साथ ही रखूँगा; जो-जो करूँगा, उनसे भी करवाऊँगा। 15 दिन में वो ऐम्स में मिलेंगे। बेटे, उसने मेहनत नहीं की, इसलिए रोग आ गया मोटापे का।

कुछ कहते हैं कि हमारा गुरु जी तो हमें कुछ कहता ही नहीं है; कहता है कि जैसे चाहे वैसे रहो। आपने कहा कि फिर वो कोई सुधार

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भी नहीं कर पायेगा। वो दुनिया को खुश रखना चाह रहा है। उसकी कोई निंदा भी नहीं होगी। जबकि एक महात्मा की पहचान ही निंदा है। ‘जब चारों ओर मार मार धाए, तब लालों के लाल कहाय ॥’ जिसकी निंदा नहीं वो महात्मा नहीं हो सकता। क्यों है निंदा! 13 अगस्त 1985 को आप राँजड़ी में आए। इस दौरान कभी किसी माई ने नहीं कहा कि उसे छेड़ा है; पर दुनिया कितनी जालिम है, कहा कि दो लड़कियों को लेकर भाग गया। जब 25 साल के थे, तब आपने विवाह नहीं किया। कोई आँख ख़राब नहीं थी, कोई बीमारी नहीं थी; अगर ज़रूरत होती तो कोई मिल जाती। अब बूढ़ा होकर भागना था क्या! ख़ैर हमारे देश की परंपरा है कि यहाँ हड्डियों की पूजा ही होती है। आप जो मना करते हैं कि भूत-प्रेतों की पूजा नहीं करो, सयानों से बचो, इससे सयानों का नुक़सान है, उनकी आमदनी पर लात बजती है। जब कोई आपसे नाम लेता है तो वो भूत-प्रेत से न्यारा हो जाता है, औरों को भी लाता है। अब जिस सयाने ने उसे सालों से फँसाया होता है, वो परेशान हो जाता है। उसकी आमदनी कम हो जाती है। तो वो निंदा शुरू कर देता है। आपने कभी संगत को नहीं कहा कि सयानों को पकड़ कर मारो, आपने कभी नहीं कहा कि शिवजी बुरे हैं। विरोध तो इन बातों से है कि आप कहते हैं कि हत्या नहीं मनाना, चंदा नहीं करना। एक महात्मा आता है तो पहले 100-100 रुपये और 5-5 किलो चीनी लेता है। समाज कब सोचेगा! इन लोगों की आमदनी आपके कारण से कम हो रही है। इसलिए निंदा करते हैं। अपने हितों के लिए, अपने स्वार्थों के लिए निंदा करते हैं, कोई दोषों के लिए नहीं। वास्तविकता तो जानते हैं।

वास्तव में आप 10 साल में जो इतना मशहूर हुए, उसमें 70 प्रतिशत सहयोग तो निंदकों का रहा है। किसी की कोई निंदा करे तो कहता है कि मर जाए उधर ही, कीड़े पड़ जाएँ, पर आप चिंतित नहीं होते हैं। आप मानते हैं कि निंदक ही आपके सच्चे प्रचारक हैं। इसलिए आपने कभी उनके ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही भी नहीं की।