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निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

बचपन से ही परिश्रमी रहे आप

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बचपन से ही परिश्रमी रहे आप

आप सात भाई थे। आपके पिताजी कई साल खटिया पर पड़े रहे। 9 जीवों का पेट पालना था, कैसे होता ! इतने में बड़े भाई की शादी हुई। बीबी आई तो उसने कहा कि हम इतने लोगों को नहीं पाल सकते। वो अलग हो गये। आपकी उम्र तब 10 साल की थी। आपने इतनी छोटी उम्र में ही कड़ी मेहनत करके पूरे परिवार को पालने में सहयोग किया। आपके पिताजी बहुत बड़े विद्वान थे। उन्होंने अपनी बहन की लड़कियों की शादी करवाई थी। पर अब घर की हालत ठीक नहीं थी। लड़कियों की शादी अच्छे घर में हुई थी। एक बार वो आईं और आपको 500 रूपये के नोट दे गयी। जब पिता जी को पता चला तो कहा कि तूने क्यों लिए पैसे? तब उन्होंने आपको उसी समय भेजा, कहा कि अभी वे रास्ते में ही होंगी, जा वापिस कर आ। आप तभी गये। यानी आपके पिता जी हिम्मत हारने वालों में से नहीं थे। ...तो तब 10 साल की उम्र से आपने जो कड़ी मेहनत शुरू की, उसके बाद आपने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आराम क्या होता है, इसका आपको पता न चला। 7 साल आपने परिवार की कड़ी मेहनत करके सेवा की; फिर 17 साल की उम्र में आपने फौज की नौकरी की। तब गुरु के सान्निध्य में आ चुके थे। फिर गुरु की जमकर सेवा की। गुरु जी कहते थे कि तू निराली चीज़ है।

भूत भी भाग जायेगा

दिन में 21 घण्टे आप काम करते हैं और इन 21 घण्टों में जितना काम आप करते हैं, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। किसी महात्मा की बात तो छोड़ो, कोई भी इंसान चाहे बहुत बड़ा धावक हो या पहलवान या अन्य मेहनती ही क्यों न होगा, नहीं कर पायेगा। यदि कोई भूत आपके साथ काम करने लगे तो वो भी भाग जायेगा, कहेगा कि यह

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क्या चीज़ है! उसको तो शरीर भी नहीं है, फिर शरीर वाले किसी इंसान की बात क्या करनी! कहने का मतलब है कि आप कभी थकते नहीं हैं। और 10 घण्टे का काम 3-4 घण्टे में ही कर लेते हैं। शरीर और दिमाग़ दोनों से आप बेहिसाब काम लेते हैं। इस शरीर को तो आप घोड़ा बनाकर कार्य लेते हैं। शरीर होकर आप कभी नहीं जीते।

राँजड़ी में सुबह आपको 400-500 लोगों की कहानियाँ सुननी पड़ती हैं और उन्हें सुनते-सुनते सैकड़ों काम भी करने होते हैं। क्योंकि कई आश्रमों का काम चल रहा होता है तो वहाँ का सामान पहुँचाना, सब व्यवस्था ठीक करना भी आपके जिम्मे है। फिर जहाँ-2 रोज़ का सत्संग होता है, वहाँ-2 जो-जो सामान भेजना है, वो भी आपके जिम्मे है। कोई भी इन कार्यों को करने के लिए नहीं है। हर काम में आप स्वयं ही शामिल हैं। फिर कई बार संगत के लिए खाना भी खुद बनाते हैं, खुद ही परोसते हैं। यह सब देखते ही बनता है।

कई बार आप अपने व्यायाम का समय भी नहीं निकाल पाते हैं, योगासन का समय भी नहीं निकाल पाते हैं। आश्रम के सब काम खुद करवाने, लोगों को काम में लगाना और कई बार खुद भी जुट जाना। खुद ही गैंती पकड़कर कुछ तोड़ने लगना, कभी खड्डा खोदने लगना आदि यह सब राँजड़ी जाने वाला ही समझ सकता है। ऐसा काम कोई महात्मा नहीं करेगा। कर ही नहीं पायेगा।

जितने कर्मठ आप हैं, कोई नहीं हो सकता है। अन्य महात्माओं की बात छोड़ो; वो तो राजाओं का जीवन जीते हैं, पर अन्य कर्मठ लोगों में भी कोई नहीं होगा। आपका मुकाबला नहीं है।

कई बार आपको राँजड़ी में काम करते-करते दो-ढाई तक बज जाते हैं। कई बार आप बिना नाश्ता किए ही वहाँ से सत्संग के लिए रवाना हो जाते हैं, क्योंकि नाश्ते का समय ही आपको नहीं मिल पाता है। सच

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तो यह है कि आपको कई बार कुछ ख़बर ही नहीं होती है। आपको बताना पड़ता है कि आपने नाश्ता नहीं किया है।

आप शरीर की थकान को मंजूर नहीं करते हैं। एक वो भी समय था, जब आप छः-छः महीने तक सोते नहीं थे। पर तब आप इतना कठिन परिश्रम नहीं कर रहे थे। अब जब आपकी संगत दिनो दिन बढ़ रही है तो कई बार आपको 10-10, 12-12 दिन तक सोने का अवसर नहीं मिल पाता है। कभी आप बीच में दिन को आराम करने की सोचते हैं तो वो भी नहीं हो पाता है। ऐसे में आपका शरीर अत्यंत ही थका हुआ लगता है। पर आपके वजूद को कभी थका हुआ नहीं पाया जा सकता है। आपकी वाणी की वही लय रहती है। आपके सफ़रनामे को सुनकर हर कोई हैरान रह जायेगा। उसे मंजूर करना ही पड़ेगा कि आप इंसान नहीं हैं। यदि वो ऐसा नहीं कर रहा है तो यह उसकी भूल है। जैसा काम आप कर रहे हैं, कोई इंसान के बस की बात नहीं है। कोई भूत भी इतना काम नहीं कर सकता है। वो भी थक जायेगा, पर आप थकने वालों में से नहीं हैं। आपका शरीर भी तौबा करता होगा कि किसके पल्ले पड़ गया हूँ। जितना परिश्रम आप करते हैं, कोई नहीं कर सकता है। कई-कई बार आपको भोजन करने का समय भी नहीं मिलता है। जो कठिन परिश्रम आप करते हैं, आज के महात्मा तो आपके साथ दो दिन रहकर ही तौबा कर देगा। क्योंकि अपने हक़ की कमाई से खाने की बात तो सुनने को मिलती है, परिश्रम करने की बात भी मिलती है, पर जितना परिश्रम आप करते हैं, इतना परिश्रम करने की बात किसी संत के बारे में पढ़ने-सुनने को नहीं मिलती है। फिर उस बीच आपकी चाल भी इतनी तेज़ रहती है कि जो काम एक घण्टे में करने वाला होता है, आप आधे घण्टे में कर लेते हैं। फिर आपका अपनी संगत पर होल्ड भी बड़ा प्यारा है। एक सच्चे कमाण्डर की तरह आप सबको चलाते हैं। फिर खुद भी उस काम में जुट जाते हैं। जितने भी आश्रम हैं, उनके जितने भी काम हैं, उन सबकी ख़बर आपको ही लेनी है। यह काम कोई भी दो दिन

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करेगा तो बीमार पड़ जायेगा। पर आप हैं कि फिर सत्संग भी 5-5 करने हैं दिन में। आराम कब करना है, कोई ख़बर नहीं है।

सर्दी हो या गर्मी, बारिश हो या तूफान, पर आपको कभी किसी ने रुकते नहीं देखा, कभी आपका कोई सत्संग स्थगित नहीं हुआ। यदि कोई हुआ भी तो उसका कोई अन्य ही कारण रहा। फिर इतना ही नहीं, कभी आपको बुख़ार हुआ तो भी आपने सत्संग नहीं छोड़ा। 104° बुख़ार होने पर भी आप सत्संग में हाज़िर नज़र आए और मुस्कराते हुए नज़र आए।

फिर दिन में 4-5 सत्संग करने, जिनमें से हरेक डेढ़ से दो घण्टे तक होता है। यानी दिन-भर बोलते ही रहना है। बोलने में भी आप कभी नहीं थकते हैं। कोई प्रोफेसर, कोई अध्यापक इतना नहीं बोल पायेगा। फिर यह नहीं कि हफ्ते में एक छुट्टी। कोई भी छुट्टी नहीं है। हफ्ते की बात नहीं है, पूरे साल में एक भी छुट्टी नहीं। आराम की चिंता ही नहीं है। हर दिन काम करना ही है। दिन हो रात हो, लगे ही रहना है। चाहे कड़कती धूप हो या फिर कड़ाके की ठंड पड़ रही हो, आप नहीं रुकते हैं। तूफान आए या फिर बरसात हो रही हो, आपको रुकते नहीं देखा जा सकता है। आपकी गाड़ी सड़कों पर हर हाल में दौड़ती ही नज़र आयेगी। आपको सत्संग के लिए निकलना ही है, चाहे सब लोग मौसम के कारण घरों में छिपकर क्यों न बैठे हों।

....फिर सत्संग करके कभी-कभी राँजड़ी पहुँचते-2 रात के 12 या एक भी बज जाते हैं। और वहाँ भी समय नहीं होता है। वहाँ भी आपके इंतज़ार में कई श्रद्धालु अपनी समस्याओं को लेकर पहुँचे होते हैं और सुबह तक का इंतज़ार करने वाले नहीं होते हैं। आपको उनसे भी निबटना है, सबकी बात सुनकर फिर कभी 1 तो कभी 2 बजे आप आराम करने जाते हैं। अब वो आराम भी हमारे देखने के लिए है। सच तो यह है कि तब ही तो आप अपने अध्यात्म खेल शुरू करते हैं। तब