Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

वो समय भी था............

Page 35Permalink

निराले सद्गुरु 35

आपको अलौकिक दुनिया में जाकर वहाँ के लोगों को चेतन करना होता है।

सुबह पुनः 4 बजे उठकर आप नित्य-कर्म करके कठिन परिश्रम में लग जाते हैं और कभी बोर नहीं होते।

वो समय भी था....

एक समय वो भी आया जब बढ़ते हुए विरोध के डर के कारण आपको सबने छोड़ दिया। विरोध के कारण लोग अपने घर में फोटो रखने में भी डरने लगे, साहिब बंदगी बोलना भी छोड़ दिया। पर आपने हिम्मत नहीं हारी, अपनी लय बरकरार रखी। न ही आपने अपनी वाणी में बदलाव लाया, न ही किसी से डरे। आप दुनिया को समझाते रहे। सी.बी.आई., आई. बी. की जाँच हुई। जाँच में कुछ नहीं आया, सुप्रीम कोर्ट ने भी आपको सत्संग वगैरह की छूट दे दी। सुर्पीम कोर्ट ने कहा कि आप सच्चे महात्मा है, आपको बेकार में तंग किया गया, आप अपना काम आज़ादी से कीजिए। आप लगे रहे; सत्संग करते रहे। आपने पुनः संगत को जोड़ा।

एक ही धुन में रहते हैं आप

आप जो दिन-रात इतनी मेहनत कर रहे हैं, उसमें एक ही धुन नज़र आती है। आप जो इतने आश्रम बनवा रहे हैं, उसमें भी एक ही धुन दिखाई देती है। ज़ालिम दुनिया द्वारा इतने कष्ट सहते हुए भी आप उन्हें क्षमा कर रहे हैं तो उसमें भी एक ही धुन दिखाई पड़ती है। आप इस संसार में आए हैं तो उसमें भी वही एक धुन नज़र आती है। आपमें यही धुन है कि सत्संग द्वारा जितने हो सकें, उतने लोगों को समझा सत्य-भक्ति में लगाकर अमर लोक ले जाएँ। आप इसी धुन में रहते हैं।

Page 36Permalink

36
साहिब बन्दगी

पैसे से आपको कोई मतलब नहीं है। आप किसी से कुछ नहीं माँगते हैं। यह काम आप एक भिखारी का मानते हैं। आप भोजन भी अपनी ही पैंशन से खाते हैं।

भोपाल में एक डॉ० साहब ने आपको 1 करोड़ दान में दिया। आपने उसे कोई शाबाशी नहीं दी, बल्कि यह कहा कि मेरा एहसान मानना कि मैंने ये पैसे आपसे लिए; फूल जाना कि आपने दिये। जिस काम के लिए आपने दिए, मैं उसी में लगाऊँगा।

आप जो आश्रम पर आश्रम बनवाते जा रहे हैं, उन सबके पीछे एक ही धुन है। आपको किसी आश्रम से कोई मतलब नहीं है। आप जगह-जगह आश्रम बनवाकर वहाँ के लोगों को बुलाना चाहते हैं कि आओ, सुनो हमें और सत्य-भक्ति को पाकर अपने देश को चलो। हर समय आप इसी धुन में रहते हैं। पर दुनिया के लोग काल की कष्टमय दुनिया में ही खो जाने से आपको आसानी से समझ नहीं पाते हैं और काल की ही भक्ति करके उससे मिल रहे कष्टों से छूटने का प्रयास करते रहते हैं। पर दुनिया आपको धीरे-धीरे समझेगी। वो काल से मिलने वाले कष्टों को भी समझेगी और आपकी शरण में आयेगी। यह होगा। यह ज़रूर होगा। आने वाला इंसान बुद्धिमान होगा। वो आपकी बात को समझेगा। उसे साहिब की बात समझ आयेगी। उसे समझना होगा।

आ जा रे…… आ जा रे…….आ जा रे॥
छोड़ दे सब तू काम जगत के, दर्श साहिब का पा ले रे।
सत्संग में तू आकर बंदे, रस अमृत को पा ले रे॥ आ जा रे…
काल की दुनिया भटक रहा तू, पग-पग कष्ट तू सहता रे।
साहिब लेने आए तुझको, समझ तू क्यों न पाए रे॥ आ जा रे….
भवसागर की धार कठिन है, बिन गुरु क्यों तू बहता रे।
शरण में आजा तू साहिब की, काहे जन्म गँवाये रे॥ आ जा रे…