निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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साहिब बन्दगी
पैसे से आपको कोई मतलब नहीं है। आप किसी से कुछ नहीं माँगते हैं। यह काम आप एक भिखारी का मानते हैं। आप भोजन भी अपनी ही पैंशन से खाते हैं।
भोपाल में एक डॉ० साहब ने आपको 1 करोड़ दान में दिया। आपने उसे कोई शाबाशी नहीं दी, बल्कि यह कहा कि मेरा एहसान मानना कि मैंने ये पैसे आपसे लिए; फूल जाना कि आपने दिये। जिस काम के लिए आपने दिए, मैं उसी में लगाऊँगा।
आप जो आश्रम पर आश्रम बनवाते जा रहे हैं, उन सबके पीछे एक ही धुन है। आपको किसी आश्रम से कोई मतलब नहीं है। आप जगह-जगह आश्रम बनवाकर वहाँ के लोगों को बुलाना चाहते हैं कि आओ, सुनो हमें और सत्य-भक्ति को पाकर अपने देश को चलो। हर समय आप इसी धुन में रहते हैं। पर दुनिया के लोग काल की कष्टमय दुनिया में ही खो जाने से आपको आसानी से समझ नहीं पाते हैं और काल की ही भक्ति करके उससे मिल रहे कष्टों से छूटने का प्रयास करते रहते हैं। पर दुनिया आपको धीरे-धीरे समझेगी। वो काल से मिलने वाले कष्टों को भी समझेगी और आपकी शरण में आयेगी। यह होगा। यह ज़रूर होगा। आने वाला इंसान बुद्धिमान होगा। वो आपकी बात को समझेगा। उसे साहिब की बात समझ आयेगी। उसे समझना होगा।
आ जा रे…… आ जा रे…….आ जा रे॥
छोड़ दे सब तू काम जगत के, दर्श साहिब का पा ले रे।
सत्संग में तू आकर बंदे, रस अमृत को पा ले रे॥ आ जा रे…
काल की दुनिया भटक रहा तू, पग-पग कष्ट तू सहता रे।
साहिब लेने आए तुझको, समझ तू क्यों न पाए रे॥ आ जा रे….
भवसागर की धार कठिन है, बिन गुरु क्यों तू बहता रे।
शरण में आजा तू साहिब की, काहे जन्म गँवाये रे॥ आ जा रे…