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निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

बिल्ली बोली-मेरे बच्चे कहां हैं

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साहिब बन्दगी

बिल्ली बोली-मेरे बच्चे कहाँ हैं

सब जीव आपसे बातें करते रहते हैं। आप सब जीवों का कष्ट समझते हैं। सब आपको अपने-अपने कष्ट सुनाते हैं। एक समय राँजड़ी आश्रम में एक बिल्ली ने कुछ बच्चे दिये। वे बड़ी शरारत करते थे। कभी वे खाना बनाने वाली जगह पहुँच जाते थे, कभी कहीं। आपने विचार किया कि यह तो ठीक नहीं हो रहा है। संगत को इनका झूठा भोजन खिलाने वाली बात है। यह विचारकर आपने उन्हें राँजड़ी से बड़ी दूर बाड़ी ब्राह्मणा में पहुँचा दिया।

रात को बिल्ली आपके कमरे में आई। ऐसे वो कभी आपके कुल्ले में नहीं आई थी। पर उस रात वो आपके कुल्ले में आई। जैसे आदमी घुटनों के बल बैठकर बात करते हैं, ऐसे ही वो बैठ गयी और आपसे प्रश्न करने लगी। वो कहने लगी कि मेरे बच्चे कहाँ हैं? तुमने उन्हें कहाँ भेज दिया है? वो आपसे बड़ी करुणामयी वाणी में अपना दर्द कहने लगी।

यह बातें कोई कहानियाँ नहीं हैं। इन सबमें सच्चाई है। पर सच है कि कलयुग की दुनिया पाखण्डियों पर ही विश्वास करती है। संतों के खेल को वो पाखण्ड ही समझती है।

साँच कहे जग मारन धाये, झूठे जग पतियाना।
कहो साहिब किसे समझायें, कहा कोई न माना॥

ऐसे निपटते हैं आप

कुछ समय पहले जब हमला हुआ तो 11 आश्रम जलाए गये। एक मंदिर जला दिया जाए तो पूरी दुनिया में हड़कंप मच जाएगा, हड़तालें हो जायेंगी। अगर किसी मस्जिद में आग लगा दी जाए तो हड़कंप मच जायेगा। अगर एक चर्च में आग लगा दें तो कैसा होगा! पूरी दुनिया में हड़कंप मच जायेगा। 'साहिब बंदगी' के 11 आश्रम जला दिए गये। यह कितना बड़ा ज़ुल्म है! सरकार ने भी साथ नहीं दिया, पुलिस ने भी नहीं। यह धार्मिक अपराध है, ईश्वरीय अपराध भी है। आपने

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किसी धर्म स्थान को नुक़सान नहीं पहुँचाया। यह सब आपकी प्लॉनिंग में नहीं है। जब आश्रमों को जलाकर भी जी नहीं भरा तो गुण्डों ने मिनिस्टर गुण्डों के साथ मिलकर रखबंधु आश्रम को तुड़वाने की प्लॉनिंग बना ली। रातों-रात आश्रम तोड़ने की योजना बन गयी, आर्डर भी पास करवा दिया। उस आश्रम की ज़मीन योगियों ने दान में दी थी। उसकी रिजिस्ट्री नहीं हुई थी। बस, पाखण्डियों को तो मौका ही चाहिए था। अब सवाल है कि किस मंदिर की रजिस्ट्री है! पहले वहाँ कारंवाही होनी चाहिए। दूसरे पंथों पर कारंवाही होनी चाहिए। साहिब बंदगी का तो 108 आश्रमों में से केवल वही आश्रम है, जिसकी रिजिस्ट्री नहीं है, बाकी की है। वो भी आपको दान में मिली है। कोई सरकारी भी नहीं है। बाकी पंथों की ज़मीनें तो सरकारी हैं, पर वहाँ कोई हाथ नहीं डालता है, क्योंकि वे राजनीति में हैं, मिनिस्टरों से मिली हुई हैं, उनसे जान-पहचान है। आप राजनीति में नहीं हैं। यही कारण है कि पाखण्डी सोचते हैं कि ये कुछ नहीं कर सकते हैं। पर उन्हें आपके सोटे का पता नहीं है। उन्हें नहीं मालूम है कि आपका अपराधी चाहे कहीं भी चला जाए, वो बच नहीं सकता है। तो आपने रात को आश्रम टूटने नहीं दिया, अंदर से ही उन्हें रोक दिया। आपने कहा कि सुबह तोड़ दें तो कोई बात नहीं है, फिर हम कानूनी कारंवाही कर लेंगे। तब तक आपने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री, उपआयुक्त (डेप्यूटी कमिश्नर)आदि तक लिखित संदेश भिजवा दिया कि हमारे साथ ऐसा-ऐसा होने जा रहा है। अब कुछ भी हो जाए, बिना किसी रोक के आप कानूनी कारंवाही के लिए तैयार हो गये। पाखण्डी कितनी भी घिनौनी हरकतें करते रहें, पर आपके काम शिष्ट ही रहे हैं। अब अखनूर हमले की बात क्या थी? मास्टर जी का वो दोहा था। आपने कहा भी था कि नहीं लिखो। पर दोहा ख़राब नहीं था। लोगों ने उसका अर्थ गलत लगाया। दोहा था-

निगुरा ब्राह्मण नहीं भला, गुरुमुख भला चमार।
देवतन से कुत्ता भला, नित उठ भूँके द्वार॥

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इसका अर्थ तो यह है कि ब्राह्मण होकर निगुरा नहीं रहना चाहिए। जो ब्राह्मण होकर निगुरा रहता है, वो अच्छा नहीं है। फिर बीच में अल्प विराम है और उसके बाद कहा है कि यदि कोई चमार है और वो गुरुमुख है, तो वो अच्छा है। फिर दूसरी पंक्ति का अर्थ है कि देवतन यानी जो मिट्टी, पत्थर आदि के मोहरे हैं, उनसे तो कुत्ता अच्छा है। यदि कोई चोर घर आ जाए तो वो भौंकता तो है न, पर वो तो कोई रक्षा नहीं कर सकते हैं। देवतन कोई ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नहीं बोला है। वो तो देवता हैं। लोगों को पता ही नहीं है। अर्थ नहीं समझा। फिर आपने हाई कोर्ट में हरिद्वार से छपी किताब भी दिखाई, जिसमें यह दोहा लिखा था। आबे-बाबाओं ने दोहे को तो बहाना बनाया। इससे पता चलता है कि हमारे धर्म में कितना पाखण्ड छिपा है। यह कितना खतरनाक काम किया और 5 हज़ार लोग झगड़ा करने आ गये। अगर एक इशारा आप कर देते तो सबकी बुरी हालत हो जाती। वो तो 10-20 लड़के जोश में आकर भागे। आपने तो मना किया। अगर नहीं करते तो कुछ और ही कहानी होती। पर आपके काम गुण्डों वाले नहीं हैं, संतों वाले हैं। सरकार ने भी किसी को नहीं पकड़ा, कोई कदम नहीं उठाया। आप निपटते तो हैं ऐसे लोगों से, पर अंदाज बड़ा प्यारा है आपका।

आपके ऐसे व्यवहार को देखते हुए ही तो आपको सन् 2002 के गाँधी पीस पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपने हिंसा का जबाब हिंसा से नहीं दिया। किसी भी गुरु पर कोई उँगली उठाए तो संगत का दिल तार-तार हो जाता है; वो भड़क उठती है, कहीं रोड़ जाम तो कहीं खूनी खेल खेला जाता है। एक निंदा का शब्द भी कोई अपने गुरु के लिए सहन नहीं कर पाता है। आपकी इतनी निंदा हुई; लोगों ने जगह-जगह पुतले फूँके, हमले किये गये, मारने का प्रयास किया गया, पर कहीं भी आपने अपनी संगत को न तो रोड़ जाम करने दिये, न ही कोई हिंसात्मक कार्य करने दिया। संतों ने ये काम किये ही नहीं। संतों में सहनशीलता

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होती है। यदि हिंसा का जबाब वे हिंसा से दें तो फिर उनमें और दूसरों में अंतर क्या रहेगा! जो सहनशीलता आपकी संगत ने दिखाई, उसका उदाहरण कहीं नहीं मिल सकता है। जहाँ कहीं वो परेशान हुई, जोश में आई, आपने उसे रोक लिया। आपने बार-बार समझाया कि यह मत सोचो कि तुम ही मेरे हो और वे कोई बेगाने हैं। वे भी मेरे ही हैं, मेरे पास ही आयेंगे। और ऐसा हुआ भी। 1-2 नहीं, 10-20 नहीं, 100-200 भी नहीं, हज़ारों कट्टर विरोधी आपके शिष्य हो गये और कइयों ने पछताकर आपसे क्षमा माँगी, आपको सच्चा महात्मा कहा। यह कोई मामूली बात नहीं है। ऐसा उदाहरण कलयुग में कहीं नहीं मिलेगा। आप जैसा व्यवहार कहीं मिल पाना संभव ही नहीं है।

चौकीचौरा में सत्संग था; कुछ बदमाश आए, कहा-सत्संग नहीं होने देंगे। आपने कहा कि यात्रा से आना है, चाय-पानी पीना है। कहा- यहाँ नहीं होने देना है। आपने कहा कि लड़ाई करना ठीक नहीं है, इसलिए आप खुद पास के थाने में गये, वहाँ कहा कि ऐसी-ऐसी बात है। उन्होंने कहा कि यहाँ के सरपंच ने ऐसा कहा है। आपने कहा कि लिख कर दो कि नहीं होने देना है सत्संग। उसने लिख दिया। आपने कहा कि यह आपने अच्छा किया। आपने बाद में केस कर दिया कोर्ट में। सालों से वो चक्कर काट रहे हैं कोर्ट के। यदि कोर्ट छोड़ दे तो आप हाई कोर्ट में अपील कर देंगे। यदि वहाँ भी छूट गये तो सुर्प्रीम कोर्ट में करेंगे। बाल सफेद कर देते हैं, पर छोड़ते नहीं और आख़िर जीतते ही हैं। ऐसे लोगों से पहले आप कानून से निपटते हैं। आप तो हारकर भी जीतते ही हैं। क्योंकि केवल कानून से ही नहीं निपटते, कुछ अंदर की बात भी होती है। रातों की नींद, दिन का चैन भी छिन जाता है ऐसे लोगों का। यदि कानून भी इंसाफ़ नहीं करे तो आपके सोटे को वो सज़ा देनी पड़ती है।

एक वकील ने कुछ गुण्डों को लेकर आश्रम की पाइप तोड़ी। आपने केस दर्ज करवाने को कहा तो केस रजिस्टर न करें वो। फिर

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आपने कोर्ट में अपील की। 10 साल हो गये; उनकी नानी की भी तौबा कर दी। 9 लोग थे। कुछ समय बाद उनमें से 3 लोग मर गये। जज रोने लगा, कहा कि तीन तो मर गये, बाकी को माफ़ करो। आपने कहा- नहीं, आप बरी करो, मैं हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में ले चलूँगा। दौड़ाऊँगा खूब, कुतुबमीनार, लाल किला सब दिखाना चाहता हूँ इनको।

पर आप मुकद्दमे लड़ने नहीं आए। किसी से झगड़ा करने नहीं आए। मुकद्दमा एक तरीका है, एक मजबूरी है, क्योंकि आप हिंसात्मक कार्यों से दूर रहते हैं। आसानी से आप मुकद्दमा नहीं करते, पर जब एक बार कर देते हैं तो फिर पीछे नहीं हटते, समझौता नहीं करते। हार जाना ठीक है, पर समझौता नहीं मंजूर है आपको। जिनपर आपने केस किये हैं, वे संदेश भिजवाते हैं, पर आप समझौता नहीं करते।

आप किसी को सताने नहीं आए। आपके लिए तो सब समान हैं; सब आपके हैं। आपकी लड़ाई झूठ के ख़िलाफ़ है, और बड़ी तगड़ी है। आपकी हर बात सच्ची है। ऐसे ही सत्य नहीं लिख रखा है।

पर आप एक तरीके से निपटते हैं। जब हमला हुआ था तो बाद में एक माई ने आपसे कहा-साहिब जी! कुछ करिए न। वो माई शायद चाहती थी कि आप अपना असली रूप दिखाएँ और हनुमान जी की तरह सब पाखण्डी रूपी राक्षसों को उठा-उठा कर फेंक दें.....कहीं दूर। यदि ऐसा काम किया तो राक्षसों वाला काम हुआ। पर आप संतों वाला काम करना चाहते हैं।

पाखण्डी तो लीडर बनने के लिए साहिब-बंदगी की ख़िलाफ़त करते हैं। एक नामी था, उसे लगा कि वो अब जाने वाला है। उसने घर वालों को कह दिया कि उसका अंतिम संस्कार साहिब-बंदगी के अनुसार करना। उसने गाँव वालों से भी कह दिया। जब उसका शरीर छूट गया तो कुछ लोगों ने बदमाशों से कह दिया कि इसका अंतिम संस्कार साहिब बंदगी के अनुसार नहीं होने देना है। बदमाशों ने आकर घर वालों

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को धमकाया और जबरन उसका संस्कार करवाया, कहीं पिण्ड दान करवाया, कहीं कुछ। जब आपको पता चला तो आपने अपने लोग भेजे, कहा कि कार्यवाही करनी है, क्योंकि इन्होंने एक पार्थिव शरीर के साथ बदतमीजी की है। आपने माई को कहा कि यदि तू केस नहीं करेगी तो मैं तेरी लड़कियों की तरफ से दावा करूँगा।

आप कानून का सहारा लेते हैं। यदि पुलिस भी कार्यवाही नहीं करती है तो आप न्यायालय में अपील करते हैं। आप नागरिक अधिकारों को जानते हैं।

एक शास्त्री जी अपने सत्संग में आपके ख़िलाफ़ बोल रहे थे, बड़ी निंदा कर रहे थे। वहाँ आपका एक नामी भी बैठा था, उसने कहा कि ऐसा तो नहीं है। शास्त्री जी ने कहा कि इधर आ, तू उनका शिष्य है क्या? कहा-हाँ। वो उधर ही उसे मारना शुरू कर दिया। यह गुण्डापन नहीं था तो और क्या था ! फिर 50-60 बंदे भेजकर उसपर हमला किया। आपको पता चला तो आपने पुलिस से संपर्क किया, पर कोई कार्यवाही नहीं की पुलिस ने।

आप सब काम तरीके से करते हैं, कानून का सहारा लेकर करते हैं, पर जब कहीं से कोई कार्यवाही नहीं होती तो फिर आपका सोटा वो काम पूरा करता है। मोल्हू, पलाँवाला के लोग कारगिल की लड़ाई के बाद अपने घर नहीं जा सके। बाकी छः महीने में चले गये, पर जो हमले वाले थे, वे दो साल वहीं रहे। उनकी लड़कियाँ ख़राब हो गयीं, पशु मर गये। यह था आपका सोटा। पर कुछ मूर्खों को तब भी होश नहीं आई।

यह सब इसलिए हुआ कि आपके नामियों को भी उन लोगों ने मारा था, घरों में नहीं जाने दिया था, तब अपने भक्तों के कष्टों को देख आपके मुँह से निकला था कि चिंता मत करो, ये भी अपने घर नहीं जा पायेंगे।

10-11 साल पहले की बात है, राँजड़ी में एक लड़का था, वो आपका बड़ा विरोध करता था, यदि कोई ग़रीब नामी होता तो उसका