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निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

आपको नाराज़ करना ठीक नहीं है

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साहिब बन्दगी

दिया। वो आपको आने नहीं देना चाह रहे थे, पर आप आधे घण्टे बाद उठकर चल पड़े।

फिर बाद में उन्होंने आपको फ़ोन किया, कहा कि आपने आधे घण्टे में मेरी कई शंकाओं का निराकरण कर दिया। अब मुझपर कृपा करो और बताओ कि मैं कहाँ पर दीक्षा लेने आऊँ?

कहने का भाव है कि आप हरेक की शंकाओं को बहुत ही कम समय में मिटा देते हैं। पर कोई समझने वाला हो। यही कारण तो है कि आपके पास विभिन्न पंथ वाले अपने-अपने पंथों को छोड़कर आपके पास चले आते हैं, क्योंकि अध्यात्म के विषय में जो खोजी होते हैं, उनकी तो कई शंकाएँ रहती हैं। जब उनकी शंकाएँ अपने पंथ में नहीं मिट पाती हैं तो वे उन शंकाओं को लेकर आपके पास आते हैं। आप जब उन शंकाओं को मिटा देते हैं तो वे प्रभावित होकर आपसे नाम ले लेते हैं; वे समझ जाते हैं कि आपके पास सच्चा ज्ञान है, केवल किताबी ज्ञान नहीं।

आपको नाराज़ करना ठीक नहीं

आप किसी से नाराज़ होना ही नहीं चाहते हैं। पर जब होते हैं तो परेशान हो जाता है वो। आपकी नाराज़गी दिल में खलबली मचा देती है। पर यदि ज़्यादा हो गये तो पागल हो जायेगा बंदा और यदि बहुत ज़्यादा हो गये तो फिर तो मर ही जायेगा।

आपके गुरु ने आपको गद्दी देते समय कोई ज़्यादा समझाया नहीं कि ऐसे-ऐसे करना। बस, उन्होंने एक शब्द लिया, कहा कि मेरे बेटों से नाराज़ नहीं होना। क्योंकि वे जानते थे आपकी नाराज़गी को।

एक नामी ने आपकी सेवा की, ज़मीन दान में दी, पर वो कहीं अहंकार में आकर बदतमीजी कर गया। आप उससे दिल से नाराज़ हो गये; बहुत नाराज़ हो गये। बेटा बाप को चाँटा मार दे तो कैसा है!

निराले सद्गुरु
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वो मर गया। कुछ देर बाद आपने सोचा कि देखते हैं कि कहाँ है। जब आपने देखा तो वो रेगीस्तान में गर्मी से तड़प रहा था। आपको दया आ गयी, सोचा कि कल्याण करूँ, पर फिर ख़्याल आया कि इसे तो अभी लाखों साल यहाँ सड़ना है। गुरु निंदा की यही सज़ा है। गुरु को नाराज़ करना ही नहीं है। आप समझाते हैं कि कभी यह मत सोचना कि गुरु को नाराज़ करके प्रभु की शरण में चले जायेंगे तो बच जायेंगे। नहीं! ऐसा नहीं होगा।

एक बादशाह के जहाँ यासीम खाँ बड़ी ऊँची पोस्ट पर था। वो कमाल जी का शिष्य था। मौलवियों ने बादशाह को शिकायत की कि इसे सज़ा देनी चाहिए, यह धर्म विरोधी बातें करता है। बादशाह ने कमाल को कहा कि ऐसा मत कहो; पर उन्होंने वही कहा। तो बादशाह ने कहा कि इसे ले जाकर चौराहे पर बाँध दो और हर आने-जाने वाले को कह दो कि इस पर पत्थर फेंके, थूके या मारे। जो नहीं मानेगा, उसे भी इसके साथ बाँध देना और उसके साथ भी यही कार्रवाही करना।

लोग आते गये और उनपर कुछ-न-कुछ फेंकते रहे; पर कमाल जी मुस्कराते रहे। यासीम खाँ उनका शिष्य था; वो भी संयोग से वहाँ से निकला। तो सिपाहियों ने कहा कि यह बादशाह का हुकुम है; आप तो हमारे अधिकारी हैं। पर कोई हमारी शिकायत कर देगा तो हमारी भी ख़ैर नहीं है, इसलिए कुछ भी मार दें। यासीम खाँ डर गया; उसने फूल की एक पखुण्डी उठाई और गुरु जी पर धीरे-से फेंका। कमाल ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। यासीम खाँ ने कहा कि गुरु जी, लोग आपको पत्थर मार रहे थे, आपपर थूक रहे थे, पर आप मुस्करा रहे थे। मैंने आपपर फूल फेंका तो आप रोने लग गये। कमाल ने कहा कि वो अनजान हैं, मुझे नहीं जानते, पर तू तो मेरी रुहानी शक्तियों को जानता था, इसलिए यह चोट मेरे दिल पर लगी है। तू भी यहीं बँध जाना था मेरे साथ। तब तेरा नाम भी मेरे साथ अमर हो जाना था।